ताज़ा रेजगारी

इनरलाइन पास

 

 

किताब के बारे में 

एक दुनिया जो हमारे इर्द-गिर्द होती है, जहाँ हम रहते हैं, हमारे कम्फ़र्ट ज़ोन की दुनिया और एक दुनिया उससे कहीं दूर- हमारे सपनों की दुनिया। लेकिन उस दूसरी दुनिया तक पहुँचना इतना आसान नहीं होता।वहाँ पहुँचने के लिए कुछ सीमाएँ लाँघनी पड़ती हैं,पार करने होते हैं मुश्किलों के कुछ दरकते हुए पहाड़।और कभी-कभी जान तक मुश्किल में डालनी पड़ती है। शायद इसलिए हममें से ज़्यादातर लोग वहाँ जाने से बचते हैं। सुविधाओं की सीमारेखा के पार मन के उन प्रतिबंधित इलाक़ों में पहुँचने के लिए हम सभी कोपार करनी होती एक लाइन, इनर लाइन और खोजना होता है अपना-अपना इनर लाइन पास। उमेश पंत का यात्रा-वृतांत ‘इनरलाइन पास’ एक ऐसी ही यात्रा की कहानी है जो बाहर की दुनिया के साथ-साथ मन के भीतर भी चलती है। 18 दिनों में पूरी हुई इस क़रीब 200 किलोमीटर की पैदल यात्रा के रोमांचक अनुभवों का एक गुलदस्ता है ‘इनरलाइन पास’ जो आपको ख़ूबसूरती और जोख़िमों के एकदम चरम तक लेकर जाता है।

लेखक के बारे में 

उमेश पंत पहाड़ों से ताल्लुक रखते हैं। उत्तराखंड के गंगोलीहाट (पिथौरागढ़) में परवरिश के बाद उनके सपने उन्हें दिल्ली खींच लाये। जामिया मिल्लिया इस्लामिया के मास कम्यूनिकेशन रिसर्च सेंटर से मास कम्यूनिकेशन में एम.ए. की डिग्री ली। फिर मुम्बई जाकर बालाजी टेलीफिल्म्स में एसोसिएट राइटर के तौर पर एक साल काम किया। मुम्बई में उनकी मुलाकात गीतकार और पटकथा लेखक नीलेश मिसरा से हुई और वो उनके मशहूर किस्सागोई के कार्यक्रम के लिए कहानियां लिखने लगे। उनकी  कहानियां बिग एफएम पर प्रसारित होती रही हैं। नीलेश के साथ ही वो ग्रामीण समाचार पत्र गाँव कनेक्शन में बतौर रोविंग राइटर भी जुड़े रहे। हिंदी के तमाम अखबारों में खबर और लेख से लेकर संपादकीय पृष्ठ तक जहां लेखनी चलाने का मौका मिला चलाते रहे।  रेडियो के लिए फिल्म और गाने भी लिखे। पत्र-पत्रिकाओं में कविताएं भी साथ-साथ छपती रही। हिंदी ब्लॉगिंग से एकदम शुरुआती दौर से जुड़े रहे और अब ‘गुल्लक’ नाम की एक वेबसाइट भी चलाते हैं। घुमक्कड़ी की लत लगी तो तस्वीर खींचने का जूनून भी साथ चल पड़ा। रचनात्मकता के इंद्रधनुष से अपने हिस्से का थोड़ा-थोड़ा हर रंग ज़िंदगी में भरने की ये कोशिश जारी है। फिलवक्त कॉन्टेंट प्रोजेक्ट के साथ जुड़कर ‘सावन’ और ‘रेड एफएम’ के लिए कहानियां लिख रहे हैं।


पहले ट्रेलर देखिये

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Posted by Hind Yugm Prakashan on Sunday, November 13, 2016


 ♣7 नवम्बर 2016

प्रीबुकिंग शुरू

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आपकी चिठ्ठियां

नीलेश मिसरा, गीतकार, किस्सागो, पत्रकार, लखनऊ

हमारी मंडली के ज़बरदस्त राइटर Umesh Pant ने किताब लिखी है. यात्रा वृतांत उनके लेखन का एक बहुत सशक्त हिस्सा है, या शायद वो पिच जिस पर वे सबसे बढ़िया खेलते हैं.

उमेश घुमक्कड हैं, अक्सर ट्रिप पर निकाल जाते हैं और उसे ट्रिपटोनिस्म का नाम भी दिया है!

हो सके तो उनकी किताब अवश्य पढ़ें. बधाई Shailesh Bharatwasi को भी ये किताब छापने के लिए.


महेश चन्द्र पुनेठा, पिथौरागढ़ ,उत्तराखंड.

एक नये अनुभव लोक की यात्रा में ले जाती हुयी अनूठी पुस्तक जो नये भूगोल ही नहीं बल्कि इतिहास और संस्कृति के छुपे व अधखुले पृष्ठों से हमारा परिचय कराती है. एक बार शुरू करने पर छोड़ने का मन ही नहीं करता है. किसी रहस्य-रोमांच से भरे उपन्यास से कम नहीं है यह यात्रा-वृतांत .

उमेश भाई का कहन का अंदाज भी अनूठा है.जितना सूक्ष्म अवलोकन उतना ही सूक्ष्म चित्रण भी. आपने भले कैलास यात्रा न की हो या उच्च हिमालयी क्षेत्र से बहुत अधिक परिचित न हों, आप घर बैठे-बैठे उस यात्रा के रोमांच का अनुभव कर सकते हैं.यह किताब उस यात्रा के लिए डराती भी है और उकसाती भी है और यात्रा हेतु मार्गदर्शन भी करती है.


अभी-अभी करीब 5000 किलोमीटर लंबी रोड ट्रिप से लौटी हूं…ट्रांस में हूं, अंदर बहुत कुछ समेट कर लाई हूं। मैं hardcore crazy traveller तो नहीं हूं, लेकिन ये महसूस करती हूं कि हर यात्रा हमें ख़ुद के और करीब ले जाती है…उमेश अक्सर ही ऐसी यात्राओं में रहता है। करीब साल भर पहले आदि कैलास से लौटने के बाद उमेश ने मुझे इस यात्रा के बारे में बताया था, मैं उसी वक्त से जानती थी कि ये यात्रा वृतांत एक किताब की शक्ल ज़रूर लेगा।

ऐसा ट्रैवलॉग आपने शायद ही पढ़ा होगा, कम से कम हिंदी में तो नहीं!

कंचन पंत, लेखिका, मुंबई

आप ट्रैवलर हैं, या नहीं हैं…आपको घूमना पसंद है, या नहीं है…आप एडवेंचर्स में यकीन रखते हैं, या नहीं रखते हैं…आप किस्मत को मानते हैं, या नहीं मानते इससे कोई फर्क नहीं पड़ता, ज़िंदगी में एक वक्त ज़रूर आता है जब हमें ऐसे ही किसी ‘इनरलाइ पास’ की दरकार होती है।

उमेश पंत ने अपना ‘इनरलाइन पास’ शायद हासिल कर लिया है, अब हमारी बारी है।

amazon.in पर प्री बुकिंग शुरू हो गई है…अपनी प्रति बुक करा लें। कीमत स्टारबक्स की एक कॉफी से भी कम है, और स्वाद! 12000 फीट की ऊंचाई पर, 3 डिग्री टेम्परेचर वाले वीराने में अचानक दिख गए ढाबे में चाय का जो पहला घूंट लिया था, बस वही स्वाद इस किताब में उतर आया है।

 


शिखा सिन्हा, DAAD इंडिया, दिल्ली

Umesh Pant का लिखा कुछ बिना पढ़े छोड़ना आसान नहीं होता। वो जितने गज़ब के फोटोग्राफर हैं उनकी यात्रावृतांत भी उतना ही सम्मोहक होता है।

Travelogues he writes are so full of adventure, information, lively and wrapped with lovely language. Waiting to get bound to ‘Inlinerline pass’ and set off to Kailash. All the best Umesh.

The journey begins…..🙂


Umesh Pant की किताब के आने की खबर स्वागतयोग्य है। मैं उनके लेखन का प्रशंसक रहा हूँ। किताब अच्छी है। पढ़िएगा आप सब भी।

सत्यानंद निरुपम

राजकमल प्रकाशन, दिल्ली


उस जंगल में जहां खतरनाक जंगली जानवर हो वहां पर बाईक से देर शाम रास्ता भटक जाने वाले, बर्फ से ढकी बिल्कुल सीधे चढ़ाई वाले पहाड़ पर जाने वाले और ऐसे ही ना जाने कितने किस्से है इनसे जुड़े हुये हैं.

इसलिये एक बार इनकी किताब को जरूर पढिये मजा आयेगा ये गारंटी मैं ले सकता हूँ।

अभिषेक वर्मा,

लखनऊ


रोहित जोशी, पत्रकार बीबीसी, दिल्ली

भारत, नेपाल और चीन की सरहद खींचते भूगोल की हमारी रोमांचक यात्रा पर Umesh का यह ट्रेवलॉग ‘इनरलाइन’ पास आ गया है..

कवर में ये जो आकर्षक ( 😉 ) छवि दिख रही है, पहचान ही रहे होंगे.. 😛

खैर! यात्राओं के या उनसे जुड़े रोचक किस्से-कहानियां सुनने-पढ़ने के शौकीन हैं, तो बुक करा लें.. यक़ीन दिलाता हूं निराश नहीं होंगे.. बढ़िया लिखा है, उमेश ने..


शुभम गुप्ता पुरवार, दिल्ली.

हर किसी के जेहन में यह सवाल होता है, खासकर उन लोगों के जेहन में जिन्होंने कभी भी ऊंचे-नीचे, उबड़-खाबड़ पहाड़ों में ट्रेकिंग नहीं की है। अक्सर लोग यह सवाल करते हैं कि पहाड़ों में ऐसा क्या होता है? तो इन सवालों का असल जबाव पहाड़ों में ही बसा हुआ है। पहाड़ों में दो तरह के लोग जाते हैं। एक वे जो सिर्फ घूमने के लिए और दूसरे वो जो खुद को खोजने और अपनी सामर्थ्य जानने के लिए जाते हैं। पहाड़ों में ट्रेकिंग करते समय आपका धैर्य, अनुशासन और आपकी दृढ़ता का पता लगता है। मैंने जब गुलमर्ग में ट्रेकिंग की थी तो उस दौरान जब पहाड़ की चढ़ाई का स्लोप 80-90 डिग्री हो गया था तब मुझे घबराहट होने लगी थी। मैंने गंडोला पॉइंट पहुँचने के लिए काफी कठिन रास्ता चुना था। एक जगह जब मैं पूरी तरह से थक चुका था और उस समय मेरा मन कहीं भी खिसकने तक का नहीं हो रहा था। बस यहीं उत्तर मिलता है कि लोग पहाड़ों पर क्यों जाते हैं।

इस किताब में Umesh Pant सर ने जिस जगह की बात की है वह दुनिया के दुर्लभतम चढ़ाई करने वाली जगहों में से एक है। पहाड़ों में मौसम का कुछ भी नहीं पता होता है, 1 किलोमीटर चढ़ाई करो तो धूप निकली हुई है और अगले किलोमीटर पर पहुंचे तो वहां तेज़ बारिश हो रही है। बस मुझे इस किताब के शीर्षक को पढ़कर यही लगता है कि इस किताब में यात्रा के रोमांचक किस्से जुड़े हुए होंगे। अगर आप भी पहाड़ों के शौक़ीन है उनके बारे में जानना चाहते हैं तो इसको ज़रूर पढ़ें।
सर, आपको बहुत बहुत बधाई और आपको असीम शुभकामनायें 🙂
चाय,


♣19 नवम्बर 2016

चाय, चकल्लस और ‘इनरलाइन पास’

कुंजुम ट्रेवल कैफ़े हौजखास में 19 नवम्बर 2016 को ‘चाय और चकल्लस’ के साथ इनरलाइन पास पर बातचीत. साथ में ट्रेवल पोएट्री का फ्लेवर भी.


♣20 नवम्बर 2016

किताब गई प्रेस में 🙂

 


यहां-वहां इनरलाइन पास की चर्चा 

 

 

 

 

हिन्दी साहित्य के जाने माने ब्लॉग जानकीपुल  पर किताब का अंश

जानकीपुल पर किताब की समीक्षा 


 

 

 

 

 

 

 

 

लल्लनटॉप पर किताब का अंश


 

 

 

हिन्दी के जानेमाने ब्लॉग ‘कबाड़खाना’ पर किताब का अंश


 

 

 

  न्यूज़ इंडिया पर लेखक पर चर्चा और किताब का अंश

 


 

 

 

 

चिट्स एंड चैटर्स पर समीक्षा


 

 

 

 

सत्याग्रह (स्क्रोल) पर किताब की समीक्षा 


 

♣25-11-2016

किताब का पहला प्रिंट तैयार 

 


साल की चुनिन्दा किताबों में शुमार हुई ‘इनरलाइन पास’

नवभारत टाइम्स, 24 दिसंबर 2016


30 जनवरी 2017

दैनिक जागरण में समीक्षा 

 


25 जनवरी 2017

नवभारत टाइम्स में ‘इनरलाइन पास’ का नन्हा सा ज़िक्र 


30 मई 2017

‘इंडिया टुडे में समीक्षा 

 


पाठकों का प्यार 


10 फ़रवरी 2017

इनरलाइन पास का दूसरा संस्करण बाज़ार में  


 


क्या आपको मिला आपका ‘इनरलाइन पास’ ?

शिखा सिन्हा, डाड, नई दिल्ली 


शबनम खान, लेखिका, नई दिल्ली 


 

आप भी चाहें तो बता सकते हैं -क्या आपको मिला आपका ‘इनरलाइन पास’ ?