ताज़ा रेजगारी

हम अपने भीतर के कट्टरपंथ को फांसी क्यों नहीं दे देते ?

yaqub memon

ऐसे मौकों पर मैं खुद को बहुत अकेला और उदास पाता हूं। मुझे नहीं पता होता कि मैं किस तरफ खड़ा होउं। मैं अपने आपको उस ‘सामूहिक चेतना’ का हिस्सा बनते हुए नहीं देख पाता जिसे ‘किसी’ को फांसी मिलने पर ‘फांसी मुबारक’ सरीखे जुमले उछालने का मौका मिल जाता है। जिसे किसी को फांसी मिलने में एक ‘उन्मादी सकून’ मिलता है।

मेरे असमंजस और उदासी की मूल वजह इस सवाल के जवाब की तलाश में छिपी है कि वो ‘किसी’ कौन है ? वो एक आदमी है जिसने ऐसे बम धमाकों में भूमिका निभाई जिसमें दो सौ से ज्यादा मासूमों की जानें चली गई ? वो पाकिस्तान की शरण पाया राह भटका हुआ नागरिक है जो भारत में दहशत फैलाकर अपने जीवन को सफल मान लेता है ? वो एक मुसलमान है जो एक दशक पहले कई हिन्दुओं और मुसलमानों की मौत की वजह बन जाता है और फिर उसी हिन्दुबहुल देश में फांसी पर चढ़ाया जाता है और उत्सव की वजह बन जाता है ? वो एक इन्सान है  जिसने एक ऐसी गलती की जिसकी सज़ा मौत से कम और कुछ थी ही नहीं ? वो एक बदनसीब है जिसे उसी दिन इस दुनिया से विदा कर दिया गया जिसदिन वो इस दुनिया का हिस्सा बना ? वो एक मोहरा है जिसे पहले एक खास मानसिकता की कुत्सित सोच ने अपनी विचारधारा के विस्तार के लिये इस्तेमाल किया और फिर एक दूसरी खास मानसिकता ने अपनी विचारधारा के ? वो एक सिरफिरा है जिसके सर पर कोई जुनून सवार है ? वो एक ‘विस्थापित आक्रोश’ है जिसे सियासी रंग देकर सत्तासीनों ने अपनी असफलता को छिपाने की कोशिश की ?

याकूब मैमन आंखिर कौन है ? उसकी सज़ा का विरोध करने वाले कौन हैं ? उसकी सज़ा का उत्सव मनाने वाले कौन हैं ? उसके नाम पर फेसबुक पर फसाद जैसी स्थिति बना देने वाले कौन हैं ? उसकी फांसी को किसी मसालेदार बिरियानी की तरह टेलीविज़न और अखबारों में पे परोसने वाले कौन हैं? उसकी मौत पर मातम मनाने वाले कौन हैं ? उसकी मौत पर विजय का उत्सव मनाने वाले कौन हैं ? और इस सब से बड़ा सवाल इन सबमें कौन एकदम सही है और कौन बिल्कुल गलत ?

मानवाधिकार ज्यादा बड़ा है या राष्ट्रवाद ? सबक ज्यादा ज़रुरी है या सज़ा ? न्याय क्या है ? मुम्बई में धमाके करके कई जान लील लेने वाले अपराधी का गुनाह बड़ा है या दिल्ली में धमाकों को अंजाम देकर कई मासूमों की असमय हत्या कर देने वाले का दोष ज्यादा बड़ा है ? एक मुसलमान हत्यारे के जुर्म और एक हिन्दु हत्यारे के जुर्म में क्या अन्तर है ?

सैकड़ों सवाल ज़हन के दरवाज़े पर लगातार दस्तक देते हैं ऐसे मौकों पर। और दिमाग काम करना बंद कर देता है। सब अपने अपने विचार को सही ठहराने में तुले हैं। सब बहाने से अपने अपने राष्ट्रवाद, अपनी अपनी धर्मनिर्पेक्षता, अपनी-अपनी इन्सानियत को साबित करने पर तुले हैं। सब आपस में भिड़े हुए हैं।

जो बोल रहे हैं वो बहुत बोल रहे हैं… उनके साथ बोलने वाले बहुत हैं.. वो एक ही तरह की बात बोल रहे हैं.. जो खामोश हैं, उन्हें बोलने से डर है. ‘स्पाइरल ऑफ़ द साइलेंस’ तो सुना होगा आपने.. आमतौर पर लोग मेजोरिटी की बात के खिलाफ या उससे अलग राय रखने में कतराते हैं.. क्यूंकि ऐसा करने पर मेजोरिटी से पृथक्करण या फिर हिंसा का शिकार होने का खतरा होता होता है.. इसी वजह से मेजोरिटी जो मानती है ज़्यादातर लोग उसका अनुसरण करने लगते हैं..  याकूब की फांसी के बाद भी यही हो रहा है..

ऐसा माहौल बनाया जा रहा है कि एक याकूब के मरने से देश का आतंकवाद ख़त्म हो जाएगा.. पर क्या सच्चाई एकदम इसके उलट नहीं है…? क्या इस फांसी से देश का हिन्दू और मुसलमान विभाजित नहीं हुआ.. ? इसलिए नहीं कि देश के कुछ मुसलमान याकूब के समर्थन में उतर आए हैं.. कि देश के कुछ हिंदुओं को इससे राहत मिली है.. बल्कि इसलिए कि इस बहाने से दक्षिणपंथी कट्टरपंथ और इस्लामिक कट्टरपंथ के कई नकाब उतर गए हैं.. दिलों का ज़हर बातों में साफ़ दिख रहा है.. ये ज़हर दोनों तरफ है.. इस तरह की फांसियां क्या हमारे आस-पास पहले से हवा में घुले ज़हर की सांध्रता को और बढ़ाती नहीं हैं ?

फिर सवाल ये उठता है कि फांसी क्या है ? उसका मकसद क्या है ? क्या इसका मकसद इतना भर है कि तुमने हमारे लोगों को मारा इसलिए हम भी तुम्हारी हत्या कर देंगे.. यानी हत्या का बदला हत्या.. फिर इसमें ‘न्याय’ जैसा क्या है ? इसे ‘बदला’ क्यों न कहा जाए ? क्या फांसी का मकसद देश से आतंकवाद को मिटाना है ? ताकि आतंकी अगली बार से हिम्मत ना करें ? पर क्या इन आतंकियों में से ज़्यादातर अपनी जान को पहले ही हथेली पर रखकर नहीं निकले होते हैं ? क्या उन भटके हुए बदनीयत लोगों के मन से पहले ही मौत का डर निकाल नहीं दिया जाता ? फिर फांसी का मकसद आखिर किसे डराना है ? क्या एक आदमी को लटका दिए जाने से उन सैकड़ों लोगों के घर फिर से आबाद हो जाएंगे जिन्होंने अपने अपनों को खो दिया ? मैं बहुत सोचने की कोशिश करता हूं और इस बात का कोई संतोषजनक जवाब नहीं पाता कि फांसी आतंकवाद की समस्या का हल आखिर कैसे है ? याकूब को नागपुर की जिस जेल में फांसी दी गई उसके बाहर जश्न मनाते लोगों का मनोविज्ञान क्या है .. और क्या है उन उन लोगों का मनोविज्ञान जो सैकड़ों की संख्या में मुंबई में उस जगह जमा हुए जहां याकूब को सुपुर्दे ख़ाक किया जाना था…? एक ही देश के इन अलग-अलग नागरिक समाजों की सामूहिक चेतना इतनी अलग क्यों है ? इन दोनों में से किसकी सामूहिक चेतना को ‘देश की सामूहिक चेतना’ माना जाए ?

और आखिर में अपने अकेलेपन में मुझे एक ही जवाब मिलता है –

हम एक समाज में एक साथ चैन से इसी शर्त पर रह सकते हैं कि हम हमेशा एक दूसरे के खिलाफ तलवारें लेकर खड़े रहने की जगह एक दूसरे के दुःख-दर्द और एक दूसरे की असुरक्षाओं को समझें.. तमाम धार्मिक और सामाजिक विभिन्नताओं के बावजूद हमारी सफलताएं-असफलताएं साझा हों, हमारे जश्न और मातम की वजहें एक समान हों.. एक ही घटना किसी ख़ास समुदाय के लिए जश्न और किसी के लिए मातम की वजह है तो हमारे सामाजिक ताने-बाने में ज़रूर कोई खतरनाक बुनियादी कमज़ोरी है.. यही कमज़ोरी बार-बार हमें अलगाववाद की तरफ ले जाती है..  हमें नफरत करने की हद तक बांट देती है.. खासकर भारत जैसे देश में अल्पसंख्यक समुदायों के मनोविज्ञान को बहुसंख्यक समाज को समझना होगा… इनमें से  किसी एक की ‘सामूहिक चेतना’ को न्याय का आधार बना लेना भारत जैसे देश के लिए एक खतरनाक स्थिति है.. फांसी कम से कम आतंकवाद जैसी भयानक समस्या का हल तो नहीं हो सकता.. बात-बात पर एक दूसरे की नीयत और देशभक्ति पर सवाल उठाने वालों को समझना होगा कि एक दूसरे को समझने की कोशिश करना ‘राष्ट्रदोह’ नहीं हो सकता..ठीक उसी तरह जैसे आँख बंद करके दूसरे को दोषी मान लेना ‘राष्ट्रभक्ति’ नहीं हो सकता.. गलतियां दोनों पक्ष करते हैं.. किसी भूगोल में कोई पहले तो किसी दूसरे भूगोल में कोई पहले गलती करता है. किसने गलती पहले की इससे दूसरे पक्ष की  प्रतिक्रिया सही या गलत नहीं हो जाती..

एक लाइन में ये कि इंसानों की मौत चाहे वो हिन्दू की हो, चाहे मुसलमान की हो, चाहे धमाके से हो, चाहे तलवारों से हो, चाहे आगजनी से हो, चाहे फांसी से हो, किसी भी तरह जस्टिफाई नहीं की जा सकती.. मौत के बदले मौत की धारणा हमारे आस-पास के माहौल को मौत की तरफ ही ले जाएगी.. और इसकी ज़द में हम खुद कब आ जाएंगे कौन जानता है ?

ऐसा हो इससे पहले हम अपने भीतर के कट्टरपंथ को फांसी क्यों नहीं दे देते…?

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