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बीमार, तीमारदार और इंतज़ार

अस्पताल इंतज़ार के मायने समझने की सबसे अच्छी युक्तियों में होते हैं. बच जाने और ख़त्म हो जाने के बीच, ज़ख्म और दवाओं के बीच, उम्मीदों और हताशाओं के बीच, बीमारों और तीमारदारों के बीच वहां इंतज़ार का एक अदृश्य पुल होता है जिसपर चलते हुए अचानक ज़िंदगी एक दर्शनशास्त्र में बदल जाती है. और हम आप एक दार्शनिक में. कई बार ज़िंदगी भी उसी अस्पताल की तरह लगने लगती है जहां अपनी-अपनी देह के बिस्तर पर हम-आप लेटे हुए हैं.

दरअसल हम सब एक अनिश्चितकालीन इंतज़ार को जी रहे हैं. हर घड़ी किसी नयी चीज़ का इंतज़ार. एक चीज़ जो अमूर्त है. हम जिसके नक़्शे बनाते हैं. नक़्शे जो हम अपने ज्ञान और अनुभवों की सीमा में बनाते हैं. कुछ हैं जो मानते हैं कि नक़्शे तो पहले ही बन चुके हैं. हमें बस उनपर चलकर जाना है. और फिर एक सरहद होगी कहीं. जिसके पार की बात हम कभी नहीं जान पाएंगे. कयास उसके बारे में भी लगाते हैं हम. पर उसके बाद क्या होगा उसका इंतज़ार नहीं करते. मौत. इंतज़ार भी मौत नाम की उस सरहद के पार दम तोड़ देता है.  तो क्या दुनिया के तमाम इंतज़ार मौत के बाद मर जाते हैं ? क्या दुनिया का हर एक इंतज़ार दरअसल किसी नयेपन का नहीं बल्कि उस पुरानी सी, बासी सी, जर्ज़र और डरा देने वाली चीज़ की तरफ ही नहीं ले जाता जिसका नक्शा तक हम नहीं बना सकते और जो हमारे नक़्शे में कहीं न होकर भी कही भी आ सकती है.

हालिया रिलीज़ हुई अनु मेनन की फिल्म ‘वेटिंग’ पर लिखते हुए भले ही ये ख़याल दिमाग में आ रहे हों पर ‘वेटिंग’ की कहानी मौत के बारे में नहीं है. वो दरअसल ज़िंदगी के लिए जूझने की कहानी है. और उस जूझने के बीच एक उम्मीद की कहानी है कि जो खोया है वो ख़त्म नहीं हुआ अभी. संभावनाएं कम हैं पर शायद वो खोया हुआ मिल ही जाए. ‘वेटिंग’ उसी संभावना को तलाशने की कहानी है. पर वो तलाश जो आपकी तो है पर आपके हाथ में नहीं है. आपके लिए कोई और उस संभावना को तलाश रहा है. जो खोना है आप वो खो चुके हैं. अब गेंद आपके पाले में नहीं रही. वो उसके पाले में है जिसके पास आप जैसे कई हैं जिनकी खोयी हुई उम्मीदों को उन्हें तलाशना है. आप उन कईयों में से एक हैं. आपकी तलाश उनका बस पेशा है. आपकी तलाश आपके लिए सबकुछ हो सकती है पर उनके लिए नहीं जिन्हें आपके लिए उस संभावना को तलाशना है. डॉक्टरी का ये पेशा शायद दुखों से उबारने की कोशिश करते-करते दुखों से ऊब जाने का पेशा है. शायद इसीलिए कभी-कभी डॉक्टर दुनिया के सबसे भावहीन प्राणी लगने लगते हैं. खासकर तब जब डॉक्टरी एक पेशा भर रह जाता है और अस्पताल दुखों से उबारने के नाम पर पैसा लूटने के केंद्र भर रह जाते हैं.

‘वेटिंग’ दो तीमारदारों शिव (नसीरुद्दीन शाह) और तारा (कल्की कोच्लिन) की कहानी है जिनके अपने ज़िंदगी से थोड़ा आगे और मौत के एकदम करीब खड़े हैं. दो तीमारदार जो अकेले हैं. एकदम अलग-अलग दुनिया के. एक जो नयी जनरेशन की है. जो ट्विटर में हज़ारों फ़ोलोअर्स के ज़रुरत के वक्त काम न आने से परेशान है. और दूसरा जिसे ये भी नहीं पता कि ट्विटर होता क्या है. एक जिसकी भाषा में ‘फ़क’ और चोमू जैसे लफ़्ज़ों की बेरोकटोक आवाजाही है और दूसरा जिसके लिए इन्हें भाषा में शामिल करना नयी जनरेशन की उत्श्रृंखलता है. लेकिन दोनों का दुःख एक सा है. दोनों की ‘सफरिंग’ एक सी है. दोनों का इंतज़ार एक सा है. और यही उन दोनों को एक दूसरे से जोड़ता है. और यही है जो दोनों को उनके अकेलेपन में तोड़ता है.

‘वेटिंग’ अस्पतालों के बेंचों में दुबक कर बैठे उस डर की कहानी है जो अपनों के खो देने के बाद जन्म लेने वाली असुरक्षा से आता है. ‘उनके बाद हमारा क्या होगा ?’ का भाव. इस भाव में उनके लिए चिंता है जो ज़िंदगी और मौत के बीच किसी महीन रेखा में खड़े हैं, या फिर ये अपने लिए चिंता है ? क्यूंकि उन लोगों पर हमारी भावनात्मक निर्भरता है. और इस तरह उन पर निर्भर होने से हमारी ज़िंदगी के मायने बनते हैं, बदलते हैं. उनके न होने से शायद हमारी ज़िंदगी बदल जाएगी.

शिव ने जो चालीस साल बिना बच्चे के अपनी पत्नी के साथ गुजार लिए वो चालीस साल क्या उसके न होने से बेमायने हो जाएंगे. या फिर वापस लौटना उस उस गिल्ट को दूर करने के लिए ज़रूरी है जो ‘बस एक बार’ ‘किसी और’ के साथ शारीरिक सम्बन्ध बनाकर शिव कई सालों से ढो रहा है. पति की दुर्घटना से कुछ समय पहले ही हुई तारा की नयी-नयी शादी जिसमें वो एक दूसरे के साथ अब तक ‘बोर’ नहीं हुए थे , क्या उसके पति का जाना बस इतना ही है कि इसके बाद उसकी ज़िंदगी में अंतरंग पलों का कोई साथी नहीं रहेगा ? और ऐसा होना उसकी ज़िंदगी में बोरियत भर जाएगा ?

हमारी ज़िंदगी में हमारे अपनों के होने के मायने क्या हैं ? बिना जताए, बिना एहसास कराये, बिना बोले, बिना साथ रहे भी क्या ये मायने ऐसे ही रह जाएंगे. क्या किसी का न होना वो खालीपन  भर है जो किसी के होने से भर जाता है ? या उस न होने से ज़िंदगी के नक़्शे पे कुछ और भी बदलता है ?  ‘वेटिंग’ इस दार्शनिक से सवाल का जवाब खोजने के लिए एक ऐसी जगह मोहय्या कराती है जहां आपके सिवा और कोई नहीं होता. ठीक वैसा वक्त जब आप उन दुखों को भोग रहे होते हैं जिन्हें भोगने के लिए आपके सिवा आपके साथ और कोई नहीं होता. कई रिश्तों के होने से जो सुख मिलते हैं उन रिश्तों के ख़त्म हो जाने से मिलने वाले दुःख आपको अकेले भोगने होते हैं. उनका कोई और सहभागी नहीं होता.

फिल्म अस्पतालों की दुनिया के उस सच को भी दिखाने की कोशिश करती है जहां डाक्टरों को भगवान का दर्ज़ा मिल जाता है. और भगवान होने का ये एहसास उन्हें एक अच्छा इंसान नहीं रहने देता कई बार. वो दुनिया जहां मरे हुए आदमी को कुछ और दिन बस इसलिए वेंटिलेटर पे रख दिया जाता है ताकि उन दिनों की मोटी फीस वसूली जा सके. मरे हुए आदमी से मुनाफ़ा कमाने की तरफ बढ़ रही अस्पतालों की महंगी व्यवस्था पर भी फिल्म एक तंज़ सा करके छोड़ देती है.

खुद से, खुद के दुखों से, खुद की असुरक्षाओं से नज़रें मिलाने का मन हो तब तो ‘वेटिंग’ देखी ही जानी चाहिए, लेकिन नसीरुद्दीन शाह, कल्की और डॉक्टर के किरदार में रजत कपूर की अदाकारी के लिए भी ये फिल्म देखी जा सकती है.

‘वेटिंग’ देखते हुए इस बात का इंतज़ार नहीं होता कि अब क्या होगा ? फिल्म आपको ठहरने का धैर्य देती है. या फिर ये कि आपमें ठहरने का धैर्य है तभी आप इस फिल्म को देखने जाइएगा. यही ठहराव फिल्म के केंद्र में है. इंतज़ार दरअसल तमाम घटनाओं के बीच उस ख़ास घटना को खोजने के लिए ठहरना है जिससे उस ख़ास मौके पर जाती तौर पर हमें सबसे ज़्यादा फर्क पड़ता है. अपने-अपने इंतज़ार को जीते दो इंसानों की एक ख़ास कहानी है ‘वेटिंग.’ फिल्म की निर्देशक अनु मेनन को इस इंतज़ार के लिए शुक्रिया ज़रूर कहा जाना चाहिए. ऊपर जो लिखा है तारीफ़ तो उसे समझा ही जा सकता है.

 

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