ताज़ा रेजगारी

यात्रा में होना

पहाड़ों की पगडंडियों पर चढ़ते हुए

मैनें अपना पहना हुआ आलस उतारा

और पहन ली कईयों की उतारी हुई थकान

 

कंकड़ों की चुभन पहनी

तो उतार ली अपने तन की कोमलता

अपने मन की कठोरता उतारने के बाद

नदी की तरलता पहन ली

 

मेरे भीतर बहुत कुछ उबल रहा था

जो मैंने धीरे-धीरे उतार लिया

स्निग्धता से भरे हुए साफ़ सुथरी बर्फ के ग्लेशियर पर

और पहन ली उसकी शीतलता

 

दुपहरी की धूप पहनकर मैं गला आया

अपने भीतर के पत्थर को

और कई बार यूं भी हुआ

कि जो भय पहना हुआ था मैंने

उसे यात्रा की मुश्किलों के कांटों ने

खुद ही फाड़कर उतार दिया

 

मैं जिस-जिस गाँव में गया

वहां मैंने उतारा अपने भीतर का शहर

मैंने हर यात्रा में एक नया गाँव पहना

वहां के लोगों की मुस्कुराहटें पहनी

(उन के दुःख-दर्द पहन सकूं इतनी कुव्वत नहीं है मुझमें )

मेरे भीतर की भाषा ने उनके शब्द पहने

और मैं उतार आया कई बेमानी से शब्दों को उन गांवों में

 

मैं अपने एकाकीपन को उतारकर

दे आया सहयात्री अजनबियों को

और उनके दिए हुए अपनेपन को पहनकर

ले आया अपने साथ

 

यात्राओं में मिली मुझको

उतरते हुए सूरज की लालिमा,

छलछलाते झरनों की चंचलता

गगनचुम्बी पर्वतों की भव्यता

और कई ऐसी चीज़ें जो हैं

रंगहीन, गंधहीन, स्वादहीन

जिन्हें देखा नहीं जा सकता

बस महसूस किया जा सकता है

 

यात्राओं ने मुझे सिखाया

कि कई बार पहनना और उतारना

महसूस करने से अलग नहीं होता

 

मैं जहां गया

वहीं उतार आया अपना पुरानापन

और वहां से पहन लाया एक नया मैं

जो हर नयी यात्रा के बाद

अक्सर लगने लगता है पुराना

 

यात्रा में होना दरअसल

अपना पहना हुआ उतारकर

ज़िंदगी का उतारा हुआ पहन लेना है

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