ताज़ा रेजगारी

Mumbai diary

‘मैट्रो’ की नयी भाषा सीखती एक मैट्रोसिटी

June 23, 2014 // 1 Comment

Mumbai Diary (23  Jun 2014) तकरीबन साड़े तीन महीने बाद मुम्बई लौटा हूं। दिल्ली की लू के बनिस्पत मुम्बई की ठन्डी हवाएं राहत देने वाली हैं। ये इस शहर के और खूबसूरत हो जाने के शुरुआती दिन हैं। दिन में उमस रहती है ज़रा-ज़रा पर साथ में जो ठन्डी हवाएं चलती हैं, वो सुकून देने वाली हैं। मौसम ही नहीं इस बार के लौटने में कुछ और भी नया है यहां। ये शहर बस अभी-अभी एक नई भाषा सीख रहा है। एस्केलेटर में डर-डर के कदम रखती READ MORE

आख़री सांसें लेती ज़िंदगी की कहानी

June 15, 2014 // 0 Comments

Mumbai Diary : 14 (Mumbai Film Festival 2012) पिछले पांच दिनों से मुम्बई के पांच अलग अलग थियेटरों का पीछा किया है। हर थियेटर जैसे एक ट्रेन सा हो और फिल्म शुरु होने का वक्त जैसे किसी सफर के शुरु होने का वक्त हो। रोज कई ऐसे ही सफर तय किये हैं इन दिनों में। सुबह उठना, घर से निकलने के पहले ज़रुरी काम निपटाना, रेलवे स्टेशन की तरफ भागना, चलती हुई टेन में मुम्बई फिल्म फेस्टिवल के कैटलौक पर डौट पेन से टिक करके सम्भावित READ MORE

फ़िल्में देखने के लिए भी कम चप्पल नहीं घिसने पड़ते

June 10, 2014 // 0 Comments

Mumbai Diary 13 (Mumbai Film Festival 2012) एक और दिन मुम्बई फिल्म फेस्टिवल के नाम रहा। शुरुआत खराब थी। इतवार की सुबह सुबह सायान के सिनेमेक्स सिनेमाहौल में औडिटोरियम के बाहर 12 बजकर 45 मिनट पर लगने वाली फिल्म गॉड्स हौर्सेज़ बिना किसी पूर्व सूचना के कैंसल कर दी गई। स्क्रीनिंग हौल के बाहर दूर दूर से फिल्म देखने आने वाले लोग इन्तज़ार करते रहे पर वहां उन्हें बताने वाला भी कोई नहीं था कि फिल्म किस वजह से ऐसे अचानक READ MORE

हर बुरे वक्त का एक अच्छा पहलू भी होता है

June 8, 2014 // 0 Comments

Mumbai Diary : 12 (मुम्बई फिल्म फेस्टिवल 2012) सुबह सुबह नीद खुली तो देर हो चुकी थी। साढ़े नौ बज चुके थे। रात को सोते वक्त सोचा था कि मुम्बई फिल्म फेस्टिवल के दूसरे दिन की पहली फिल्म से शुरुआत की जाएगी। और फिर पूरा दिन थियेटर की कुर्सियों पर टिककर फिल्मी अनुभवों को अपनी जि़न्दगी का हिस्सा बनाया जाएगा। पर रात को देर से सोने की आदत सुबह देर से उठने की मजबूरी पैदा कर ही देती है। खैर उठते ही फटाफट नहा READ MORE

नाराजगी कितनी अर्थहीन और क्षणभंगुर भावना़ है

June 3, 2014 // 2 Comments

Mumbai Diary 10 डोंगरी टु दुबई का बुक लांच था। बेंड्रा की कार्टर रोड में समुद्री किनारे के पास औलिव नाम का वो बार। और उस बार का एक छोटा सा अहाता जिसके फर्श पर नदियों के किनारे पाये जाने वाले, पानी से घिसे मुलायम से कंकड़ बिछाये गये थे। जो दिख अच्छे रहे थे, पर उनपर चलने में एक असहजता महसूस हो रही थी। उस अहाते के बीच में एक पेड़ का कंकाल था, जिससे पत्तियां नदारद थी। उस सूखे नंगे पेड़ को सलेटी रंग से READ MORE

वक्त की पटरी और यादों के बेनाम स्टेशन

May 31, 2014 // 0 Comments

Mumbai Diary 9 अभी अभी कांजुरमार्ग स्टेशन के पास पूरब से पश्चिम की ओर जाने वाले पुल पे कुछ वक्त बिताया। वक्त के साथ साथ पुल के ठीक नीचे बीतती रेलगाडि़यां थी जो अलग अलग ट्रेक पर अपनी अपनी गति से आ जा रही थी। जैसे पटरियां वक्त हों और हर रेलगाड़ी अलग अलग लमहा। जैसे हर लमहा अपने अपने हिस्से के वक्त में गुजरता है और अन्ततह जिन्दगी नाम के एक लम्बे सफर का हिस्सा हो जाता है, वैसी ही तो होती है हर READ MORE

इतवारी शामों में सुकून के किनारे

May 28, 2014 // 0 Comments

Mumbai Diary 7 ( February 2012) मुम्बई और मेरे रिश्ते की उम्र आज एक साल एक महीना और कुछ 7 दिन हो चुकी है… ये शहर मेरे लिये अब उतना अजनबी नहीं रह गया है…. जैसे जैसे अजनबियत खत्म होने लगती है… वैसे वैसे रहस्य छंटने लगते हैं… नयापन धुंधला होने लगता है… पुरानापन हावी होने लगता है… आकर्षण खत्म होने का डर लगने लगता है… पर मायानगरी मुम्बई के अनुभवों के इस अथाह समुन्दर के लिये मेरे ही क्या हर किसी के READ MORE

‘घोस्ट राइटर’ लिखते हैं मुंबई की किस्मत

May 26, 2014 // 0 Comments

Mumbai Diary :6 ( October 2011) देर शाम अंधेरी वैस्ट के रिहायशी इलाके मलाड की एक मीटिंग से लौटते हुए ओशीवारा के लोटस पैट्रोल पंप से गुजरने के दरमियान कुछ यूं होता है…..सड़क पर सरकती रफतार के बीच अचानक एक बत्ती जलती है, एक गाड़ी रुकती है, एक खिड़की दिखती है। कार के बांईं सीट पे बैठी वो, थोड़ी देर मुझे देखती है। फिर थोड़ी देर मैं भी उसे देखता हूं। हाये, फिर वो मुस्कुरा देती है। हम एक मुस्कुराहट साझा करते READ MORE

आप लाख चाहें, रिश्ते कभी सेकंडहैन्ड नहीं हो सकते

May 20, 2014 // 0 Comments

Mumbai Diary : 4 ( Jun 2011) आज ही घर शिफ्ट किया है। यारी रोड से यारी और वर्सोवा की लहरें प्यारी हो गई थी। उस गली को छोड़ आये हैं अब। इन्डियन आईल नगर के पास अपना बाजार के बाजू कहीं एक घर मिला है। बाजार भी कभी किसी का अपना हुआ है भला। खैर यहां अभी अभी खिड़की खोलकर देखा तो सामने एक दस बारह मंजिली इमारत बन रही है। बाहर अंधेरा है। नीव के इर्द गिर्द एक टिन की टेम्प्रेरी दीवार बनी है। दरवाजे की शक्ल के एक कोने READ MORE

कभी कभी लगता है लोग अजनबी क्यों होते हैं ?

May 17, 2014 // 3 Comments

मुंबई डायरी: १ (जून 2011) कुछ दिन पहले हिन्दी की जानी मानी वैबसाईट मोहल्लालाईव के सम्पादक अविनाश जी ने फेसबुक पे पिंग किया। न हैलो। न हाय। सीधे कहा उमेश मुम्बई डायरी लिखा करो। आईडिया मुझे अच्छा लगा। उस बात को हफ्ते से उपर हो आया था। कुछ लिख नहीं पाया। कुछ ऐसा नया और खास हो ही कहां रहां था। वही रोज घर से आफिस (बालाजी टेलीफिल्म्स) का काम निपटा रहा था। रोज वर्सोवा का एक चक्कर लग रहा था। हां READ MORE

‘एक सौ दर्द जले जब दिल में, एक नज़्म का जन्म हुआ’

April 14, 2014 // 0 Comments

गुलज़ार  साहब को दादा साहेब फाल्के पुरस्कार मिलने की बधाई देते हुए मोहल्ला लाइव पर छपने वाली अपनी ‘मुंबई डायरी’ में से एक दिन जो गुलज़ार के नाम है, ‘गुल्लक’ पढने वालों के लिए भी .. गुलज़ार। ये नाम मेरे लिये उन शुरुआती साहित्यिक सुविधाओं में से था जो मुझे अपने छोटे से कस्बे गंगोलीहाट में रहने के दिनों में ही मिल गई थी। पुखराज, त्रिवेणी और रात पस्मिने की, ये तीन किताबें ऐसी थी जिनके READ MORE