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लड़कियों की ‘हिंट’ समझने से पहले ‘पिंक’ देखें

कभी-कभी केवल अंडरटोन से काम नहीं चलता. कुछ बातें होती हैं जो दो-टूक , साफ़-साफ़ कहनी पड़ती हैं. जब समाज का एक बड़ा हिस्सा ग़लत ‘हिंट’ लेने लगता है तो उसे केवल ‘हिंट’ देने से काम नहीं चलता. इसलिए पिंक में एकदम बोल्ड और साफ़-साफ़ शब्दों में ‘नो मतलब नो’ का सन्देश दिया जाना सही समय पर एक ज़रूरी हस्तक्षेप की तरह लगता है.

पिंक. ये रंग लड़कियों के हिस्से में क्यों आया होगा ? जब पहली बार खुद से हम ये सवाल कर रहे होते हैं तो कई और सवाल आजू-बाजू खड़े हो जाते हैं. रात को देर से घर आने वाली लड़कियां, शराब पीने वाली लड़कियां, शादी से पहले सेक्स करने वाली लड़कियां, घर से अलग अकेले रहने वाली लड़कियां और अपने साथ घर पर लड़कों को लाने वाली लड़कियां. इन अलग-अलग वाक्यांशों को जब हम पढ़ रहे हैं तो हमारे दिमाग में क्या तस्वीरें बन रही हैं ? क्या वो तस्वीरें ‘नॉर्मल’ हैं ? क्या वो लड़कियां ‘नॉर्मल’ हैं जो इन तस्वीरों में हमें दिखाई दे रही हैं ? और फिर इन सारे वाक्यांशों में ‘लड़कियां’ शब्द बदलकर ‘लड़का’ कर दीजिये और फिर देखिये कि दिमाग में क्या तस्वीरें बनती हैं ? और वो तस्वीरें हमें तुलनात्मक रूप से कितनी सामान्य या असामान्य लगती हैं. पिंक फिल्म मूलतः इसी तुलना के लिए अपने दर्शक को तैयार कर देती है. फिल्म देखते हुए ये सवाल आपके ज़हन में बार-बार आते हैं और यहीं फिल्म अपने उद्देश्य में खरी उतर जाती है.

पिंक ये डिस्कोर्स हमारे सामने उस दौर में खड़ा कर रही है जब ‘निक्कर वाली छोरी’ या ‘तमंचे पे डिस्को’ टाइप के गाने अपने समय के सबसे हिट गाने हैं. मतलब ये कि जहां एक तरफ बौलीवुड की ज़्यादातर फ़िल्में लड़कियों से जुड़े स्टीरियोटाइप्स को और मजबूत कर सामान्य भारतीयों की मानसिकता को अपने लाभ के लिए भुना रही हैं वहां शूजित सरकार (क्रिएटिव प्रोड्यूसर) और अनिरुध्ध राय चौधरी की ‘पिंक’ इसके एकदम उलट खड़ी होती है और (अपने लाभ के लिए ही सही) उस मानसिकता को कड़ी चुनौती देती है जो महानगरीय लड़कियों को एक ख़ास जीवनशैली की वजह से ‘वैसी लड़कियों’ में शामिल कर देती है. ‘वैसी लड़कियां’ मतलब ‘इज़ीली अवेलेबल’.

 निर्भया केस के बाद दिल्ली में और कुछ हुआ हो या न हुआ हो महिलाओं की अस्मिता और आज़ादी के सवाल को एक सामाजिक मान्यता ज़रूर मिली. दिल्ली यूनिवर्सिटी में ‘पिंजरा तोड़’ मूवमेंट हो, या ‘व्हाई लोयटर’ और ‘रिक्लेम युवर नाइट’ सरीखे प्रयोग सामने आये, महिलाएं इन तमाम अभिनव प्रयोगों के ज़रिये अपनी सुरक्षा और आज़ादी के सवालों पर ज़्यादा मुखर होकर सामने आई. और कम से कम महानगरों के मिडिल क्लास समाज में इस विषय की चर्चा होने लगी. यहां सवाल केवल महिलाओं की सुरक्षा का नहीं था बल्कि उनके पहनावे, उनकी जीवनशैली, उनके खान-पान के आधार पर किसी भी तरह के शोषण, भेदभाव और उन प्रतिबंधों का भी था जो महिला होने की वजह से उन पर थोप दिए जाते हैं. इन सवालों ने सुविधाओं से भरे शहर में उन सुविधाओं पर महिलाओं के बराबर के हक़ की ज़मीन किस हद तक तैयार की ये कहना ज़रा मुश्किल है लेकिन अभिव्यक्ति के विभिन्न माध्यमों में इस सवाल को थोड़ी-थोड़ी जगह अब मिलने लगी है. विज्ञापनों की भाषा में ‘व्हाई शुड बोइज़ हैव आल द फ़न’ का शुमार होना और फिल्मों के बाज़ार में ‘एन एच-10’, ‘क्वीन’ आदि फिल्मों की ज़रुरत महसूस होना इस लिहाज से सकारात्मक सन्देश है. सोशियल मीडिया पर भी इस तरह के सन्देश वाली कई वीडियो सीरीज़ ( मसलन कल्की  कोच्लिन अभीनीत अनब्लश्ड या यश राज की मैन्स वर्ल्ड वेब सीरीज़)  शेयर की गई और सराही भी गई. पिंक को इसी कड़ी में अगले सकारात्मक प्रयास के रूप में देखा जा सकता है.

आमतौर पर जब महिलाओं पर पुरुषों द्वारा की जाने वाली ‘ज़्यादती’ की बात समाज या मीडिया के बीच होती है तो उसे एक ख़ास तरह का ‘सेंसेशन’ बनाकर पेश किया जाता है. इसी सेन्सेश्नलिज्म के चलते असल मुद्दे पर बात ही नहीं हो पाती.  ‘पिंक’ फिल्म की सबसे अच्छी बात यही है कि ‘उस दिन क्या हुआ’ ये फिल्म का सबसे गैर-ज़रूरी हिस्सा है और फिल्म उसे एकदम आखिर में एंड क्रेडिट के साथ बतौर एक छोटी सी क्लिप पेश करती है. जबकी जो हुआ उसके इर्द-गिर्द खड़े होने वाला डिस्कोर्स फिल्म के लिए ज़्यादा महत्वपूर्ण है. फिल्म एक लड़की के साथ हुई ‘ज्यादती’ के सेंसेशन को भुनाने के बजाये उस ‘ज़्यादती’ की वजह पर ज़्यादा ध्यान देती है. यानी बीमारी की जगह, उपचार को ज़्यादा अहमियत के साथ पेश करती है.

लड़कियों की सुरक्षा के लिए बने कानून किस तरह पुलिस की कार्यप्रणाली के सामने एकदम अपाहिज बन जाते हैं फिल्म इसकी पोल-पट्टी खोलकर रख देती है. हमारे समाज में लड़कियों के लिए होने वाली ‘मॉरल पुलिसिंग’ किस तरह से उन्हें एक झटके में कटघरे में खड़ा देती है फिल्म इस पर भी बात करती है. शराब पीने, कपड़े पहनने, देर से घर आने, पार्टी करने और नए दोस्त बनाने को लेकर लड़के और लड़कियों के लिए समाज के दोहरे रवैय्ये का भी फिल्म पर्दाफ़ाश करती है. वो चाहे ‘नॉर्थ ईस्ट’ की लड़कियों के साथ जुड़े टैबू हों या हंस-बोल कर बात कर लेने में न झिझकने वाली (माने बोल्ड) लड़कियों के बारे में औसत रवैय्ये की, फिल्म कई स्तरों पर बहस को ले जाती है.

फिल्म महिलाओं की ‘चॉइस’ के सवाल को सबसे प्रभावशाली तरीके से एक सामाजिक बहस का हिस्सा बनाती है. ‘नो मतलब नो’. दीपक सहगल (अमिताभ बच्चन) की दलील के आख़री हिस्से में आया ये वाक्य पूरी फ़िल्म में दिए गए तर्कों और दलीलों को एकदम प्रभावशाली तरीके से समेटकर एक जगह ले आता है. ‘नो’ बस एक शब्द नहीं बल्कि एक पूरा का पूरा वाक्य है’. इस छोटी सी बात को दर्शकों के ज़हन में रचाने-बसाने की क़वायद फिल्म का असल मकसद था और कहा जा सकता है कि इस मकसद को पूरा करने में अदाकारी, निर्देशन और ख़ासकर संवाद काफी हद तक सफ़ल साबित होते हैं.

मीनल, फलक और एंड्रिया के डर दिल्ली में स्वतंत्र रूप से रह रही कमोवेश हर कामकाजी लड़की के डर हैं. लेकिन क्या फिल्म में मौजूद तीनों लड़कों के दंभ दिल्ली के कमोवेश हर लड़के का प्रतिनिधित्व करते हैं ? यदि ऐसा है तो ये बहुत चिंता की बात है. राजवीर के दोस्त का कहना कि ‘बहुत चुल है यार इसे, इसे बजाने में मज़ा आएगा’ क्या फिल्म देखने वाले लड़के को वीर रस से भरता है या उसपर उसे शर्म आती है ? खुद राजवीर का कठघरे में कहना कि ‘ऐसी लड़कियों के साथ यही होना चाहिए. ऐसी लडकियां ……… होती हैं.” फिल्म देख रहे कितने लड़के इस बात से इत्तफ़ाक रखते हैं. इन सवालों के जवाब से हमारे समाज की सामंती सोच का आंकलन किया जा सकता है. और निसंदेह ये संख्या कम नहीं है. शायद इसलिए ‘पिंक’ बनाने की सोच को जन्म लेना होता है.

अमिताभ बच्चन कुछ हिस्सों जबरदस्त प्रभाव छोड़ते हैं. पीयूष मिश्रा कुछ नया नहीं करते पर बुरे भी नहीं लगते. राजबीर सिंह के रूप में ( अंगद बेदी) और उसके दोस्त अंकित मल्होत्रा के रूप में विजय वर्मा  इतने प्रभावशाली हैं कि आप उनसे नफरत करने लगते हैं. तापसी पन्नू, कीर्ति कुल्हारी और एंड्रिया तीनों ही अपने-अपने स्तर पर दिल्ली की एक आम कामकाजी लड़की की मनःस्थिति में दर्शकों को झाँकने का अच्छा मौक़ा देती हैं.

पिंक थोड़ा ‘प्रीची’ ज़रूर है. पर कभी-कभी केवल ‘अंडरटोन’ से काम नहीं चलता. कुछ बातें होती हैं जो दो-टूक , साफ़-साफ़ कहनी पड़ती हैं. जब समाज का एक बड़ा हिस्सा ग़लत ‘हिंट’ लेने लगता है तो उसे केवल ‘हिंट’ देने से काम नहीं चलता. इसलिए पिंक में एकदम बोल्ड और साफ़-साफ़ शब्दों में ‘नो मतलब नो’ का सन्देश दिया जाना सही समय पर एक ज़रूरी हस्तक्षेप की तरह लगता है.

 

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