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मुरझाए हुए फूल के खिलने की आख़री उम्मीद है ‘अक्टूबर’

एक फ़ाइव स्टार होटल में मैनेजमेंट के दो इंटर्न हैं वो. उन दोनों में नोक-झोक का एक रिश्ता है. एक रिश्ता जो शायद संवेदनाओं के अपने चरम पर न पहुंच जाता अगर एक दुर्घटना न हुई होती. अगर एक गेट टुगेदर के दौरान छत से गिरकर शिउली (बनिता संधू) एक ऐसी दुनिया में न पहुंच गई होती जो मौत के एकदम क़रीब है. जहां बस इलहाम भर की ज़िंदगी बची हुई है. इलहामों पर यकीन न करने वाले मान चुके हैं कि शिउली के शरीर में जो नाम मात्र जीवन बचा है उसके अब कोई मायने नहीं हैं. पर एक उसकी मां (गीतांजली राव) है जो नाउम्मीदियों के ढेर से रेशा-रेशा तलाशकर उम्मीद का एक महीन धागा ढूँढ रही है और एक है डेन (वरुण धवन) जो शिउली की लगभग चित हो चुकी देहभाषा में अपने वजूद को तलाशने की कोशिश कर रहा है. देह झुलसा देने वाली गरमियों के बीच आत्मीयता की गरमाहट तालाशने की एक ग़ज़ब की कोशिश है अक्टूबर. 

हिंदी में इतनी ख़ामोश और ठहरी हुई फ़िल्में बहुत कम बनती हैं. शिप ऑफ़ थीसियस, वेटिंग, उड़ान ये कुछ नाम हैं जो ठहराव के लिहाज़ से अक्टूबर को देखते हुए आपके ज़हन में आते हैं. ऐसी फ़िल्मों में एक समय के बाद आप सबकुछ सिनेमा की रची हुई उस ख़ामोश दुनिया पर छोड़ देते हैं और उन्हीं भावनाओं में गोते लगाने लगते हैं जिनसे फ़िल्मों के किरदार गुज़र रहे होते हैं. वहां हाव-भाव आपसे संवाद कर रहे होते हैं और शब्द फिर उतने अहम नहीं रह जाते. जो घट रहा होता है उसमें किसी घटना के होने का शोर नहीं होता. उन तमाम घटनाओं की तरह जो हमारे पास लगातार हो रही होती हैं, इतनी प्रभावहीन जैसे हो ही नहीं रही हों. लेकिन अगर आप इन घटनाओं पर ध्यान देने लगें तो कई बार वो ज़िंदगी को बदल देने तक की ताब रखती हैं. शूजित सरकार की ये फ़िल्म-अक्टूबर, ऐसी ही शोर विहीन घटनाओं की तरह है.

शिउली की माँ आईआईटी में प्रोफ़ेसर हैं. वो अपनी हंसती-बोलती प्यारी सी बेटी को एक दिन अस्पताल में पाती हैं. जो अब न हिल-डुल सकती है, न बोल सकती है. जिसके चेहरे पर कोई भाव नहीं आता. वो कोमा में है और ठीक होने की सम्भावनाओं की एक हारी हुई लड़ाई लड़ रही है. हर महीने इलाज में हो रहा लाखों का ख़र्च अब रिश्तेदारों की आँखों की किरकिरी बन चुका है लेकिन एक माँ के लिए उसकी बेटी के जीवन से बड़ी कीमत और क्या हो सकती है? ये एक ऐसा इंतज़ार है जिसकी अहमियत और कोई नहीं समझ सकता.

वहीं डेन का किरदार तो कमाल का है. उसके सारे दोस्त उसे समझा रहे हैं कि वो न शिउली का बॉयफ़्रेंड है, न ही रिश्तेदार. न ही शिउली उससे प्यार करती थी. ऐसे में रोज़ अस्पताल में टाइम वेस्ट करके अपना करियर दाँव पे लगाने का कोई मतलब नहीं है. लेकिन डेन इस सब से बेपरवाह है. नौकरी जाने तक की नौमत आ गई है लेकिन वो शिउली के पास जाना नहीं छोड़ता. जबसे उसे पता चला कि शिउली ने गिरने से पहले पूछा था- ‘व्हेर इस डेन’ (डेन कहां है?). तब से वो एक ही सवाल का जवाब ढूँढ रहा है. ‘शिउली ने ऐसा क्यों कहा था?’. उसके पास इसके जवाब तलाशने के लिए या तो शिउली के ठीक होने एक अंतहीन इंतज़ार है या फिर कुछ स्मृतियां. मसलन वो और शिउली एक कमरे में सफ़ाई कर रहे हैं और उसके हाथों से सफ़ेद रंग के कई शिवली (हरसिंगार) के फूल ज़मीन पर बिखर गए हैं. अक्टूबर के महीने में बहुत कम समय के लिए खिलने वाले शिवली के फूल. इन बिखरे हुए फूलों को समेटने की तरह ही है बिस्तर पर बेजान पड़ी शिउली की देखभाल करना. फूलों को समेटने के लिए जो सावधानी, जो संवेदना चाहिए अब शिउली को उसी की दरकार है. डेन से किसी को इसकी अपेक्षा नहीं है. लेकिन ये ज़िम्मेदारी डेन ने ख़ुद अपने कंधों पर ले ली है. जाने क्यों?

डेन का शिउली की तरफ़ जो एकतरफ़ा लगाव है उसकी गहराई शब्दों से फ़िल्म कभी बयां नहीं करती. छोटे-छोटे हाव-भाव हैं जिनमें एक दर्शक के तौर पर हम डेन के लगाव को गहराई से देख पाते हैं. होंठों पे जाने कब एक पतली मुस्कुराहट चली आती है और कब वो आँखों में एक महीन सी नम रेखा में बदल जाती है, पता ही नहीं चलता. एक शांत सी पहाड़ी नदी में किसी हल्के पीले पत्ते को बहते हुए देखते चले जाने का सुकून देती है अक्टूबर. और धीरे-धीरे उस पत्ते की जगह आप ख़ुद को महसूस करने लगते हैं.

पीकू और विकी डोनर जैसी फ़िल्में लिख चुकी जूही चतुर्वेदी ने जब अक्टूबर लिखी होगी तो डेन के शिउली के लिए लगाव को कितने गहरे तक महसूस किया होगा. डेन का जो किरदार है, एक इंसान के तौर पर बिना बेहद संवेदनशील हुए आप उस किरदार को गढ़ नहीं सकते. उस किरदार के सम्भव हो पाने के लिए जूही की तारीफ़ की ही जानी चाहिए.  वरुण धवन  ने उस किरदार को जिस तरह से निभा लिया है उसके लिए आपका एक मझा हुआ कलाकार होना ज़रूरी है. ये फ़िल्म देखकर वरुण धवन में ग़ज़ब की सम्भावनाएं दिखाई देने लगती हैं. 

डेन जो अपनी नौकरी और परिवार के लिए बेहद लापरवाह दिखाई देता है वो शिउली के लिए उतना ही फ़िक्रमंद नज़र आता है. जब उसे पता चलता है कि शिउली के चाचा, जो उसकी मां को लगातार समझा रहे हैं कि अब इलाज में फ़ालतू पैसे ख़र्च करने से कोई फ़ायदा नहीं, अस्पताल में आ रहे हैं तो वो स्टूल को वेंटिलेटर के पास से हटाता है और नर्स से कहता है कि -चाचा को वहां मत बैठने देना. उन्हें शिउली से दूर रखना. नर्स हल्के से मुस्कुरा देती है.  

पार्किंग में खड़ी शिउली की कार की चाभी लेकर वो स्टेयरिंग को बड़े प्यार से छूता है, जैसे शिउली की छुवन को महसूस कर रहा हो. बार-बार उस छत पर जाता है और उस रेलिंग को स्पर्श करता है जहां पर वो आख़री बार बैठी थी. वो शिउली के पसंदीदा फूलों को अस्पताल में लाकर उसके क़रीब रखता है. जब आप किसी से प्यार करते हैं तो आप उसके इर्द-गिर्द की एक ऐसी दुनिया को देखने लगते हैं जो किसी और को नज़र नहीं आती. जो किसी और के लिए बेमायने होती है. वो दुनिया जहां जिससे आप प्यार करते हैं उसका स्पर्श कहीं पाल्थी मारे बैठा होता है, उसकी महक इत्मिनान से मुस्कुरा रही होती है. उसकी कही गई बातें किसी और रूप में वहां घूम रही होती हैं. जहां किसी और को कुछ नज़र नहीं आता वहां आप उसके होने का एक-एक निशान देखते और महसूस कर लेते हैं, जिससे आप प्यार करते हैं. डेन का प्यार भी उसके लिए एक नयी दुनिया के दरवाज़े खोल देता है. जो उन दरवाज़ों के खुलने की आहट से अनजान हैं वो डेन को बेवक़ूफ़ समझते हैं. लेकिन शिउली की मां उसके प्यार को जान और समझ रही है. वो देख रही है कि कैसे शिउली के लिए पहले डेन ने अपनी नौकरी ताक पे लगा दी. फिर कुल्लू में दूसरी नौकरी मिली तो वो उसे भी छोड़ के आ गया. इतना प्यार उसकी बेटी से उसके अलावा और कौन कर सकता है?

शिउली हॉस्पिटल से डिस्चार्ज हो जाती है तो डेन उसे सैर कराने ले जाता है. वो उसका ख़याल रखता है. उसे होटल में नौकरी पर वापस रख लिया जाता है. शिउली अब भी ख़ामोश है. आंखों के कुछ इशारे भर हैं जिनसे वो अपनी बात कह पाती है. पर अगर कोई इन इशारों को समझने का धैर्य रखता हो तो मन हल्का हो जाने के लिए इतना भी काफ़ी हो शायद. लेकिन हमारा ये शरीर जो सुनने, बोलने, भागने-दौड़ने का आदी है वो इतना ठहराव आख़िर कब तक सह सकता है. एक रात शिउली मौत की वो आख़री सीढ़ी भी चढ़ जाती है. अपनी तमाम सामवेदनाओं को आँखों और उसके इर्द गिर्द की कुछ मांसपेशियों तक सीमित रखने की वो सीमा भी आखिरकार लांघ जाती है शिउली. 

और अक्टूबर के किसी दिन जब शिउली की मां दिल्ली छोड़कर जा रही होती है वो डेन को फ़ोन करके घर बुलाती है. शिउली की आंखरी निशानी एक पेड़ है, जिसके फूल उसे बहुत पसंद थे. शिउली का पेड़. मां असमंजस में है कि उसकी इस आख़री निशानी का अब क्या होगा? डेन उस निशानी को भी अपना लेता है.

शिउली के पेड़ को अपनी बाहों में समेटे वो टेम्पो के पीछे बैठकर अपने घर जा रहा है. फ़िल्म का ये आख़री दृश्य आपके ज़हन में शिउली के न जाने कितने बीज़ छोड़ जाता है, जो गाहे-बगाहे फ़िल्म के ख़त्म होने के बाद भी महकते रहते हैं. निहायत गर्मी भरे जून के महीने में हवा की ठंडी बयार बनकर अक्टूबर का इस तरह ठहर जाना एक सुकून भरा अनुभव बन जाता है.

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