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मैक्सिमम सिटी के मिड नाईट अन्ना

Mumbai Diary 8 ( April 2012)
मुम्बई पे छतें सरों से कोई खास सरोकार नहीं रखती। अपने अनुभव देखकर तो यही लगता है। व्यक्तिगत अनुभवों से शुरु करुं तो जुम्मा जुम्मा एक साल और कुछ महीने हुए हैं यहां आये और तीन बार घर बदली कर लिया है, चैथी जगह शिफ्ट करने की तैयारी चल रही है। इस बार छंलांग थोड़ी लम्बी है। अंधेरी से सुदूर पवई। खैर इस लम्बी छलांग ने वक्त पर उठना और खाना.-पीना मयस्सर करवाया है, हांलांकि सोने के मामले में अब भी मनमानी जारी है। कुछ फायदे हैं तो कुछ नुकसान भी । रात के दो बजे अब अन्ना के पास बूस्ट या काॅफी पीने नहीं जाना होता, सुबह पांच बजे सोकर दिन के चार बजे उठना नहीं होता, रोज रोज, रात रात भर जागकर दोस्तों से बकर नहीं होती। माने परिवार में शामिल होने से बैचुलर जिन्दगी की अराजकता का अंत हो चला है। किचन में हफ्तेभर के कूड़े का ढ़ेर अब नहीं रहता, खाना बनाने वाली बाईयां इसलिये छोड़कर नहीं चली जाती कि कूकर का वाशर ठीक नहीं है, झाड़ू की मोठ से कब तक काम चलेगा? दालें खत्म हो गई हैं, बिना प्याज टमाटर के सब्जी कैसे बनेगी? आज फिर चिकन की बोटी थाली में छोड़ दी है- छी मैं कैसे धोएगी? बीस तारीख हो गई है… अब तो पगार दे दो… वगैरह वगैरह अब अनुभवों के सिलसिले से बाहर है। दोस्तों के साथ अराजक रहने का भले ही अपना मज़ा हो पर परिवार के साथ रहने का सुख भी सच कहूं तो कुछ कम नहीं है। सुबह सुबह उठते ही बिस्तर पे दीदी के हाथ की बनी चाय मिलना वो भी मुम्बई जैसे शहर में। मेरे प्यारे दोस्त और एक्स रुम मेट्स पढ़ेगे तो शायद जलेंगे ये जानकर।
Maximum cityये शायद संयोग ही है कि सुकेतु मेहता की मैक्सिमम सिटी के पीडीएफ डाउनलोड पर ठीक उस मौसम में नज़र गई, जब आप मुम्बई को भरपूर कोस सकते हैं। एक अजीब सी चिपचिपाहट वाली गर्मी है इन दिनों। हर वक्त गर्म हवा चलती है, सर जैसे भारी भारी सा रहता है। कारणों पर यही कयास लगाते रहते हैं कि शायद पानी सही नही है, इसलिये एक अजीब सी बेचैनी रहती है। मैक्सिमम सिटी के शुरुआती अध्याय पढ़ते हुए लगता है कि मुम्बई भले ही मायानगरी ही क्यों न हो पर रहने लायक शहर नहीं है। मेहता जी लिखते हैं कि हम जो हवा ले रहे हैं, जो पानी पी रहे हैं, जो सब्जियां खा रहे हैं वो सब शिट है। इस तरह हम शिट को अपनी जिन्दगी का हिस्सा बना रहे हैं। हांलाकि उनकी दिक्कतें थोड़ा आगे चलकर इस बारे में भी हैं कि यदि आपको यहां रहना है तो अमीर बनकर रहना होगा, इसके अलावा कोई और विकल्प आपके पास नही है। पर मुम्बई का दूसरा सच ये भी है कि यहां लोग कैसे न कैसे अपने लिये विकल्प तलाश ही लेते हैं।
मेहता जी की इस किताब  को पढ़ने के दौरान एक और संयोग हुआ कि नवनीत रंजन नाम के एक युवा फिल्म मेकर और मेरे वर्चुअल मित्र ने अपनी डौक्यूमेंट्री फिल्म धारावी डायरी का एक लिंक चैट विंडो पे भेजा। फिल्म धारावी की झुग्गियों मे रहने वाले उन बच्चे और बड़ों के बारे में है जो मुम्बई और मुम्बई से बाहर से आने वाले अपशिश्ट पदार्थों को रिसाईकिलिंग के लिये तैयार करते हैं। धारावी की वो झुग्गियां जिन्होंने शहर के बड़े बड़े बाज़ारों और हाउसिंग सोसाईटियों से दूर इन लोगों को शरण दी, उन झुग्गियों को इन लोगों से छीनने की कवायद शुरु हो चुकी है। बाज़ारवाद के पोषक कौर्पोरेट संस्थानों ने धारावी को खरीद लिया है और अपना बचपन यहां गुजारते, या उस बचपन को यही की गलियों में बिता चुके इन लोगों से इस जगह को छीन लेने का मन बना लिया है। विस्थापन की त्रासदी पर नज़र डालती ये धारावी डायरी हासिये के इन लोगों से इनका आसमान छीन लिये जाने की त्रासद कहानी कहती है। नवनीत की ये फिल्म अभी बन रही है ठीक उस वक्त जबकि इन लोगों की उम्मीदें टूट रही हैं, पर इस टूटन पर शायद ही किसी की नज़र जाये।
मुम्बई में कौस्ट आफ लिविंग हमेशा क्वालिटी आफ लिविंग पे हावी रहती है। और इसकी एक बड़ी वजह है बिल्डरों और दलालों का प्रकोप। आसमान छूने की कोशिश करते घरों की आसमान छूंती कीमतें यहां रहने वालों की नीदें लूट लेती हैं और उस पर एक साल की लीज़ का  कौन्ट्रेक्ट और हर साल लीज़ की मियाद खत्म होते ही दलालों की अलग फीस। जिस तरह से दिल्ली की संसद में नेता दलाली से अपनी जेबें भरते हैं उसी तरह मुम्बई में घर दिलाने वाले दलालों की मनमानी चलती है और ये रैकेट इतना बड़ा है कि इसे भेदकर आप घर नहीं ढूढ़ सकते। जैसे हमारे देश में भ्रष्टाचार करने की खुली छूट है उसी तरह मुम्बई में दलालों को मनमानी करने की खुली छूट है। अपनी बड़ी बड़ी कारों में वो आपको घर दिखायेंगे, आपको कौम्प्लेक्स देंगे और अपने बड़े बड़े मकानों के लिये आपसे बिन बात के पैसे उगाहेंगे। आपको बिना नागा किये पैसे दे देने होंगे क्योंकि एक अदद छत तो आपको रहने के लिये चाहिये ही। आपकी कमाई के बड़े हिस्से पर सेंध डालते ये दलाल मुम्बई में आशियाना तलाशने वाले लोगों के लिये एक कड़वी सच्चाई हैं। ऐसे में सुकेतु मेहता प्रासांगिक हो जाते हैं जब वो कहते हैं वी हैव नो चाईस बट टू लिव रिच इफ वी हैव टू लिव एट आल।
पवई आने के बावजूद अंधेरी आना जाना होता रहता है, कभी कभी हफ्ते में चार दिन भी और इस आने जाने ने एक गलतफहमी दूर कि है कि मुम्बई के औटो वाले धांधली नहीं करते। खूब शातिर है ये भी। यहां मीटर से चलने को हर औटो वाला राजी है पर मीटर में बड़े बड़े झोल हैं। तकनीकी झोल करके इसकी प्राकृतिक रफ्तार से बहुत तेज़ भगा दिया जाता है इस मीटर को। लेकिन बार बार सफर करने पर आप जान जाते हैं की आपके साथ धोखा हो रहा है। राहत देने वाली बात ये है कि अगर आप बोल दें कि दादा आपके मीटर में झोल है, पूरा पैसा नहीं मिलेगा तो वो मुस्कुराके मान लेते हैं। आपको कोई लैक्चर या एरोगैंस से भरी नसीहत नहीं देते। झोल करके अपनी छोटी सी झोली भरने वाले मुम्बई के औटो चालक कम से कम इतनी गैरत तो रखते हैं कि पकड़े जाने पर चुपचाप अपनी गलती मान लें।
खैर मुम्बई में हर सड़क पर बदस्तूर मरम्मत का काम चल रहा है बरसों से। आधे आधे किलोमीटर की सड़कों पर करोडों के कौन्ट्रेक्ट हैं, जितना वक्त इनकी मरम्मत करने में लगता है, उतने वक्त में बरसात हो जाती है और फिर बरसात के बाद सड़कों का वही हाल हो जाता है। ठेकेदारों ने शायद सड़कों की अनवरत मरम्मत का ठेका लिया है, ये मानते हुए कि सड़कें पूरी तरह ठीक करने की जिम्मेदारी उनकी नही है। उसपर सरकारी अफसरों को पैसे खिलाकर हाउसिंग सोसायटी वाले बरसाती पानी में ही गटरों का मलमूत्र विसर्जित कर देते हैं। सड़कों के बीच में ड्रेनेज की व्यवस्था है यहां और वहीं कहीं से पीने के पानी का कनेक्शन भी है। अपच और पेट खराब रहने की वजहों में से शायद ये भी एक बड़ी वजह हो…कौन जाने? और हां यातायात के नियम तो जैसे मुम्बई वासियों के लिये बने ही नहीं है। रेड लाईट जम्प करना लगता है यहां की प्राचीन परम्पराओं में शुमार है जिसका पालन करते हुए लोग टैªफिक जाम की वजह बन जाने में गौरवान्विचत महसूस करते हैं। जो ट्रैफिक के नियमों का पालन करना चाहता है वो सड़क पर खुद को ठगा सा महसूस करता है।
वर्सोआ की आती जाती लहरों से दूर बहुत दूर अब पवई की शान्त झील के किनारे टहलने का सिलसिला चल निकला है। अजनबी सड़कों, फूटपाथों और गलियों में टहलते हुए पैदल निकल जाना एक पुराना शगल है जो यहां भी जारी है। कभी कभी घूमते हुए रोम आर्किटैक्चर के हिसाब से बने खूबसूरत इलाके हीरानंदानी तक कदम पहुंच जाते हैं। हीरानंदानी के आलीशान मकानों के ठीक पीछे पर्वतों का एक टुकड़ा झांकता है जिसपर से एक झरना किसी खरगोश सा फुदकता हुआ नीचे कूद पड़ता है। कम जगह में ज्यादा ज्यादा ठूस देतेे इस शहर में ये हरियाली एक पोएटिक जस्टिस सी लगती है। पर कविता और यथार्थ में अन्तर तब झटके से मालूम पड़ जाता है जब यहां की दुकानों में आम की कीमत हज़ार रुपये किलो तक की छलांग मार जाती है। इस खूबसूरती को देखभर लो और लौट आओ इतना ही बहुत है। आम की ये कीमतें यहां लाख-लाख रुपये महीने का किराया देने वाले खास लोगों को ही बर्दास्त होती होंगी। हम तो ऐसे आम को दूर से ही नमस्ते करके लौट आते हैं।

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