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‘मैट्रो’ की नयी भाषा सीखती एक मैट्रोसिटी

Mumbai Diary (23  Jun 2014)

तकरीबन साड़े तीन महीने बाद मुम्बई लौटा हूं। दिल्ली की लू के बनिस्पत मुम्बई की ठन्डी हवाएं राहत देने वाली हैं। ये इस शहर के और खूबसूरत हो जाने के शुरुआती दिन हैं। दिन में उमस रहती है ज़रा-ज़रा पर साथ में जो ठन्डी हवाएं चलती हैं, वो सुकून देने वाली हैं। मौसम ही नहीं इस बार के लौटने में कुछ और भी नया है यहां।

ये शहर बस अभी-अभी एक नई भाषा सीख रहा है। एस्केलेटर में डर-डर के कदम रखती महिलाओं के सकुचाये चेहरे, एन्ट्री के वक्त कूपन ढ़ंग से न लगाने की वजह से गेट पे लगता जमावड़ा, और फिर एक ही कूपन पे झट से गेट पार कर जाते पांच-छह घबराये से लोग। जैसे कोई गांव से पहली-पहली बार शहर आया हो। और शहर के तौर तरीकों को सीखने की कोशिश कर रहा हो। मैट्रो के कोच के भीतर मोबाइल से तस्वीरें खिंचाने की जैसे होड़ सी लगी हो। कहीं गर्लफ्रेंडें बाॅयफ्रेंडों से फोटो खिंचा रही हैं, तो कहीं पूरा परिवार सीट पर बैठे तस्वीरवाज़ी में लगा है। कुछ जो अकेले हैं शैल्फी भी खींच रहे हैं, कुछ दरवाजे के शीशे पर ही खुद के अक्स को कैमरे पर उतार रहे हैं। चेहरा दर चेहरा, क्लिक दर क्लिक, ऐसा लगता है जैसे किसी बच्चे को कोई नया-नया सा खिलौना पकड़ा दिया हो। इत्ता बड़ा सा खिलौना जिससे कई लोग खेल सकते हैं। बच्चे, बड़े, बूढ़े सब। बैग्राउन्ड में मैट्रो होना ही खुशी की शर्त है। अंधेरी से घाटकोपर आती जाती मैट्रो कित्ते सारे चेहरों में मुस्कुराहट बांटती हुई सी लगती है।

फोटो खिंचाते हुए उनके चेहरे पर एक झिझक भी है, एक उत्साह भी। पीछे स्टिकर चिपके हैं जिनमें कैमरे के लोगो पर क्राॅस का निशान है, पर नया जोश ये स्टिकर विस्टीकर कहां देखता है। शर्माते हुए लड़कियां फोटो खिंचाती आस-पास के लोगों को देख मुस्कुरा भी देती हैं कभी, और एक लड़की तो काफी देर तक वीडियो बनाती रही, पता नहीं क्या कैद किया उसने अपने फोन पर, पर उसके चेहरे पर इतनी देर जो मुस्कुराहट बनी रही वो एकदम ताज़ी थी। नई नई मैट्रो की तरह ही।

वहां लोकल में तो सबकुछ फटाफट होता है। चलती हुई ट्रेन पे चढ़ना, चलती हुई से ही उतर जाना। दरवाजों के बाहर लटककर सफर करना। यहां ये नहीं हो सकता। दरवाजे दांयी या बांयी तरफ खुलेंगे। कुछ सेकंड रुककर। उतनी देर थमना तो होगा। ये थमने का अहसास नया है। इसमें एक खास किस्म का ठहराव है जो मुम्बईकरों की जि़न्दगी में शामिल हो रहा। उनकी रफ्तार कुछ थमी है। जैसे मैट्रो खामोशी से कह जाती हो- बहुत भाग लिये। अबकी ज़रा थमकर। थाम्बा -थाम्बा।

मैट्रो के लम्बे-चौड़े पारदर्शी शीशों के बाहर से ये शहर अपने संकुचन में भी खूबसूरत सा लगता है। नीली बरसाती वाली झुग्गियां भी अपनी सम्पूर्णता में अच्छी सी लगती हैं। चकाला से आगे बढ़ते हैं तो पहाडि़यां दिखाई देने लगती हैं। लोकल तो जैसे शहर के सीने को चीरकर निकलती है। उसके बाहर सबकुछ भागता सा दिखाई देता है। सबकुछ लमहों में दिखाई देता है। दिखाई भर देकर बहुत तेज़ कहीं भाग जाते से लमहे। जैसे एक दूसरे से भाग रहे हों। ठीक वैसे जैसे यहां लोग भागने लगते हैं एक दूसरे से कभी-कभी। एक ऐसी अस्तित्वहीन, आकारविहीन सी अनाम दूरी की तरफ न जाने क्या पा लेने के लिये। एक छोर से दूसरे छोर भागती हुई ट्रेनें ऐसी लगती है जैसे कोई बेचैनी हो उनके अन्दर और उसकी वजह पता न हो। तेज़-तेज़ सासें लेती, छटपटाती हुई सी ट्रेनें। भीतर ही भीतर किसी अज्ञात वजह से घुटती हुई सी और अपनी ही तरह के बेचैन लोगों को अपने भीतर समेटती सी।

मैट्रो इस बेचैनी को एक हद तक थामती सी लगती है। शहर को थोड़ा सा ज़ूम आउट करके देखती हुई। कुछ और ऊंचाई से जहां से चीजें अपनी पूर्णता में दिखती हैं, वो भागादौड़ी भी अफरातफरी सी नहीं लगती।

पर मैट्रो अभी मुम्बईकरों के सफर का एक भरा पूरा विकल्प नहीं है। वो एक छोटा सा हिस्सा कवर करती है। जब तक उसे शहर के बांकी हिस्सों से नहीं जोड़ा जा सकेगा तब तक ये बस नये-नये उत्साह की वजह भर बनकर रहेगी। अभी लोग सैलानियों की तरह इसमें बैठ रहे हैं, इसे जीवनसाथी की तरह देख पाने में अभी बहुत वक्त लगेगा। क्योंकि जीवनसाथी पूरे सफर में आपका साथ देता है लेकिन सहयात्री कहीं बीच ही में आपका साथ छोड़ देते हैं। मुम्बई लोकल की तरह लाइफलाइन का दजऱ्ा मैट्रो तभी हासिल कर पाएगी जब ये पूरे शहर से जुड़ पाएगी। सच यही है कि ये शहर आपको तभी अपनाता है जब आप इससे गहरे तक जुड़ते हैं।

हां इतना तो होगा कि मैट्रो के आने से कि पीक आवर्स में सेन्ट्रल लाइन से अंधेरी की तरफ जाने वाले लोगों को ज़रुर विरार फास्ट के कहर से मुक्ति मिल जाएगी। दादर की डरावनी भीड़ से उनका सामना अब नहीं होगा।

मुम्बई लौटने के बाद सघर्ष के इस दौर में साथ-साथ जूझ रहे दोस्तों से पूरी रात भर की अनसैन्सर्ड गप्पें सुकून देती हैं। रातभर की खुमारी सुबह-सुबह वर्सोवा की लहरों में जाकर टूटती है तो राहत मिलती है। दिमाग के कोनों में बेचैनियां जब-जब लौट रही होती हैं तो कोई दोस्त गेट टुगेदर के भाव से बुला लेता है। अपने अलग-अलग सपनों से जुड़ी सबकी चिन्ताएं एक ही तरह की हैं। चिन्ताओं का कोई अन्त कहां होता है, उनके कोई हल भी नहीं होते, पर एक दूसरे से बांटभर लेने से वो कुछ वक्त के लिये टल ज़रुर जाती हैं।

फोटो क्रेडिट: गूगल

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1 Comment on "‘मैट्रो’ की नयी भाषा सीखती एक मैट्रोसिटी"

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kavita rawat
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मुंबई ‘मैट्रो’ का सजीव खाका खींच दिया आपने
सबकी अपनी अपनी दौड़……..अपनी अपनी दुनिया ..

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