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रंगों के मसीहा इस होली, रंगने की समझदारी देना

रंगों के मसीहा इस होली

रंगने की समझदारी देना

जिसके छींटे सब तक पहुँचे

इक ऐसी पिचकारी देना

 

उम्मीद  की खाली चादर में

मुस्कान मरुनी रंग देना

तकलीफ के काले रस्तों पर

एक धूप गुलाबी संग देना

 

इस बार ‘अबीरी सुबहों’ में

कुछ और करीबी बढ़ जाएं

ताज़ी सी खुशी के गहरे रंग

शिद्दत से सभी पर चढ जाएं

 

मेरे हिस्से का भी सूरज

उगना होगा, उग जाएगा

रंगों से भरा वो इन्द्रधनुष

जब आएगा तब आएगा

 

मैं खुद ही रंग समेट सकूं

अबकी कुछ ऐसा ढंग देना

मैं हाथ खोलकर बांट सकूं

इतनी इफरात उमंग देना

 

रंगों का न कोई मजहब हो

सब एक रंग में रंग जाएं

सबके हिस्से में सब रंग हों

रंगों में न कोई बंट पाए

 

इक बार चढ़े फिर छूटें ना

खुशियाँ इतनी सारी देना

 

रंगों के मसीहा इस होली

रंगने की समझदारी देना

जिसके छींटे सब तक पहुँचे

इक ऐसी पिचकारी देना

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