ताज़ा रेजगारी

मेरी सोच

जिन्दगी की कोचिंग क्लास हैं स्टीव जौब्स की बातें

October 5, 2012 // 1 Comment

स्टीव जौब्स का व्यकितत्व मुझे जिन्दगी की कोचिंग क्लास की तरह लगता है। उनके बारे में पढ़ते चले जाना जि़न्दगी को सीखते चले जाने की तरह है। आविष्कार ही वो चीज़ है जो एक लीडर को एक फौलोवर से अलग करती है। स्टीव जौब्स की कही ये बात इसलिये अहम हो जाती है क्योंकि उन्होंने जो कहा वो अपने खुद के अनुभवों के आधार पर कहा। उनकी कही हर बात को उनकी जिन्दगी के अलग अलग हिस्सों में झलकते हुए देखा जा READ MORE

अभी वीसी ने मिलने बुलाया है….देखें साहब क्या कहते हैं

May 10, 2011 // 1 Comment

एमसीआरसी की छात्रा सबा रहमान की टिप्पणी कल एमसीआरसी के छात्रों के विरोध प्रदर्शन का तीसरा दिन था। बिना खाये पिये वो अपनी मांगों को लेकर डटे हुए हैं। फाईनल इयर की सानिया अहमद और फहद की हालत आज बिगड़ गई। उन्हें होली फैमिली हौस्पिटल में भर्ती कराना पड़ा। कल की हिंसक कार्रवाई के बाद आज इन छात्रों के समर्थन में कुछ ज्यादा लोग जुटे। लेकिन जामिया के वीसी और एमसीआरसी के डाईरेक्टर दोनों READ MORE

पढ़ाई की जगह पिटाई, क्या यही है एमसीआरसी का असली चेहरा

May 8, 2011 // 0 Comments

जामिया के एमसीआरसी के छात्रों की भूख हड़ताल का आज दूसरा ही दिन था और प्रशासन को ये गवारा न हुआ कि उन्हें अपनी बात शान्तिपूर्ण तरीके से रखने दी जाये। उन्होंने छात्रों के शान्तिपूर्ण विरोध का दमन करने के लिये जो तरीका अपनाया आप इस वीडियो में देख सकते हैं। पुलिस ने स्थानीय एसएचओ सतबीर सिंह डागर के नेतृत्व में इन छात्रों पर लाठीचार्ज किया। आज जामिया के छात्रों के साथ दिल्ली READ MORE

आप सभी से एक अपील

May 6, 2011 // 0 Comments

उन लोगों ने दिन रात मेहनत करके अपनी डिप्लोमा फिल्मों की स्क्रिप्ट लिखी। उसे पिच गया। लेकिन जब फिल्म बनाने के दिन नजदीक आये तो उन्हें कहा गया कि उनकी अटेंडेंस सौर्ट है। इसलिये उन्हें ये फिल्म नहीं बनाने दी जायेगी। और न ही वो इस साल एक्जाम दे पायेंगे। एमसीआरसी जामिया। एक निहायत ही जाना माना संस्थान जिसे फिल्म और जनसंचार की प-सजय़ाई के लिये आउटलुक का एक सर्वे तीसरे स्थान पर रखता है। READ MORE

किसके लिए लड़ रहे हैं अन्ना हजारे….

April 6, 2011 // 0 Comments

जन लोकपाल विधेयक पर अंग्रेजी में बहुत सी पाठ्यसामागी इन्टरनेट पर मौजूद है। हिन्दी में ना के बराबर जानकारी है। इसलिये ये लेख हिन्दी पाठकों के लिये जो मेरी ही तरह इस बिल के बारे में ज्यादा जानना चाहते हैं।     सुना कि अन्ना हजारे अनशन पे बैठे हुए हैं। लगा कि समझना चाहिये कि आंखिर मुद्दा क्या है। और जब समझा तो लगा कि दरअसल ये मुद्दा तो हमारे अपने जीवन से जुड़ा है। लोकपाल विधेयक एक ऐसा READ MORE

मुम्बई के बीच से

December 14, 2010 // 0 Comments

इन दिनों मुम्बई में हूं। वहां वर्सोवा के समुद्री किनारे से मुम्बई पर कुछ लिखने का मन हुआ। गीली रेत पर अकेले कुछ घंटे चलते चलते बिताने के बीच से ये पंक्तियां आपके लिये कैसी वर्सोवा वर्सोवा वाली चुप्पी सा शहरकैसा जुहू चौपाटी सा ये शोर हैकैसी नरिमन नरिमन इसमें छाई है चकाचौंधकैसी बांद्रा किनारे वाली भोर है कैसे लहर लहर खुद तक खींच लेता हैकैसे बूंद बूंद खुद में समा लाता हैकैसे READ MORE

मानव व्यापार की राष्ट्रीय शर्म

November 23, 2010 // 0 Comments

आज विकीपीडिया पूरी दुनिया को ये बता रहा है कि भारत पूरी दुनिया में इन्सानों की खरीद फरोक्त का मूल केन्द्र है और यहीं से इस व्यापार के संक्रमण की शुरुआत होती है। ये उस देश के लिये बेहद शर्मनाक बात है जो हालिया सुरक्षा परिषद में अपनी स्थाई सदस्यता के दावे कर रहा है, जिसको विश्व में सबसे तेजी से उभरते देश के रुप में देखा जाता है। एक ऐसा देश जो कौमनवैल्थ जैसे बड़े आयोजन करवाके पूरी READ MORE

सिनेमाथैक पर ईदियां…..

November 11, 2010 // 0 Comments

कश्मीर को इस पूरे दौर में एक ऐसे प्रान्त के रुप में देखा, समझा और महसूस किया गया है जो किसी देश से जुड़ने और अलग हो जाने के बीच ऐसे पिस रहा है जैसे दो पाटों के बीच कोई परम्परा पिस रही हो। जैसे अलग होने और अपना साबित करने के बीच की ये लड़ाई अपने राजनैतिक, धार्मिक और भौगोलिक कारणों के वजहकर कभी खत्म ही नहीं होगी। चलती रहेगी। इस लड़ाई पर हर तरह के लोग अपनी प्रतिक्रिया देने से नहीं चूकते। READ MORE

नैनीताल से लौटने के नशे के बीच से कुछ…

October 22, 2010 // 1 Comment

हाल ही में नैनीताल जाना हुआ। वहां ताल में बोटिंग करते हुए कुछ पंक्तियां लिखने का मन हुआ। कुछ तस्वीरें उतारने का जी किया। नैनीताल को अपने शब्दों में बयां करती शब्दों और तस्वीरों की ये जुगलबंदी आपके लिये….. वो नशीली सी झील मस्तानी गुनगुनी  धूप गुनगुना पानी। आज सूरज चांद बनके बिखरने सा लगा बनके तारा पानी में उभरने सा लगा।  बूंदों में पसरने लगी दूधिया पिघलन जैसे पानी में ही बस आया READ MORE

आओ आओ फिल्में देखो….

September 28, 2010 // 1 Comment

यहां हर रविवार को कुछ नई फिल्में स्क्रीन हो रही हैं। कुछ नये चेहरे उन फिल्मों पर अपनी प्रतिक्रिया दे रहे हैं। कुछ नये घर वैन्यू में शामिल हो रहे हैं। कुछ नई यादें आगे के लिये जुड़ रही हैं। नई बातें और एक नई सोच। हर बार एक तरह का नयापन। सिनेमाथैक ने अपनी स्क्रीनिंग की तीसरी पारी पूरी की। इशिता हर स्क्रीनिंग के बाद उसपर अपनी एक ताजा रिपोर्ट फेसबुक के सिनेमाथैक ग्रुप पे पोस्ट कर देती READ MORE

आओ आओ फिल्में देखो….

September 27, 2010 // 2 Comments

यहां हर रविवार को कुछ नई फिल्में स्क्रीन हो रही हैं। कुछ नये चेहरे उन फिल्मों पर अपनी प्रतिक्रिया दे रहे हैं। कुछ नये घर वैन्यू में शामिल हो रहे हैं। कुछ नई यादें आगे के लिये जुड़ रही हैं। नई बातें और एक नई सोच। हर बार एक तरह का नयापन। सिनेमाथैक ने अपनी स्क्रीनिंग की तीसरी पारी पूरी की। इशिता हर स्क्रीनिंग के बाद उसपर अपनी एक ताजा रिपोर्ट फेसबुक के सिनेमाथैक ग्रुप पे पोस्ट कर देती READ MORE

सिने सफर मुख्तसर -भाग 2

September 25, 2010 // 1 Comment

बहसतलब का आज दूसरा दिन था। आज बात होनी थी हिन्दी सिनेमा और बाजार पर। कार्यक्रम के संचालन की बागडोर अविनाश ने खुद कुछ कहने के बाद वरुण ग्रोवर को दे दी। वरुण ग्रोवर  ने शुरुआत की और कहा कि हिन्दी सिनेमा का व्यापार बड़ा एब्सटेक्ट किस्म का है। यहां लोग फिल्में बेच तो रहे हैं पर रिस्क नहीं ले रहे। ये लोग जाहिर तौर पे निर्माता हैं। उनके कंटेंट में प्रयोग दिखे न दिखे लेकिन पीआर में जबरदस्त READ MORE

सिने सफर मुख्तसर- भाग 1

September 24, 2010 // 4 Comments

मोहल्ला लाईव, जनतंत्र और यात्रा बुक्स द्वारा आयोजित बहसतलब का पहला दिन कुछ सार्थक बहसों के नाम रहा । अविनाश दास ने कार्यक्रम की रुपरेखा रखी और फिर मिहिर पान्डया के संचालन में कार्यक्रम ने रफतार पकड़नी शुरु की। अभी गाड़ी स्लो पेस में थी। सफर शुरु हुआ ही था। सिनेजगत की उपरी सतहों से शुरु होकर उसकी गहराईयों में उतरता एक बातचीत का सफर जिसमें एक साथ परदे के पीछे अपनी भूमिका अदा करने READ MORE

एक शुरुआत थोड़ी फिल्मी सी…..

September 12, 2010 // 1 Comment

एक बंद संकरी गली और बत्ती गुल बंद संकरी गली के भीतर जहां शाम के चार बजे एक खास किस्म का अंधेरा रैंग रहा था। पहुंचते ही कुछ पसीने से नहाई हुई शक्लें किसी चीज का इन्तजार करती दिखाई दी। मैं पहुचा और तय था कि इन्तजार किसी और चीज का था। यार पिछले दो घंटे से लाईट नहीं है। वहां पहुंचने तक तय हो चुका था कि वैन्यू अब चेंज करना होगा। बिना लाईट के स्क्रीनिंग सम्भव नही थी। सिनेमाथैक। इसी नाम से READ MORE

बोल कबीरा तब क्या हैगा

September 7, 2010 // 2 Comments

कभी गुलामी मातम थीपर आज गुलामी उत्सव हैगाकौमनवेल्थ के जरिये बिकनाआज देश का गौरव हैगा। लूट खसोट की मैराथन मेंभ्रष्टाचार का शासन हैगाअब तो वो भी बिक जाना हैघर में जितना राशन हैगा। कितना कौमन वैल्थ हमाराइसको उसको बंटता हैगाआम आदमी चुपकर प्यारेतुझको काहे खटता हैगा। बंदरबांट का मेला देखोहर चेला मदारी हैगाकब्ज न होती पच जायेगापैसा पाचनकारी हैगा। कल्माड़ी की दाड़ी भीतरकाले धन का READ MORE

जीविका से जुड़ी आम आदमी की फिल्में

September 6, 2010 // 2 Comments

वृत्त्चित्रों को लेकर भारत में अपेक्षाकृत ठीक ठाक काम होता है लेकिन उनके प्रदर्शन को लेकर उतने प्रयास नहीं दिखाई देते। शहरी इलाकों में कभी कभार कुछ फिल्म फेस्टिवल्स को छोड़ दें तो इनके प्रदर्शन के लिये कोई सुचारु व्यवस्था हमारे देश में देखने को नहीं मिलती। शायद यही वजह है कि कई गम्भीर मुद्दे इन फिल्मों की शक्ल में उठते तो हैं पर दर्शकों के अभाव में अपनी मौत मर जाते हैं। और ये READ MORE

गिर्दा के इर्द गिर्द

September 5, 2010 // 1 Comment

दिल लगाने में वक्त लगता है, डूब जाने में वक्त लगता है, वक्त जाने में कुछ नहीं लगता, वक्त आने में वक्त लगता है। गिरीश तिवारी गिर्दा वक्त जा चुका है। गिरदा नहीं रहे। अब ऐसा वक्त आने में समय लगेगा जब गिरदा जैसा कोई जनकवि, जनसेवक फिर पैदा होगा और हमसे झूमते हुए कह उठेगा ततुक नी लगा उदेख, घुनन मुनई न टेक। दिल्ली के राजेन्द्र भवन में गिरदा की दिवंगत आत्मा को सृद्धान्जली देने के लिये आज उमड़ी READ MORE

जनस्वास्थ्य पर भारी पड़ता कौमनवैल्थ

August 27, 2010 // 1 Comment

हैल्थ इज वैल्थ। इस जुमले का भरपूर प्रयोग आप हम अपने जीवन में भले ही कई बार करते हैं किन्तु स्वास्थ्य सम्बन्धी नीतियों के मामले में सरकार को शायद यह बात समझ नहीं आती। इस बात का अन्दाजा कौमनवैल्थ में किये जा रहे खर्च और कौमन यानी आम आदमी की हैल्थ पर हो रहे मौजूदा खर्च की तुलना करके लगाया जा सकता है। यह बात अब किसी से छिपी नही है कि कौमनवैल्थ खेलों के नाम पर इन कुछ में महीनों में किस तरह READ MORE

फुटबाल फीवर और फैशन स्टेटमेंट बनता फेसबुक स्टेटस

July 4, 2010 // 0 Comments

अर्जेटीना हार गई। ब्राजील भी नहीं रहीं। कुछ दुखी हैं। कुछ बस इसलिये खुश कि अभी तो सेमीफाईनल चल रहा है। माने पिक्चर अभी बांकी है। रगों में वाका वाका बनकर सकीरा दौड़ रही है और कानों में भिनभिनाती मधुमक्खियों सी वो पता नहीं कैसी सी धुन, कैसा तो नाम वैवुजेला या इससे मिलता जुलता। एक विश्वव्यापी रोमान्च सा फैला हुआ है दुनिया में फीफा के नाम का। खिलाड़ी भगवान हो गये है, टीम धर्म और खेल READ MORE

भोपाल का मृतलेख

June 13, 2010 // 2 Comments

भोपाल की त्रासदी के 26 वर्षों बाद उसपर जो हालिया फैसला आया है वह चौंकाने वाला है। उसी फैसले का विरोध दर्ज करती ये कुछ पंक्तियां उन लोगों को को समर्पित जो बेवजह इस त्रासदी के शिकार हो गये और उन कई पीड़ितों के साथ खड़े होने की एक कोशिश जो इस अन्यायी फैसले के खिलाफ अपनी आवाज बुलंद कर रहे हैं….. आज फिर इन्साफ को मिट,टी में दफनाया गयाजमहूरियत की शक्ल का कंकाल फिर पाया गया। उनकी सियासत की READ MORE

जंगलों में जीवन तलाशता वो

June 5, 2010 // 2 Comments

Into the wild …..और एक दिन वो सब कुछ छोड़ कर चला जाता है। कहीं दूर अलास्का के जंगलों की तरफ। अपने मां बाप और बहन को छोड़कर। बिना कुछ बताये। क्यों? इसके लिये उसके पास कई कारण हैं। वो अपने मां बाप को बचपन से देख रहा है छोटी छोटी बातों पर लड़ते हुए। वो देखता आया है उनकी बहसों के कारण कितने भौतिक हैं। कितने मटीरियलिस्टिक। उसके ग्रेजुएशन डे के दिन उसके पापा उसे सबसे बेहतर तोहफा क्या दे सकते हैं? एक READ MORE

इनक्रोचमेंट, डिमोल्यूशन एंड डिस्प्लेसमेंट

May 21, 2010 // 0 Comments

सुबह सुबह नौएडा मोड़ से गुजरते हुए सड़क के किनारे देखा तो वहां मां दुर्गा की वो मूर्ति नहीं थी, ना ही नटराज की। वहां कुछ लोग थे जो बुल्डोजर लेकर कच्ची ईंटों से बने उन कच्चे घरों को तोड़ रहे थे जहां अब तक वो कुछ लोग रहते थे, जिनका रहना वहां गैवाजिब था, उन लोगों के लिये जिनके लिये लोकतंत्र सबसे उपर है और कानून उससे भी उपर। इसीलिये इन लोगों का वहां रहना गैरकानूनी समझा गया और आज उनको वहां न READ MORE

बांधों की टूटन से उपजते आन्दोलन

May 1, 2010 // 1 Comment

बड़े बांधों को बनाये जाने को लेकर दुनिया भर में चर्चाएं हो रही हैं। विश्वभर में कुलमिलाकर 47665 छोटे बड़े बांध हैं जिनमें से सबसे ज्यादा 22 हजार बांध चीन मे, 6600 से ज्यादा बांध संयुक्त राज्य अमेरिका और उसके बाद 4291 बांध भारत में हैं। लेकिन अब इन बांधों को लेकर बड़े बड़े आन्दोलन ही खड़े नहीं हो रहे बल्कि इस विशय पर वृत्तचित्र और फिल्में भी बन रही हैं। इससे साफ जाहिर होता है कि अंधाधुृध READ MORE

एक दोस्त का प्रोफेश्नल हो जाना

April 22, 2010 // 4 Comments

कई बार अपने आसपास लोगों को निहायत प्रोफेश्नल होता देख डर लगता है। समझ नहीं आता कि क्या ज्यादा जरुरी है। इन्सानी भावनाओं को जिन्दा रखते हुए जीना या प्रोफेश्नल होना। जल्दबाजी, बेचेनी फलतह तुनकमिजाजी, गुस्सा। समझ नहीं आता कि क्यों कोई काम शुकून से नहीं किया जा सकता। पर सबके काम करने करवाने के अपने अपने तरीके हैं यहां। क्या सही क्या गलत। लेकिन कई बार इस प्रोफेश्नलिजम की हद यहां अपने READ MORE

लव.. सेक्स.. धोखा. और सच

March 24, 2010 // 4 Comments

लव, सेक्स और धोखा। इन तीनों में से कोई भी शब्द हाईपोथैटिकल और नया नहीं है। तीनों इन्सानी फितरत के हिस्से हैं। और इसी तरह हिन्दुस्तानी फिल्मों के भी। लेकिन दिबाकर बनर्जी जिस तरीके से इन तीनों को स्क्रीन पे दिखाते हैं उससे फिल्म की ग्रामर को ही एक नई धारा सी मिल जाती है। मेरी समझ से इस तरह की फिल्म हिन्दुस्तान में पहले कभी नहीं बनी। जिसमें सब कुछ आन कैमरा चल रहा है। फिल्म कैमरे के READ MORE

सम्भावना डाट काम से तीन कविताएं

March 15, 2010 // 4 Comments

यहां बांईओर कमेन्ट बौक्स में एक मैसेज मुस्कुरा रहा है जिसमें हिन्दयुग्म के हालिया प्रकाशित काव्यसंग्रह सम्भावना डाट काम में प्रकाशित मेरी कुछ कविताओं को छापने का जिक्र है। रोहित की इस दोस्ताना गुजारिश पर उनकी कुछ कलाकृतियों के साथ उनके कुछ चित्रों और मेरी कविताओं की जुगलबंदी पेश है आपके लिये….. शब्द शब्द गिरगिट की तरह होते हैं और बदल जाते हैं पल में मायनों की तरह। रोशनी से READ MORE

उन्हें आपकी कोई केयर नहीं है जी

March 12, 2010 // 1 Comment

उफ एक बुरी खबर उनके लिये जो फेसबुक पर अपने दिल की बात कहकर जी हल्का कर लेने में भरोसा करते हैं। जो ये सोचते हैं कि दिल में उठे भावनाओं के तूफान को शब्दों के लबादे में लिपटाकर दुनिया को बता ही दिया जाय ताकि कुछ लोग जो इस हाले दिल से इत्तेफाक रखते हैं अपनी राय इसपर चस्पा कर दें। कहीं आप भी ऐसी ही कोई गलतफहमी तो नहीं पाले बैठे हैं कि फेसबुक पर आपके जजबातों की कद्र करने के लिये दुनिया पलक READ MORE

1411- बाघों के नाम

February 18, 2010 // 1 Comment

आज के दौर में जंगल उदास हैं और वो लड़की जो बाघ की खाल से बना फर पहनकर शीशे में देख मुस्कुरा रही है हमें जंगली सी दिखती है। पर ये उस दौर की बात है जब जंगल उतने जंगली नहीं थे न ही आदमी उतना शहरी। जब एक दहाड़ सुनाई देने पर अक्सर कहते थे गांव के लोग कि बाघ आ गया। हम सुनते थे अपने पापा से बाघ के किस्से कि कैसे उस रोज आया था बाघ हमारे शेरा को ले जाने और पापा ने किया था टौर्च लेकर पीछा हम आज तक पापा READ MORE

डाट काम में सम्भावनाओं को तलाशती कविताएं और हिन्दयुग्म

February 6, 2010 // 3 Comments

प्रगति मैदान के गेट नम्बर सात के पास हाल नम्बर 2 में आज हिन्दयुग्म अपना वार्षिकोत्सव मना रहा था। साथ में होना था 38 उभरते हुए सम्भावनाषील कवियों की कविताओं के संकलन सम्भावना डाट का विमोचन। कुछ जाने पहचाने चेहरों के अतिरिक्त वहां जो लोग लोग मौजूद थे उनका परिचय यही था कि वो हिन्दयुग्म से किसी न किसी तरह जुड़े थे। हिन्दयुग्म के निखिल आनन्द गिरि ने नियत समय पर मंच संचालन का कार्यभार READ MORE

ताकि बाघ जीते रहें…

February 1, 2010 // 1 Comment

कल मेरे एक क्लासमेट और आत्मीय दोस्त शशांक वालिया का अचानक फोन आया। “यार तुम बडे ब्लौग शौग लिखते हो। एक ब्लाग मेरी रिक्वेस्ट पे भी लिखो यार। मैं चाहता हूं कि बाघों पर तुम कुछ लिखो। सेव टाईगर्स का टीवी पर एड देखा तो सोचा कि तुम्हें फोन कर लूं।” बडा अच्छा सा लगा कि लोगों कि अपेक्षाएं नई सोच से जुड रही हैं। ऐसी आशाओं पर खरा उतरने की कोशिश नई सोच के जरिये इसी तरह आगे भी जारी रहेगी फिलहाल READ MORE

लाशों से कफन बीनने वालों पर बनी फिल्म को नेश्नल अवार्ड

January 26, 2010 // 3 Comments

जामिया के मासकम्यूनिकेशन रिसर्च सेन्टर में साउन्ड के लेक्चरार मतीन अहमद को फिल्म चिल्ड्रन आफ पायर की साउन्ड डिजाईनिंग के लिये इस बार का नेश्नल अवार्ड दिया जा रहा है। ये फिल्म वाराणसी के उन 6 बच्चों की कहानी है जो मरघटों पर जलती हुई लाशों पर लिपटे हुए कफन बीनते हैं। कफन बीनकर या कभी कभी चुरा और छीनकर अपनी जिन्दगी जीने वाले इन बच्चों का जीवन कैसे बसर होता है चिल्ड्रन आफ पायर इसे READ MORE

एक बेजुबान आक्रोश

January 23, 2010 // 0 Comments

सारे आक्रोष महज एक दुर्घटना बनकर समाप्त हो जाते हैं। ये आक्रोश भी कुछ ऐसा ही था। गोविन्द निहिलानी की इस फिल्म को देखकर ताजा ताजा बस यही समझ में आता है कि आक्रोश की अपनी असल आवाज उसके सन्नाटे में दबी होती है। मगर अक्सर इस चुप्पी के पीछे जो आक्रोश दबा होता है वो इतना खामोश रहता है कि उसका होना न होना बनकर समाप्त हो जाता है। आदिवासियों पर होने वाले अत्याचार पर बनी इस पूरी फिल्म में READ MORE

पंचेश्वर- टूटती उम्मीदों का बांध

January 15, 2010 // 3 Comments

पंचेश्वर बांध इन दिनों उत्तराखंड में चर्चा का केंद्र बना हुआ है और संभावित डूब क्षेत्र के इलाकों में ये बांध प्रतिरोध को भी जन्म दे चुका है। ये प्रतिरोध जाहिर तौर पर उन लोगों का है, जो इस बांध के बन जाने के बाद सीधे तौर पर प्रभावित होंगे। इस बांध के कारण कितने लोगों का विस्थापन होगा, इसका अनुमान कई विश्लेषक लगा चुके हैं। ये बांध भारत और नेपाल के बीच 1994 में हुई संधि के अंतर्गत READ MORE

पहाड़ी जायके के बहाने

January 10, 2010 // 3 Comments

मम्मी ने रात को भट के दाने भिगा दिये । सुबह सुबह मैं जब इन दानों को देखता हूं तो इनमें एक अजीब सी विशालता आ जाती है। रात को ये दाने इतने बड़े कहां थे। मुझे हैरानी होती है। कहीं संबह सुबह की धूप के घुलने से तो ये दाने फूल नहीं गये होंगे। मैं इस समय विज्ञान भूल जाना चाहता हूं। मम्मी ने जब इन्हें भिगाया होगा तो क्या उसे भी विज्ञान याद रहा होगा। नहीं ना। फिर क्यों मैं इन दानों के फूल जाने में READ MORE

बदतर होते ये सरकारी स्कूल

December 19, 2009 // 1 Comment

जामिया के एमसीआरसी में उस दिन एक अजीब वाकया सुनने को मिला। सुनकर सभी चैंके। और एक अजीब वितृष्णा से मन भर उठा। फस्र्ट ईयर के कुछ छात्रों ने बताया कि उनकी क्लास की एक लड़की को भरतनगर के सरकारी स्कूल के लड़कों ने स्कूल कैंपस में मोलेस्ट किया है। दिल्ली के सरकारी स्कूल। सुनकर जो छवि अब तक बनती रही थी वो यही थी कि सफेद कमीज और नीली पैंट पहने जो लड़के बसों में बुरी तरह लटकते हुए कन्डक्टरों READ MORE

कोपेनहेगन के बहाने

December 13, 2009 // 3 Comments

जलवायु परिवर्तन के मुददे पर बहुत कुछ लिखा जा रहा है आजकल। बहुत सी बहसें। बहुत से जुलूस। बहुत से कोंन्फ्रेस, सेमीनार, किताबें और न जाने क्या क्या। पर असल में किया क्या जा रहा है कम से कम ऐसे बड़े श्हरों में जहां बहसें अपने इन्टलैक्चुअल रिदम के साथ उफान पर हैं, यह जरा देखने वाली बात है। दिखे तो कोई बता दे। इस ब्लाग को लिखने की एक खास वजह है। जो इस वैश्विक मुददे को स्थानीय होकर देखने से READ MORE

डेज़ आफ हैवन यानि खूबसूरती के पल

December 10, 2009 // 1 Comment

डेज़ ऑफ़ हैवन उन कमाल की फिल्मों से एक है जिन्हें आप चाहें तो बस उनकी सिनेमेटोग्रेफी के लिए देख सकते हैं। इस फिल्म को कम्प्यूटर पर देखते हुए आपकी स्पेस की परेषान हो सकती है। क्योंकि हर दूसरा फ्रेम आपको मजबूर कर देता है कि फिल्म को रोककर बस उस फ्रेम में डूब जाया जाये। उसी तरह जैसे पहाड़ों में सर्दियों के मौसम में घूमने निकले हों। और कंपाती ठंड के बीच जहां जहां धूप दिखे वहां वहां रुक READ MORE

एक वीडियो ब्लाग के बारे में

December 8, 2009 // 4 Comments

हिन्दी में ब्लाग कैसे बनायें कई लोग ये सवाल करते मिल जाते हैं। शुरुआती दिनों में ब्लाग कैसे बनायें यह भी लोगों की समस्या का विषय था। कई लोगों के लिये अभी भी ये समस्या का विषय है। ब्लाग बनाते हुए और बनाने के बाद कुछ छोटी छोटी दिक्कतें आती हैं। मसलन शुरुआत कैसे करें। फिर ब्लाग बन जाने के बाद उसमें हिन्दी में कैसे लिखें। अगर र्वउ में कोई बढ़ा टैक्स्ट जेसे लेख या कहानी पहले सो लिखी हुई READ MORE

क्या आपका फोन चोरी नही हुआ

November 24, 2009 // 4 Comments

सिट यार फोन चोरी हो गया। घर आकर बताया तो भाई लोगों के चेहरे पर मुस्कुराहट तैर आई। पहली बार जब घर आकर बताया था तो ऐसा नहीं हुआ था। तब सबको लगा था कि हां कुछ चोरी हो गया। ऐसा होना नहीं चाहिये था। कैसे कोई फोन चोरी कर सकता है। जेब से निकाल कैसे लिया फोन। ब्ला ब्ला…तब घर वालों ने बड़ी जिज्ञासा दिखाई थी फोन चोरी होने की घटना के बारे में। घर में पहला फोन जो चोरी हुआ था। मुझे भी सदमा सा लगा था। READ MORE

युद्व का उन्माद और सोल्जर ब्लू

November 14, 2009 // 0 Comments

युद्व का उन्माद कितना विभत्स, कितना भयावह और अमानवीय हो सकता है सोल्जर ब्लू में देखा जा सकता है। ये एक अमेरिकन फिल्म है। इतिहास में झांकती, जंग के मैदान में ले जाती और उस मनहस्थिति से रुबरु कराती जो एक आदमी को निहायत जंगली बना देने पर उतारु कर देती है। जो एक सभ्यता के असभ्य हो जाने की अन्तिम सीमा तक पहुंचने की यात्रा दिखाती है। फलतह आदमी के अमानवीय हो जाने की दर्दनाक सच्चाई को खुलकर READ MORE

और तीन की टिकट नहीं रही…….

November 5, 2009 // 0 Comments

दिल्ली की बसों में एक और बड़ा दर्दनाक वाकया हुआ। बड़े अफसोस के साथ कहना पड़ रहा है कि इस हादसे में 3 रुपये की टिकट नहीं रही । दिल्ली में बसों के किराये बढ़ गये। पांच का टिकट दस का हो गया और दस का पन्द्रह में बदल गया। सात की बिसात भी अब नहीं रही। इस घटना का सीधा असर यहां ब्लाग पढ़ रहे आप हम लोगों में से बहुत कम पर होगा। हमें शायद ये घटना बहुत दर्दनाक ना लगे। पर बस में चढ़ने वाला एक बड़ा तबका READ MORE

ओसियान उड़कर आया सुपरमैन आफ मालेगांव

October 29, 2009 // 2 Comments

वे फैज नहीं हैं फैजा हैं इसलिए उनका अंदाजे बयां अलहदा है। फैज शब्दों से अपनी बात कहते थे फैजा ने वृत्तचित्र के जरिये कही। और जो कही कमाल कही। किसी कविता सी दिल में उतर गई चित्रों के कई वृत्त सी बनाती जैसे नदी के शान्त प्रवाह में कंकड़ को हल्के धकेल दिया हो। फैजा अहमद खान आरै कुहू तनवीर की फिल्म सुपरमैन आफ मालेगांव एक डाक्यूमेंटी फोर्म की फिल्म है। पूरी फिल्म एक फिल्म बनने की READ MORE

ओसियान् में खरगोश

October 28, 2009 // 1 Comment

ओसियान्स में दिखा वो खरगोश रगों में अब तक एक अजनबी सी रुमानियत पैदा कर रहा है। एक मासूम सी, बच्ची सी पर पर फिर भी प्रौढ़, परिपक्व सी है ये रुमानियत। बड़ा रुहानी सा होकर भी रुहानी भाव न होने सा कुछ, पर फील पूरा रुहानी, पूरा नशा लिए हुए। सात बजकर पैंतालीस मिनट पर उस खरगोश ने फिल्मी परदे पर दौड़ना शुरु किया फिर दौड़ा क्या रुक ही गया दिमाग के कोने कोने में जैसे हमेशा के लिए। परेश कामदार ने READ MORE

ब्लागिंग से जुड़े कुछ डर कुछ शिकायतें

October 25, 2009 // 3 Comments

एक फिल्म आई थी, तारे जमी पर। फिल्म की सफलता के बाद फिल्म के मुख्य कलाकार दर्शील ने एक सवाल उठाया था कि जब उनकी अदाकारी बेहतर है तो उन्हें बेस्ट ‘बाल कलाकार’ की जगह बेस्ट ‘कलाकार’ का पुरस्कार क्यों नहीं दिया जा सकता। मायने यही थे कि किसी चीज को रिकोर्गनाईज किये जाने के लिए क्या ज्यादा जरुरी है? उसकी गुणवत्ता या फिर उससे जुड़ी हुई उम्र और अनुभव की सीमाएं। मेरे खयाल से गुणवत्ता। READ MORE

अब आयेगा इन्टरनेट पर दुकानदारी का दौर

October 20, 2009 // 3 Comments

इन्टरनेट इन दिनों दुकानों का काम भी कर रहा है। यहां पर कई ऐसी साईटस मौजूद है जो आपको विभिन्न प्रोडक्टस की जानकारी दे देती हैं वो भी घर बैठे। आपके मनपसन्द कपड़े हों या फिर अन्य कोई एसेसरी इन्टरनेट पर उनके मूल्यों के साथ उनकी गुणवत्ता की भी जानकारी ली जा सकती है। ये वैबसाईट कुछ इसी तरह काम करती हैं जैसे गूगल या कोई अन्य सर्च इन्जन। बस आपको टाईप करना होता है प्रोडक्ट का नाम और आपको उस READ MORE

एक ज्यादती है कपिल साहब का बयान

October 20, 2009 // 1 Comment

15 जुलाई 2009 को कपिल सिब्बल ने लोकसभा में अपने भाषण में कहा था कि शिक्षा व्यवस्था में सभी तरह के नये प्रयोगों को शामिल किया जायेगा। और हाल ही में उन्होंने बयान जारी किया आआईटी में प्रवेश के लिए 80-85 प्रतिशत अंक लाना अनिवार्य होना चाहिये। 15 जुलाई को दिये हुए वक्तव्य में उनका मन्तव्य शायद इसी तरह के प्रयोगों से था। उनका मानना है कि जो बारहवीं में इतने अंक नहीं ला सकता उसे इतने प्रतिश्ठित READ MORE

आस्था के लिए जीता एक नगर: त्रयम्बकेश्वर

October 19, 2009 // 2 Comments

इस बार त्रयम्बकेष्वर जाना हुआ। लगा कि भक्ति और आस्था ये ऐसे शब्द हैं जिनका कटटरवाद से कोई लेना देना नहीं है। महाराष्ट में नासिक के पास एक छोटा सा कस्बा है त्रयम्बकेश्वर जिसका अस्तित्व अगर है तो उसके पीछे बस यही भक्ति और आस्था है। लगता कि है कि ये कस्बा इसी आस्था से है और इसके लिए जीता है। आस्था न होती तो ये कस्बा न होता। एक पिछड़ा सा नजर आने वाला इलाका, पिछड़े से नजर आने वाले लोग लेकिन READ MORE

ईद मुबारक…..

September 21, 2009 // 4 Comments

हम ईदगाह पढ़ते बड़े हुए। और जब जब हामिद के चिमटे ने उसकी दादी की आंखें को खुशी से सराबोर कर दिया हमें लगा कि ईद आ गई। और आज फिर जब ईद आई है हमें हामिद की दादी याद हो आई है। उसी चिमटे उन्हीं खुशी भरे आंसुवों के साथ। जामिया में पढ़ते उसे समझते मुझे पांच साल हो आये हैं। पर जामिया को मैने कभी उस रुप नहीं समझा जिस रुप में मीडिया अक्सर हमें समझाता रहा है। मुझे जब जब मोहन चंद्र शर्मा से हमदर्दी READ MORE

मैन विद मूवी कैमरा : कैमरा जब आंख बन जाता है

September 17, 2009 // 0 Comments

फिल्मों में रुचि रखने वाले लोगों के लिए मैन विद मूवी कैमरा एक कमाल की फिल्म है। जिस दौर में सिनेमा की शुरुआत होती है उस दौर में कैसे एक डाइरैक्ट हर सम्भव तकनीक अपनी फिल्म में प्रयोग कर लेता है और पूरी सफलता से, ये बात फिल्म देख लेने के बाद ही पता चलती है। 1929 में बनी ये डौक्यूमेंट्री फिल्म रसियन निर्देशक वर्तोव ने निर्देशित की। न फिल्म में कोई कहानी है, ना ही कोई निर्धारित पात्र साथ ही READ MORE

भीड़ भरी बस और वो

September 11, 2009 // 6 Comments

दिल्ली की भीड़ भरी बसों में रोज कई वाकये होते हैं। मसलन मोबाईल या पर्स चोरी हो जाना। पर इन वाकयों को अंजाम देने वाले लोग ये काम चोरी छिपे करते हैं। उन्हें किसी का डर होता है। यह किसी शायद प्रशासन होता है, माने पुलिसिया डंडा और मार। पर जो वाकया आज हुआ उसे उदेखकर लगता है इस किसी का डर अब किसी को नहीं रह गया है। खासकर उनको जिन्होंने शायद हर किसी को अपनी मुट्ठी में कर लिया है। किसी को ताकत READ MORE

एक कहानी सा कुछ

September 9, 2009 // 3 Comments

सड़क पर बसें रफ्तार से आ जा रही हैं। बस स्टॉप पर भीड़ तिलचट्टों के झुंड सी बिखरी है। एक बस आती है। रुकती है और उस पर लोग टूट पड़ते हैं। जैसे जल्दबाजी एक जरुरत हो जिसके पूरा न होने पर सम्भवतह जिन्दगी थम सी जाएगी। लोग इस भीड़ में खुद को सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण और हर किसी को निहायत तुच्छ मानते हुए किसी तरह बस में अपने लिए जगह बना लेना चाहते हैं। खींचातानी-धक्कामुक्की जगह बना लेने की इस READ MORE

दाखिले की प्रक्रिया में दखल की जरुरत

July 3, 2009 // 0 Comments

दिल्ली विश्वविद्यालय में दाखिले की दौड़ अन्तिम पड़ाव पर पहुंचने वाली है और कई लाख छात्रों में से कुछ हजार ही ऐसे हैं जिन्हें विश्वविद्यालय में पढ़ने का मौका हासिल होने वाला है। दाखिलों की इस पूरी प्रक्रिया को बेहद आसान कर देने का श्रेय विश्वविद्यालय प्रशासन को अवश्य दिया जाना चाहिये क्योंकि इसने छात्रों और उनके अभिभावकों के कई लीटर पसीने को बहने से बचाया है लेकिन मौजूदा वर्ष READ MORE

भावनाओं का संसार रचती दो उम्दा फिल्में

June 13, 2009 // 2 Comments

इस बीच माजिद माजिदी की दो फिल्में देखने को मिली। चिल्ड्रन आफ हैवन और कलर्स आफ पैराडाईस। माजिद माजिदी की फिल्में एक अलग संसार रचती हैं। गांवों का संसार, भावनाओं का संसार और अदभुत प्राकृतिक और मनोवैज्ञानिक सुन्दरता का संसार। इन दो ही फिल्मों ने इस ईरानी निर्देशक के प्रति एक अजीब सा आकर्षण जेहन में पैदा किया है। कोई निर्देशक कितनी गहराई से अभावों के बीच से उपजते मनोवैज्ञानिक READ MORE

नुक्कड़ नाटक के बाद एक और नाटक

April 25, 2009 // 5 Comments

समलैंगिकता को कितना सही कहा-ठहराया जाय ये मुददा अलग बहस का हो सकता है लेकिन हमारे समाज में समलैंगिकों के साथ होने वाला व्यवहार कतई सही नहीं ठहराया जा सकता। हाल ही में जामिया के एमसीआरसी के मासकाम्यूनिकेषन कर रहे छात्रों ने समलैंगिकता पर एक नुक्कड़ नाटक किया। पूरा नाटक इन छात्रों द्वारा लिखा और कोरियोग्राफ किया गया। बाकायदा ये पूरा नाटक टीचिंग स्टाफ के संरक्षण और दिशा निर्देशन READ MORE

मैं वोट करुंगा

April 2, 2009 // 5 Comments

कई बार ये सवाल मेरे जहन मैं आता हैकि आंखिर मैं वोट क्यूं करुंवोटिंग मशीन के मतों में मैं एक और अंक क्यों भरुंमैं आंखिर वोट क्यूं करुं।लेकिन इस बार मैं अपनी इस सोच पर चोट करुंगा।मैं वोट करुंगा। मैं वोट करुंगा।मैं वोट करुंगाक्योंकि संसद के गलियारों में मेरी हिस्सेदारी होगी।मैं वोट करुंगाक्योंकि एक युवा होने के नाते ये मेरी जिम्मेदारी होगी।मैं वोट करुंगाक्योंकि याद है मुझे कि READ MORE

एक और भड़ास जैसा कुछ

March 20, 2009 // 3 Comments

हम एक ऐसी लोकतांत्रिक व्यवस्था में जी रहे हैं जहां पे आपको बोलने सुनने और यहां तक कि सोचने के लिए भी एक दायरा तय कर लेना होता है। क्या सोचें क्या कहें और क्या करें इस सब के इर्द गिर्द एक बड़ी लोहे की कांटेदार जंजीर लिपटी हुई है। एक छोटी सी भूल उस जंजीर को आपके मांसल शारीर के खून का प्यासा बना सकती है। और फिर एक दर्द आपके इर्द गिर्द किसी साये की तरह मडराने को बेताब खड़ा हो जायेगा। फिर आप READ MORE

ये शहर इस मौत का जिम्मेदार है

March 16, 2009 // 5 Comments

तस्वीरें यहां से हटा दी गई हैं। एक नजदीकी दोस्त की इस सलाह पर कि तस्वीरें यहां पोस्ट करना भी अपने में एक संवेदनहीनता है। हांलाकि मैं अभी उहापोह की स्तिथि में हूं कि क्या वाकई इस मुत लड़के की तस्वीरों को यहां छापना एक असंवेदनशील व्यवहार है कि नहीं। या फिर एक कड़वी सच्चाई को उसके भौंडे ही सही लेकिन वास्तविक रुप में दिखाना यदि कुछ लोंगों काी सेवेदनाओं को जगा सके तो क्या इस सोच से छापी गई READ MORE

होली है तो पर यहां कहां

March 9, 2009 // 2 Comments

कल होली है तो पर होने जैसा कुछ नजर नहीं आया अब तक। हर त्यौहार की तरह इस होली में फिर घर की याद हो आयी है। घर जाने का मन तो था पर जाना हो नही पाया। कारण वही एकैडमिक प्रेशर। खैर घर यानी गंगोलीहाट में होली के अपने अलग रंग हैं। वहां आज भी होली पारम्परिक तरीके से मनायी जा रही है। वहां की होली की खास बात है कि उसमें रंग भी है ता साफ सुथरे। वहां कोई हुडदंग जैसी चीजें नही हैं। औरतों की अपनी अलग READ MORE

जय हो जय हो जय जय हो

February 24, 2009 // 0 Comments

border=”0″ alt=””id=”BLOGGER_PHOTO_ID_5305846119517931362″ /> आजा आजा जिन्द सामियाने के तले। और इसके बाद जय हो। आस्कर सेरेमनी में अभी जब इस संगीत के सामियाने में ए आर रहमान पुरस्कार ले रहें हैं तो दिल गर्व से गदगद हो रहा है। हांलाकि ए आर रहमान की धुनें पहले गोल्डन ग्लोब और उसके बाद बाफटा में कमाल दिखा चुकी थी। लेकिन आस्कर आंखिर आस्कर है। ये हर भारतीय के लिए गर्व की बात है कि भारत के संगीत को इस बार विश्व में READ MORE

मीडिया पर एक और तालिबानी हमला

February 19, 2009 // 1 Comment

पाकिस्तान की स्वात घाटी में एक बार फिर पाकिस्तान की तालिबानी ब्रिगेड ने अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की हत्या की है। दरअसल यह हत्या उस पाकिस्तानी पत्रकार मूसा खान की हत्या ही नहीं है बल्कि यह मामला हमारी मौलिक स्वतंत्रता के अधिकार के हनन का मामला है। यह हत्या भले ही पाकिस्तान में हुई हो लेकिन ऐसा नहीं है कि किसी और देश के लिए इसकी कोई अहमियत नहीं रह जाती। यहां सवाल आतंकवाद के बुलन्द READ MORE

यमुना किनारे विचरने के बहाने

February 2, 2009 // 1 Comment

नदियां हमेशा उस जगह को एक संस्कृति देती हैं जहां वो बह रही होती हैं। नदियों के साथ एक पूरा जीवन और उस जीवन के बरक्स लोगों की दैनिक जीवनचर्या भी नदियों से जुड़ जाती है। चाहे वो बनारस या हरिद्वार के घाट हों या किसी छोटे से गांव के किनारे बह रही अनजान से नाम वाली नदी के किनारे, नदी होने से उनका होना कुछ अलग ही अहमियत से सराबोर हो जाता है। उन घाटों, उन किनारों में होने वाली चहल पहल की वजह वो READ MORE

परिंदों का इन्तजार सा कुछ

January 28, 2009 // 5 Comments

इन दिनों कभी कभी तस्वीरें खीचने का जी होता है। हांलाकि मेरे पास अब तक कोई प्रोफेश्नल कैमरा तो नहीं है लकिन कालेज से जब कैमरा ईश्यू किया तो कुछ तसवीरें खींची। कभी कभी लगता है कि परिंदों के पास अपनी दुनिया को और ज्यादा विस्तार से जीने की आजादी है। उनके पास आकाश है, उसकी उंचाई है और एक स्वच्छन्दता किसी भी हद तक जा सकने की। लेकिन दरियागंज के पास ये परिंदे अपनी छोटी सी दुनिया में कितने खुश READ MORE

इसे कहते हैं जीवटता

January 24, 2009 // 5 Comments

उसकी उम्र 76 वर्ष से ज्यादा हो गई है। चेहरे पर उगी बेतरतीब दाड़ी के बीच बुढ़ापे की कमजारी को साफ देखा जा सकता है। लेकिन उसके अन्दर ऐसा क्या है जो उसे इस तरह के कदम उठाने पर मजबूर कर रहा है। ऐसी कौन सी पीड़ा है कि वो सख्स इन दिनों दिल्ली में बिड़ला मन्दिर के पास हिन्दु महासभा भवन परिसर में धरने पर बैठा हुआ है। आज दसवां दिन है। जीडी अग्रवाल नाम के यह वयोवृद्ध व्यक्ति गंगा को बचाये जाने की मांग READ MORE

फिरकापरस्ती के खिलाफ सहमत जामिया में

January 23, 2009 // 3 Comments

इन दिनों जामिया में सफदर हाशमी की याद में एक चित्र प्रदर्शनी लगी हुई है। यह प्रदर्शनी सांस्कृतिक संस्था सहमत के द्वारा आयोजित की गई है। जामिया के एक सोफिस्टिकेटेड फूड कोर्ट यूथ कैफे के पास बने एक नवनिर्मित प्रदर्शनी हाल में एक महीने के लिए लगी यह प्रदर्शनी कई मायनों में देखने लायक है। जब यह हाल बन रहा था तो लगा था कि यहां पर एक और फूड कोर्ट बनेगा लेकिन ऐसा नहीं हुआ। यह सचमुच बड़ी READ MORE

मीडिया के छात्रों के बारें में

January 9, 2009 // 0 Comments

मीडिया से जुड़े विषयों की पढ़ाई कर रहे छात्रों के बीच हमेशा कुछ कहने की, अपने समाज के मुददों पर बात रखने की एक ललक अन्दर से होती है। नहीं होती तो होनी ही चाहिये, ऐसा मेरा मानना है। दिल्ली आने के बाद पत्रकारिता या जनसंचार से जुड़े कुछ महत्वाकांक्षी छात्रों से मुलाकात हुई। उनमें कुछ कहने और छपने छपाने की गजब की ललक थी। हांलाकि तीन सालों में उनकी छपने छपाने और कुछ कर गुजरने की ललक तो बनी READ MORE

घर में सर्दी के बीच हिमालय को देखते हुए

January 6, 2009 // 1 Comment

दूर हिमालय शान्त खड़ा हैदरकती हुई परतों का शोरअपनी षान्त नियति में छुपाया हुआ सा। एक लहर जो बिना चीखे समा रही है असंख्य छातियों के भीतररुह में अभेद्य सिहरन दियेजिसका नाम डर नहीं है। जलती हुई अंगीठियों के भीतरपक रहं, लाल नारंगी रंगऔर उनपर कांपती सी नीली हवाजो ठिठुरते हाथों में समा जायेगीऔर शीत लहरकुछ देर गाायब होने का स्वांग भर लौट आयेगी थोड़ी देर में। गर्म लपटें जिन्दगी की तरहठंडी READ MORE

जनसरोकारों से जुड़ी पत्रकारिता के खतरे से जूझता उत्तराखंड

January 2, 2009 // 2 Comments

उत्तराखंड में फिलवक्त पत्रकारिता के दो स्वरुप दिखाई दे रहे हैं। पहला जिसमें बड़े पूंजीपति समूह एक बड़े मार्केट प्लेयर के रुप में वहां अपनी जड़ें जमाने पर आमादा हैं। इस बीच इसी क्रम में हिन्दुस्तान और राष्ट्रीय सहारा जैसे बड़े ामूहों ने वहां अपना प्रसार किया है। इससे पहले उत्तर भारत के प्रमुख समाचार पत्रों दैनिक जागरण और अमर उजाला का बाजाार पर कब्जा था और सम्भवतह राष्टीय सहारा और READ MORE

शराब से पीड़ित पहाड़ का दर्द

December 28, 2008 // 3 Comments

मौजूदा समय में पूरे उत्तराखंड में जिस तरह से आन्दोलनों ने जोर पकड़ा है उसे देख यही लगता है कि खंडूरी सरकार से आम आदमी पूरी तरह संतुष्ट नहीं है। ऐसा प्रतीत होता है कि प्रषासन और आम जनता के बीच तालमेल जैसी स्थिति उत्तराखंड से गायब होती जा रही है। यही कारण है कि लोग पानी, अस्पताल, रोजगार, षिक्षा जैसी बुनियादी सुविधाओं की मांग करते हुए लामबन्द होकर सड़कों पर उतर रहे हैं। ज्यादातर इलाकों READ MORE

समय का कैक्टस और कमल का फूल

December 10, 2008 // 2 Comments

कई बार ना जाने क्यों लगता है कि इस शहर में एक बंजर सी उदासी भरी पडी है। और जब जब ये लगता है तो महसूस होता है कि मैं कहीं का नहीं रह गया हूं। इस शोर मचाती दिल्ली में कहीं भीतर एक अजीब सी खामोशी पसरती चली जाती है। सब कुछ एक मशीनी अन्दाज में चला जा रहा है। जैसे किसी खांचे में फिट कर दिया गया हो। एक अजीब सा परायापन किसी अदृश्य गुबार की शक्ल में दिमाग के पुर्जों के बीच गर्द सा चस्पा हो गया है। READ MORE

सावधान ये सब जाली है

December 8, 2008 // 3 Comments

कुछ महीनों पहले दिल्ली के एक संस्थान से एमबीए कर रहे छात्र ने आत्हत्या करने का प्रयास किया। कारण था कि छात्र जिस संस्थान पर अपने लाखों रुपये फीस के रुप में लुटा चुका था वह संस्थान ही जाली निकला। इतनी बुरी तरह ठगे जाने के दर्द ने छात्र को अपनी जीवनलीला समाप्त करने पर मजबूर कर दिया। संयोगवश उसकी जान बच गई। इस तरह के कई ठगी के मामले अक्सर देखने में आते हैं। यदि आप भी नये सत्र में किसी READ MORE

मुम्बई मेरी जान

December 2, 2008 // 0 Comments

उन लमहों में जब हम मायानगरी को देख रहे थे छलनी होते। हम लाचार हिरन थेजिसे शिकारियों ने घेर लिया थाऔर फुर्ती से भरा होने पर भीदुबके रहना एक कोने मेंजिसकी नियति बन गई थी। उन लमहों में हम एक ऐसे लोकतंत्र के साक्षी थेजो उदार होने के नाम परअपनी सुरक्षा ताक पे रख देता है।जिसे मैत्री सम्बन्ध अपनी जान से प्यारे हैं। उन लमहों में हम राजनीति के उस रुप के दर्शक थेजो महज वोट के लिए कर रही थी READ MORE

नौला- विलुप्त होना एक पुरानी परम्परा का

December 1, 2008 // 2 Comments

नौला। पहाड़ी इलाकों में पेयजल के पारम्परिक स्रोतों का जिक्र करते ही सबसे पहले जहन में यही श्ब्द आता है। दरअसल नौले पहाड़ों में पानी के संचयन की एक पुरानी प्रणाली है। इन नौलों का पानी साफ और स्वादिष्ट होता है। नौले अक्सर ऐसी जगह पर बनाये जाते हैं जहां पानी प्राकृतिक रुप से उपजता हो। हर गांव में सामान्य रुप से चार या पांच नौले जरुर होते हैं। गांवों में नौले केवल पानी का स्रोत भर नहीं READ MORE

ब्लैक होल (Black Hole) – अंतरिक्ष के गर्भ में छिपा रहस्य

November 29, 2008 // 2 Comments

Black hole, Kanchan Pant कंचन पंत कंचन एनडीटीवी इन्डिया में पत्रकार है। बह्मांड के अनंत विस्तार में ढेरों रहस्य और अदभुत करिश्मे छिपे हुए हैं। ब्लैक होल भी अंतरिक्ष का ऐसा ही एक रहस्य है। इस अदभुत आकाशीय रचना को समझाने के लिए साइंटिस्टों ने कई सिद्यांत दिए, कई तर्क पेश किए। लेकिन क्या ब्लैक होल को समझना इतना आसान है? सैद्यांतिक तौर पर देखें तो हां लेकिन जब बात प्रायोगिक तौर पर इसे सिद्ध करने की READ MORE

आर्तनादः पांच दिन पिचहत्तर किलोमीटर

November 29, 2008 // 1 Comment

गंगोलीहाट में अभिलाषा एक प्रयास नाम से छात्रों का एक अनौपचारिक संगठन है जिसे रोहित भाई के साथ कुछ सालों पहले हम लोगों ने क्षेत्र के कुछ युवा साथियों की मदद से प्रारम्भ किया। हमें सूझी कि क्यों न‌ क्षेत्र के सबसे बीहड़ बेल और भैरंग पट्टी के इलाके की खाक छानी जाय। इस तरह तय हुआ पांच दिनों के गांव चलो अभियान का कार्यक्रम। सात आठ लोगों का हमारा दल गाते बजाते गांव गांव घूमा। पांच दिनों READ MORE

धारावाहिकों में लौटता सामाजिक सन्देश

November 25, 2008 // 3 Comments

भारत में टेलीविजन पर मनोरंजन परक कार्यक्रमों की शुरुआत सोप ओपरा से हुई। 1985 में मनोहर श्याम जोशी द्वारा लिखा गया धारावाहिक हम लोग पहला धारावाहिक था। कक्का जी कहिन या नीम का पेड़ जैसे धारावाहिकों में सामाजिक सन्देश की महक साफ महसूस की जा सकती थी। गांव की मिट्टी की गंध लिए रोज रात बुधई दर्शकों के परिवारों के साथ अपने सुख दुख बांटता। धीरे धीरे यह फिजा बदली, धारावाहिक मध्य और उच्च वर्ग READ MORE

देखने की चीज बनते विज्ञापन

November 25, 2008 // 2 Comments

वे दौर अब नहीं रहा जब टीवी पर विज्ञापन आते ही आपकी नजर रिमोट पर दौड़ती थी और आप फट से चैनल बदल देते थे। मौजूदा दौर में एकता कपूर के के सीरियल भले ही उबाउ हो चले हों पर विज्ञापन समय दर समय रोचक होते जा रहें हैं। अब किसी खास विज्ञापन की वजह से आप चैनल बदलते बदलते उंगलियों को रोक दें ऐसा सम्भव है। विज्ञापन अब एक बड़ा उद्योग बन चला और इस उद्योग में रचनात्मकता की उड़ान अपने उफान पर है। विज्ञापन READ MORE

सावधान इन्टरनेट का भविष्य खतरे में है

November 25, 2008 // 2 Comments

इन्टरनेट इन दिनों दैनिक उपयोग की जरुरी चीजों में शुमार हो गया है। लेकिन जरुरी कामों के साथ कई बार गैरजरुरी कामों के लिए भी हम घंटों इन्टरनेट सर्फ करते हैं। क्योंकि अब तक हम यही समझते आये हैं इन्टरनेट का चाहे कितना ही प्रयोग कर लें सिवाय बिल के इसका कहीं और फर्क नहीं पड़ता। लेकिन वास्तव में ऐसा नहीं है। अगर हम इतनी ही बेतकल्लुफी और लापरवाही से इन्टरनेट का प्रयोग करते रहे तो कुछ अरसे READ MORE

रहस्यों से परदा उठाती गुफा: पाताल भुवनेश्वर

November 25, 2008 // 2 Comments

उत्तराखण्ड की पहाड़ी वादियों  के बीच बसे सीमान्त कस्बे गंगोलीहाट की पाताल भुवनेश्वर गुफा किसी आश्चर्य से कम नही है। यहां पत्थरों से बना एक. एक शिल्प तमाम रहस्यों को खुद में समेटे हुए है। मुख्य द्वार  से संकरी फिसलन भरी 80 सीड़ियां उतरने के बाद एक ऐसी दुनिया नुमाया होती है जहां युगों युगों का इतिहास एक साथ प्रकट हो जाता है। गुफा में बने पम्थरों के ढांचे देश के आध्यात्मिक वैभव की READ MORE

मीडिया बनाम जनस्वास्थ्य

November 24, 2008 // 2 Comments

जनस्वास्थ्य एक ऐसा मुद्दा है जो भारतीय मीडिया में अछूत सी हैसियत रखता है इसीलिये एनडीटीवी इन्डिया पर स्वास्थ्य पर फीचर देखकर एकबारगी हैरानी हुई कि यह कैसे हो गया? विशेषकर हिन्दी मीडिया में यह विषय बेहद उपेक्षित है। देश में एक ओर पंचसितारा अस्पतालों के चलन ने जोर पकड़ा है। हेल्थ टूरिजम के बहाने विदेशी पर्यटक बेहतर स्वास्थ्य की उम्मीद में यहां आते हैं और हमारा देश उनकी उम्मीदों पर READ MORE