ताज़ा रेजगारी

मुंबई डायरी

जगमग शहर में अंधेरे से जूझते हुए

December 5, 2015 // 1 Comment

नोट: यह लेख नवभारत टाइम्स (5 दिसंबर 2015) के सम्पादकीय पृष्ठ पर प्रकाशित हुआ है. मूल रूप से लिखा गया पूरा लेख यहां पेश है.  मुंबई के वर्सोवा बीच की रेत अभी-अभी सुनहरे रंग से लाल हुई थी और अब उसने अपना असल रंग भी खोना शुरू कर दिया था. सूरज डूब ही रहा था. किनारे चट्टान पर खड़ा एक शख्स बहुत देर से गहराते आकाश में अपनी मायूसी का रंग तलाश रहा था. मैंने कुछ दिनों में रिलीज़ होने जा रही ‘गेंग्स ऑफ़ READ MORE

‘यात्री मोड’ के नफे नुकसान

January 20, 2015 // 0 Comments

दिल्ली में किये काम के (छोटे-मोटे विलंबित) चैक  मुंबई के पते पर मंगाते हुए लग रहा है कि इन दिनों शहर कपड़ों की तरह बदल रहा हूं…  जनवरी के आते आते दिल्ली और मुंबई के बीच बदलता यही है कि जेकेट से लदे दिन टी-शर्ट से हल्के हो जाते हैं… जैसे सिहराती सर्दी और हल्की सी  हवा वाले गुनगुने दिन दो बच्चों की तरह साथ साथ दौड़ रहे हों.. कभी कोई आगे तो कभी कोई पीछे.. ‘कब आओगे’ या ‘कब जाओगे’ का ठीक READ MORE

‘मैट्रो’ की नयी भाषा सीखती एक मैट्रोसिटी

June 23, 2014 // 1 Comment

Mumbai Diary (23  Jun 2014) तकरीबन साड़े तीन महीने बाद मुम्बई लौटा हूं। दिल्ली की लू के बनिस्पत मुम्बई की ठन्डी हवाएं राहत देने वाली हैं। ये इस शहर के और खूबसूरत हो जाने के शुरुआती दिन हैं। दिन में उमस रहती है ज़रा-ज़रा पर साथ में जो ठन्डी हवाएं चलती हैं, वो सुकून देने वाली हैं। मौसम ही नहीं इस बार के लौटने में कुछ और भी नया है यहां। ये शहर बस अभी-अभी एक नई भाषा सीख रहा है। एस्केलेटर में डर-डर के कदम रखती READ MORE

आंखिर किनकी शय पर चलती है रेल ?

June 21, 2014 // 1 Comment

Mumbai Diary  15 ( Jun 2012 ) मुम्बई में हूं और खफा हूं। खफा हूं कि देश की आर्थिक राजधानी में बैठा देश के नैतिक दिवालियेपन का शिकार हो रहा हूं। देश के राजनैतिक खोखलेपन का हिस्सा बन रहा हूं। अप्रैल की 22 तारीख को मुम्बई आया था। तब देखा था कि कितनी मुश्किल से ट्रेन की वेटिंग क्लियर हुई थी। और ये भी कि जिस कोच में था उसमें एक लम्बी दूरी तक दो बर्थ खाली पड़ी रही थी। 4 तारीख की वापसी की टिकिट थी। जिसकी अन्तहीन READ MORE

आख़री सांसें लेती ज़िंदगी की कहानी

June 15, 2014 // 0 Comments

Mumbai Diary : 14 (Mumbai Film Festival 2012) पिछले पांच दिनों से मुम्बई के पांच अलग अलग थियेटरों का पीछा किया है। हर थियेटर जैसे एक ट्रेन सा हो और फिल्म शुरु होने का वक्त जैसे किसी सफर के शुरु होने का वक्त हो। रोज कई ऐसे ही सफर तय किये हैं इन दिनों में। सुबह उठना, घर से निकलने के पहले ज़रुरी काम निपटाना, रेलवे स्टेशन की तरफ भागना, चलती हुई टेन में मुम्बई फिल्म फेस्टिवल के कैटलौक पर डौट पेन से टिक करके सम्भावित READ MORE

फ़िल्में देखने के लिए भी कम चप्पल नहीं घिसने पड़ते

June 10, 2014 // 0 Comments

Mumbai Diary 13 (Mumbai Film Festival 2012) एक और दिन मुम्बई फिल्म फेस्टिवल के नाम रहा। शुरुआत खराब थी। इतवार की सुबह सुबह सायान के सिनेमेक्स सिनेमाहौल में औडिटोरियम के बाहर 12 बजकर 45 मिनट पर लगने वाली फिल्म गॉड्स हौर्सेज़ बिना किसी पूर्व सूचना के कैंसल कर दी गई। स्क्रीनिंग हौल के बाहर दूर दूर से फिल्म देखने आने वाले लोग इन्तज़ार करते रहे पर वहां उन्हें बताने वाला भी कोई नहीं था कि फिल्म किस वजह से ऐसे अचानक READ MORE

हर बुरे वक्त का एक अच्छा पहलू भी होता है

June 8, 2014 // 0 Comments

Mumbai Diary : 12 (मुम्बई फिल्म फेस्टिवल 2012) सुबह सुबह नीद खुली तो देर हो चुकी थी। साढ़े नौ बज चुके थे। रात को सोते वक्त सोचा था कि मुम्बई फिल्म फेस्टिवल के दूसरे दिन की पहली फिल्म से शुरुआत की जाएगी। और फिर पूरा दिन थियेटर की कुर्सियों पर टिककर फिल्मी अनुभवों को अपनी जि़न्दगी का हिस्सा बनाया जाएगा। पर रात को देर से सोने की आदत सुबह देर से उठने की मजबूरी पैदा कर ही देती है। खैर उठते ही फटाफट नहा READ MORE

गणपति के बाद फिल्मों का उत्सव

June 4, 2014 // 0 Comments

Mumbai Diary : 11 (October 2012) गणपति बप्पा ने अलविदा कह दिया है। गणेश के इस बड़े उत्सव को देखकर लगता है कि मुम्बई में लोग मस्त रहना जानते हैं। गणेश उत्सव के तुरन्त बाद ही निर्देशक उमेश शुक्ला की फिल्म ओह माई गौड देखते हुए अभी अभी बीते गणपति उत्सव के जलसे के दृश्य जैसे रिवाईन्ड होते हैं। कांजुरमार्ग से अंधेरी जाते हुए पहले पवई लेक, फिर जुहू बीच, फिर वर्सोवा बीच की तरफ न जाने कितने हज़ारों लोगों की जमात READ MORE

नाराजगी कितनी अर्थहीन और क्षणभंगुर भावना़ है

June 3, 2014 // 2 Comments

Mumbai Diary 10 डोंगरी टु दुबई का बुक लांच था। बेंड्रा की कार्टर रोड में समुद्री किनारे के पास औलिव नाम का वो बार। और उस बार का एक छोटा सा अहाता जिसके फर्श पर नदियों के किनारे पाये जाने वाले, पानी से घिसे मुलायम से कंकड़ बिछाये गये थे। जो दिख अच्छे रहे थे, पर उनपर चलने में एक असहजता महसूस हो रही थी। उस अहाते के बीच में एक पेड़ का कंकाल था, जिससे पत्तियां नदारद थी। उस सूखे नंगे पेड़ को सलेटी रंग से READ MORE

वक्त की पटरी और यादों के बेनाम स्टेशन

May 31, 2014 // 0 Comments

Mumbai Diary 9 अभी अभी कांजुरमार्ग स्टेशन के पास पूरब से पश्चिम की ओर जाने वाले पुल पे कुछ वक्त बिताया। वक्त के साथ साथ पुल के ठीक नीचे बीतती रेलगाडि़यां थी जो अलग अलग ट्रेक पर अपनी अपनी गति से आ जा रही थी। जैसे पटरियां वक्त हों और हर रेलगाड़ी अलग अलग लमहा। जैसे हर लमहा अपने अपने हिस्से के वक्त में गुजरता है और अन्ततह जिन्दगी नाम के एक लम्बे सफर का हिस्सा हो जाता है, वैसी ही तो होती है हर READ MORE

मैक्सिमम सिटी के मिड नाईट अन्ना

May 30, 2014 // 0 Comments

Mumbai Diary 8 ( April 2012) मुम्बई पे छतें सरों से कोई खास सरोकार नहीं रखती। अपने अनुभव देखकर तो यही लगता है। व्यक्तिगत अनुभवों से शुरु करुं तो जुम्मा जुम्मा एक साल और कुछ महीने हुए हैं यहां आये और तीन बार घर बदली कर लिया है, चैथी जगह शिफ्ट करने की तैयारी चल रही है। इस बार छंलांग थोड़ी लम्बी है। अंधेरी से सुदूर पवई। खैर इस लम्बी छलांग ने वक्त पर उठना और खाना.-पीना मयस्सर करवाया है, हांलांकि सोने के READ MORE

इतवारी शामों में सुकून के किनारे

May 28, 2014 // 0 Comments

Mumbai Diary 7 ( February 2012) मुम्बई और मेरे रिश्ते की उम्र आज एक साल एक महीना और कुछ 7 दिन हो चुकी है… ये शहर मेरे लिये अब उतना अजनबी नहीं रह गया है…. जैसे जैसे अजनबियत खत्म होने लगती है… वैसे वैसे रहस्य छंटने लगते हैं… नयापन धुंधला होने लगता है… पुरानापन हावी होने लगता है… आकर्षण खत्म होने का डर लगने लगता है… पर मायानगरी मुम्बई के अनुभवों के इस अथाह समुन्दर के लिये मेरे ही क्या हर किसी के READ MORE

‘घोस्ट राइटर’ लिखते हैं मुंबई की किस्मत

May 26, 2014 // 0 Comments

Mumbai Diary :6 ( October 2011) देर शाम अंधेरी वैस्ट के रिहायशी इलाके मलाड की एक मीटिंग से लौटते हुए ओशीवारा के लोटस पैट्रोल पंप से गुजरने के दरमियान कुछ यूं होता है…..सड़क पर सरकती रफतार के बीच अचानक एक बत्ती जलती है, एक गाड़ी रुकती है, एक खिड़की दिखती है। कार के बांईं सीट पे बैठी वो, थोड़ी देर मुझे देखती है। फिर थोड़ी देर मैं भी उसे देखता हूं। हाये, फिर वो मुस्कुरा देती है। हम एक मुस्कुराहट साझा करते READ MORE

मुंबई में स्वाद की एक सड़क : मोहम्मद अली रोड

May 21, 2014 // 0 Comments

Mumbai Diary 5 (September 2011) कई जगहें ऐसी होती हैं जहां ना भी गये होते तो कुछ नहीं होता पर जहां जाने के बाद ऐसा लगता है कि यहां ना आये होते तो कुछ मिस हो जाता। तो ये कहानी एक खोज से शुरु होती है। कुछ दिनों पहले इसी मोहल्ले के जमीदार साहब अविनाश जी ने मिलने बुलाया…बातों ही बातों में फिल्मों की चीरफाड़ करने वाले अजय ब्रहमात्मज जी ने कहां कि आज हम एक खास जगह जा रहे हैं….चलोगे…? कहां पूछने पर जवाब नहीं READ MORE

आप लाख चाहें, रिश्ते कभी सेकंडहैन्ड नहीं हो सकते

May 20, 2014 // 0 Comments

Mumbai Diary : 4 ( Jun 2011) आज ही घर शिफ्ट किया है। यारी रोड से यारी और वर्सोवा की लहरें प्यारी हो गई थी। उस गली को छोड़ आये हैं अब। इन्डियन आईल नगर के पास अपना बाजार के बाजू कहीं एक घर मिला है। बाजार भी कभी किसी का अपना हुआ है भला। खैर यहां अभी अभी खिड़की खोलकर देखा तो सामने एक दस बारह मंजिली इमारत बन रही है। बाहर अंधेरा है। नीव के इर्द गिर्द एक टिन की टेम्प्रेरी दीवार बनी है। दरवाजे की शक्ल के एक कोने READ MORE

खुश रहना हमारी नैतिक जिम्मेदारी ही है

May 19, 2014 // 0 Comments

Mumbai Diary : 3 (April 2011) कभी कभी लगता है कि मैं एक तिनका हूं और ये शहर बारीक सा एक घोंसला। मेरी ही तरह तिनका तिनका लोग इससे जुड़ते जाते हैं, ठीक उसी तरह जैसे समय का कोई हिस्सा यथार्थ से जुड़ रहा होता है। सुना है मुम्बई मुलाकातों से चलती है। कौन्टेक्ट्स यहां आपकी एक बहुत बड़ी पूंजी है। प्रोफेश्नल मीटिंग्स। पता नहीं क्यूं ये शब्द सुनने में बहुत अच्छा नहीं लगता। कभी कभी यहां हर कोई असुरक्षित नज़र READ MORE

बरसात, छाता और वो लड़की

May 18, 2014 // 0 Comments

Mumbai Diary : 2 ( Jun 2011) मुम्बई के बारे में एक बात सुनी थी। मानसून आने के बाद यहां जब बारिश शुरु होती है ना, फिर इतनी जल्दी थमती नहीं। सच ही है। जून से शुरु होकर सितम्बर तक वही झमाझम झमाझम….बारिश जब रिमझिम की आवाज़ में बोलती है तो सन्नाटे की सांय सांय कहीं गायब हो जाती है। मैने बचपन में अपनी हिन्दी की किताब गद्य मंजूषा के किसी पन्ने पर एक निबंध में पढ़ा था कि सन्नाटे की आवाज़ सांय सांय होती है। खैर READ MORE

कभी कभी लगता है लोग अजनबी क्यों होते हैं ?

May 17, 2014 // 3 Comments

मुंबई डायरी: १ (जून 2011) कुछ दिन पहले हिन्दी की जानी मानी वैबसाईट मोहल्लालाईव के सम्पादक अविनाश जी ने फेसबुक पे पिंग किया। न हैलो। न हाय। सीधे कहा उमेश मुम्बई डायरी लिखा करो। आईडिया मुझे अच्छा लगा। उस बात को हफ्ते से उपर हो आया था। कुछ लिख नहीं पाया। कुछ ऐसा नया और खास हो ही कहां रहां था। वही रोज घर से आफिस (बालाजी टेलीफिल्म्स) का काम निपटा रहा था। रोज वर्सोवा का एक चक्कर लग रहा था। हां READ MORE

इस ज़िंदगी का कोई निर्देशक नहीं होता

May 14, 2014 // 0 Comments

 बांद्रा स्टेशन की तरफ आती हुई सड़क। हाथ में कतई लाल रंग के दिल के आकार के 25-30 गुब्बारों का गुच्छा। वो सफेद टाॅप और नीली रंग की जींस पहनी हुई लड़की हाथ में छतरी के हैंडल की तरह एक डोरी थामे पूरे आत्मविश्वास से इस गुच्छे को लिये आगे बढ़ती जा रही थी। चेहरे पर न कोई डर न कोई घबराहट। चैदह फरवरी का दिन और बूढ़े, बच्चे, वयस्कों से भरी एक व्यस्त सड़क। कुछ देर उसे देखने के बाद आस पास देखा। लड़के, READ MORE

‘एक सौ दर्द जले जब दिल में, एक नज़्म का जन्म हुआ’

April 14, 2014 // 0 Comments

गुलज़ार  साहब को दादा साहेब फाल्के पुरस्कार मिलने की बधाई देते हुए मोहल्ला लाइव पर छपने वाली अपनी ‘मुंबई डायरी’ में से एक दिन जो गुलज़ार के नाम है, ‘गुल्लक’ पढने वालों के लिए भी .. गुलज़ार। ये नाम मेरे लिये उन शुरुआती साहित्यिक सुविधाओं में से था जो मुझे अपने छोटे से कस्बे गंगोलीहाट में रहने के दिनों में ही मिल गई थी। पुखराज, त्रिवेणी और रात पस्मिने की, ये तीन किताबें ऐसी थी जिनके READ MORE

एकांत से घिरे शोर सा शहर

January 25, 2014 // 0 Comments

यहां मुंबई में कई बार आप उस पत्ते की तरह महसूस करने लगते हैं, जो नदी के प्रवाह के बीच किसी पत्थर में अटक गया हो। आसपास सबकुछ लगातार बह रहा हो पर आपके मन का कोई सिरा उस पथरीली सतह पर कहीं दबा रह गया हो। बहता हुआ पानी लगातार आपको धकेलता जा रहा हो। पर आप आगे बढ़ ही नहीं पा रहे हों। चोटिल होते जा रहे हों। अदृश्य सी चोटें, जो दिखती नहीं, शायद होती भी नहीं पर सालती हैं। नदी जो समय है, बहाव जो READ MORE