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महेश चंद्र पुनेठा

पहाड़ और पहाड़ के जीवन-संदर्भों से उपजी महेश चंद्र पुनेठा की कविता – शिव कुमार मिश्र

February 26, 2011 // 0 Comments

युवा कवि महंश चंद्र पुनेठा का कविता संग्रह भय अतल में  इन दिनों चर्चा में है। पुनेठा जी की कविताएं पर्वतीय अंचल का ऐसा चित्रण हमारे सामने पेश करती हैं कि पहाड़ से दूर रहने के बावजूद आपको वहां के सुख दुख संघर्ष और जनजीवन की झलक मिल जाती है। पुनेठा जी की कविताओं को आप इससे पहले भी नई सोच पर पढ़ चुके हैं। वरिश्ठ माक्सवादी आलोचक एवं जनवादी लेखक संघ के राष्टीय अध्यक्ष शिव कुमार मिश्र  ने READ MORE

उत्तराखंड के युवा कवि महेश सूत्र सम्मान 2010 के लिए चयनित

July 31, 2010 // 0 Comments

पुनेठा जी को सूत्र सम्मान दिये जाने पर हार्दक बधाईयो सहित ये खबर आप तक पहुंचा रहा हू। पर्वतीय सराकारों से जुड़ी उनकी कविताओं को आपने इस ब्लाग पर पहले पढ़ा भी होगा। आशा है कि उनकी कविताओं का सफर आगे भी जारी रहेगा। इस मौके पर उन्हें हार्दिक शुभकामनाएं। पिथौरागढ़। देश के प्रतिष्ठित साहित्यिक पुरस्कारों में शामिल साहित्य सूत्र सम्मान इस वर्ष उत्तराखण्ड के युवा कवि महेश चन्द्र READ MORE

रंग तो बहुत सारे पर अपना रंग हल्का

February 27, 2010 // 2 Comments

कुमाउनी होली के अपने अलग रंग हैं। इसमें में भी इतनी विभिन्नता है कि हर क्षेत में होली का कुढ नया जायका देखने को मिल जाता है। पिथैरागढ़ के छोटे से कस्बे गंगोलीहाट की होली के रंग में हमें होली से पहले ही डुबो रहे हैं युवा साहित्यकार महेश चन्द्र पुनेठा -महेश चंद्र पुनेठा गंगोलीहाट की होली देखने का मौका पहले-पहल मुझे वर्ष 1993 में मिला जब मेरी पहली नियुक्ति इस क्षेत्र में हुई।उस वर्ष READ MORE

पहाड़ और उतरन

October 2, 2009 // 0 Comments

महेश चंद्र पुनेठा जी की कविताएं इस ब्लाग पर मैं लगातार प्रकाशित करता रहा हूं। इसी कड़ी में आज पेश हैं उनकी ये दो उम्दा कविताएं….. अपनी जमीनपहाड़इसलिए पहाड़ हैक्योंकिजितना फैला है वह आसमान मेंउससे अधिकधॅसा है कहीं अपनी जमीन में उतरनप्रवाह है जब तकनदी नदी है ।गति है जब तकहवा हवा है ।मुक्त है जब तकप्रेम प्रेम है ।बॅधते हीनदी नदी नहींहवा हवा नहींऔर प्रेम प्रेम नहींउतरन मात्र रह READ MORE

पहाड़ का जीवन

July 23, 2009 // 5 Comments

आप कभी पहाड़ी इलाकों में जरुर गये होंगे। क्या महसूस किया आपने…….?यही ना कि इससे खूबसूरत कोई चीज दुनिया में शायद बनी ही ना हो। कितना खुशनुमा है यहां का जीवन। कितना साफ सुथरा, ताजगी भरा बेहद सहज और सरल। आपाधापा से दूर। मन किया होगा कि बस यहीं जीवन बिताने को मिल जाये तो जन्नत और क्या होगी। आपकी एक सैलानी की नजर जो नहीं देख पाई आइये आपको दिखाते हैं पहाड़ों के भीतर की दूसरी दुनिया का सच। READ MORE

दलित विमर्श की महत्वपूर्ण कविता है केशव अनुरागी

May 6, 2009 // 1 Comment

अब तक इस ब्लौग पर आपने पुनेठा जी की कविताओं का लुत्फ उठाया है लेकिन इस बार उन्होंने इस ब्लौग के लिए समीक्षा भेजी है। इसी बहाने यह बताता चलूं कि महेश चंद्र पुनेठा जी हंस कृतिओर ज्ञानोदय अंकुर सहित लगभग सभी साहित्यिक पत्रिकाओं के लिए कविता और समीक्षा लेखन करते रहे हैं। आशा है आने वाले समय में भी उनकी समीक्षाएं इस ब्लाग में पढ़ने को मिलती रहेंगी। – महेश चंद्र पुनेठा म्ंगलेश डबराल READ MORE

नैनो पर सवार कवितामय बहस

April 28, 2009 // 0 Comments

अब नैनो पर बहस कविता में सवार है। लंबे समय बाद पुनेठा जी ने अपनी इस कविता के रुप में फिर दस्तक दी है। इससे पहले इस ब्लाग को पहाड़ी बनाने में उनकी कवितामय मदद मिलती रही है। अब उनकी कविता बहस का हिस्सा बन आई है तो आप भी इसे महसूसें इसे । उमेश भाई ,ब्लाग निरंतर निखर रहा है। इसलिए काफी लोग इसे पढ़ और पसंद कर रहे हैं । अपनी प्रतिक्रिया भी दे रहे हैं । ‘ नैनो’ को लेकर काफी अच्छी बहस चल रही है। आगे READ MORE

पढ़ने की संस्कृति विकसित करती हैं बाल पत्रिकाएं

January 17, 2009 // 4 Comments

हमारे समय के बच्चे तकनीकों के इर्द गिर्द जी रहे हैं। मोबाईल, टीवी और इन्टरनेट उनकी दुनिया में बहुत गहरे समाये हुए हैं। उन्हें हाई डेफिनिशन वीडियो गेम्स की दुनिया के सुपरहीरोज के साथ कम्पीटिशन करने में मजा आता है। हांलाकि ये बातें शहरी और कस्बाई बच्चों के पर ही ज्यादा लागू होती है। ऐसे में बच्चों के किताबों के जरिये मनोरंजन की सम्भावना कमती जा रही है। उन्हें कहानी, कविताएं पढ़ने से READ MORE

पहाड़

January 11, 2009 // 1 Comment

महेश चंद्र पुनेठा जी ने इस ब्लौग के लिए कई सारी कविताएं उपलब्ध कराई हैं। समय समय पर उनकी कविताओं के जरिये इस ब्लाग के पाठकों को पहाड़ की खुशबू और जायके का अहसास होता रहेगा। फिलहाल पेश है उनकी ये कविता। पहाड़ !कितने प्यारे लगते होजब रोज सुबह-सवेरेधर लाते हो सूरज कोअपने भारी-भरकम कंधों परतुम्हारे इस करतब परखिलखिला उठती हैं दिशाएं भीहिमाच्छादित शिखररंग जाते हैं भट्टी में गर्म हो READ MORE

रंग तो बहुत सारे पर अपना रंग हल्का

December 25, 2008 // 2 Comments

कुमाउनी होली के अपने अलग रंग हैं। इसमें में भी इतनी विभिन्नता है कि हर क्षेत में होली का कुढ नया जायका देखने को मिल जाता है। पिथैरागढ़ के छोटे से कस्बे गंगोलीहाट की होली के रंग में हमें होली से पहले ही डुबो रहे हैं युवा साहित्यकार महेश चन्द्र पुनेठा -महेश चंद्र पुनेठा गंगोलीहाट की होली देखने का मौका पहले-पहल मुझे वर्ष 1993 में मिला जब मेरी पहली नियुक्ति इस क्षेत्र में हुई।उस वर्ष READ MORE