ताज़ा रेजगारी

फिल्म फेस्टिवेल

‘हंसा’ :गांव में शहर की गुपचुप घुसपैठ

October 18, 2015 // 0 Comments

हंसा। थियेटर और सिनेमा के अदाकार मानव कौल ने जब इस फिल्म को अपनी फेसबुक टाइमलाइन पे शेयर किया तो पता नहीं था कि इस लिंक के ज़रिये मैं उस दुनिया में पहुंचने वाला हूं जिसे मैने बचपनभर जिया है।   आइएमडीबी बताता है कि ये फिल्म 2012 में रिलीज़ हुई और इसे 8.3 की रेटिंग से भी नवाजता है। यूट्यूब पर शायद ये फिल्म ताज़ा ताज़ा अपलोड की गई है। मेरे लिये उत्तराखंड के परिवेश पर अब तक मानीखेज़ एक ही READ MORE

Singham returns : A poetic review

August 15, 2014 // 1 Comment

  मन  बिफर उठे, तन तड़प उठे परदे पे फिल्म जब आवे सिंघम ना फन आये, ना  मन आये सेम कथा दोहरावे सिंघम कॉपी पेस्ट बनावत सिंघम फिर गाड़ियां उड़ावत सिंघम लॉजिक नहीं लगावत सिंघम धत तेरे की हो जावत सिंघम साथ में लेके करीना को बोझिल लव ट्रेक बनाए सिंघम ढाई घंटे की मूवी में बिलकुल इन्ट्रेस्ट ना आये सिंघम फ्री में पुलिस की प्रचारक सिंघम एंड में शर्ट उतारक सिंघम आर एस एस अवतारक सिंघम पहले से कम मारक READ MORE

आख़री सांसें लेती ज़िंदगी की कहानी

June 15, 2014 // 0 Comments

Mumbai Diary : 14 (Mumbai Film Festival 2012) पिछले पांच दिनों से मुम्बई के पांच अलग अलग थियेटरों का पीछा किया है। हर थियेटर जैसे एक ट्रेन सा हो और फिल्म शुरु होने का वक्त जैसे किसी सफर के शुरु होने का वक्त हो। रोज कई ऐसे ही सफर तय किये हैं इन दिनों में। सुबह उठना, घर से निकलने के पहले ज़रुरी काम निपटाना, रेलवे स्टेशन की तरफ भागना, चलती हुई टेन में मुम्बई फिल्म फेस्टिवल के कैटलौक पर डौट पेन से टिक करके सम्भावित READ MORE

लड़के के लिए तबाह होती जिंदगियों का ‘किस्सा’

March 12, 2014 // 0 Comments

  पिछले मुंबई फिल्म फेस्टिवल में अनूप सिंह के निर्देशन में बनी फिल्म ‘किस्सा’ देखी थी.. उसी फिल्म पर की गई टिप्पणी को यहां पोस्ट कर रहा हूँ..फिल्म अभी रिलीज़ नहीं हुई है . ये टिप्पणी  ‘स्पौइलर’ भी हो सकती है ..   भारत-पाकिस्तान के विभाजन के उस दौर में जब सिख अपनी रिहाइश के लिए जूझते हुए पाकिस्तान के पंजाब से भारत के पंजाब आ रहे थे, उनसे उनके पैतृक घर छूट रहे थे। उस दौर के भूगोल से अनूप READ MORE

जीविका से जुड़ी आम आदमी की फिल्में

September 6, 2010 // 2 Comments

वृत्त्चित्रों को लेकर भारत में अपेक्षाकृत ठीक ठाक काम होता है लेकिन उनके प्रदर्शन को लेकर उतने प्रयास नहीं दिखाई देते। शहरी इलाकों में कभी कभार कुछ फिल्म फेस्टिवल्स को छोड़ दें तो इनके प्रदर्शन के लिये कोई सुचारु व्यवस्था हमारे देश में देखने को नहीं मिलती। शायद यही वजह है कि कई गम्भीर मुद्दे इन फिल्मों की शक्ल में उठते तो हैं पर दर्शकों के अभाव में अपनी मौत मर जाते हैं। और ये READ MORE