ताज़ा रेजगारी

फिल्में

‘दुनाली में लगी जंग’ दिखाती ‘अनारकली आरा’

March 29, 2017 // 0 Comments

हमारे समाज की अनारकलियों के जीवन को एक बाहरी की तरह देखने के बजाय ये फ़िल्म उनके अंतर्मन तक पहुंचाती है. ये फ़िल्म हमारे समाज के दुनाली-धारियों की दुनाली में लगी उस जंग को दिखाती है जिसे गोली खाने के डर से हमारा डरा हुआ समाज देखकर भी अनदेखा कर देता है. लेकिन हमारे ही बीच की कोई अनारकली उसे ज़रा घिसती है, तनिक रगड़ती भी है और ज़रुरत पड़ने पर उस दुनाली को पकड़कर उसी पर तान देती है जो उसकी धौंस में READ MORE

लड़कियों की ‘हिंट’ समझने से पहले ‘पिंक’ देखें

September 21, 2016 // 0 Comments

कभी-कभी केवल अंडरटोन से काम नहीं चलता. कुछ बातें होती हैं जो दो-टूक , साफ़-साफ़ कहनी पड़ती हैं. जब समाज का एक बड़ा हिस्सा ग़लत ‘हिंट’ लेने लगता है तो उसे केवल ‘हिंट’ देने से काम नहीं चलता. इसलिए पिंक में एकदम बोल्ड और साफ़-साफ़ शब्दों में ‘नो मतलब नो’ का सन्देश दिया जाना सही समय पर एक ज़रूरी हस्तक्षेप की तरह लगता है. पिंक. ये रंग लड़कियों के हिस्से में क्यों आया होगा ? जब पहली बार खुद से हम ये सवाल कर READ MORE

‘हंसा’ :गांव में शहर की गुपचुप घुसपैठ

October 18, 2015 // 0 Comments

हंसा। थियेटर और सिनेमा के अदाकार मानव कौल ने जब इस फिल्म को अपनी फेसबुक टाइमलाइन पे शेयर किया तो पता नहीं था कि इस लिंक के ज़रिये मैं उस दुनिया में पहुंचने वाला हूं जिसे मैने बचपनभर जिया है।   आइएमडीबी बताता है कि ये फिल्म 2012 में रिलीज़ हुई और इसे 8.3 की रेटिंग से भी नवाजता है। यूट्यूब पर शायद ये फिल्म ताज़ा ताज़ा अपलोड की गई है। मेरे लिये उत्तराखंड के परिवेश पर अब तक मानीखेज़ एक ही READ MORE

दस्तूरी समाज में कस्तूरी तलाशते दिलों की कहानी : मसान

July 27, 2015 // 0 Comments

वो कहती है- “तुम बहुत सीधे और ईमानदार हो। बिल्कुल निदा फाज़ली की गज़लों की तरह।” वो पूछता है – “निदा फाजली, वो कौन हैं ?” और उसका एक मासूम सा जवाब-“यही तो तुम्हारी ईमानदारी है। “ ये स्वीकार्यता हर रिश्ते में नहीं होती। नायिका बशीर बद्र की फैन है। दुश्यंत कुमार की कविताओं की शौकीन है। और जानती है कि नायक ने अगर चकबस्त को सुन लिया तो वो बेहोश हो जाएगा। पर इस जानने में अहमन्यता READ MORE

‘ओल्ड स्कूल’ होकर भी ‘घणी बांवरी’ सी फिल्म

May 24, 2015 // 0 Comments

एक शक्ल की दो लड़कियां हैं जिनमें एक ओरिजनल है एक डुब्लिेकेट। अब असल मुद्दा ये है कि जो आॅरिजनल है वो नायक को अब आॅरिजनल नहीं लगती। वो डुब्लिकेट में आॅरिजनल तलाश रहा है। नायक को यहां चाॅइस मिलती है कि वो रिबाॅक पसंद करे या फिर रिब्यूके ? पर असल सवाल ये है कि क्या आॅरिजनल भी यही रखेंगे और डुब्लिकेट भी ? यहां कोई ईंट से ईंट जोड़ने के लिये सीमेन्ट तलाश रहा है वो चाहे किसी भी कंपनी का हो और READ MORE

हत्याओं के प्रतिशोध से गुजरता हाइवे

March 23, 2015 // 0 Comments

एन एच 10 के एक दृश्य में मीरा (अनुष्का शर्मा) हाइवे के किसी ढाबे के गंदे से टॉयलेट के दरवाज़े पर लिखे उस एक शब्द को मिटाती हैं- रंडी. हमारे समाज के एक बड़े हिस्से की मानसिकता उसी गंदे टॉयलेट के सड़े-गले टीन के दरवाज़े की तरह ही है. एनएच 10 उस एक गीले कपड़े की तरह उस मानसिक गंदलेपन को पोंछने की एक अच्छी कोशिश करती है. फिल्म हाइवे पे तो निकलती है लेकिन ऐसी पगडंडियों को नमूदार करते हुए जिनके READ MORE

कसेट वाले ज़माने में मोह के धागे

March 4, 2015 // 0 Comments

बाज़ार के सामने बार-बार हारता बाॅलिवुड जब दम लगाता है तो दम लगाके हाइशा सरीखा कुछ सम्भव हो पाता है। दम लगाके हाइशा खुद को हारते हुए देखकर भी जीतता हुआ महसूस करने सा अनुभव है। हमारी नज़र भर से जि़न्दगी के तमाम चेहरे एकदम बदल जाते हैं। जो चीज़ हमें जैसी लगती है ठीक वैसी वो कभी होती ही नहीं। हमारी अपनी सीमाएं उस चीज़ के हमारी जि़न्दगी में मायने बदल देती हैं। इसके असर कई बार दूसरों से और READ MORE

पीके एकदम ‘लुल’ नहीं है

December 21, 2014 // 0 Comments

चलिये शुरु से शुरु करते हैं। पीके इसी भाव से शुरु होती है। एकदम नग्न। आवरणहीन। इस विशाल दुनिया के मरुस्थल में एक नंगा आदमी खड़ा है जिसे दुनिया के बारे में कुछ नहीं पता। ठीक उस मानसिक अवस्था में जैसे हम पैदा होने के ठीक बाद होते हैं। ठीक इसी बिन्दु पर फिल्म से बड़ी उम्मीदें बंध जाती हैं। एक एलियन की नज़र से इस दुनिया को देखना जिसके लिये ये दुनिया एक अनजान गोला भर है। वो नज़र जिसमें कोई READ MORE

अधूरी होकर भी मुकम्मल दुनिया

September 13, 2014 // 0 Comments

फाइन्डिंग फैनी इस स्वार्थी और व्यस्त होती जा रही दुनिया में एक ऐसी जगह की खोज की कहानी है जहां सबसे सबको मतलब होता है। या फिर ये कि स्वार्थी और व्यस्त जैसे बड़े और गम्भीर लफ्ज़ों से उपजने वाले भावों को किसी पुरानी जंग लगी कार में बिठाकर रोजी की उस उस मरी हुई बिल्ली के साथ दफना आने की कहानी है फाइन्डिंग फैनी। रात के वक्त एक अकेले से घर में रह रहे फर्डी को एक खत आता है। खत देखकर फर्डी READ MORE

Singham returns : A poetic review

August 15, 2014 // 1 Comment

  मन  बिफर उठे, तन तड़प उठे परदे पे फिल्म जब आवे सिंघम ना फन आये, ना  मन आये सेम कथा दोहरावे सिंघम कॉपी पेस्ट बनावत सिंघम फिर गाड़ियां उड़ावत सिंघम लॉजिक नहीं लगावत सिंघम धत तेरे की हो जावत सिंघम साथ में लेके करीना को बोझिल लव ट्रेक बनाए सिंघम ढाई घंटे की मूवी में बिलकुल इन्ट्रेस्ट ना आये सिंघम फ्री में पुलिस की प्रचारक सिंघम एंड में शर्ट उतारक सिंघम आर एस एस अवतारक सिंघम पहले से कम मारक READ MORE

आँखें खोलने की नसीहत देती ‘आँखों देखी’

August 8, 2014 // 1 Comment

दो समानान्तर रेखाएं अनन्त पर मिलती हैं। बाउजी इस बात को मानने से इनकार देते हैं। दो समानान्तर रेखाएं अगर मिल गई तो वो समानान्तर हो ही नहीं सकती। बाउजी के लिये ऐसा कोई अनन्त नहीं बना जहां हम-आप अपनी सुविधा के लिये दो समानान्तर रेखाओं को मिला देते हैं। दरअसल बाउजी उस गणित को अपनी दुनियां से बेदखल करने की ठान चुके हैं जो किसी और के सच के हिसाब से अपने समीकरण तय करता है। वो गणित जो READ MORE

उन चीज़ों को खोते हुए देखना जो आपको बनाती हैं

August 3, 2014 // 0 Comments

Beasts of the southern wild हशपपी का खुद पर और जीवन की अच्छाईयों पर एक गहरा और अटूट भरोसा है। ये भरोसा उसकी अपनी बनाई दुनिया से जुटाये आत्वविश्वास से आता है। हशपपी मानती है कि पूरी दुनिया का अस्तित्व इस बात पर निर्भर करता है कि हर जीज़ अपनी-अपनी जगह पर सही तरीके से फिट हो। यदि इनमें किसी एक भी चीज़ यहां तक कि सबसे छोटी चीज़ में विध्वंश होता है तो पूरी दुनिया नष्ट हो जाएगी। वो खुद को इस बड़े संसार  का READ MORE

एक औरत के मन तक ले जाती फिल्म

July 12, 2014 // 0 Comments

Film : A woman under influence कितनी फिल्में होंगी जो स्त्रियों के मनोविज्ञान में बहुत गहरे तक झांकने की कोशिश करती हैं। फिल्म जगत में ऐसी फिल्मों की स्थिति माइनोरिटी की तरह ही होगी। जाॅन कैसेवेटस (John cassavetes) की फिल्म अ वुमन अन्डर इन्फलुएंस ऐसी ही फिल्मों में है जो रिश्ते, परिवार, अपने व्यवहार और यहां तक कि अपने वजूद के प्रति एक स्त्री की असुरक्षा, भय और इस वजह से पनपी मनोवैज्ञानिक अस्थिता को मानव स्वभाव READ MORE

अकेलापन समेटकर मुस्कराहट बिखेरती Amelie

July 9, 2014 // 0 Comments

एमिली अकेलेपन से जूझती एक लड़की है जो अपनी दुनियां को परिकथाओं सा बनाकर अपने अकेलेपन का हल खोज रही है। एक सनकी से मां बाप की लड़की जिन्हें लगता है कि उसकी बेटी को दिल की बीमारी है, इसलिये उसके बचपन भर में उसे घर से बाहर जाने की मनाही रही। यहां तक कि उसकी पढ़ाई भी घर मे ही हुई है। एक दुर्घटना में मां की मौत के बाद वो घर छोड़ देती है और एक कैफे में काम करना शुरु करती है। एक सीधी-साधी सी दिखने READ MORE

आपकी ज़िंदगी से बात करती एक फिल्म : ‘Her’

April 22, 2014 // 0 Comments

 फेसबुक पर एक दोस्त के स्टेटस को देखकर ये फिल्म डाउनलोड की और अब रात के दो बजकर 30 मिनट हो चुके हैं..वो फिल्म जो अभी अभी पूरी हुई है नीद की हथेली पकड़कर उसे किसी दूसरे कोने में कुछ देर और बैठने को कह आई है। स्पाइक जोन्ज (Spike Jonze) निर्देशित फिल्म ‘हर‘ आपको टूटे हुए रिश्तों से उपजे अकेलेपन, इन्तजार, विछोह जैसी भावनाओं के रास्ते उस खालीपन की तरफ ले जाती जिसे भरा जाना ज़रुरी सा लगने लगता है। READ MORE

लड़के के लिए तबाह होती जिंदगियों का ‘किस्सा’

March 12, 2014 // 0 Comments

  पिछले मुंबई फिल्म फेस्टिवल में अनूप सिंह के निर्देशन में बनी फिल्म ‘किस्सा’ देखी थी.. उसी फिल्म पर की गई टिप्पणी को यहां पोस्ट कर रहा हूँ..फिल्म अभी रिलीज़ नहीं हुई है . ये टिप्पणी  ‘स्पौइलर’ भी हो सकती है ..   भारत-पाकिस्तान के विभाजन के उस दौर में जब सिख अपनी रिहाइश के लिए जूझते हुए पाकिस्तान के पंजाब से भारत के पंजाब आ रहे थे, उनसे उनके पैतृक घर छूट रहे थे। उस दौर के भूगोल से अनूप READ MORE

एक ‘क्वीन’ का आज़ाद होना

March 11, 2014 // 0 Comments

दिल्ली में कॉलेज आने जाने वाले लड़कों के बीच एक टर्म बहुत प्रचलित है। ‘बहन जी‘। ‘बहन जी टाइप‘ होना शहरी परिप्रेक्ष में एक लड़की के लिये अच्छा नहीं माना जाता। ‘यूथ‘ की भाषा में कहें तो ‘हैप‘ होना शहर के युवाओं की मुख्यधारा में आने के लिये एक ज़रुरी मानदंड है। इसके उलट परिवार और सगे सम्बन्धियों की परिभाषा में ‘बहन जी टाइप‘ लड़की एक आदर्श लड़की है। फिल्म क्वीन की कहानी में रानी की READ MORE

कहीं आप भी नीरो के मेहमान तो नहीं हैं

June 13, 2013 // 0 Comments

नोट: मेरा यह लेख साप्ताहिक समाचार पत्र गाँव कनेक्शन में प्रकाशित हो चुका है। रोम में एक शासक हुआ करता था- नीरो। एक ऐसा शासक जिसके शासनकाल में लगी आग की लपटें आज तक इतिहास के पन्नों को झुलसाती हैं। जब भी उन लपटों की बात होती है तो घोर जनता विरोधी शाषन की तस्वीरें उभरकर सामने आ जाती हैं, कुछ कुछ वही होता है जब भारत में पिछले सालों में हुई किसानों की आत्महत्याओं की बात होती है। किसानों की READ MORE

जल्द ही गाँव पर फिल्म बनाउंगा : दीपक डोबरियाल

May 7, 2013 // 0 Comments

 मूलतः गाँव कनेक्शन के लिए लिए गए इस साक्षात्कार को यहां भी पढ़ा जा सकता है.  भारतीय सिनेमा में गाँव के किरदारों के बारे में जब भी बात होती है तो दीपक डोबरियाल का नाम ज़हन में ज़रुर आता है। ओमकारा, गुलाल, तनु वेड्स मनु, मकबूल, दांये या बांये से लेकर दबंग-2 जैसी फिल्मों में अपने गंवई अंदाज़ से दर्शकों के बीच अपनी अलग पहचान बनाने वाले दीपक डोबरियाल से बात की उमेश पंतने। पेश हैं इस बातचीत READ MORE

आंखिरी लमहों में मुम्बई फिल्म फेस्टिवल

October 31, 2012 // 0 Comments

मुम्बई फिल्म फेस्टिवल  के छटे दिन फेसबुक पर फेस्टिवल के पेज से जानकारी मिली कि मुम्बई डाईमेन्शन कैटेगरी के अन्दर आने वाली 25 शौर्ट फिल्म्स का प्रदर्शन एक बार फिर किया जा रहा है। मुम्बई डाईमेन्शन की पहली स्की्रनिंग छूट जाने का बहुत मलाल हुआ था। इसलिये इस स्क्रीनिंग को किसी भी हाल में न छोड़ने का मन बना लिया था। मैने फेसबुक पर पढ़ा था कि दिन के एक बजकर तीस मिनट पर फिल्म गोदरेज थियेटर READ MORE

मुंबई फिल्म फेस्टिवल : पांचवा दिन

October 29, 2012 // 0 Comments

पिछले पांच दिनों से मुम्बई के पांच अलग अलग थियेटरों का पीछा किया है। हर थियेटर जैसे एक ट्रेन सा हो और फिल्म शुरु होने का वक्त जैसे किसी सफर के शुरु होने का वक्त हो। रोज कई ऐसे ही सफर तय किये हैं इन दिनों में। सुबह उठना, घर से निकलने के पहले ज़रुरी काम निपटाना, रेलवे स्टेशन की तरफ भागना, चलती हुई ट्रेन में मुम्बई फिल्म फेस्टिवल के कैटलौक पर डॉट पेन से टिक करके सम्भावित अच्छी फिल्मों की READ MORE

मुंबई फिल्म फेस्टिवल- चौथा दिन

October 25, 2012 // 0 Comments

एक और दिन मुम्बई फिल्म फेस्टिवल के नाम रहा। शुरुआत खराब थी। इतवार की सुबह सुबह सायान के सिनेमेक्स सिनेमाहौल में औडिटोरियम के बाहर 12 बजकर 45 मिनट पर लगने वाली फिल्म गौडस हौर्सेज़ बिना किसी पूर्व सूचना के कैंसल कर दी गई। स्क्रीनिंग हौल के बाहर दूर दूर से फिल्म देखने आने वाले लोग इन्तज़ार करते रहे पर वहां उन्हें बताने वाला भी कोई नहीं था कि फिल्म किस वजह से ऐसे अचानक टाल दी गई है। 60-62 साल READ MORE

मुम्बई फिल्म फेस्टिवल- दूसरा और तीसरा दिन

October 23, 2012 // 0 Comments

सुबह सुबह नीद खुली तो देर हो चुकी थी। साढ़े नौ बज चुके थे। रात को सोते वक्त सोचा था कि मुम्बर्इ फिल्म फेसिटवल के दूसरे दिन की पहली फिल्म से शुरुआत की जाएगी। और फिर पूरा दिन थियेटर की कुर्सियों पर टिककर फिल्मी अनुभवों को अपनी जि़न्दगी का हिस्सा बनाया जाएगा। पर रात को देर से सोने की आदत सुबह देर से उठने की मजबूरी पैदा कर ही देती है। खैर उठते ही फटाफट नहा धोकर कदम स्टेशन की ओर बढ़ाए जा READ MORE

MAMI DIARY-1 : फिर आया मुंबई फिल्म फेस्टिवल

October 23, 2012 // 0 Comments

एक जलसा मुंबर्इ में दस्तक देने वाला है। इस जलसे की उत्सवधर्मिता का स्वरूप बिल्कुल अलहदा है। इस जलसे में जो होगा, वो स्क्रीन पर होगा और उसका असर लोगों के दिलो-दिमाग और शायद मानसिकताओं पर होगा। सिनेमा को पालते पोसते इस शहर में सिनेमा के इस उत्सव को लेकर कितना उत्साह है, ये कल से पूरे एक हफ्ते देखने को मिलेगा। मामी मुंबर्इ के रास्ते पर है। बस आज यह हम तक पहुंच जाएगा। इस बार मिस नहीं करना READ MORE

एक ईमानदारी से बोले गये झूठ की ‘कहानी’

March 11, 2012 // 1 Comment

कहानी के ट्रेलर देखकर लग रहा था कि कोई रोने धोने वाली फिल्म होगी… जिसमें शायद कलकत्ते को लेकर नौस्टेल्जिया जैसा कुछ होगा… शायद एक पीडि़त प्रेग्नेंट औरत होगी जो अपने अधिकारों के लिये लड़ रही होगी… शायद नो वन किल्ड जैसिका जैसा ही कुछ… पर फिल्म देखने के बाद अच्छा लगा कि कुछ नया देखने को मिला… प्रिडिक्टिबिलिटी से परे… बौलिवुड के मौजूदा परिदृश्य में जिस तरह फिल्मों से READ MORE

ब्लू वैलेन्टाईन: एक खूबसूरत तनाव

December 22, 2011 // 0 Comments

“You got to be careful that person you fall in love is worth it to you” “How can you trust your feelings when they can disappear like that..” किसी से प्यार करते वक्त जो बात सबसे जरुरी है वो ये कि इस बात का पूरा ध्यान रखा जाये कि जिससे आपको प्यार हो रहा है वो इस लायक है भी कि नहीं कि उसे प्यार किया जा सके। ये बात भले ही थोड़ा अटपटी लगे लेकिन ब्लू वैलेन्टाईन यही बात व्यावहारिक ढ़ंग से समझाती है…अक्सर हम अपनी भावनाओं के वश में आकर प्यार करते हैं… भावनाओं का भरोसा READ MORE

नादान परिंदे घर आजा…..

November 14, 2011 // 3 Comments

कुछ दिन पहले भवन्स कौलेज में रौकस्टार के प्रोमोशन का लाईव शो देखते हुए कई सारे टैक्निकल एरर हुए तो कुछ शक सा हुआ। स्टेज के दोनों ओर दो एलिवेटर लगे थे जिन्हें नर्गिस फखरी और रणबीर कपूर को उनके परफोर्मेंस के बाद नीचे वापस पहुचाना था। रणबीर तो वापस पहुंच गये लेकिन नर्गिस का एलिवेटर गच्चा दे गया। फिर रहमान के गाते वक्त पियानो खराब हो गया तो उन्हें अपना गाना स्किप करना पड़ा। वहां दोनों READ MORE

ये साली…. अच्छी थी

February 9, 2011 // 1 Comment

इन्टयूशन था कि साली अच्छी होगी। कई इन्टयूशन सच निकलते हैं। इस बार यही हुआ। ये साली जिन्दगी कुलमिलाकर एक अच्छी भली फिल्म थी। इसे देखते हुए ऐसा नहीं लगा कि कुछ रेगुलर देख रहे हैं। गन थी। धांय धांय थी। गेंग्स्टर्स थे। पर अभी रामू मार्का किसी डाईरेक्टर की जगह सुधीर मिश्रा थे। इसीलिये फिल्म थोड़ी अलग बन पड़ी। थोड़ी स्टाईलाईज्ड सी। अच्छी एडिटिंग निहायत रफ और रा कहे जा सकने वाले कैची READ MORE

सिनेमाथैक पर ईदियां…..

November 11, 2010 // 1 Comment

कश्मीर को इस पूरे दौर में एक ऐसे प्रान्त के रुप में देखा, समझा और महसूस किया गया है जो किसी देश से जुड़ने और अलग हो जाने के बीच ऐसे पिस रहा है जैसे दो पाटों के बीच कोई परम्परा पिस रही हो। जैसे अलग होने और अपना साबित करने के बीच की ये लड़ाई अपने राजनैतिक, धार्मिक और भौगोलिक कारणों के वजहकर कभी खत्म ही नहीं होगी। चलती रहेगी। इस लड़ाई पर हर तरह के लोग अपनी प्रतिक्रिया देने से नहीं चूकते। READ MORE

सिने सफर मुख्तसर -भाग 2

September 25, 2010 // 0 Comments

बहसतलब का आज दूसरा दिन था। आज बात होनी थी हिन्दी सिनेमा और बाजार पर। कार्यक्रम के संचालन की बागडोर अविनाश ने खुद कुछ कहने के बाद वरुण ग्रोवर को दे दी। वरुण ग्रोवर  ने शुरुआत की और कहा कि हिन्दी सिनेमा का व्यापार बड़ा एब्सटेक्ट किस्म का है। यहां लोग फिल्में बेच तो रहे हैं पर रिस्क नहीं ले रहे। ये लोग जाहिर तौर पे निर्माता हैं। उनके कंटेंट में प्रयोग दिखे न दिखे लेकिन पीआर में जबरदस्त READ MORE

सिने सफर मुख्तसर -भाग 2

September 25, 2010 // 1 Comment

बहसतलब का आज दूसरा दिन था। आज बात होनी थी हिन्दी सिनेमा और बाजार पर। कार्यक्रम के संचालन की बागडोर अविनाश ने खुद कुछ कहने के बाद वरुण ग्रोवर को दे दी। वरुण ग्रोवर  ने शुरुआत की और कहा कि हिन्दी सिनेमा का व्यापार बड़ा एब्सटेक्ट किस्म का है। यहां लोग फिल्में बेच तो रहे हैं पर रिस्क नहीं ले रहे। ये लोग जाहिर तौर पे निर्माता हैं। उनके कंटेंट में प्रयोग दिखे न दिखे लेकिन पीआर में जबरदस्त READ MORE

पावन पत्नियों का कलुषित सच

September 18, 2010 // 1 Comment

हाल ही में रितेश शर्मा की एक डाक्यूमेंट्री फिल्म दिल्ली में प्रदर्शित की गई जिसमें देवदासी प्रथा जैसी ऐसी कुरीति पर सवाल उठाये गये जिसपर मेनस्ट्रीम मीडिया में आजकल मुश्किल से कोई बहस हो रही है। द होली वाईव्स नाम से बनी यह फिल्म बताती है किस तरह इस दौर में महिला अधिकारों को लेकर हल्ला मचाया गया, घरेलूं हिंसा विरोध्ाी कानून बने और महिला अधिकारों पर कई बहसें हुई लेकिन इसके बावजूद READ MORE

जंगलों में जीवन तलाशता वो

June 5, 2010 // 2 Comments

Into the wild …..और एक दिन वो सब कुछ छोड़ कर चला जाता है। कहीं दूर अलास्का के जंगलों की तरफ। अपने मां बाप और बहन को छोड़कर। बिना कुछ बताये। क्यों? इसके लिये उसके पास कई कारण हैं। वो अपने मां बाप को बचपन से देख रहा है छोटी छोटी बातों पर लड़ते हुए। वो देखता आया है उनकी बहसों के कारण कितने भौतिक हैं। कितने मटीरियलिस्टिक। उसके ग्रेजुएशन डे के दिन उसके पापा उसे सबसे बेहतर तोहफा क्या दे सकते हैं? एक READ MORE

कुरुसावा के सपने

April 6, 2010 // 1 Comment

कई बार हम सपने देखते हैं और जब जागते हैं तो सोचते हैं जो हमने देखा उसका अर्थ आंखिर था क्या। पर अक्सर ज्यादातर सपनों को हम भुला ही देते हैं ऐसे जैसे उन्हें हमने कभी देखा ही न हो। पर क्या आपको नहीं लगता कि किसी दूसरे के सपने अपनी आंखों से देखना कितना रोमांचक अनुभव हो सकता है। और वो भी तब जब सपने किसी सुन्दर फिल्म में फिल्मा लिये गये हो और वो भी अकिरा कुरुसावा जैसे निर्देशक के द्वारा। READ MORE

लव.. सेक्स.. धोखा. और सच

March 24, 2010 // 1 Comment

  लव, सेक्स और धोखा। इन तीनों में से कोई भी शब्द हाईपोथैटिकल और नया नहीं है। तीनों इन्सानी फितरत के हिस्से हैं। और इसी तरह हिन्दुस्तानी फिल्मों के भी। लेकिन दिबाकर बनर्जी जिस तरीके से इन तीनों को स्क्रीन पे दिखाते हैं उससे फिल्म की ग्रामर को ही एक नई धारा सी मिल जाती है। मेरी समझ से इस तरह की फिल्म हिन्दुस्तान में पहले कभी नहीं बनी। जिसमें सब कुछ आन कैमरा चल रहा है। फिल्म कैमरे के READ MORE

लव.. सेक्स.. धोखा. और सच

March 24, 2010 // 4 Comments

लव, सेक्स और धोखा। इन तीनों में से कोई भी शब्द हाईपोथैटिकल और नया नहीं है। तीनों इन्सानी फितरत के हिस्से हैं। और इसी तरह हिन्दुस्तानी फिल्मों के भी। लेकिन दिबाकर बनर्जी जिस तरीके से इन तीनों को स्क्रीन पे दिखाते हैं उससे फिल्म की ग्रामर को ही एक नई धारा सी मिल जाती है। मेरी समझ से इस तरह की फिल्म हिन्दुस्तान में पहले कभी नहीं बनी। जिसमें सब कुछ आन कैमरा चल रहा है। फिल्म कैमरे के READ MORE

एक बवंडर से उठी फिल्म

January 5, 2010 // 0 Comments

राजस्थान की भंवरी देवी को शायद आप अब तक न भूले हों। 1992 में राजस्थान की भतेरी गांव की इस महिला का गांव के ही कुछ उच्च जाति के लोगों ने बलात्कार किया। वजह यह थी कि एक छोटी जाति की महिला होने के बावजूद उसने गांव में हो रहे बाल विवाह को रोकने के लिए सरकार की मदद करनी चाही। केन्द्र सरकार के महिला विकास कार्यक्रम के तहत साथिन नाम की संस्था के साथ उसने सक्रिय रुप से गांव की सामाजिक बुराईयों के READ MORE

डेज़ आफ हैवन यानि खूबसूरती के पल

December 10, 2009 // 1 Comment

डेज़ ऑफ़ हैवन उन कमाल की फिल्मों से एक है जिन्हें आप चाहें तो बस उनकी सिनेमेटोग्रेफी के लिए देख सकते हैं। इस फिल्म को कम्प्यूटर पर देखते हुए आपकी स्पेस की परेषान हो सकती है। क्योंकि हर दूसरा फ्रेम आपको मजबूर कर देता है कि फिल्म को रोककर बस उस फ्रेम में डूब जाया जाये। उसी तरह जैसे पहाड़ों में सर्दियों के मौसम में घूमने निकले हों। और कंपाती ठंड के बीच जहां जहां धूप दिखे वहां वहां रुक READ MORE

लगत जोबनवा मा चोट को खोजती एक फिल्म

November 22, 2009 // 2 Comments

लगत जोबनुवा में चोट, फूल गेंदवा न मार। ये शब्द फिर गाये नहीं गये। ठुमरी के ये बोल कहीं खो गये होते।शब्द ही थे। खो जाते। अगर सबा उन्हें ढ़ूढ़ने की कोशिश नहीं करती। लेकिन सबा दीवान को न जाने क्या सूझी कि वो इन शब्दों को ढ़ूढ़ते ढूंढ़ते एक सिनेमाई सफर तय कर आई। उनकी डोक्यूमेंटी फिल्म द अदर सौंग दरअसल लगत जोबनुआ में चोट के लगत करेजवा में चोट बन जाने की यात्रा है। आंखिर क्यों जोबनुआ READ MORE

युद्व का उन्माद और सोल्जर ब्लू

November 14, 2009 // 0 Comments

युद्व का उन्माद कितना विभत्स, कितना भयावह और अमानवीय हो सकता है सोल्जर ब्लू में देखा जा सकता है। ये एक अमेरिकन फिल्म है। इतिहास में झांकती, जंग के मैदान में ले जाती और उस मनहस्थिति से रुबरु कराती जो एक आदमी को निहायत जंगली बना देने पर उतारु कर देती है। जो एक सभ्यता के असभ्य हो जाने की अन्तिम सीमा तक पहुंचने की यात्रा दिखाती है। फलतह आदमी के अमानवीय हो जाने की दर्दनाक सच्चाई को खुलकर READ MORE

खरगोश ओसियान में अव्वल

November 1, 2009 // 0 Comments

सोने जा ही रहा था कि एक सूचना मिली। सूचना बड़ी अच्दी लगी तो सोचा आपको बता ही डालूं। खरगोश को ओसियान के दर्शकों ने सबसे ज्यादा पसंद किया। ये तो पता ही था। लेकिन बात और साफ हो गई जब ओसियान के पुरस्कारों की घोषणा की गई। औडियन्स पोल कैटेगरी में खरगोश ने बाजी मार ली। लौंग नाइट को बेस्ट फिल्म का ज्यूरी अवार्ड दिया गया। हातेम अली निर्देशित यह सीरियन फिल्म जेल में डाल दिये गये राजनैतिक READ MORE

सुपरमैन आफ मालेगांव

October 29, 2009 // 2 Comments

वे फैज नहीं हैं फैजा हैं इसलिए उनका अंदाजे बयां अलहदा है। फैज शब्दों से अपनी बात कहते थे फैजा ने वृत्तचित्र के जरिये कही। और जो कही कमाल कही। किसी कविता सी दिल में उतर गई चित्रों के कई वृत्त सी बनाती जैसे नदी के शान्त प्रवाह में कंकड़ को हल्के धकेल दिया हो। फैजा अहमद खान आरै कुहू तनवीर की फिल्म सुपरमैन आफ मालेगांव एक डाक्यूमेंटी फोर्म की फिल्म है। पूरी फिल्म एक फिल्म बनने की READ MORE

ओसियान का दूसरा दिन

October 27, 2009 // 1 Comment

ओसियान फिल्म फेस्टिवल के दूसरे दिन आज तीन फिल्में देखी। तेजा, मैन वूमेन एंड अदर स्टोरीज और ब्लाईंड पिग हू वान्टस टू फलाई। पहली फिल्म तेजा हेला जर्मिया के निर्देशन में बनी है। फिल्म अफ्रिका के इन्टलेक्चुअल युवाओं के पलायन पर केन्द्रित है। फिल्म मुख्य रुप से अपने अतीत पर अधिकार के हक के समर्थन में खड़ी होती है। अफ्रिकी समाज की एक बहुत कड़वी सच्चाई को दिखाती इस फिल्म के कुछ अंशों READ MORE

एक पार्टी ऐसी भी

August 21, 2009 // 2 Comments

पार्टी कल्चर से बहुत ज्यादा ताल्लुक ना होने के बावजूद इस पार्टी ने लुभा लिया। 1984 में आई  गोविन्द निहिलानी की फिल्म पार्टी गर्मियों की पहाड़ी ठंडक का अहसास करते हुए देखी। फिल्म वर्तमान साहित्य जगत के पूरे गड़बड़झाले को उस दौर में भले ही कह गई हो पर आज भी सीन बाई सीन सच्चाई वही है। तल्ख ही सही। पार्टी की कहानी एक पार्टी की तैयारियों से शुरु होती है। ये पार्टी प्रतिष्ठित साहित्यकारों READ MORE

भावनाओं का संसार रचती दो उम्दा फिल्में

June 13, 2009 // 2 Comments

इस बीच माजिद माजिदी की दो फिल्में देखने को मिली। चिल्ड्रन आफ हैवन और कलर्स आफ पैराडाईस। माजिद माजिदी की फिल्में एक अलग संसार रचती हैं। गांवों का संसार, भावनाओं का संसार और अदभुत प्राकृतिक और मनोवैज्ञानिक सुन्दरता का संसार। इन दो ही फिल्मों ने इस ईरानी निर्देशक के प्रति एक अजीब सा आकर्षण जेहन में पैदा किया है। कोई निर्देशक कितनी गहराई से अभावों के बीच से उपजते मनोवैज्ञानिक READ MORE