ताज़ा रेजगारी

प्रेजेंटेशन

छाताएं और बारिशें

August 24, 2017 // 0 Comments

आसमान से लगातार कुछ ऐसा बरसता रहा जिसके लिए ज़मीन का सबसे गर्म टुकड़ा सबसे ज़्यादा तरस रहा था।    बारिश न होती तो कुछ अनाम पत्तियाँ जो दीवार होते जा रहे शहर की किसी बेजान सी खिड़की में ग़लती से उग आई थी, मुरझा गई होती। क्युंकी शहर में उसकी फ़िक्र करने का मौसम अब कभी नहीं आता। फ़िक्र है। फ़िक्र को कुछ नहीं हुआ। वक़्त को हो गया है। वक़्त नहीं है। वक़्त नहीं है क्युंकि ये अपने-अपने READ MORE

पर तेरा मुस्काना भर कितनों का रोशनदान हुआ

June 17, 2017 // 0 Comments

तेरे बाद ज़माना ये कुछ इस तरह हलकान हुआ दिल्ली तेरी याद में रोई मुंबई तक वीरान हुआ   तेरे हिज़्र के कई दिनों तक यही समझना मुश्किल था शहर हुआ या क़त्ल हुए अरमानों का शमशान हुआ   तूने अपनी एक नज़र से कितने ही दिल ढहा दिए हाय तेरा ये हुस्न ओ ज़ालिम, हुस्न हुआ-तूफ़ान हुआ   ख़ुद को शायर कहने वाले तेरे इश्क़ में ख़ाक हुए उनका तुझपर लिखना भी जैसे तेरा एहसान हुआ   तू तो नहीं आई पर अक्सर आती READ MORE

‘दुनाली में लगी जंग’ दिखाती ‘अनारकली आरा’

March 29, 2017 // 0 Comments

हमारे समाज की अनारकलियों के जीवन को एक बाहरी की तरह देखने के बजाय ये फ़िल्म उनके अंतर्मन तक पहुंचाती है. ये फ़िल्म हमारे समाज के दुनाली-धारियों की दुनाली में लगी उस जंग को दिखाती है जिसे गोली खाने के डर से हमारा डरा हुआ समाज देखकर भी अनदेखा कर देता है. लेकिन हमारे ही बीच की कोई अनारकली उसे ज़रा घिसती है, तनिक रगड़ती भी है और ज़रुरत पड़ने पर उस दुनाली को पकड़कर उसी पर तान देती है जो उसकी धौंस में READ MORE

यात्रा में होना

September 29, 2016 // 0 Comments

पहाड़ों की पगडंडियों पर चढ़ते हुए मैनें अपना पहना हुआ आलस उतारा और पहन ली कईयों की उतारी हुई थकान   कंकड़ों की चुभन पहनी तो उतार ली अपने तन की कोमलता अपने मन की कठोरता उतारने के बाद नदी की तरलता पहन ली   मेरे भीतर बहुत कुछ उबल रहा था जो मैंने धीरे-धीरे उतार लिया स्निग्धता से भरे हुए साफ़ सुथरी बर्फ के ग्लेशियर पर और पहन ली उसकी शीतलता   दुपहरी की धूप पहनकर मैं गला आया अपने भीतर के पत्थर READ MORE

लड़कियों की ‘हिंट’ समझने से पहले ‘पिंक’ देखें

September 21, 2016 // 0 Comments

कभी-कभी केवल अंडरटोन से काम नहीं चलता. कुछ बातें होती हैं जो दो-टूक , साफ़-साफ़ कहनी पड़ती हैं. जब समाज का एक बड़ा हिस्सा ग़लत ‘हिंट’ लेने लगता है तो उसे केवल ‘हिंट’ देने से काम नहीं चलता. इसलिए पिंक में एकदम बोल्ड और साफ़-साफ़ शब्दों में ‘नो मतलब नो’ का सन्देश दिया जाना सही समय पर एक ज़रूरी हस्तक्षेप की तरह लगता है. पिंक. ये रंग लड़कियों के हिस्से में क्यों आया होगा ? जब पहली बार खुद से हम ये सवाल कर READ MORE

वो घर मेरा ही था जहां रहता नहीं था मैं

August 1, 2016 // 0 Comments

जिसपे निगाह ठहरे वो शफहा नहीं था मैं एक हर्फ़ था, खुद भी जिसे पढ़ता नहीं था मैं होती किसे आखिर मेरे होने की ज़रुरत अपनी ही ज़रुरत का सामां नहीं था मैं खुदको कभी तफसील से जाना नहीं मैंने जाने कि क्या-क्या था और क्या नहीं था मैं मुझको मेरी सांसों की सदा शोर सी लगी बेइंतहा तनहाई थी, तनहा नहीं था मैं लोगों के साथ रास्ते भी भाग रहे थे कबसे खड़ा था फिर भी ठहरा नहीं था मैं दहलीज़ उसकी छूंके कई बार मैं READ MORE

बीमार, तीमारदार और इंतज़ार

June 1, 2016 // 0 Comments

अस्पताल इंतज़ार के मायने समझने की सबसे अच्छी युक्तियों में होते हैं. बच जाने और ख़त्म हो जाने के बीच, ज़ख्म और दवाओं के बीच, उम्मीदों और हताशाओं के बीच, बीमारों और तीमारदारों के बीच वहां इंतज़ार का एक अदृश्य पुल होता है जिसपर चलते हुए अचानक ज़िंदगी एक दर्शनशास्त्र में बदल जाती है. और हम आप एक दार्शनिक में. कई बार ज़िंदगी भी उसी अस्पताल की तरह लगने लगती है जहां अपनी-अपनी देह के बिस्तर पर हम-आप READ MORE

ख़ुद से वादा था पुराना जो निभाया मैंने

May 18, 2016 // 0 Comments

एक झूठा ही सही ख़्वाब सजाया मैंने तुझे अलसुबह अपने पास में पाया मैंने   मेरे जानिब मुझे जो भी मिला बेचेहरा उसके सांचे पे तेरा नक्श बनाया मैंने   तू नहीं थी, मगर उसमें थी महक तेरी हाय क्या सूंघ लिया है ये खुदाया मैंने   तेरे आने का ये जो शोर है, अफवाह है ये अपनी तन्हाई को इक दिन ये बताया मैंने   न तुझे जाने से रोका, न बुलाया वापस न इस बात पे अफ़सोस जताया मैंने   अपनी उम्मीद का घोंटा गला फिर READ MORE

उस बच्चे के होंठ में पालथी मार के बैठी थी पागल

May 1, 2016 // 0 Comments

खिड़की पर परदे और दरवाजों पे रहती है सांकल फिर जाने किस रस्ते से दबे पांव वो गई निकल सड़कों, चौराहों, बाज़ारो, घर से, दफ्तर से गायब दिल से, बातों से, चेहरे से, होंठो से भी गई फिसल इसका, उसका, सबका, चेहरा मुरझाया सा लगा मुझे कुछ तो था जो सबके अन्दर धीरे-धीरे गया बदल जब फुर्सत के दिन थे तो चौखट पे ही दिख जाती थी ‘खुशी’ नाम की वो चिड़िया ना जाने कहां हुई ओझल दिन भर भाग दौड़ कर जाने कहां-कहां खोजी READ MORE

बैठ के बालकनी में मौसम गाये एक ग़ज़ल

April 7, 2016 // 0 Comments

जीने का ढब कुछ दिन को इतना आवारा हो अजनबी पहाड़ी रस्ता हो, पानी का धारा हो वक्त नदी की लहरों में कुछ देर ठहर जाए डूब रही उम्मीदों को तिनके का सहारा हो जल्दीबाजी, शोर-शराबा सबकी छुट्टी कर खुला हुआ आकाश हो और एक टूटता तारा हो रुपया-पैसा, बटुवा, सबकुछ एक किनारे रख मनमर्जी के सिक्कों से जीवन का गुज़ारा हों तितली आँख मिचोली खेले हवा के आंगन में दूर कहीं मीठी लय में बजता इकतारा हो बैठ के बालकनी READ MORE

सोलांग वैली : बर्फ से बाबस्ता वो ढाई घंटे

April 1, 2016 // 0 Comments

ये एक आम ट्रिप होने जा रहा था. हम पहली रात कुल्लू (हिमांचल प्रदेश) में एक होटल बुक कर चुके थे. जिसकी बालकनी से जगमगाता कुल्लू का एक हिस्सा हमारी तरफ झांक रहा था और पेड़ की ओट से मुस्कुराता चाँद कह रहा था – मज़े करो. लकड़ी के बारामदे में बिछी कुर्सियों पर पसरे हमने करीब चौदह घंटे लम्बे सफ़र की थकान मिटाई. दिल्ली से हम पिछली रात के करीब बारह बजे भारत की बांग्लादेश पर ज़बरदस्त जीत के रोमांच के READ MORE

रंगों के मसीहा इस होली, रंगने की समझदारी देना

March 23, 2016 // 0 Comments

रंगों के मसीहा इस होली रंगने की समझदारी देना जिसके छींटे सब तक पहुँचे इक ऐसी पिचकारी देना   उम्मीद  की खाली चादर में मुस्कान मरुनी रंग देना तकलीफ के काले रस्तों पर एक धूप गुलाबी संग देना   इस बार ‘अबीरी सुबहों’ में कुछ और करीबी बढ़ जाएं ताज़ी सी खुशी के गहरे रंग शिद्दत से सभी पर चढ जाएं   मेरे हिस्से का भी सूरज उगना होगा, उग जाएगा रंगों से भरा वो इन्द्रधनुष जब आएगा तब आएगा   मैं READ MORE

ये ‘जेएनयू’ तो एक ऐसा शज़र है

February 15, 2016 // 0 Comments

#StandWithJNU अभी माहौल कुछ बिगड़ा इधर है मगर मुंह खोलना ही पेशतर है अभी चुप रहने का मंजर नहीं है सुनो यह बात मेरी मुख़्तसर है मैं तुमको अहतियातन कह रहा हूं नहीं आसान आगे का सफ़र है बताओ चोट कैसे ठीक होगी वो देता ज़ख्म है, पर चारागर है नया पन्ना पलटना चाहता हूं मगर वो फाड़ देंगे मुझको डर है हैं अब लफ़्ज़ों के मानी मुश्किलों में समझने का कहां उनमें सबर है किताबों से डरे सब लोग हैं ये इल्म की बात इनपर READ MORE

सूरजकुंड मेले पर एक वीडिओ कोलाज

February 10, 2016 // 0 Comments

मेरे घर की दीवारों पर अब राजस्थान की कुछ कठपुतलियां मुस्कुरा रही हैं. दक्षिण भारत की कुछ लकड़ी की चिड़ियाएं मूक चहचहा रही हैं. कुछ रंग-बिरंगे कागज़ के सिपाही मेरी दीवार से मुझे लिखता हुआ देख जाने क्या सोच रहे हैं. और वो एक जापानी मुस्कराहट मेरी आंखों के सामने अब भी नाच रही है. सूरजकुंड मेले से लौटे दो दिन हो गए हैं पर कुछ है जो भीतर रह गया है. ‘देश की विविधता’ नाम की ये चीज़ जब राजनीतिक READ MORE

बंद दरवाज़े पे बस अखबार डलता रह गया

January 29, 2016 // 0 Comments

बेरंग सा एक दिन अपने रंग बदलता रह गया रोशनी में डूबकर सूरज पिघलता रह गया बिक रहा था यूं अकेलापन खुले बाज़ार में बिन खरीददारों के कारोबार चलता रह गया नीद को भी जागने की इस कदर लत लग गई ख़्वाब एक मायूस सा बैठा मचलता रह गया बंद कमरे में अकेले रोशनी घुटती रही एक कोने में दिया बेकार जलता रह गया जिस तरफ खिड़कियां खोली उस तरफ दीवार थी अलसुबह खिड़की का परदा आंख मलता रह गया पार्क की उस बेंच ने तापी READ MORE

हर आत्महत्या कई सवाल छोड़ जाती है

January 19, 2016 // 0 Comments

क्या है ये जो दिमागों में इस हद तक भर जाता है कि मन को खाली कर देता है ? समाज में उन मान्यताओं का क्या अर्थ है जिनसे जीवन जैसी नायाब नेमत भी किसी ख़ास वर्ग या व्यक्ति के लिए अर्थहीन हो जाती है. हमारी जाति, हमारा धर्म, हमारी सत्ता, हमारी संस्थाएं, हमारा ओहदा इतना बड़ा कैसे हो सकता है कि उसके सामने मानवता बार-बार हार जाती है ? हमारे-आपके आस-पास होते हुए भी कोई इतना खाली इतना, बेजार कैसे हो जाता READ MORE

जगमग शहर में अंधेरे से जूझते हुए

December 5, 2015 // 1 Comment

नोट: यह लेख नवभारत टाइम्स (5 दिसंबर 2015) के सम्पादकीय पृष्ठ पर प्रकाशित हुआ है. मूल रूप से लिखा गया पूरा लेख यहां पेश है.  मुंबई के वर्सोवा बीच की रेत अभी-अभी सुनहरे रंग से लाल हुई थी और अब उसने अपना असल रंग भी खोना शुरू कर दिया था. सूरज डूब ही रहा था. किनारे चट्टान पर खड़ा एक शख्स बहुत देर से गहराते आकाश में अपनी मायूसी का रंग तलाश रहा था. मैंने कुछ दिनों में रिलीज़ होने जा रही ‘गेंग्स ऑफ़ READ MORE

मोदी जी याद रखियेगा जहां में नूरजहां और भी हैं

November 29, 2015 // 0 Comments

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कल अपने मन की बात में सोलर लालटेन की मदद से गाँव को रौशन करने वाली कानपुर के दरियांव की ‘नूरजहां’ का ज़िक्र किया और वो चर्चा में आ गई और ये खबर हर मीडिया हाउस की सुर्ख़ियों में. लेकिन ये बात तब की है जब मोदी जी प्रधानमंत्री नहीं थे, और गाँव कनेक्शन देश का सबसे बड़ा ग्रामीण अखबार नहीं था. तब कानपुर की ही ऐसी और भी कई महिलाओं पर मैंने एक विस्तृत रिपोर्ट लिखी READ MORE

देश की राजधानी में नींद भी है एक सपना

November 14, 2015 // 0 Comments

नोट: लेख मूलतः नवभारत टाइम्स के लिए लिखा गया है और  14 नवम्बर 2015 के सम्पादकीय पृष्ठ पर प्रकाशित हो चुका है. दिल्ली में जिन सड़कों, फ़्लाइओवरों, से आप गुजरते हैं उनके आस-पास रात के वक्त ऐसे लोगों की दुनिया बस जाती जिनकी ज़िंदगी का सबसे बड़ा सपना है – नींद. उस शहर में जहां रियल एस्टेट का बाज़ार अपने बूम पर हो, तीन कमरों और एक छत के लिए जहां लोग करोड़ रूपये तक खर्च कर देने की हैसियत रखते हों वहां एक READ MORE

एक गिलहरी धूप के हाथ से बिस्किट छीन के भागी थी

October 24, 2015 // 0 Comments

उस दीवार पे खिड़की थी और खिड़की पर एक गोरैया बहुत दिनों से ढूंढ रहा हूं, वो तस्वीर मिलेगी क्या ? एक गिलहरी धूप के हाथ से बिस्किट छीन के भागी थी लौट के बरसों से ना आई, फिर से धूप खिलेगी क्या ? एक कटोरी खुशी रखी थी कबूतरों के चुगने को वक्त के पांव से छलक गई है, फिर से खुशी भरेगी क्या ? मां के हाथ में सलाइयों की चोचें अक्सर लड़ती थी यहां शहर में ठंड नहीं है, मां बनियान बिनेगी क्या ? ईद से पहले शबनम READ MORE

‘हंसा’ :गांव में शहर की गुपचुप घुसपैठ

October 18, 2015 // 0 Comments

हंसा। थियेटर और सिनेमा के अदाकार मानव कौल ने जब इस फिल्म को अपनी फेसबुक टाइमलाइन पे शेयर किया तो पता नहीं था कि इस लिंक के ज़रिये मैं उस दुनिया में पहुंचने वाला हूं जिसे मैने बचपनभर जिया है।   आइएमडीबी बताता है कि ये फिल्म 2012 में रिलीज़ हुई और इसे 8.3 की रेटिंग से भी नवाजता है। यूट्यूब पर शायद ये फिल्म ताज़ा ताज़ा अपलोड की गई है। मेरे लिये उत्तराखंड के परिवेश पर अब तक मानीखेज़ एक ही READ MORE

बेकायदे का प्यार

September 20, 2015 // 0 Comments

कभी कभी मन करता है सब यहां-वहां सा हो जाए तितर-बितर एकदम कुछ भी न रहे करीने से सुबह-दिन-शाम-रात बन जाए सुबह-रात-दिन-शाम या फिर दिन-सुबह-रात-शाम सर्दियों के बीच गर्मियां होने लगें बारिशें धूप के ऊपर गिरने लगें टप-टप बोलना सुनाई देने का मोहताज न रहे शहर में गाड़ियों की जगह गाय-बकरियां तैरने लगें पंखों की मशीनी कर्कश आवाज़ को निचोड़ने पर बाल्टी में भरने लगे ग़ुलाम अली की ग़ज़ल आकाश आर्ट बुक हो READ MORE

एफटीआईआई के छात्रों के समर्थन में जुटे सैकड़ों कला-प्रेमी

August 3, 2015 // 0 Comments

जंतर मंतर पर विरोध-प्रदर्शन :   एफटीआईआई में गजेन्द्र चौहान की चेयरमैन के रूप में नियुक्ति के विरोध में आज जंतर-मंतर पर विरोध प्रदर्शन हुआ. जिसमें फिल्म संस्थान पुणे (एफटीआईआई ) के छात्रों के समर्थन में डीयू, जामिया सहित दिल्ली के तमाम विश्वविद्यालयों के छात्र-छात्राओं ने बढ़-चढ़ कर भाग लिया. साथ ही आइसा, केवाईएस, इप्टा, अस्मिता सहित तमाम  संगठनों ने इस विरोध प्रदर्शन को समर्थन दिया. READ MORE

हम अपने भीतर के कट्टरपंथ को फांसी क्यों नहीं दे देते ?

July 31, 2015 // 0 Comments

ऐसे मौकों पर मैं खुद को बहुत अकेला और उदास पाता हूं। मुझे नहीं पता होता कि मैं किस तरफ खड़ा होउं। मैं अपने आपको उस ‘सामूहिक चेतना’ का हिस्सा बनते हुए नहीं देख पाता जिसे ‘किसी’ को फांसी मिलने पर ‘फांसी मुबारक’ सरीखे जुमले उछालने का मौका मिल जाता है। जिसे किसी को फांसी मिलने में एक ‘उन्मादी सकून’ मिलता है। मेरे असमंजस और उदासी की मूल वजह इस सवाल के जवाब की तलाश में छिपी है READ MORE

दस्तूरी समाज में कस्तूरी तलाशते दिलों की कहानी : मसान

July 27, 2015 // 0 Comments

वो कहती है- “तुम बहुत सीधे और ईमानदार हो। बिल्कुल निदा फाज़ली की गज़लों की तरह।” वो पूछता है – “निदा फाजली, वो कौन हैं ?” और उसका एक मासूम सा जवाब-“यही तो तुम्हारी ईमानदारी है। “ ये स्वीकार्यता हर रिश्ते में नहीं होती। नायिका बशीर बद्र की फैन है। दुश्यंत कुमार की कविताओं की शौकीन है। और जानती है कि नायक ने अगर चकबस्त को सुन लिया तो वो बेहोश हो जाएगा। पर इस जानने में अहमन्यता READ MORE

भारतीय समाज का ‘चेस्टिटी टेस्ट’ : ‘सेक्रेड ग्लास बाउल’

July 25, 2015 // 0 Comments

प्रिया ‘सेक्रेड ग्लास बाउल’ का जो खूबसूरत प्रतीक अपनी फिल्म में गढ़ती हैं उसका सीधा सा अर्थ यही है कि लड़कियों को हमेशा ये सिखाया जाता है कि उनके पास एक ऐसी चीज़ है जिसे उन्हें सुरक्षित रखना है। सुरक्षा का यही भाव उन्हें एक खास उम्र के बाद डरकर रहने को मजबूर कर देता है। वो तबतक खुलकर नहीं जी पाएंगी जबतक उनके मन में इस ग्लास बाउल को बचाकर रखने का दबाव बना रहेगा। जबतक उनके चरित्र को READ MORE

अब उन पहाड़ी मैगी पॉइंट्स का क्या होगा ?

June 12, 2015 // 2 Comments

डियर मैगी, कल जब किराने की दूकान में गया तो जाते ही कहा…आंटी मैगी..ये कहते ही मुझको रुकना पड़ा..न चाहते हुए भी.. तुम वहीं शेल्फ में रखे थे..पर आज पहले की तरह सबसे आगे की लाइन में खड़े मुस्कुरा नहीं रहे थे…तुम्हें कहीं पीछे कई और नूडल्स से ढंकते हुए किसी अपराधी की तरह छुपाया गया था.. न चाहते हुए भी आज नज़र दूसरे नामों के नूडल्स को तलाश रही थी..समझ नहीं आ रहा था कि तुम्हारी जगह किसे चुनूं? तुम READ MORE

‘ओल्ड स्कूल’ होकर भी ‘घणी बांवरी’ सी फिल्म

May 24, 2015 // 0 Comments

एक शक्ल की दो लड़कियां हैं जिनमें एक ओरिजनल है एक डुब्लिेकेट। अब असल मुद्दा ये है कि जो आॅरिजनल है वो नायक को अब आॅरिजनल नहीं लगती। वो डुब्लिकेट में आॅरिजनल तलाश रहा है। नायक को यहां चाॅइस मिलती है कि वो रिबाॅक पसंद करे या फिर रिब्यूके ? पर असल सवाल ये है कि क्या आॅरिजनल भी यही रखेंगे और डुब्लिकेट भी ? यहां कोई ईंट से ईंट जोड़ने के लिये सीमेन्ट तलाश रहा है वो चाहे किसी भी कंपनी का हो और READ MORE

क्यों वीरान हो गई पहाड़ की बाखलियां

May 21, 2015 // 0 Comments

पिछले कुछ सालों में प्रदेश की अर्थव्यवस्था में जिन क्षेत्रों का बोलबाला रहा उनमें कंस्ट्रक्शन, मैन्यूफैक्चरिंग और जलविद्युत ऊर्जा प्रमुख हैं। बीते दौर में कलकारखानों और खनन में 15 फीसदी की विकास दर देखी गई जबकि कृषि में यह विकास दर केवल 2 फीसदी की रही। ज़ाहिर है कृषि क्षेत्र के विकास में सरकार की रुचि खनन और कारखानों की तुलना में बहुत कम रही और इसकी वजहें किसी से छिपी नहीं है। READ MORE

ये ‘निर्णय’ आखिर किसका है ?

April 28, 2015 // 0 Comments

पुष्पा रावत कैमरा लेकर निकलती है निम्न मध्यवर्गीय परिवार की युवा लड़कियों की उन इच्छाओं की खोज में जिन्हें रोजमर्रा की जिन्दगी जीते हुए उनके चेहरे, उनके व्यवहार में खोज पाना मुश्किल है। वो इच्छाएं या तो धीरे धीरे मर रही हैं या फिर उन पर थोप दी गई जिम्मेदारियों के मलवे में इतनी नीचे दबी हुई हैं कि कई बार ये इलहाम तक हो जाता है कि वो हैं भी या नही। उस कमरे में जिसकी दीवार का रंग एकदम READ MORE

राहे सुखन है संजय वन

April 23, 2015 // 0 Comments

उस जंगल की परिधि से लगी छोटी-बड़ी इमारतें ऐसी लग रही थी जैसे किसी शांत सी झील को कंटीले तार-बाढ़ से घेर दिया गया हो. जैसे पूरा शहर धीरे धीरे इस जंगल को अपने चंगुल में घेर रहा हो..लील जाने के लिए और हज़ारों पेड़ इस घेरे में सिमटे हुए अपने बचे रहने के लिए जी-तोड़ संघर्ष में लगे हों. कुछ देर यूं ही मचान के पास ही के उस मखमली घास के मैदान में लेटे रहे. आसमान से गिरती धूप को चेहरे पर पड़ने से बचाने के लिए READ MORE

कहीं दराती बीमार तो नहीं कर रही ?

April 20, 2015 // 0 Comments

विवेकानंद पर्वतीय कृषि अनुसंधान संस्थान ने बनाये पहाड़ी खेती के लिये नये उपकरण, उपकरणों में लकड़ी की जगह रबर और, लोहे के प्रयोग पर दिया बल “हल बनाने के लिये अब तक बांज, सनड़ जैसे चौड़ी पत्ती वाले पेड़ों की लकड़ी का इस्तेमाल किया जाता है। ये पेड़ अपनी जड़ों में बारिश के पानी का संचय करते हैं। ज़मीन की सतहों पर अब 10 इंच तक भी पानी नहीं रह गया है जिसकी मुख्य वजह कृषि उपकरणों के लिये होने READ MORE

क्या सचमुच सम्भव है ‘नेट न्यूट्रेलिटी’ ?

April 15, 2015 // 0 Comments

जनाब आप किस नेट न्यूट्रेलिटी की बात कर रहे हैं ? क्या सचमुच नेट पर न्यूट्रेलिटी या इन्टरनेट तटस्थता जैसी कोई चीज़ सम्भव है ? क्या वर्तमान परिप्रेक्ष में इन्टरनेट की दुनिया वैसी है जैसी हम असल दुनिया को बनाना चाहते हैं ? वो दुनिया जिसमें तमाम संसाधनों पर सभी का बराबर हक हो। क्या सचमुच ये घास उतनी ही हरी है जितनी इसे बताया जा रहा है ? फर्ज कीजिये कि आप गो डैडी पर एक डोमेन खरीदते हैं। तो READ MORE

सिनेमा : शटर से थियेटर तक

April 10, 2015 // 0 Comments

मैं इस वक्त उत्तराखंड के पिथौरागढ़ में हूं।अपने ननिहाल में।कुछ हफ्ते भर पहले रिलीज़ हुई एनएच 10 देखने का मन है।पर अफ़सोस कि मैं उसे बड़े परदे पर नहीं देख पाऊंगा।क्यूंकि ज़िला मुख्यालय होते हुए भी यहां एक सिनेमाघर नहीं है जहां ताज़ा रिलीज़ हुई मुख्यधारा की फ़िल्में देखी जा सकें।एक पुराना जर्ज़र पड़ा सिनेमाघर है जिसके बारे में मेरी मामा की लड़की ने मुझे अभी अभी बताया है – “वहां तो बस बिहारी READ MORE

महत्वाकांक्षाओं का ‘आप’निवेशिक काल

March 28, 2015 // 0 Comments

ये राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं का ‘आप’निवेशिक काल था. वो धारा जो न दक्षिणपंथी लगती थी, न वामपंथी अब वो ‘कमीनपंथी’ पर उतर आई थी. पार्टी बनाने वाले, पार्टी चलाने वाले के लिए ‘कमीने-साले’ हो गए थे. इस ‘आप’निवेशिक काल का अविर्भाव आदर्शों के अतिरेक की ज़मीन पर हुआ, वो ज़मीन जो दरअसल अपनी नहीं थी. देश के अन्नाओं, गांधियों, अम्बेडकरों की ज़मीन का अतिक्रमण करके वो ज़मीन कब्जाई गई थी. ठीक उसी दौर में READ MORE

हत्याओं के प्रतिशोध से गुजरता हाइवे

March 23, 2015 // 0 Comments

एन एच 10 के एक दृश्य में मीरा (अनुष्का शर्मा) हाइवे के किसी ढाबे के गंदे से टॉयलेट के दरवाज़े पर लिखे उस एक शब्द को मिटाती हैं- रंडी. हमारे समाज के एक बड़े हिस्से की मानसिकता उसी गंदे टॉयलेट के सड़े-गले टीन के दरवाज़े की तरह ही है. एनएच 10 उस एक गीले कपड़े की तरह उस मानसिक गंदलेपन को पोंछने की एक अच्छी कोशिश करती है. फिल्म हाइवे पे तो निकलती है लेकिन ऐसी पगडंडियों को नमूदार करते हुए जिनके READ MORE

कसेट वाले ज़माने में मोह के धागे

March 4, 2015 // 0 Comments

बाज़ार के सामने बार-बार हारता बाॅलिवुड जब दम लगाता है तो दम लगाके हाइशा सरीखा कुछ सम्भव हो पाता है। दम लगाके हाइशा खुद को हारते हुए देखकर भी जीतता हुआ महसूस करने सा अनुभव है। हमारी नज़र भर से जि़न्दगी के तमाम चेहरे एकदम बदल जाते हैं। जो चीज़ हमें जैसी लगती है ठीक वैसी वो कभी होती ही नहीं। हमारी अपनी सीमाएं उस चीज़ के हमारी जि़न्दगी में मायने बदल देती हैं। इसके असर कई बार दूसरों से और READ MORE

पीके एकदम ‘लुल’ नहीं है

December 21, 2014 // 0 Comments

चलिये शुरु से शुरु करते हैं। पीके इसी भाव से शुरु होती है। एकदम नग्न। आवरणहीन। इस विशाल दुनिया के मरुस्थल में एक नंगा आदमी खड़ा है जिसे दुनिया के बारे में कुछ नहीं पता। ठीक उस मानसिक अवस्था में जैसे हम पैदा होने के ठीक बाद होते हैं। ठीक इसी बिन्दु पर फिल्म से बड़ी उम्मीदें बंध जाती हैं। एक एलियन की नज़र से इस दुनिया को देखना जिसके लिये ये दुनिया एक अनजान गोला भर है। वो नज़र जिसमें कोई READ MORE

क्या इन्द्रधनुष एक सच है

December 19, 2014 // 0 Comments

“ये“ लोग 2021 तक पूरे देश को हिन्दू बना देने की बात करते हैं। और सरहद पार से “वो“ लोग चाहते हैं कि पाकिस्तान के बाद भारत में इस्लाम अपनी परवाज़ भरने लगे। ये पहचान के कुछ चैखटे हैं जिनमें कट्टरपंथी अपनी-अपनी मजऱ्ी के मुताबिक आपको और हमें फिट कर देना चाहते हैं। पहचानों की इस रणभूमि में जो ताकतवर है उसकी आवाज़ें अखबारों, समाचार पत्रों और यहां तक कि सोशियल मीडिया में सुखिर्यां बटोर लेती READ MORE

कहानी : घुटने का दर्द

September 5, 2014 // 0 Comments

 1. अगस्त क्रान्ति राजधानी मुंबई सेन्ट्रल के प्लेटफाॅर्म एक से चल पड़ी थी। मम्मी खिड़की के बाहर भागती हुई दुनिया को देख रही थी और पापा अभी अभी आये मिड डे अखबार को पलट रहे थे। हमारी तीन सीटों में से एक सीट 8 नम्बर की थी जो उस कोच के दूसरे छोर पर थी। मैं उस सीट को देखने के लिये जाकर वापस लौटा तो देखा कि एक 45-46 साल का लगने वाला, उचले चेहरे पर नज़र के चश्मे पहना वो अजनबी आदमी पापा को कुछ बताये जा READ MORE

वक्त की उंगलियों में नाचती है ज़िंदगी की कठपुतली

August 27, 2014 // 0 Comments

रात का तकरीबन नौ बज रहा था। संगीत नाटक अकादमी से बाहर निकला ही था कि मेनरोड पर एक रिक्शेवाले को अपने रिक्शे पर कपड़ा मारते हुए देखा। पूछा कि क्या वो अम्बेडकर पार्क की तरफ जाएगा? मुझे इसी ओर आना था। रिक्शेवाले ने मना कर दिया। तभी पीछे एक शख्स को साईकिल के खड़ा पाया। वो शख्स अपनी साईकिल रोक के मेरी ओर देख रहा था। मेरे मुड़ने पर तकरीबन 40-45 साल के उस आदमी ने कहा कि ”मैं भी चारबाग की तरफ जा READ MORE

मैगी बनाने में १० मिनट पर सेक्स ‘टू मिनट नूडल्स’ की तरह क्यूं ?

August 24, 2014 // 0 Comments

Lucknow Diary (नोट : डायरी करीब २ साल  पुरानी है पर गुल्लक में पहली बार छप रही है ताकि आगे के लिए सहेजी जा सके) सेक्स सोसाईटी एन्ड शी…. लखनऊ में इस नाम से कोई थियेटर शो है, पहले तो ये जानकर ही जरा आश्चर्य हुआ। साथी गौरव मस्तो स्रीवास्तव निमंत्रण पत्र देके गये थे। लखनऊ में थियेटर देखने का पहला अवसर था ये इसलिये उत्साह भी बहुत था। संगीत नाटक अकादमी पहुंचे तो वहां पहले से भोजपुरी महोत्सव के रंग READ MORE

Singham returns : A poetic review

August 15, 2014 // 1 Comment

  मन  बिफर उठे, तन तड़प उठे परदे पे फिल्म जब आवे सिंघम ना फन आये, ना  मन आये सेम कथा दोहरावे सिंघम कॉपी पेस्ट बनावत सिंघम फिर गाड़ियां उड़ावत सिंघम लॉजिक नहीं लगावत सिंघम धत तेरे की हो जावत सिंघम साथ में लेके करीना को बोझिल लव ट्रेक बनाए सिंघम ढाई घंटे की मूवी में बिलकुल इन्ट्रेस्ट ना आये सिंघम फ्री में पुलिस की प्रचारक सिंघम एंड में शर्ट उतारक सिंघम आर एस एस अवतारक सिंघम पहले से कम मारक READ MORE

आँखें खोलने की नसीहत देती ‘आँखों देखी’

August 8, 2014 // 1 Comment

दो समानान्तर रेखाएं अनन्त पर मिलती हैं। बाउजी इस बात को मानने से इनकार देते हैं। दो समानान्तर रेखाएं अगर मिल गई तो वो समानान्तर हो ही नहीं सकती। बाउजी के लिये ऐसा कोई अनन्त नहीं बना जहां हम-आप अपनी सुविधा के लिये दो समानान्तर रेखाओं को मिला देते हैं। दरअसल बाउजी उस गणित को अपनी दुनियां से बेदखल करने की ठान चुके हैं जो किसी और के सच के हिसाब से अपने समीकरण तय करता है। वो गणित जो READ MORE

उन चीज़ों को खोते हुए देखना जो आपको बनाती हैं

August 3, 2014 // 0 Comments

Beasts of the southern wild हशपपी का खुद पर और जीवन की अच्छाईयों पर एक गहरा और अटूट भरोसा है। ये भरोसा उसकी अपनी बनाई दुनिया से जुटाये आत्वविश्वास से आता है। हशपपी मानती है कि पूरी दुनिया का अस्तित्व इस बात पर निर्भर करता है कि हर जीज़ अपनी-अपनी जगह पर सही तरीके से फिट हो। यदि इनमें किसी एक भी चीज़ यहां तक कि सबसे छोटी चीज़ में विध्वंश होता है तो पूरी दुनिया नष्ट हो जाएगी। वो खुद को इस बड़े संसार  का READ MORE

ये नगरिया ‘पहले आप’ की, ‘जनाब’ की है

July 29, 2014 // 0 Comments

ये नगरिया ‘पहले आप’ की, ‘ज़नाब’ की है                                                                                                               यहां दूसरे की भी दुकान आपकी है ‘कड़ाई’ में है चिकन और ‘कढ़ाई’ में भी चिकन भई कुछ और बात टुंडे कबाब की है हर किसी को यहां ‘मज़ा आती’ है यहां बाग़ों के मजे़ लेते हाथी हैं मैं को हम और तू को आप कहते हैं सिम्पल सी बात भी ‘गज़ब’ हो जाती है. यहां READ MORE

एक औरत के मन तक ले जाती फिल्म

July 12, 2014 // 0 Comments

Film : A woman under influence कितनी फिल्में होंगी जो स्त्रियों के मनोविज्ञान में बहुत गहरे तक झांकने की कोशिश करती हैं। फिल्म जगत में ऐसी फिल्मों की स्थिति माइनोरिटी की तरह ही होगी। जाॅन कैसेवेटस (John cassavetes) की फिल्म अ वुमन अन्डर इन्फलुएंस ऐसी ही फिल्मों में है जो रिश्ते, परिवार, अपने व्यवहार और यहां तक कि अपने वजूद के प्रति एक स्त्री की असुरक्षा, भय और इस वजह से पनपी मनोवैज्ञानिक अस्थिता को मानव स्वभाव READ MORE

अकेलापन समेटकर मुस्कराहट बिखेरती Amelie

July 9, 2014 // 0 Comments

एमिली अकेलेपन से जूझती एक लड़की है जो अपनी दुनियां को परिकथाओं सा बनाकर अपने अकेलेपन का हल खोज रही है। एक सनकी से मां बाप की लड़की जिन्हें लगता है कि उसकी बेटी को दिल की बीमारी है, इसलिये उसके बचपन भर में उसे घर से बाहर जाने की मनाही रही। यहां तक कि उसकी पढ़ाई भी घर मे ही हुई है। एक दुर्घटना में मां की मौत के बाद वो घर छोड़ देती है और एक कैफे में काम करना शुरु करती है। एक सीधी-साधी सी दिखने READ MORE

खोई हुई एक चीज़

July 6, 2014 // 0 Comments

कविता यहीं कहीं तो रख्खी थी दिल के पलंग पर यादों के सिरहाने के नीचे  शायद या फिर वक्त की जंग लगी अलमारी के ऊपर तनहाई की मेज पे या फिर उदासियों की मुड़ी तुड़ी चादर के नीचे ? यहीं कहीं तो रख्खी थी कुछ तो रखकर भूल गया हूं आंखिर क्या था ये भी याद नहीं आता कई दिनों से ढूंढ रहा हूं वो बेनाम सी ,बेरंग और बेशक्ल सी कोई चीज़ ऐसी चींजें खोकर वापस मिलती हैं क्या ? एक-दूजे की ज़िंदगी में हम दोनों भी ऐसी ही READ MORE

Photo Diary 1 : Birds

July 6, 2014 // 0 Comments

Photo diary: 1) दिल्ली के महरोली में अपने कमरे की खिड़की के बाहर इस मादा कबूतर को देखा. खिड़की खोलने की आहट भर से चौकन्नी हो जाती. लगातार अपने अंडे के आस पास मडराने वाले हर खतरे पर नज़र रखती. मां किसी भी रूप में हो उसके लिए उसकी आने वाली संतान शायद सबसे बड़ी खुशी लेकर आती है. खुशी से पहले फ़िक्र का ये लामहा मैंने अपने कैमरे में कैद कर लिया. Delhi, India   2) नैनीताल सैलानियों का शहर है. इस छोटे से पहाड़ी शहर में READ MORE

आपकी अदालत में आपके लिये भी तो कोई कठघरा हो

July 1, 2014 // 0 Comments

“और ये जो नया काम आपने शुरु किया है ज़रा बताइये कि इसका न्यूज़रुम से क्या सरोकार है ? इस नये काम को क्या कहते हैं क्या आप जानते हैं ? रितु धवन, अनिता शर्मा और प्रसाद जिनका नाम तनु ने अपने सुसाइड नोट में लिखा है उन्हें आप जानते तो होंगे ना ? कोई विशाखा गाइडलाइन होती है ऐसे मसलों के लिये, आपने सुना तो होगा ही। इस गाइडलाईन के तहत खुद पर और इन लोगों पर कोई कार्रवाई करें तो खबर ज़रुर चलवा READ MORE

नीद से जागा हुआ शब्द

June 24, 2014 // 1 Comment

एक दिन अचानक नीद से जागा एक सोया हुआ शब्द लेने लगा तेज़ तेज़ सासें और बिखरने लगे हवा में कई डरे हुए अक्षर उसने अभी अभी देखा था एक सपना जिसमें एक जंग खाती अल्मारी में बंद थी कई कहानियां जो वापस जाना चाहती थी अपनी अपनी किताबों में नौकरी नाम का वो हत्यारा जिसका वज़न पंद्रह  घंटे से भी ज्यादा था वक्त की छुरी से कर रहा था एक एक कहानी की हत्या कहानियां रोती, चीखती ,चिल्लाती तोड़ रही थी एक एक READ MORE

‘मैट्रो’ की नयी भाषा सीखती एक मैट्रोसिटी

June 23, 2014 // 1 Comment

Mumbai Diary (23  Jun 2014) तकरीबन साड़े तीन महीने बाद मुम्बई लौटा हूं। दिल्ली की लू के बनिस्पत मुम्बई की ठन्डी हवाएं राहत देने वाली हैं। ये इस शहर के और खूबसूरत हो जाने के शुरुआती दिन हैं। दिन में उमस रहती है ज़रा-ज़रा पर साथ में जो ठन्डी हवाएं चलती हैं, वो सुकून देने वाली हैं। मौसम ही नहीं इस बार के लौटने में कुछ और भी नया है यहां। ये शहर बस अभी-अभी एक नई भाषा सीख रहा है। एस्केलेटर में डर-डर के कदम रखती READ MORE

आख़री सांसें लेती ज़िंदगी की कहानी

June 15, 2014 // 0 Comments

Mumbai Diary : 14 (Mumbai Film Festival 2012) पिछले पांच दिनों से मुम्बई के पांच अलग अलग थियेटरों का पीछा किया है। हर थियेटर जैसे एक ट्रेन सा हो और फिल्म शुरु होने का वक्त जैसे किसी सफर के शुरु होने का वक्त हो। रोज कई ऐसे ही सफर तय किये हैं इन दिनों में। सुबह उठना, घर से निकलने के पहले ज़रुरी काम निपटाना, रेलवे स्टेशन की तरफ भागना, चलती हुई टेन में मुम्बई फिल्म फेस्टिवल के कैटलौक पर डौट पेन से टिक करके सम्भावित READ MORE

The great ‘Kumaoni wedding’

May 24, 2014 // 2 Comments

इस बार अपने गांव चिटगल गया , काफी वक्त हो गया था वहां गए हुए. चिटगल, उत्तराखंड में गंगोलीहाट नाम की एक खूबसूरत सीमान्त तहसील का एक बेहद खूबसूरत गाँव है. पर उस ख़ूबसूरती को संवारने के लिए, उसे महसूस करने के लिए और उसे बचाए रखने के लिए वहां लोग लगातार कम होते जा रहे हैं. असुविधाओं और अभावों के चलते परिवार के परिवार  अपने पुश्तैनी घरों में ताला जड़कर वहां से बाहर आ रहे हैं. रोजगार, शिक्षा, READ MORE

‘एक सौ दर्द जले जब दिल में, एक नज़्म का जन्म हुआ’

April 14, 2014 // 0 Comments

गुलज़ार  साहब को दादा साहेब फाल्के पुरस्कार मिलने की बधाई देते हुए मोहल्ला लाइव पर छपने वाली अपनी ‘मुंबई डायरी’ में से एक दिन जो गुलज़ार के नाम है, ‘गुल्लक’ पढने वालों के लिए भी .. गुलज़ार। ये नाम मेरे लिये उन शुरुआती साहित्यिक सुविधाओं में से था जो मुझे अपने छोटे से कस्बे गंगोलीहाट में रहने के दिनों में ही मिल गई थी। पुखराज, त्रिवेणी और रात पस्मिने की, ये तीन किताबें ऐसी थी जिनके READ MORE

एक ‘क्वीन’ का आज़ाद होना

March 11, 2014 // 0 Comments

दिल्ली में कॉलेज आने जाने वाले लड़कों के बीच एक टर्म बहुत प्रचलित है। ‘बहन जी‘। ‘बहन जी टाइप‘ होना शहरी परिप्रेक्ष में एक लड़की के लिये अच्छा नहीं माना जाता। ‘यूथ‘ की भाषा में कहें तो ‘हैप‘ होना शहर के युवाओं की मुख्यधारा में आने के लिये एक ज़रुरी मानदंड है। इसके उलट परिवार और सगे सम्बन्धियों की परिभाषा में ‘बहन जी टाइप‘ लड़की एक आदर्श लड़की है। फिल्म क्वीन की कहानी में रानी की READ MORE