ताज़ा रेजगारी

दिल्ली डायरी

देश की राजधानी में नींद भी है एक सपना

November 14, 2015 // 0 Comments

नोट: लेख मूलतः नवभारत टाइम्स के लिए लिखा गया है और  14 नवम्बर 2015 के सम्पादकीय पृष्ठ पर प्रकाशित हो चुका है. दिल्ली में जिन सड़कों, फ़्लाइओवरों, से आप गुजरते हैं उनके आस-पास रात के वक्त ऐसे लोगों की दुनिया बस जाती जिनकी ज़िंदगी का सबसे बड़ा सपना है – नींद. उस शहर में जहां रियल एस्टेट का बाज़ार अपने बूम पर हो, तीन कमरों और एक छत के लिए जहां लोग करोड़ रूपये तक खर्च कर देने की हैसियत रखते हों वहां एक READ MORE

एफटीआईआई के छात्रों के समर्थन में जुटे सैकड़ों कला-प्रेमी

August 3, 2015 // 0 Comments

जंतर मंतर पर विरोध-प्रदर्शन :   एफटीआईआई में गजेन्द्र चौहान की चेयरमैन के रूप में नियुक्ति के विरोध में आज जंतर-मंतर पर विरोध प्रदर्शन हुआ. जिसमें फिल्म संस्थान पुणे (एफटीआईआई ) के छात्रों के समर्थन में डीयू, जामिया सहित दिल्ली के तमाम विश्वविद्यालयों के छात्र-छात्राओं ने बढ़-चढ़ कर भाग लिया. साथ ही आइसा, केवाईएस, इप्टा, अस्मिता सहित तमाम  संगठनों ने इस विरोध प्रदर्शन को समर्थन दिया. READ MORE

बाद बारिश के

June 21, 2015 // 0 Comments

फूल चादर की तरह लाल मिट्टी वाली उस कच्ची सड़क पर बिछे थे। रेंगती हुई चींटियां खुश थी कि बारिश के बाद ही सही उन्हें नयी सलवटें नसीब हुई. गिलहरियां आहटों का रास्ता काटती हुई सी फुदक कर कहीं दूर ओझल होती रही थी. मोर अपने पंख फैलाए धूप की अचकनें पहनकर जंगलों में खो रहे थे. दूर कहीं तितलियां भी थी जो टहनियों की पत्तियों से दोस्ती बढ़ाने में मशगूल थी. हवा आज देह को झुलसाने पर आमादा नहीं थी.. READ MORE

सुबह की सैर जैसे सपना हो गई हो

June 20, 2015 // 0 Comments

बाद बारिश के सुबह की सैर जैसे रात का सपना हो गई थी.. ज़मीन अभी भी नम थी.. जैसे कभी कभी उसकी आंखें हो जाया करती हैं उसकी याद में.. उतनी ही पाक-साफ़, उतनी ही मासूम.. ज़मीन पर बिखरे हुए फूलों को देखकर उसे लगा कि उसकी यादों का रंग शायद हल्का पीला होता होगा.. उसने गीली हो गई उस हरी बेंच पर बिखरी उन मासूम पंखुडि़यों को गौर से देखा.. उनके बिखरने में खूबसूरती तो थी पर उस खूबसूरती के पीछे एक टूटना रहा READ MORE

राहे सुखन है संजय वन

April 23, 2015 // 0 Comments

उस जंगल की परिधि से लगी छोटी-बड़ी इमारतें ऐसी लग रही थी जैसे किसी शांत सी झील को कंटीले तार-बाढ़ से घेर दिया गया हो. जैसे पूरा शहर धीरे धीरे इस जंगल को अपने चंगुल में घेर रहा हो..लील जाने के लिए और हज़ारों पेड़ इस घेरे में सिमटे हुए अपने बचे रहने के लिए जी-तोड़ संघर्ष में लगे हों. कुछ देर यूं ही मचान के पास ही के उस मखमली घास के मैदान में लेटे रहे. आसमान से गिरती धूप को चेहरे पर पड़ने से बचाने के लिए READ MORE

हे IRCTC ! ट्रेन का टिकिट मांगा है, लोकसभा का नहीं

June 17, 2014 // 0 Comments

  Delhi Diary ( Jun 2014)                                                                                      Feeling: IRCTC sucks ये असम्भव सा काम आज बस होने ही वाला था। जिस काम के लिये पिछले हफते भर से तरह तरह के जुगाड़ काम ना आये उस काम को आज मैं घर बैठे कर ही लेने वाला था। उम्मीद पूरी थी। बावजूद इसके कि पुराने अनुभव इस पूरी उम्मीद का समर्थन करने वाले तो कतई नहीं थे। पर हम तो ठहरे उम्मीद पालने में माहिर। घोर आशावादी किसम के मासूम READ MORE

चुनावी दिल्ली में एक बीमार सा दिन

April 8, 2014 // 0 Comments

 सीने में इन दिनों कभी कभी तेज़ दर्द होता है.. लगता है की पेट के अन्दर कोई जा बैठा है जो कभी कभी फेफड़ों को जोर से पकड़ लेता है और निचोड़ने लगता है.. घर के बाहर टूटी-फूटी सड़कों में बहुत सारी धूल है और पास में एक प्राइवेट अस्पताल.. हरे रंग के शीशे से बना बड़ा सा अस्पताल.. मैं अन्दर जाता हूं.. रिसेप्शन पर बैठी गाढ़ी लिप स्टिक वाली लडकी मुझसे तीन सौ रूपये यूं निकलवा लेती है जैसे मैंने उससे कभी उधार READ MORE

जेएनयू की होली – 5 अनुभव

March 18, 2014 // 0 Comments

तो इस बार की होली जेएनयू में खेली। बाबा गंगनाथ मार्ग से जेएनयू के गेट की तरफ बड़ते ही माहौल एकदम बदल सा जाता है। जेएनयू कैम्पस के भीतर रंग जैसे इन्सानों के शरीरों पर झूलते हुए नज़र आते हैं। कई तरह के रंग और उसमें सबसे गहरा रंग खुशी का। होली है हुड़दंग नहीं जेएनयू के मेन गेट से अन्दर आते हुए सैकड़ों रंगे-पुते लड़के लड़कियों का हुजूम देखके ऑटो वाला ज़रा डर रहा था। “भैया चिन्ता मत करो। READ MORE

इनक्रोचमेंट, डिमोल्यूशन एंड डिस्प्लेसमेंट

May 21, 2010 // 0 Comments

सुबह सुबह नौएडा मोड़ से गुजरते हुए सड़क के किनारे देखा तो वहां मां दुर्गा की वो मूर्ति नहीं थी, ना ही नटराज की। वहां कुछ लोग थे जो बुल्डोजर लेकर कच्ची ईंटों से बने उन कच्चे घरों को तोड़ रहे थे जहां अब तक वो कुछ लोग रहते थे, जिनका रहना वहां गैवाजिब था, उन लोगों के लिये जिनके लिये लोकतंत्र सबसे उपर है और कानून उससे भी उपर। इसीलिये इन लोगों का वहां रहना गैरकानूनी समझा गया और आज उनको वहां न READ MORE

एक दोस्त का प्रोफेश्नल हो जाना

April 22, 2010 // 4 Comments

कई बार अपने आसपास लोगों को निहायत प्रोफेश्नल होता देख डर लगता है। समझ नहीं आता कि क्या ज्यादा जरुरी है। इन्सानी भावनाओं को जिन्दा रखते हुए जीना या प्रोफेश्नल होना। जल्दबाजी, बेचेनी फलतह तुनकमिजाजी, गुस्सा। समझ नहीं आता कि क्यों कोई काम शुकून से नहीं किया जा सकता। पर सबके काम करने करवाने के अपने अपने तरीके हैं यहां। क्या सही क्या गलत। लेकिन कई बार इस प्रोफेश्नलिजम की हद यहां अपने READ MORE

क्या आपका फोन चोरी नही हुआ

November 24, 2009 // 4 Comments

सिट यार फोन चोरी हो गया। घर आकर बताया तो भाई लोगों के चेहरे पर मुस्कुराहट तैर आई। पहली बार जब घर आकर बताया था तो ऐसा नहीं हुआ था। तब सबको लगा था कि हां कुछ चोरी हो गया। ऐसा होना नहीं चाहिये था। कैसे कोई फोन चोरी कर सकता है। जेब से निकाल कैसे लिया फोन। ब्ला ब्ला…तब घर वालों ने बड़ी जिज्ञासा दिखाई थी फोन चोरी होने की घटना के बारे में। घर में पहला फोन जो चोरी हुआ था। मुझे भी सदमा सा लगा था। READ MORE

और तीन की टिकट नहीं रही…….

November 5, 2009 // 0 Comments

दिल्ली की बसों में एक और बड़ा दर्दनाक वाकया हुआ। बड़े अफसोस के साथ कहना पड़ रहा है कि इस हादसे में 3 रुपये की टिकट नहीं रही । दिल्ली में बसों के किराये बढ़ गये। पांच का टिकट दस का हो गया और दस का पन्द्रह में बदल गया। सात की बिसात भी अब नहीं रही। इस घटना का सीधा असर यहां ब्लाग पढ़ रहे आप हम लोगों में से बहुत कम पर होगा। हमें शायद ये घटना बहुत दर्दनाक ना लगे। पर बस में चढ़ने वाला एक बड़ा तबका READ MORE

ईद मुबारक…..

September 21, 2009 // 4 Comments

हम ईदगाह पढ़ते बड़े हुए। और जब जब हामिद के चिमटे ने उसकी दादी की आंखें को खुशी से सराबोर कर दिया हमें लगा कि ईद आ गई। और आज फिर जब ईद आई है हमें हामिद की दादी याद हो आई है। उसी चिमटे उन्हीं खुशी भरे आंसुवों के साथ। जामिया में पढ़ते उसे समझते मुझे पांच साल हो आये हैं। पर जामिया को मैने कभी उस रुप नहीं समझा जिस रुप में मीडिया अक्सर हमें समझाता रहा है। मुझे जब जब मोहन चंद्र शर्मा से हमदर्दी READ MORE

भीड़ भरी बस और वो

September 11, 2009 // 6 Comments

दिल्ली की भीड़ भरी बसों में रोज कई वाकये होते हैं। मसलन मोबाईल या पर्स चोरी हो जाना। पर इन वाकयों को अंजाम देने वाले लोग ये काम चोरी छिपे करते हैं। उन्हें किसी का डर होता है। यह किसी शायद प्रशासन होता है, माने पुलिसिया डंडा और मार। पर जो वाकया आज हुआ उसे उदेखकर लगता है इस किसी का डर अब किसी को नहीं रह गया है। खासकर उनको जिन्होंने शायद हर किसी को अपनी मुट्ठी में कर लिया है। किसी को ताकत READ MORE

एक कहानी सा कुछ

September 9, 2009 // 3 Comments

सड़क पर बसें रफ्तार से आ जा रही हैं। बस स्टॉप पर भीड़ तिलचट्टों के झुंड सी बिखरी है। एक बस आती है। रुकती है और उस पर लोग टूट पड़ते हैं। जैसे जल्दबाजी एक जरुरत हो जिसके पूरा न होने पर सम्भवतह जिन्दगी थम सी जाएगी। लोग इस भीड़ में खुद को सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण और हर किसी को निहायत तुच्छ मानते हुए किसी तरह बस में अपने लिए जगह बना लेना चाहते हैं। खींचातानी-धक्कामुक्की जगह बना लेने की इस READ MORE

नुक्कड़ नाटक के बाद एक और नाटक

April 25, 2009 // 5 Comments

समलैंगिकता को कितना सही कहा-ठहराया जाय ये मुददा अलग बहस का हो सकता है लेकिन हमारे समाज में समलैंगिकों के साथ होने वाला व्यवहार कतई सही नहीं ठहराया जा सकता। हाल ही में जामिया के एमसीआरसी के मासकाम्यूनिकेषन कर रहे छात्रों ने समलैंगिकता पर एक नुक्कड़ नाटक किया। पूरा नाटक इन छात्रों द्वारा लिखा और कोरियोग्राफ किया गया। बाकायदा ये पूरा नाटक टीचिंग स्टाफ के संरक्षण और दिशा निर्देशन READ MORE

एक और भड़ास जैसा कुछ

March 20, 2009 // 3 Comments

हम एक ऐसी लोकतांत्रिक व्यवस्था में जी रहे हैं जहां पे आपको बोलने सुनने और यहां तक कि सोचने के लिए भी एक दायरा तय कर लेना होता है। क्या सोचें क्या कहें और क्या करें इस सब के इर्द गिर्द एक बड़ी लोहे की कांटेदार जंजीर लिपटी हुई है। एक छोटी सी भूल उस जंजीर को आपके मांसल शारीर के खून का प्यासा बना सकती है। और फिर एक दर्द आपके इर्द गिर्द किसी साये की तरह मडराने को बेताब खड़ा हो जायेगा। फिर आप READ MORE

ये शहर इस मौत का जिम्मेदार है

March 16, 2009 // 5 Comments

तस्वीरें यहां से हटा दी गई हैं। एक नजदीकी दोस्त की इस सलाह पर कि तस्वीरें यहां पोस्ट करना भी अपने में एक संवेदनहीनता है। हांलाकि मैं अभी उहापोह की स्तिथि में हूं कि क्या वाकई इस मुत लड़के की तस्वीरों को यहां छापना एक असंवेदनशील व्यवहार है कि नहीं। या फिर एक कड़वी सच्चाई को उसके भौंडे ही सही लेकिन वास्तविक रुप में दिखाना यदि कुछ लोंगों काी सेवेदनाओं को जगा सके तो क्या इस सोच से छापी गई READ MORE

होली है तो पर यहां कहां

March 9, 2009 // 2 Comments

कल होली है तो पर होने जैसा कुछ नजर नहीं आया अब तक। हर त्यौहार की तरह इस होली में फिर घर की याद हो आयी है। घर जाने का मन तो था पर जाना हो नही पाया। कारण वही एकैडमिक प्रेशर। खैर घर यानी गंगोलीहाट में होली के अपने अलग रंग हैं। वहां आज भी होली पारम्परिक तरीके से मनायी जा रही है। वहां की होली की खास बात है कि उसमें रंग भी है ता साफ सुथरे। वहां कोई हुडदंग जैसी चीजें नही हैं। औरतों की अपनी अलग READ MORE

यमुना किनारे विचरने के बहाने

February 2, 2009 // 1 Comment

नदियां हमेशा उस जगह को एक संस्कृति देती हैं जहां वो बह रही होती हैं। नदियों के साथ एक पूरा जीवन और उस जीवन के बरक्स लोगों की दैनिक जीवनचर्या भी नदियों से जुड़ जाती है। चाहे वो बनारस या हरिद्वार के घाट हों या किसी छोटे से गांव के किनारे बह रही अनजान से नाम वाली नदी के किनारे, नदी होने से उनका होना कुछ अलग ही अहमियत से सराबोर हो जाता है। उन घाटों, उन किनारों में होने वाली चहल पहल की वजह वो READ MORE

इसे कहते हैं जीवटता

January 24, 2009 // 5 Comments

उसकी उम्र 76 वर्ष से ज्यादा हो गई है। चेहरे पर उगी बेतरतीब दाड़ी के बीच बुढ़ापे की कमजारी को साफ देखा जा सकता है। लेकिन उसके अन्दर ऐसा क्या है जो उसे इस तरह के कदम उठाने पर मजबूर कर रहा है। ऐसी कौन सी पीड़ा है कि वो सख्स इन दिनों दिल्ली में बिड़ला मन्दिर के पास हिन्दु महासभा भवन परिसर में धरने पर बैठा हुआ है। आज दसवां दिन है। जीडी अग्रवाल नाम के यह वयोवृद्ध व्यक्ति गंगा को बचाये जाने की मांग READ MORE

फिरकापरस्ती के खिलाफ सहमत जामिया में

January 23, 2009 // 3 Comments

इन दिनों जामिया में सफदर हाशमी की याद में एक चित्र प्रदर्शनी लगी हुई है। यह प्रदर्शनी सांस्कृतिक संस्था सहमत के द्वारा आयोजित की गई है। जामिया के एक सोफिस्टिकेटेड फूड कोर्ट यूथ कैफे के पास बने एक नवनिर्मित प्रदर्शनी हाल में एक महीने के लिए लगी यह प्रदर्शनी कई मायनों में देखने लायक है। जब यह हाल बन रहा था तो लगा था कि यहां पर एक और फूड कोर्ट बनेगा लेकिन ऐसा नहीं हुआ। यह सचमुच बड़ी READ MORE

मीडिया के छात्रों के बारें में

January 9, 2009 // 0 Comments

मीडिया से जुड़े विषयों की पढ़ाई कर रहे छात्रों के बीच हमेशा कुछ कहने की, अपने समाज के मुददों पर बात रखने की एक ललक अन्दर से होती है। नहीं होती तो होनी ही चाहिये, ऐसा मेरा मानना है। दिल्ली आने के बाद पत्रकारिता या जनसंचार से जुड़े कुछ महत्वाकांक्षी छात्रों से मुलाकात हुई। उनमें कुछ कहने और छपने छपाने की गजब की ललक थी। हांलाकि तीन सालों में उनकी छपने छपाने और कुछ कर गुजरने की ललक तो बनी READ MORE

समय का कैक्टस और कमल का फूल

December 10, 2008 // 2 Comments

कई बार ना जाने क्यों लगता है कि इस शहर में एक बंजर सी उदासी भरी पडी है। और जब जब ये लगता है तो महसूस होता है कि मैं कहीं का नहीं रह गया हूं। इस शोर मचाती दिल्ली में कहीं भीतर एक अजीब सी खामोशी पसरती चली जाती है। सब कुछ एक मशीनी अन्दाज में चला जा रहा है। जैसे किसी खांचे में फिट कर दिया गया हो। एक अजीब सा परायापन किसी अदृश्य गुबार की शक्ल में दिमाग के पुर्जों के बीच गर्द सा चस्पा हो गया है। READ MORE