ताज़ा रेजगारी

डौक्यूमेंटी फिल्म

देश की राजधानी में नींद भी है एक सपना

November 14, 2015 // 0 Comments

नोट: लेख मूलतः नवभारत टाइम्स के लिए लिखा गया है और  14 नवम्बर 2015 के सम्पादकीय पृष्ठ पर प्रकाशित हो चुका है. दिल्ली में जिन सड़कों, फ़्लाइओवरों, से आप गुजरते हैं उनके आस-पास रात के वक्त ऐसे लोगों की दुनिया बस जाती जिनकी ज़िंदगी का सबसे बड़ा सपना है – नींद. उस शहर में जहां रियल एस्टेट का बाज़ार अपने बूम पर हो, तीन कमरों और एक छत के लिए जहां लोग करोड़ रूपये तक खर्च कर देने की हैसियत रखते हों वहां एक READ MORE

ये ‘निर्णय’ आखिर किसका है ?

April 28, 2015 // 0 Comments

पुष्पा रावत कैमरा लेकर निकलती है निम्न मध्यवर्गीय परिवार की युवा लड़कियों की उन इच्छाओं की खोज में जिन्हें रोजमर्रा की जिन्दगी जीते हुए उनके चेहरे, उनके व्यवहार में खोज पाना मुश्किल है। वो इच्छाएं या तो धीरे धीरे मर रही हैं या फिर उन पर थोप दी गई जिम्मेदारियों के मलवे में इतनी नीचे दबी हुई हैं कि कई बार ये इलहाम तक हो जाता है कि वो हैं भी या नही। उस कमरे में जिसकी दीवार का रंग एकदम READ MORE

क्या इन्द्रधनुष एक सच है

December 19, 2014 // 0 Comments

“ये“ लोग 2021 तक पूरे देश को हिन्दू बना देने की बात करते हैं। और सरहद पार से “वो“ लोग चाहते हैं कि पाकिस्तान के बाद भारत में इस्लाम अपनी परवाज़ भरने लगे। ये पहचान के कुछ चैखटे हैं जिनमें कट्टरपंथी अपनी-अपनी मजऱ्ी के मुताबिक आपको और हमें फिट कर देना चाहते हैं। पहचानों की इस रणभूमि में जो ताकतवर है उसकी आवाज़ें अखबारों, समाचार पत्रों और यहां तक कि सोशियल मीडिया में सुखिर्यां बटोर लेती READ MORE

शुरुआत ‘मासिक धर्म’ की या गुलामी की ?

March 9, 2014 // 0 Comments

महिला दिवस का दिन। रात के तकरीबन दस बज रहे थे। दिल्ली के जेएनयू के माही मांडवी छात्रावास के लॉन में अभी-अभी पत्रकार प्रेक्षिस नाम के समूह द्वारा रोहित जोशी के सम्पादन में निकाली गई पुस्तक उम्मीदों की निर्भयाएं का लोकार्पण हुआ था। ये पुस्तक 16 दिसम्बर को हुई बलात्कार की घटना के बाद बलात्कार और उससे जुड़े विषयों पर हुए विमर्शों पर छपे लेखों का एक ज़रुरी संकलन है। मौजूदा समय में READ MORE

कहीं आप भी नीरो के मेहमान तो नहीं हैं

June 13, 2013 // 0 Comments

नोट: मेरा यह लेख साप्ताहिक समाचार पत्र गाँव कनेक्शन में प्रकाशित हो चुका है। रोम में एक शासक हुआ करता था- नीरो। एक ऐसा शासक जिसके शासनकाल में लगी आग की लपटें आज तक इतिहास के पन्नों को झुलसाती हैं। जब भी उन लपटों की बात होती है तो घोर जनता विरोधी शाषन की तस्वीरें उभरकर सामने आ जाती हैं, कुछ कुछ वही होता है जब भारत में पिछले सालों में हुई किसानों की आत्महत्याओं की बात होती है। किसानों की READ MORE

पावन पत्नियों का कलुषित सच

September 18, 2010 // 1 Comment

हाल ही में रितेश शर्मा की एक डाक्यूमेंट्री फिल्म दिल्ली में प्रदर्शित की गई जिसमें देवदासी प्रथा जैसी ऐसी कुरीति पर सवाल उठाये गये जिसपर मेनस्ट्रीम मीडिया में आजकल मुश्किल से कोई बहस हो रही है। द होली वाईव्स नाम से बनी यह फिल्म बताती है किस तरह इस दौर में महिला अधिकारों को लेकर हल्ला मचाया गया, घरेलूं हिंसा विरोध्ाी कानून बने और महिला अधिकारों पर कई बहसें हुई लेकिन इसके बावजूद READ MORE

लाशों से कफन बीनने वालों पर बनी फिल्म को नेश्नल अवार्ड

January 26, 2010 // 2 Comments

  जामिया के मासकम्यूनिकेशन रिसर्च सेन्टर में साउन्ड के लेक्चरार मतीन अहमद को फिल्म चिल्ड्रन आफ पायर की साउन्ड डिजाईनिंग के लिये इस बार का नेश्नल अवार्ड दिया जा रहा है। ये फिल्म वाराणसी के उन 6 बच्चों की कहानी है जो मरघटों पर जलती हुई लाशों पर लिपटे हुए कफन बीनते हैं। कफन बीनकर या कभी कभी चुरा और छीनकर अपनी जिन्दगी जीने वाले इन बच्चों का जीवन कैसे बसर होता है चिल्ड्रन आफ पायर इसे READ MORE

लगत जोबनवा मा चोट को खोजती एक फिल्म

November 22, 2009 // 2 Comments

लगत जोबनुवा में चोट, फूल गेंदवा न मार। ये शब्द फिर गाये नहीं गये। ठुमरी के ये बोल कहीं खो गये होते।शब्द ही थे। खो जाते। अगर सबा उन्हें ढ़ूढ़ने की कोशिश नहीं करती। लेकिन सबा दीवान को न जाने क्या सूझी कि वो इन शब्दों को ढ़ूढ़ते ढूंढ़ते एक सिनेमाई सफर तय कर आई। उनकी डोक्यूमेंटी फिल्म द अदर सौंग दरअसल लगत जोबनुआ में चोट के लगत करेजवा में चोट बन जाने की यात्रा है। आंखिर क्यों जोबनुआ READ MORE

सुपरमैन आफ मालेगांव

October 29, 2009 // 2 Comments

वे फैज नहीं हैं फैजा हैं इसलिए उनका अंदाजे बयां अलहदा है। फैज शब्दों से अपनी बात कहते थे फैजा ने वृत्तचित्र के जरिये कही। और जो कही कमाल कही। किसी कविता सी दिल में उतर गई चित्रों के कई वृत्त सी बनाती जैसे नदी के शान्त प्रवाह में कंकड़ को हल्के धकेल दिया हो। फैजा अहमद खान आरै कुहू तनवीर की फिल्म सुपरमैन आफ मालेगांव एक डाक्यूमेंटी फोर्म की फिल्म है। पूरी फिल्म एक फिल्म बनने की READ MORE

मैन विद मूवी कैमरा : कैमरा जब आंख बन जाता है

September 17, 2009 // 0 Comments

फिल्मों में रुचि रखने वाले लोगों के लिए मैन विद मूवी कैमरा एक कमाल की फिल्म है। जिस दौर में सिनेमा की शुरुआत होती है उस दौर में कैसे एक डाइरैक्ट हर सम्भव तकनीक अपनी फिल्म में प्रयोग कर लेता है और पूरी सफलता से, ये बात फिल्म देख लेने के बाद ही पता चलती है। 1929 में बनी ये डौक्यूमेंट्री फिल्म रसियन निर्देशक वर्तोव ने निर्देशित की। न फिल्म में कोई कहानी है, ना ही कोई निर्धारित पात्र साथ ही READ MORE