ताज़ा रेजगारी

डायरी

बाद बारिश के

June 21, 2015 // 0 Comments

फूल चादर की तरह लाल मिट्टी वाली उस कच्ची सड़क पर बिछे थे। रेंगती हुई चींटियां खुश थी कि बारिश के बाद ही सही उन्हें नयी सलवटें नसीब हुई. गिलहरियां आहटों का रास्ता काटती हुई सी फुदक कर कहीं दूर ओझल होती रही थी. मोर अपने पंख फैलाए धूप की अचकनें पहनकर जंगलों में खो रहे थे. दूर कहीं तितलियां भी थी जो टहनियों की पत्तियों से दोस्ती बढ़ाने में मशगूल थी. हवा आज देह को झुलसाने पर आमादा नहीं थी.. READ MORE

सुबह की सैर जैसे सपना हो गई हो

June 20, 2015 // 0 Comments

बाद बारिश के सुबह की सैर जैसे रात का सपना हो गई थी.. ज़मीन अभी भी नम थी.. जैसे कभी कभी उसकी आंखें हो जाया करती हैं उसकी याद में.. उतनी ही पाक-साफ़, उतनी ही मासूम.. ज़मीन पर बिखरे हुए फूलों को देखकर उसे लगा कि उसकी यादों का रंग शायद हल्का पीला होता होगा.. उसने गीली हो गई उस हरी बेंच पर बिखरी उन मासूम पंखुडि़यों को गौर से देखा.. उनके बिखरने में खूबसूरती तो थी पर उस खूबसूरती के पीछे एक टूटना रहा READ MORE

राहे सुखन है संजय वन

April 23, 2015 // 0 Comments

उस जंगल की परिधि से लगी छोटी-बड़ी इमारतें ऐसी लग रही थी जैसे किसी शांत सी झील को कंटीले तार-बाढ़ से घेर दिया गया हो. जैसे पूरा शहर धीरे धीरे इस जंगल को अपने चंगुल में घेर रहा हो..लील जाने के लिए और हज़ारों पेड़ इस घेरे में सिमटे हुए अपने बचे रहने के लिए जी-तोड़ संघर्ष में लगे हों. कुछ देर यूं ही मचान के पास ही के उस मखमली घास के मैदान में लेटे रहे. आसमान से गिरती धूप को चेहरे पर पड़ने से बचाने के लिए READ MORE

वक्त की उंगलियों में नाचती है ज़िंदगी की कठपुतली

August 27, 2014 // 0 Comments

रात का तकरीबन नौ बज रहा था। संगीत नाटक अकादमी से बाहर निकला ही था कि मेनरोड पर एक रिक्शेवाले को अपने रिक्शे पर कपड़ा मारते हुए देखा। पूछा कि क्या वो अम्बेडकर पार्क की तरफ जाएगा? मुझे इसी ओर आना था। रिक्शेवाले ने मना कर दिया। तभी पीछे एक शख्स को साईकिल के खड़ा पाया। वो शख्स अपनी साईकिल रोक के मेरी ओर देख रहा था। मेरे मुड़ने पर तकरीबन 40-45 साल के उस आदमी ने कहा कि ”मैं भी चारबाग की तरफ जा READ MORE

मैगी बनाने में १० मिनट पर सेक्स ‘टू मिनट नूडल्स’ की तरह क्यूं ?

August 24, 2014 // 0 Comments

Lucknow Diary (नोट : डायरी करीब २ साल  पुरानी है पर गुल्लक में पहली बार छप रही है ताकि आगे के लिए सहेजी जा सके) सेक्स सोसाईटी एन्ड शी…. लखनऊ में इस नाम से कोई थियेटर शो है, पहले तो ये जानकर ही जरा आश्चर्य हुआ। साथी गौरव मस्तो स्रीवास्तव निमंत्रण पत्र देके गये थे। लखनऊ में थियेटर देखने का पहला अवसर था ये इसलिये उत्साह भी बहुत था। संगीत नाटक अकादमी पहुंचे तो वहां पहले से भोजपुरी महोत्सव के रंग READ MORE

‘एक सौ दर्द जले जब दिल में, एक नज़्म का जन्म हुआ’

April 14, 2014 // 0 Comments

गुलज़ार  साहब को दादा साहेब फाल्के पुरस्कार मिलने की बधाई देते हुए मोहल्ला लाइव पर छपने वाली अपनी ‘मुंबई डायरी’ में से एक दिन जो गुलज़ार के नाम है, ‘गुल्लक’ पढने वालों के लिए भी .. गुलज़ार। ये नाम मेरे लिये उन शुरुआती साहित्यिक सुविधाओं में से था जो मुझे अपने छोटे से कस्बे गंगोलीहाट में रहने के दिनों में ही मिल गई थी। पुखराज, त्रिवेणी और रात पस्मिने की, ये तीन किताबें ऐसी थी जिनके READ MORE

चुनावी दिल्ली में एक बीमार सा दिन

April 8, 2014 // 0 Comments

 सीने में इन दिनों कभी कभी तेज़ दर्द होता है.. लगता है की पेट के अन्दर कोई जा बैठा है जो कभी कभी फेफड़ों को जोर से पकड़ लेता है और निचोड़ने लगता है.. घर के बाहर टूटी-फूटी सड़कों में बहुत सारी धूल है और पास में एक प्राइवेट अस्पताल.. हरे रंग के शीशे से बना बड़ा सा अस्पताल.. मैं अन्दर जाता हूं.. रिसेप्शन पर बैठी गाढ़ी लिप स्टिक वाली लडकी मुझसे तीन सौ रूपये यूं निकलवा लेती है जैसे मैंने उससे कभी उधार READ MORE

जेएनयू की होली – 5 अनुभव

March 18, 2014 // 0 Comments

तो इस बार की होली जेएनयू में खेली। बाबा गंगनाथ मार्ग से जेएनयू के गेट की तरफ बड़ते ही माहौल एकदम बदल सा जाता है। जेएनयू कैम्पस के भीतर रंग जैसे इन्सानों के शरीरों पर झूलते हुए नज़र आते हैं। कई तरह के रंग और उसमें सबसे गहरा रंग खुशी का। होली है हुड़दंग नहीं जेएनयू के मेन गेट से अन्दर आते हुए सैकड़ों रंगे-पुते लड़के लड़कियों का हुजूम देखके ऑटो वाला ज़रा डर रहा था। “भैया चिन्ता मत करो। READ MORE

ये शहर इस मौत का जिम्मेदार है

March 16, 2009 // 5 Comments

तस्वीरें यहां से हटा दी गई हैं। एक नजदीकी दोस्त की इस सलाह पर कि तस्वीरें यहां पोस्ट करना भी अपने में एक संवेदनहीनता है। हांलाकि मैं अभी उहापोह की स्तिथि में हूं कि क्या वाकई इस मुत लड़के की तस्वीरों को यहां छापना एक असंवेदनशील व्यवहार है कि नहीं। या फिर एक कड़वी सच्चाई को उसके भौंडे ही सही लेकिन वास्तविक रुप में दिखाना यदि कुछ लोंगों काी सेवेदनाओं को जगा सके तो क्या इस सोच से छापी गई READ MORE

यमुना किनारे विचरने के बहाने

February 2, 2009 // 1 Comment

नदियां हमेशा उस जगह को एक संस्कृति देती हैं जहां वो बह रही होती हैं। नदियों के साथ एक पूरा जीवन और उस जीवन के बरक्स लोगों की दैनिक जीवनचर्या भी नदियों से जुड़ जाती है। चाहे वो बनारस या हरिद्वार के घाट हों या किसी छोटे से गांव के किनारे बह रही अनजान से नाम वाली नदी के किनारे, नदी होने से उनका होना कुछ अलग ही अहमियत से सराबोर हो जाता है। उन घाटों, उन किनारों में होने वाली चहल पहल की वजह वो READ MORE

समय का कैक्टस और कमल का फूल

December 10, 2008 // 2 Comments

कई बार ना जाने क्यों लगता है कि इस शहर में एक बंजर सी उदासी भरी पडी है। और जब जब ये लगता है तो महसूस होता है कि मैं कहीं का नहीं रह गया हूं। इस शोर मचाती दिल्ली में कहीं भीतर एक अजीब सी खामोशी पसरती चली जाती है। सब कुछ एक मशीनी अन्दाज में चला जा रहा है। जैसे किसी खांचे में फिट कर दिया गया हो। एक अजीब सा परायापन किसी अदृश्य गुबार की शक्ल में दिमाग के पुर्जों के बीच गर्द सा चस्पा हो गया है। READ MORE