ताज़ा रेजगारी

ग़ज़ल जैसा कुछ

पर तेरा मुस्काना भर कितनों का रोशनदान हुआ

June 17, 2017 // 0 Comments

तेरे बाद ज़माना ये कुछ इस तरह हलकान हुआ दिल्ली तेरी याद में रोई मुंबई तक वीरान हुआ   तेरे हिज़्र के कई दिनों तक यही समझना मुश्किल था शहर हुआ या क़त्ल हुए अरमानों का शमशान हुआ   तूने अपनी एक नज़र से कितने ही दिल ढहा दिए हाय तेरा ये हुस्न ओ ज़ालिम, हुस्न हुआ-तूफ़ान हुआ   ख़ुद को शायर कहने वाले तेरे इश्क़ में ख़ाक हुए उनका तुझपर लिखना भी जैसे तेरा एहसान हुआ   तू तो नहीं आई पर अक्सर आती READ MORE

वो घर मेरा ही था जहां रहता नहीं था मैं

August 1, 2016 // 0 Comments

जिसपे निगाह ठहरे वो शफहा नहीं था मैं एक हर्फ़ था, खुद भी जिसे पढ़ता नहीं था मैं होती किसे आखिर मेरे होने की ज़रुरत अपनी ही ज़रुरत का सामां नहीं था मैं खुदको कभी तफसील से जाना नहीं मैंने जाने कि क्या-क्या था और क्या नहीं था मैं मुझको मेरी सांसों की सदा शोर सी लगी बेइंतहा तनहाई थी, तनहा नहीं था मैं लोगों के साथ रास्ते भी भाग रहे थे कबसे खड़ा था फिर भी ठहरा नहीं था मैं दहलीज़ उसकी छूंके कई बार मैं READ MORE

ख़ुद से वादा था पुराना जो निभाया मैंने

May 18, 2016 // 0 Comments

एक झूठा ही सही ख़्वाब सजाया मैंने तुझे अलसुबह अपने पास में पाया मैंने   मेरे जानिब मुझे जो भी मिला बेचेहरा उसके सांचे पे तेरा नक्श बनाया मैंने   तू नहीं थी, मगर उसमें थी महक तेरी हाय क्या सूंघ लिया है ये खुदाया मैंने   तेरे आने का ये जो शोर है, अफवाह है ये अपनी तन्हाई को इक दिन ये बताया मैंने   न तुझे जाने से रोका, न बुलाया वापस न इस बात पे अफ़सोस जताया मैंने   अपनी उम्मीद का घोंटा गला फिर READ MORE

उस बच्चे के होंठ में पालथी मार के बैठी थी पागल

May 1, 2016 // 0 Comments

खिड़की पर परदे और दरवाजों पे रहती है सांकल फिर जाने किस रस्ते से दबे पांव वो गई निकल सड़कों, चौराहों, बाज़ारो, घर से, दफ्तर से गायब दिल से, बातों से, चेहरे से, होंठो से भी गई फिसल इसका, उसका, सबका, चेहरा मुरझाया सा लगा मुझे कुछ तो था जो सबके अन्दर धीरे-धीरे गया बदल जब फुर्सत के दिन थे तो चौखट पे ही दिख जाती थी ‘खुशी’ नाम की वो चिड़िया ना जाने कहां हुई ओझल दिन भर भाग दौड़ कर जाने कहां-कहां खोजी READ MORE

बैठ के बालकनी में मौसम गाये एक ग़ज़ल

April 7, 2016 // 0 Comments

जीने का ढब कुछ दिन को इतना आवारा हो अजनबी पहाड़ी रस्ता हो, पानी का धारा हो वक्त नदी की लहरों में कुछ देर ठहर जाए डूब रही उम्मीदों को तिनके का सहारा हो जल्दीबाजी, शोर-शराबा सबकी छुट्टी कर खुला हुआ आकाश हो और एक टूटता तारा हो रुपया-पैसा, बटुवा, सबकुछ एक किनारे रख मनमर्जी के सिक्कों से जीवन का गुज़ारा हों तितली आँख मिचोली खेले हवा के आंगन में दूर कहीं मीठी लय में बजता इकतारा हो बैठ के बालकनी READ MORE

ये ‘जेएनयू’ तो एक ऐसा शज़र है

February 15, 2016 // 0 Comments

#StandWithJNU अभी माहौल कुछ बिगड़ा इधर है मगर मुंह खोलना ही पेशतर है अभी चुप रहने का मंजर नहीं है सुनो यह बात मेरी मुख़्तसर है मैं तुमको अहतियातन कह रहा हूं नहीं आसान आगे का सफ़र है बताओ चोट कैसे ठीक होगी वो देता ज़ख्म है, पर चारागर है नया पन्ना पलटना चाहता हूं मगर वो फाड़ देंगे मुझको डर है हैं अब लफ़्ज़ों के मानी मुश्किलों में समझने का कहां उनमें सबर है किताबों से डरे सब लोग हैं ये इल्म की बात इनपर READ MORE

अंधेरा, रोशनी से बात करता पाया गया

February 3, 2016 // 0 Comments

राह भर जितनी दूर मेरा-तेरा साया गया अंधेरा, रोशनी से बात करता पाया गया. दूर जाना ही मुकद्दर है हमारा शायद पास आकर एक दूजे को समझाया गया हवा को शक था तेरी और मेरी निगाहों में उसे अपनी जुदाई का यकीं दिलाया गया दिल ने तो खैर जो कहा सो कहा ज़हन ने जो कहा उस दिन उसे अपनाया गया वो आख़री आंसू था जिसे पोंछ दिया हर गिले-शिकवे को यूं भुलाया गया उस रोज फिर न मिलने का जो वादा किया उस वादे को ताउम्र फिर READ MORE

एक चुटकुला हंसी की कमी से मर गया

January 31, 2016 // 0 Comments

ये भीड़ से भरा शहर यूं अकेला कर गया एक चुटकुला हंसी की कमी से मर गया यहीं रहता था, मसखरा था एक कल से मिलता नहीं, जाने किधर गया तुमने देखा हो तो बता दो ना वो शायद मेरी खुशी लेकर गया सबके चेहरे क्यूं यहां बेरौनक हैं कौन बेनूर सबको यूं कर गया वो जिसे सब ढूंढने में हैं मसरूफ वो कहीं है ही नहीं कोई बताकर गया कपड़ों के सिवा कुछ नहीं बदला कबसे सुबह उठा, नहाया, और दफ्तर गया मैं शहर आया, रहा, आखिर में READ MORE

बंद दरवाज़े पे बस अखबार डलता रह गया

January 29, 2016 // 0 Comments

बेरंग सा एक दिन अपने रंग बदलता रह गया रोशनी में डूबकर सूरज पिघलता रह गया बिक रहा था यूं अकेलापन खुले बाज़ार में बिन खरीददारों के कारोबार चलता रह गया नीद को भी जागने की इस कदर लत लग गई ख़्वाब एक मायूस सा बैठा मचलता रह गया बंद कमरे में अकेले रोशनी घुटती रही एक कोने में दिया बेकार जलता रह गया जिस तरफ खिड़कियां खोली उस तरफ दीवार थी अलसुबह खिड़की का परदा आंख मलता रह गया पार्क की उस बेंच ने तापी READ MORE

बड़ा शायर था वो कुछ शेर लिखकर मर गया होगा

January 27, 2016 // 0 Comments

वो कुछ अलफ़ाज़ अपने नाम सबके कर गया होगा बड़ा शायर था वो कुछ शेर लिखकर मर गया होगा सभी मसरूफ रहते हैं कि इतना वक्त किसको है मुझे शक है कोई उसके जनाजे पर गया होगा किसी की शान में शायद कसीदे पढ़ नहीं पाया किसी के गाल पर शायद तमाचा कर गया होगा गरीबों के हुकूकों पर लिखा करता था वो अक्सर कोई उसकी गरीबी देखकर ही डर गया होगा न जाने क्यों कलम से उसकी, कुर्सी खौफ खाती थी उसे वो जूतियों की नोक पर रखकर READ MORE

सीख रहे हैं हम इस तरह शहर होना

January 25, 2016 // 0 Comments

धूप सेकना, बरसातों में तर होना बर्फ पड़े तो गरम-गरम बिस्तर होना मां का गरम पकौड़ी तलकर ले आना ‘गप्प’ मारकर दिन की गुजर-बसर होना अंगीठी में तपे कोयले सी एक शाम रात का खाना साथ में मिलजुल कर होना बंद कमरों ने सारे मौसम छीन लिए ऐसे ‘शिफ्टों’ में घर का दफ्तर होना अपने आज को टांक के वक्त की सूली पर                             चाहें जाने किस कल का बेहतर होना फुर्सत भी चिड़ियों जैसी लापता हुई सीख READ MORE

एक गिलहरी धूप के हाथ से बिस्किट छीन के भागी थी

October 24, 2015 // 0 Comments

उस दीवार पे खिड़की थी और खिड़की पर एक गोरैया बहुत दिनों से ढूंढ रहा हूं, वो तस्वीर मिलेगी क्या ? एक गिलहरी धूप के हाथ से बिस्किट छीन के भागी थी लौट के बरसों से ना आई, फिर से धूप खिलेगी क्या ? एक कटोरी खुशी रखी थी कबूतरों के चुगने को वक्त के पांव से छलक गई है, फिर से खुशी भरेगी क्या ? मां के हाथ में सलाइयों की चोचें अक्सर लड़ती थी यहां शहर में ठंड नहीं है, मां बनियान बिनेगी क्या ? ईद से पहले शबनम READ MORE

जो करके खोखला गया

August 10, 2015 // 0 Comments

मैं कुछ तलाशता तलाशता किधर चला गया जो साफ़-साफ़ दिख रहा था वो भी धुंधला गया जो सच था वो भी झूठ ही मिला तो तब बुरा लगा यकीन मानने का मेरा हौसला चला गया जो प्यास थी बुझी नहीं, न जाने किसकी प्यास थी सूखते गले में वो उदासिया पिला गया खुशी भी उम्र लेके आई बीतकर चली गई गया भी वो औ यूं कि हमको करके इत्तला गया न जाने किसको क्या मिला, न जाने किसका क्या गया कुछ तो ऐसा भर गया जो करके खोखला READ MORE

ये पैसा नहीं हो तो कितना सही हो

May 27, 2014 // 0 Comments

ये हर चीज़ बिकने के बाज़ार ज़ालिम ये सौदे, ये उनके खरीददार ज़ालिम बस इक चीज़ पर टिक गई है जो दुनिया यूं अनजाने में बिकता संसार ज़ालिम ऐसा नहीं हो तो कितना सही हो ये कागज़ जो सब कुछ ख़तम कर रहा है ये पैसा नहीं हो तो कितना सही हो खुशियों की होती अठन्नी, चवन्नी भरोसे पे चलती, नहीं पड़ती गिननी ये बटुए न होते, कटौती न होती ख्वाहिश की फेहरिश्त छोटी न होती ये खातों पे चलते घरबार ज़ालिम ये मर मर के जीना हर READ MORE

बादलों के पंख होते, बारिशों के पांव

May 22, 2014 // 0 Comments

काश कि ऐसा भी होता चैन का एक गाँव जिस तलक लेकर के जाती खुशी की एक नाव ज़िंदगी की कश्मकश की धूप से कुछ दूर नीद की पगडंडियों पर, ख़्वाब की एक छाँव सुबह के पर्वत के पीछे, शाम के कुछ पास चांद के झरने से बहती चांदनी की ठांव खिलखिलाती धूप की मासूम दुनिया में बादलों के पंख होते, बारिशों के पांव शहर से, बाज़ार से और शोरगुल से दूर चुप की धुन में बात करती नदी सा ठहराव काश कि ऐसा भी होता चैन का एक गाँव READ MORE

बिसराया गांव सोचता है, मैं भी तो कभी तो रखवाला था

May 18, 2014 // 0 Comments

फोटो : उमेश पन्त नदी किनारे एक घर था, जिसकी कुंडी पर ताला था एक टूटी सी छत थी जिसपर, खालीपन का जाला था एक गाँव नाम की कविता थी, जो धीरे धीरे मिटती रही और दूर कहीं वीराने में एक सूरज डूबने वाला था पहले टूटे परिवार वहां, फिर बाखलिया वीरान हुई फिर वो दीवार भी दरक गई जिसने बरसों से संभाला था पाथर वाली काली छत पर भुट्टे के बीज उदास से थे आँगन में पडा सिल-बट्टा भी जैसे बस रोने वाला था शाम ढले उस READ MORE

कल को पकड़ कर बैठे रहना, यूं भी अच्छी बात नहीं

May 16, 2014 // 1 Comment

बुरे दिनों में साथ रहे जो, अच्छे दिन में साथ नहीं दुनिया ऐसे ही चलती है, चलिए कोई बात नहीं रिश्तों की दुनिया का भी एक अंक गणित सा होता है समीकरण के खेलों में चलते कोई जज़्बात नहीं दांयी तरफ से जितना हो, बांयी ओर भी वही रखो बिना आंकलन किये यहां, हल होते सवालात नहीं हम जब तक भी साथ रहे हमने बस दिल का कहा सुना वो भी दिल की बात सुनें, इतना भी वक्त इफरात नहीं कल जो हुआ सो हुआ यहां, खैर चलो अब जाने दो READ MORE

अपनी अलमारी में देखो मेरी नीद पड़ी होगी

May 2, 2014 // 0 Comments

नीले आसमान पर फिर से काले बादल छाए हैं किसी बात पर धूप की सूरत सुबह-सुबह उखड़ी होगी सूरज भी कल खफ़ा खफ़ा था तू कल रात उदास थी क्या ? या फिर तारों की टोली अंधेरे से झगड़े होगी बिना बताये एक दिन यूं ही मुझे छोड़ कर चली गई तेरे दरवाज़े के बाहर एक उम्मीद खड़ी होगी उस दिन मैंने ख्वाबों के संग तहें लगाकर रख्खी थी अपनी अलमारी में देखो मेरी नीद पड़ी होगी     READ MORE

उड़ती हुई पतंगें हिन्दू-मुस्लिम कैसे पहचानें

April 21, 2014 // 0 Comments

              बुझने से पहले हर लौ अक्सर लगती है इतराने                                                                                              बनते बनते रह जाते हैं यूं भी दुनिया में अफ़साने उंगली की स्याही का रंग, नीला होता है, लाल नहीं याद रहे ये आये हैं हमको बातों में उलझाने अब भी याद में ताज़ा है अप्पी की सेंवई का मीठापन होली में वो भी आई थी मेरे घर गुजिया खाने छत पर साथ खड़े होकर के  ढील दी हमने माझे में READ MORE

दो महीने की बातें

March 22, 2014 // 1 Comment

धरना-वर्ना, जंतर-मंतर, दिल्ली तक ही चलता है बाकी का सच गोली की बौछारों में छुप जाएगा जो छाती तान के सामने आएगा उसको मरना होगा जिसको जीना होगा वो हत्यारों में छुप जाएगा चौबीस घंटे खबर चलेगी अलग-अलग अल्फाजों में सड़कों पर जो खून बहा था नारों में छुप जाएगा सोमवार से शनिवार तक जमकर वाद-विवाद करो दो दो पैग लगाकर सब इतवारों में छुप जाएगा जो विरोध में मुह खोले उसको ‘अश्लील’ बता देना बाकी READ MORE

उनके काले सच

November 25, 2013 // 0 Comments

जनता को भरमाने वाले उनके काले सच कड़वे राज़ छुपाने वाले उनके काले सच झूठ की चादर तान के चैन से सोने वाले लोग सबकी नीद उड़ाने वाले उनके काले सच गलती करके वो कहते हैं बहक गए थे हम खुद को न्याय दिलाने वाले उनके काले सच अपनी धमक के आगे जो सबको बौना समझें दुनिया को धमकाने वाले उनके काले सच सत्ता को अलबत्ता मानें जो अपनी जागीर तर्कों को झुठलाने वाले उनके काले सच आदर्शों का झोला लेकर घूमा करते READ MORE

कुछ तो कहना था अलविदा ही सही

May 19, 2011 // 0 Comments

अब ये बेचैनी जाविदा ही सहीकुछ तो कहना था अलविदा ही सही यूं भी तो पास कभी आ न सकेअब ये दूरी ही सही हम जुदा जुदा ही सही कब तलक यूं किसी मजधार में बहते रहतेगमे साहिल ये तयशुदा ही सही अब ये किस्मत की लकीरें तो बदलने से रहीहम सवाली ही सही तुम खु़दा ख़ुदा ही READ MORE

आधी रही मुराद

March 20, 2011 // 0 Comments

आंखों के किसी बेहतरीन खाब सा थावो जो लमहा था लाजवाब सा था जबसे देखा उसी में डूब गयेउसका चेहरा किसी सुर्खाब सा था कैसे ना झुकते शान में उसकीउसका रुतबा जो था नवाब सा था उसने यूं तो कभी कुछ भी न कहावो न कहना भी आदाब सा था उनको लेकर हमारा इश्क जो थाकिसी आधी रही मुराद सा READ MORE

मेरी चाहत, तेरी रज़ा

March 20, 2011 // 0 Comments

वो तो जीने का एक नशा सा हैवरना जीना भी खामखा सा है मर मर के जी रहे हैं तेरी याद में परऐसे जीने में भी मज़ा सा है। तुझको देखा तो एक गुमां सा हुआमेरी सांसों में कुछ रुका सा है। मुझको मालूम है कि इश्क गलतफहमी हैएक मुगालता है यूं ही बेवजा सा है। कोई बारीक सा समन्दर हैये जो यादों का सिलसिला सा है लगता है शब औ रोज़ का रिश्तामेरी चाहत, तेरी रज़ा सा READ MORE

हमें मालूम इस दुनियां की सब बारीकियां भी थी

February 7, 2011 // 7 Comments

भूख की तड़पन भी थी और रोटियां भी थी पतन की खाईयां भी थी, विजय की चोटियां भी थी। जिसे था हौसला, चुनने का साहस था, चुनी उसने घने जंगल में संकरे रासते पगडंडियां भी थी। इतिहास कहता है यहां कितने उगे और कितने ही डूबे वक्त के आकाश में दिन रात की पाबंदियां भी थी। मुझे लगता रहा दुनिया में मैं सबसे अकेला हूं कि ऐसी ही शिकायत उनके दिल के दरमियां भी थी कि मैने जब भी भीतर झांक के खुद की तलाशी ली वहां READ MORE

तनहा कोने खाली से

February 5, 2011 // 1 Comment

टूटे टूटे बिखरे बिखरे तनहा कोने खाली सेदेखो कैसे डरे हुए हैं लमहों की बिकवाली से बिक जाती हैं बंटने वाली चीजें भी बाजारों मेंतभी तो धन्ना सेठ बने हैं जो थे लोग सवाली से। हमको खबर जो बेच रहा है भूख से होती मौतों कीवही है जिसने रोटी छीनी मरे हुए की थाली से। यह बाजार का गणित है भैया हंसना रोना क्या जानेप्यार के मीठे बोल यहां पर लगते गाली गाली से। कुरियर से घर में गुलदस्ता भिजवाने का फैशन READ MORE

पाबंदी

January 31, 2011 // 1 Comment

थोड़ी थोड़ी धूप संभाले रिमझिम सी बरसात भी होचुप्पी भी हो खामोशी भी थोड़ी थोड़ी बात भी हो टप टप की शहनाई गूंजे इन्द्रधनुश के रंगों मेंधूप की गलबहियां भी हों और ठिठुरन की सौगात भी हो कुछ ना हो और कुछ ना होना कुछ होने सा लगने लगेफुरसत वाली सुबह साथ हो खाली खाली रात भी हो। बाजारों का शोर शराबा लहरों में खो जाये कहींपैसे धूं धूं जलने लगें फिर कोई झंझावात न हो। वो शैतान सी जल्दीबाजी खाले READ MORE

कल

January 31, 2011 // 0 Comments

मैं भी था और तुम भी थी और वो निर्जन सी चुप्पी भीअच्छा होता गर वो खामोशी हमसे कुछ कहती तो यह सन्नाटा भी चुप होने की हद तक गहरा होताअगर तेरी आवाज हवा सी आस पास ना बहती तो तेरा कुछ ना कहना भी शायद मुझको अच्छा लगतातेरी आंखों में कुछ कहने की मंषा गर रहती तो।                                                       प्यार अनूठे पागलपन की एक निशानी बन जाताहम दोनों के बीच भरोसे की दीवार न ढहती तो। ना जाने READ MORE

कोशिश

January 31, 2011 // 0 Comments

ऐसी क्या मजबूरी थी इतना न हुआ कल आ जातेकल से फिर ना आओगे बस इतना ही बतला जाते। हमने समय को ऐसे तांका जैसे तुम्हारी आंखें होंपलों को पलकें मान रहे थे इस भ्रम को झुठला जाते। तुमको ही तुम माना होता ऐसा होता बेहतर थाहमको तोे तुम सा हि दिखा जिसको देखा आते जाते। सोये तो तुम आंखों में थी जगते भी कुछ ना बदलापरिवर्तन है नियम प्रकृति का खुद को कैसे समझाते। सुनो कि मैं जो कुछ कहता हूं कहो कि तुमने READ MORE

भोपाल का मृतलेख

January 24, 2011 // 0 Comments

आज फिर इन्साफ को मिट,टी में दफनाया गयाजमहूरियत की शक्ल का कंकाल फिर पाया गया। उनकी सियासत की जदों में कत्ल मानवता हुईकहके यही इन्साफ है फिर हमको भरमाया गया। जिस शख्स की गलती के कारण मिट गई जानें कईउसको बड़े आदर से उसके देश भिजवाया गया। आता  है अब भी ज़हन में बच्चा वो मिटटी में दबाअरसों से हर अखबार की सुर्खी में जो पाया गया। सालों से जो आंखें लगाये आस बैठी थी उन्हेंनृशंसता की हद का READ MORE