ताज़ा रेजगारी

कविता

फिर वही किंतु-परंतु

May 17, 2017 // 0 Comments

बहुत सारा किंतु-परंतु है जीवन में किंतु जब तुम पास होती हो तो सब ग़ायब हो जाता है   मैं बहुत पास से देखता हूँ तुम्हारी मुस्कान इतने पास से कि वो मुझे अपनी लगने लगती है मैं अपनी घबराहटों को महसूस करने लगता हूँ तुम्हारे भीतर और तुम्हारे भीतर का डर कभी-कभी कर देता है मेरे रोंगटे खड़े   किसी रात हम बहुत देर तक एक दूसरे में खोजते रहते हैं एक दूसरे को हमारे स्पर्श लाँघ जाते हैं निजता की READ MORE

यात्रा में होना

September 29, 2016 // 0 Comments

पहाड़ों की पगडंडियों पर चढ़ते हुए मैनें अपना पहना हुआ आलस उतारा और पहन ली कईयों की उतारी हुई थकान   कंकड़ों की चुभन पहनी तो उतार ली अपने तन की कोमलता अपने मन की कठोरता उतारने के बाद नदी की तरलता पहन ली   मेरे भीतर बहुत कुछ उबल रहा था जो मैंने धीरे-धीरे उतार लिया स्निग्धता से भरे हुए साफ़ सुथरी बर्फ के ग्लेशियर पर और पहन ली उसकी शीतलता   दुपहरी की धूप पहनकर मैं गला आया अपने भीतर के पत्थर READ MORE

रंगों के मसीहा इस होली, रंगने की समझदारी देना

March 23, 2016 // 0 Comments

रंगों के मसीहा इस होली रंगने की समझदारी देना जिसके छींटे सब तक पहुँचे इक ऐसी पिचकारी देना   उम्मीद  की खाली चादर में मुस्कान मरुनी रंग देना तकलीफ के काले रस्तों पर एक धूप गुलाबी संग देना   इस बार ‘अबीरी सुबहों’ में कुछ और करीबी बढ़ जाएं ताज़ी सी खुशी के गहरे रंग शिद्दत से सभी पर चढ जाएं   मेरे हिस्से का भी सूरज उगना होगा, उग जाएगा रंगों से भरा वो इन्द्रधनुष जब आएगा तब आएगा   मैं READ MORE

खोई हुई एक चीज़

July 6, 2014 // 0 Comments

कविता यहीं कहीं तो रख्खी थी दिल के पलंग पर यादों के सिरहाने के नीचे  शायद या फिर वक्त की जंग लगी अलमारी के ऊपर तनहाई की मेज पे या फिर उदासियों की मुड़ी तुड़ी चादर के नीचे ? यहीं कहीं तो रख्खी थी कुछ तो रखकर भूल गया हूं आंखिर क्या था ये भी याद नहीं आता कई दिनों से ढूंढ रहा हूं वो बेनाम सी ,बेरंग और बेशक्ल सी कोई चीज़ ऐसी चींजें खोकर वापस मिलती हैं क्या ? एक-दूजे की ज़िंदगी में हम दोनों भी ऐसी ही READ MORE

1411- बाघों के नाम

February 18, 2010 // 1 Comment

आज के दौर में जंगल उदास हैं और वो लड़की जो बाघ की खाल से बना फर पहनकर शीशे में देख मुस्कुरा रही है हमें जंगली सी दिखती है। पर ये उस दौर की बात है जब जंगल उतने जंगली नहीं थे न ही आदमी उतना शहरी। जब एक दहाड़ सुनाई देने पर अक्सर कहते थे गांव के लोग कि बाघ आ गया। हम सुनते थे अपने पापा से बाघ के किस्से कि कैसे उस रोज आया था बाघ हमारे शेरा को ले जाने और पापा ने किया था टौर्च लेकर पीछा हम आज तक पापा READ MORE