ताज़ा रेजगारी

कविताएँ

फिर वही किंतु-परंतु

May 17, 2017 // 0 Comments

बहुत सारा किंतु-परंतु है जीवन में किंतु जब तुम पास होती हो तो सब ग़ायब हो जाता है   मैं बहुत पास से देखता हूँ तुम्हारी मुस्कान इतने पास से कि वो मुझे अपनी लगने लगती है मैं अपनी घबराहटों को महसूस करने लगता हूँ तुम्हारे भीतर और तुम्हारे भीतर का डर कभी-कभी कर देता है मेरे रोंगटे खड़े   किसी रात हम बहुत देर तक एक दूसरे में खोजते रहते हैं एक दूसरे को हमारे स्पर्श लाँघ जाते हैं निजता की READ MORE

यात्रा में होना

September 29, 2016 // 0 Comments

पहाड़ों की पगडंडियों पर चढ़ते हुए मैनें अपना पहना हुआ आलस उतारा और पहन ली कईयों की उतारी हुई थकान   कंकड़ों की चुभन पहनी तो उतार ली अपने तन की कोमलता अपने मन की कठोरता उतारने के बाद नदी की तरलता पहन ली   मेरे भीतर बहुत कुछ उबल रहा था जो मैंने धीरे-धीरे उतार लिया स्निग्धता से भरे हुए साफ़ सुथरी बर्फ के ग्लेशियर पर और पहन ली उसकी शीतलता   दुपहरी की धूप पहनकर मैं गला आया अपने भीतर के पत्थर READ MORE

बेकायदे का प्यार

September 20, 2015 // 0 Comments

कभी कभी मन करता है सब यहां-वहां सा हो जाए तितर-बितर एकदम कुछ भी न रहे करीने से सुबह-दिन-शाम-रात बन जाए सुबह-रात-दिन-शाम या फिर दिन-सुबह-रात-शाम सर्दियों के बीच गर्मियां होने लगें बारिशें धूप के ऊपर गिरने लगें टप-टप बोलना सुनाई देने का मोहताज न रहे शहर में गाड़ियों की जगह गाय-बकरियां तैरने लगें पंखों की मशीनी कर्कश आवाज़ को निचोड़ने पर बाल्टी में भरने लगे ग़ुलाम अली की ग़ज़ल आकाश आर्ट बुक हो READ MORE

ये नगरिया ‘पहले आप’ की, ‘जनाब’ की है

July 29, 2014 // 0 Comments

ये नगरिया ‘पहले आप’ की, ‘ज़नाब’ की है                                                                                                               यहां दूसरे की भी दुकान आपकी है ‘कड़ाई’ में है चिकन और ‘कढ़ाई’ में भी चिकन भई कुछ और बात टुंडे कबाब की है हर किसी को यहां ‘मज़ा आती’ है यहां बाग़ों के मजे़ लेते हाथी हैं मैं को हम और तू को आप कहते हैं सिम्पल सी बात भी ‘गज़ब’ हो जाती है. यहां READ MORE

खोई हुई एक चीज़

July 6, 2014 // 0 Comments

कविता यहीं कहीं तो रख्खी थी दिल के पलंग पर यादों के सिरहाने के नीचे  शायद या फिर वक्त की जंग लगी अलमारी के ऊपर तनहाई की मेज पे या फिर उदासियों की मुड़ी तुड़ी चादर के नीचे ? यहीं कहीं तो रख्खी थी कुछ तो रखकर भूल गया हूं आंखिर क्या था ये भी याद नहीं आता कई दिनों से ढूंढ रहा हूं वो बेनाम सी ,बेरंग और बेशक्ल सी कोई चीज़ ऐसी चींजें खोकर वापस मिलती हैं क्या ? एक-दूजे की ज़िंदगी में हम दोनों भी ऐसी ही READ MORE

नीद से जागा हुआ शब्द

June 24, 2014 // 1 Comment

एक दिन अचानक नीद से जागा एक सोया हुआ शब्द लेने लगा तेज़ तेज़ सासें और बिखरने लगे हवा में कई डरे हुए अक्षर उसने अभी अभी देखा था एक सपना जिसमें एक जंग खाती अल्मारी में बंद थी कई कहानियां जो वापस जाना चाहती थी अपनी अपनी किताबों में नौकरी नाम का वो हत्यारा जिसका वज़न पंद्रह  घंटे से भी ज्यादा था वक्त की छुरी से कर रहा था एक एक कहानी की हत्या कहानियां रोती, चीखती ,चिल्लाती तोड़ रही थी एक एक READ MORE

अगर क़ुतुब मीनार के पंख होते

April 13, 2014 // 1 Comment

फोटो: उमेश पन्त महरोली टर्मिनल से वो टूटी फूटी सड़क जाती है क़ुतुब मीनार की ओर ऐसे जैसे कोई गांव का बच्चा धूल-धूसरित कपड़े पहने जा रहा हो दिल्ली देखने अपने हाथ में पकड़े इतिहास की कोई फटी पुरानी किताब दूर आकाश में बहुत ऊंचाई से क़ुतुब मीनार देखती है उस उपेक्षित सड़क को जैसे नौकरी के लिए कहीं दूर रह रही मां अपनी आंखों में बना रही हो अपने बच्चे का काल्पनिक चित्र बिखरे हुए हैं चारों तरफ चुनावी READ MORE

देखकर भी न देखना

March 6, 2014 // 2 Comments

मैं अपने शरीर को जंग लगे पुर्जों में ढ़लता हुआ देखता हूं मैं खुद को उतना ही देखता हुआ देखता हूं जितना देखकर मुझे देखने से डर न लगे मैं अपनेआप को जंग में गोलियां खाते नहीं देखता भीड़ में लाठियां भांचते उस पुलिस वाले को नहीं देखता जो मुझे देखता हो बर्बर निगाह से ट्रेफिक वाले को रिश्वत लेता हुआ देखकर भी मैं देखता हूँ ऐसे जैसे मैंने कुछ न देखा हो मैं नदी देखता हूं, समुद्र देखता हूं, जंगल READ MORE

तुम आई हो

February 15, 2014 // 0 Comments

Photo: Umesh Pant जब जब  खुशी गीले कपड़ों की तरह लटकी हुई होती है उदासी की तार में  टपक रही होती हैं अकेलेपन की बूदें टप टप टप सूरज थका हारा सा बैठा रहता है कहीं दूर कई कई दिन  मन कर रहा होता है एक अदद धूप का इंतज़ार ऐसे में तुम्हारा आना उस धूप का आना है जो दिन-रात आ-जा सकती है बेरोक टोक तुम वो मौसम हो जिसके आते ही भाप हो जाती हैं अकेलेपन की बूदें आज फिर कई दिनों बाद गम के मैले कपड़े उतारकर साफ़ सुथरी खुशी READ MORE

समानार्थक शब्द

December 10, 2013 // 0 Comments

इस बेमायने से समय में हमने साथ रहकर खोजे कुछ शब्द जिनके अर्थ जानते हैं सिर्फ दो लोग तुम और मैं हमने तय किये बहुत से अल्प विराम. जो नहीं पहुचते किसी पूर्ण विराम तक.. हम बढते गए शब्द दर शब्द लिखते गए  ज़िन्दगी के पैराग्राफ समय के रूलदार पन्नों पर प्यार का अर्थ बस प्यार नहीं होता अक्षरशः प्यार की भाषा में नहीं होता कुछ भी तत्सम और तत्भव मैंने प्यार में सीखा है इतना  कि प्यार एक ऐसी भाषा है  READ MORE

आख़िरी कश

August 29, 2013 // 2 Comments

पलकों से लिया मैने तुम्हारे चेहरे का आख़िरी कश आंखों की ऐश ट्रे में अधबुझे से ख्वाब रह गये हैं बस। तुम ऐसी तलब हो जो कभी राख नहीं होती। अब सब कुछ धुंआ-धुंआ है तुम्हारे READ MORE

आंखिरी कश

August 29, 2013 // 2 Comments

पलकों से लिया मैने तुम्हारे चेहरे का आंखिरी कश आंखों की ऐश ट्रे में अधबुझे से ख्वाब रह गये हैं बस। तुम ऐसी तलब हो जो कभी राख नहीं होती। अब सब कुछ धुंआ-धुंआ है तुम्हारे READ MORE

ट्रेन के छूटने का वक्त

April 10, 2013 // 1 Comment

कुछ रिश्ते जैसे बहुत जल्दी बहुत पास आ जाते हैं आते हैं लेकर जरा सी फिक्र, जरा सा प्यार, जरा जरा अपनापन भी कुछ रिश्ते जैसे उन एक दिन के मेहमानों के से होते हैं जिनको छोड़ आते हैं हम स्टेशन जो चढ चुके होते हैं ट्रेन में जिनसे कह चुके होते हैं हम अलविदा ना चाहने के बावजूद हो चुका होता है जिनकी ट्रेन के छूटने का वक्त घुल जाता है हथेली की रेखाओं में कहीं जिनके हाथों का स्पर्श रह जाती है आंखो READ MORE

हर गली पर

April 8, 2013 // 0 Comments

सामने है एक विशाल इमारत लगी है जिसपर एशियन पेन्ट से सनी पत्थरों की मोटी चाहरदीवारी। ये मोटी दीवारें छिपा रही हैं नेपत्थ्य में छिपे मजदूरों के दर्द को। इन दीवारों के किनारे काटी गई सीढि़यों की कलात्मकता बता रही है कि काटा गया था यूं ही पैनी धार से मजदूरों के मेहनताने का एक बड़ा हिस्सा। इमारतों की खिड़कियों से झांकते हैं वे लोग जो बैठे हैं काटकर मेहनताने को अपने मजे से कटते समय की READ MORE

परसों रात की बात

March 14, 2013 // 1 Comment

फोटो: उमेश पंत मैने परसों रात अंधेरे को उलझते हुए देखा देखा उसे रोशनी से लड़ते हुए वो मिटा रहा था उजाले के हस्ताक्षर सुबह बस होने को थी और अंधेरा मानने को तैयार नहीं था इतनी उजली नहीं है दुनिया ये जो खामोश मुगालते हैं जिन्हें हम ‘सब बढि़या है’ कहकर पालते हैं वो सब कुपोषण के शिकार हैं उनके खून में बहता है एनीमिया आप किस दुनिया में रहते हैं मियां ?? अंधेरा बता रहा था उजाले को तुम्हारी READ MORE

अकेलापन

February 27, 2013 // 0 Comments

जैसे फुर्सत से की बिनाई का कोई धागा उधड़ गया हो, छूट गये हों फंदे।वक्त के खालीपन में, गुम गई हो सीकें ।पूरा होते होते अधूरा रह गया हो किसी के लिये रतजगे रखकर, प्यार के ऊन से बिना रिश्तों का स्वेटर । जैसे बिना हुआ सबकुछ हो गया हो बेमायने। रह गया हो धागाभर अकेलापन ऊन का एक गोला लुड़कता जा रहा हो किसी स्याह अनन्त अंधेरे की तरफ, छोड़ता जा रहा हो उलझते धागे, और कोई भी न हो जो उसे थामे और समेट ले READ MORE

ये जो संसद है, हद है

February 18, 2013 // 0 Comments

ये जो इंडिया हैबढि़या है एक ही कष्ट हैसब भ्रष्ट है भारतवासी हैसर्दी, खांसी है योजनाओं में मुद्रा हैइफरात है, खुदरा हैटनों टन हैआवंटन है ये जो कर्ता है, धर्ता हैजेबें भरता हैमुफत वोट लेता हैडाकू है, नेता है वो जो घिसता है, पिसता हैगुमनाम आदमीआलू से सस्ता हैआम आदमी ये जो काला धन है, मन हैटू इन वन है कोयला  है किसी पे,किसी पे चारा हैसब हैं अपराधी,सब पर धारा है कानून है, जेल है,सब फेल हैजेब READ MORE

एक मुठ्ठी फुर्सत

November 19, 2012 // 1 Comment

मशरूफियत की जेबों मेंसुबह सुबह यू ही तलाशी ली.टटोला तो निकल आई कुछ पुरानी चींजेंकुछ भीगे कागज उम्मीदों केकुछ रूखे छिलके सुकून केएक मुड़ा हुआ विजिटिंग कार्ड खुशी का(जिससे कभी मिलना ना हुआ)पुरानी डायरी के पन्ने पे लिखी ख्वाहिशों की एक फेहरिश्त( जिसकी स्याही पूरी तरह धुल चुकी थी अब)निकालकर फेंक दिया इन चीज़ों कोवक्त के पास रखे उस कूडेदान में.पर अब भी कुछ था जो बचा रह गया था. बरसों पहले READ MORE

तस्वीरें और दीवारें

October 23, 2012 // 0 Comments

वक्त के चौखटे में कहींपुरानी यादों की एक तस्वीर लटकी हुई थीअरसे से कुछ खटकता रहा था उसमेंकुछ तल्खियां थी शायदकई मर्तबा सोचा किउस तस्वीर को दीवार से उतार फेंकूंकई दफा कोशिश भी कीपर तस्वीर को न हटना था, न हटीबार बार हटाने पर भीकिसी काई सी उग आती थी कमज़र्फअब जाके समझ आया हैकि कुछ तस्वीरें वक्त की दीवार से नहीं हटतीकुछ दीवारों को वक्त की तस्वीर से हटाना होता READ MORE

गणपति बप्पा मोरिया……..

September 29, 2012 // 0 Comments

नेता ले गये लूट के दिल्लीदेश हमारा सोरियागणपति बप्पा मोरिया…….. जेबें हमरी खाली करकेभर गये अपनी बोरियांगणपति बप्पा मोरिया मंहंगा राशन, बिजली महंगीजीना मेहंगा होरियागणपति बप्पा मोरिया वालमार्ट का बोर्ड देखकेकल्लू बनिया रोरियागणपति बप्पा मोरिया कोल के घोल से लगे दाग कोएफडीआर्इ से धोरियागण्पति बप्पा मोरिया संसद भवन के पीछे मटरुसर पे मैला ढ़ोरियागणपति बप्पा मोरिया लोक READ MORE

खाली जगह

May 19, 2012 // 0 Comments

लाखों, करोड़ों में से,   किसी एक के कम होने से यूं तो फर्क नहीं पड़ना चाहिये फिर भी पड़ता है फर्क…. कुछ जो कम होकर छोड़ जाता है , कहीं किसी कोने में खाली जगह… जिसे न हवाएं भर सकती हैं, न यादें….. सम्भावनाओं के कुछ बुलबुले रह जाते हैं उस जगह, जो पैदा करते रहते हैं कई और बुलबुलों का भ्रम….. जिनके बनने और टूट जाने के बीच  वक्त के सिवा कुछ नहीं बदलता…. उस खाली जगह पर  एक अदृश्य सी कसर रह READ MORE

ख़बर दर ख़बर

April 5, 2012 // 1 Comment

टीवी पर आने वाली हर नई ख़बर के साथहमारी आत्माएं और भ्रष्ट होती जाएंगी। नीदों की आंखों में धूल झोंकता शहररोशनी बनकर हमारे अंधेरों में शामिल हो जाएगा। ग्ंधाते पसीनों की भीड़ मेंहमसे छीन लिये जाएंगे हमारे मोबाईल फोन। सरेबाज़ार सड़कों के बीच सेउठा ली जाएंगी हमारी खुशियां दिन दहाड़े। हमारी शिकायतों पर टलती रहेंगी कार्रवाईयां। हमारे इलाज के पैसे लूटकरबनाये जाते रहेंगे हाथी वाले READ MORE

शहर में लड़की

February 14, 2012 // 1 Comment

तमाम टीवी चैनलों पर कई लोग थे तुम नहीं थी… हर विषय पर बोल रहे थे लोग हो रही थी चर्चाएं ज़ोर ज़ोर से। पर कोई नहीं बोला तुम्हारे बारे में। मैं जानना चाहता था कहां हो तुम? देखना चाहता था तुम्हारी एक झलक, पर कोई कैमरा तुम पर फोकस नहीं हुआ। पेज थ्री की जगमग और स्टार की हाईप्रोफाईल कहानियों में तुम दिखती भी तो कैसे? तुम्हारी मलिनता कैमरे पे अच्छी नहीं लगती। वहां तो चढ़ती है कई परतें चेहरे READ MORE

‘आईस-पाईस’ और ‘धप्पी’

December 31, 2011 // 2 Comments

फिर पिट्ठी में बस्ता रखके,  इस्कूल को जाना मंगता है.बाजू में प्याज दबा करके,छुटटी का बहाना मंगता है….. बरसात में कीचड़ के उपर,फुटबाल खेलना मंगता है.साईकिल का टायर हाथों से,सड़कों पे ठेलना मंगता है… वो सात पत्थरों का टावर,कपड़े की बॉल से गिर जाना.गुडडू की छत पे फिर एक शाम,‘किंग-कौंग’ खेलना मंगता है… फिर से किरकेट का टूर्नामेंट,कस्बे में हंगामा कर दे.‘हिप हिप हुर्रे’… ‘हिप हिप READ MORE

दूर से आई है खबर कि वो शहर में है….

December 30, 2011 // 1 Comment

आज फिर खुला, कोई दरवाज़ा हैआज फिर से पुरानी यादें ताज़ा हैंआज फिर कोई हलचल है.. कहीं कुछ तो है खोल के फिर से खिड़कियां शायद भूल गयाहवा के रास्ते कोई तो चला आया हैमेरे कमरे में आज फिर घुली बेचैनी हैजाना पहचाना कोई अजनबी सा साया है… मुझसे कहता है नज़र फेर के बैठे रहनायाद मत करना, भुला देना, यही बेहतर हैअपने तकिये से रोक लेना, सांस मत लेना अपने सपनों को सुला देना, यही बेहतर हैऔर एक टीस भी देता READ MORE

ये हो न सका

December 21, 2011 // 1 Comment

मैं मिलना चाहता था तुमसेठीक उस वक्तजिसके लिये कोई गिनती न होन घंटा, न मिनट न सेकंडन सुबह, न शाम,न बारिश, न धूप, न वजह…… उजाले और अंधेरे के बीच तलाशना चाहता था वो वक्तजिसमें हम दोनो धुंधले से दिखते न पूरी तरह उजले… न पूरी तरह स्याह सुनना चाहता था वो आवाज़जो सुनाई देने और न देने के बीच की होतीन पूरी तरह सच… न पूरी तरह झूठ खोजना चाहता था एक जगहजहां समुद्र के उपर एक जंगल होतापहाड़ों के READ MORE

काश प्यार एक बच्चा होता।

August 14, 2011 // 2 Comments

काश प्यार एक बच्चा होता। छोटी छोटी बातों से नावाकिफ होतानादानी में कभी कभी कह जाता बातें बड़ी बड़ी।और पास में होती मांसुनती हंस देती खड़ी खड़ी।कितना अच्छा होता।काश प्यार एक बच्चा होता। उसे न पैसे से कोई मतलब होतासौ पचास के हरे नोट वह नहीं जानतापैसा उसके लिये होता एक चौकलेटजो लाते पापा रोज शाम।कुछ भी कह जाता जो मन में होताइतना सच्चा होता।काश प्यार एक बच्चा होता। अपनी साईकिल के READ MORE

खुशी की आदत…

June 13, 2011 // 1 Comment

ये अंधेरा कभी तोउस उजाले सा रहा होगातुम्हें जब कुछ नहीं दिखाबहुत कुछ हो रहा होगा बहुत थोड़ी सी बारिशथोड़ी सी बूंदेंज़मी पर अब भी बाकी हैंवो भीगा पत्ताशायद गर्द अपनी धो रहा होगा। कड़ी गर्मी मेंतुम्हारे घर पे अपना घर बनाते हैंके जब बरसात आती हैकबूतर लौट जाते हैंउन्हें मालूम हैकहीं कोई अंबर कुहासा खो रहा होगा यहां जब रात की कालिकमेरी आंखों में छाई थीअमावस पास आया थामुझे पूरा यकी READ MORE

बदलाव भी एक लहर है

May 27, 2011 // 0 Comments

बदलाव भी एक लहर हैबूंद बूंद, लमहा लमहा,तर बतर,भीगी भीगी,  बहती सी लहर…. और एक सूर्य है तपाता -जलाता सामुश्किलों का सूर्यऔर राहतों का एक चांद भी तो है……. दिन ब दिन तय है कि हमें बदलना होगावक्त की करवटों के साथ ढ़लना होगा जिन्दगी ऐसीजैसे किसी गाड़ी सेजा रहे हों किसी पहाड़ी सड़क परहरे पेड़, पीले पत्ते, बंजर खेत, टूटे मकानफूल, क्यारियां, झरने, नदीधूप, छांव, सुख और दुख पीछे छोड़ते हुएकिसी READ MORE

समुद्र के लिये

May 24, 2011 // 0 Comments

कैसे हो पाते हो अपनी नमकीनियत में भी इतने मीठे कैसे रोज तपने के बाद जल नहीं जाते बुझ ही नहीं जाते सूरज के साथ देखता हूं कई मर्तबा तुम्हें उफनते हुए तुम कुछ तो सोचते हो किसी के बारे में जानता हूं कि एक ज्वार है तुम्हारे भीतर सुनामी की भीषण सम्भावना लिये पर समझ नहीं पाया हूं आज तक कैसे रह पाते हो इतने शान्त और बांट पाते हो शान्ति को बिना भेदभाव के मैने भगवान के बारे में कुछ ऐसा ही सुना है READ MORE

वक्त होता है कतरनों की तरह

May 14, 2011 // 2 Comments

मैने कड़ियों को जोड़ना चाहा वो जो टूटी थी शायद समय की माला थी वो जो बिखरी तो जुड़ न पाई कभी। वक्त होता है कतरनों की तरह वो भी डरता है आंधियों से कहीं कोई आंधी उसे उड़ा ही न दे कोई पानी उसे गला ही न दे एक स्याही थी बड़ी गाढ़ी सी तूने मेरे समय पे पोती थी तबसे समय की वो कतरन दिल की अलमारियों में रक्खी है उसपे दो शब्द लिख नहीं पाया उसका कुछ और हो नहीं पाया मुझे हर बार यही लगता है अब वो किसी भी READ MORE

परायेपन की बू

May 5, 2011 // 0 Comments

यूं ही अकेले साहिल पे चलते चलतेएक नाव मिली थीलगा कि जैसे इतनी प्यारी चीजकभी देखी ही नहीं थीलगा कि जैसे कोई साथीदूर तलक अब संग चलेगा।पास गया और अपनी मरजी सेएक पतवार उठा लीकुछ आगे तक नाव चलाने कीकोशिश भी कीपर नाव वही रुकी ही रहीडगमग करती सी।नाव को देखाकोई कमी या मीनमेक कुछ भी न दिखातभी अचानक याद आयाएक चीज नहीं थीआसपास देखा जाकर साहिल पे तलाशातबसे अबतक रोज तलाशी लेता हूं साहिल READ MORE

एक लड़की जो आपकी प्रेमिका नहीं हो सकी

April 28, 2011 // 2 Comments

आपके लाख चाहने के बावजूदएक लड़की जो आपकी प्रेमिका नहीं हो सकीएक ऐसे सपने की तरह हैजिसे शायद आप कभी ठीक से नहीं देख पायेउस नीद की तरह जिसमें आप बेचैन थेउस चैन की तरह जो सबसे खूबसूरत थाएक यात्रा रास्ता भूली हुईएक गलती जो जानबूझ के की गईएक गीत जिसमें दर्द थाएक लहर जो कभी नहीं थमीएक  ट्रेन  जो दूर से आती दिखीपर आप तक कभी नहीं पहुंचीएक इत्मिनान जिसे आपने हर पल जियाएक दुखजिसे आप सांसों के READ MORE

चार छोटी कविताएं

April 21, 2011 // 0 Comments

सन्नाटे की मौत तुम न कहोमैं समझ न पांउं।कुढ़ता रहूं हमेशा।तुम भी रहो परेशान।रहे सदाअवान्छनीय मौन।बेहतर हैमौत जैसे सन्नाटै सेसन्नाटे की मौत।हम तुम तय कर लेंकब बोलना हैकहां चुप रहना है। सदा  सदा एक सदा आती हैसदा बहार है सदासदा डराती है।और वो रहते हैंसदा खौफजदा।चुप रहने की आदत ने ऐसी मौत दी हैवो जी भर के मरते हैं सदा सर्वदा। मंत्री जी का मैसेज  दिल्ली में प्लेन का रनवे हैदेहरादून READ MORE

शहर इतने खराब नहीं होते

April 11, 2011 // 3 Comments

अगर थोड़ा सा समय निकालकर गौर करेंतो ये कोई पत्थर पर लिखी लकीर नहीं हैकि शहर हमेशा खराब होता है।शहर में एक क्यारी हो सकती हैजहां जल्दबाजी की टहनियों में फुरसत के फूल होंऔटो के भागते मीटर मेंठहरी हुई उम्मीद हो सकती हैकिसी बाम्बे टाईम्स के चौथे पन्ने परखबर हो सकती है खुशी कीआठवें माले से नीचे झांक सकती है प्यार भरी नजरजो कूद सकती है आपकी आखों मेंऔर कर सकती है रोमांटिक गाने सुनने को READ MORE

इस बार परिंदे ने नसीहत दे दी

March 25, 2011 // 0 Comments

मेरे कमरे में कबूतर आयाअच्छा लगा किकोई तो है साथ मेरेबहुत देर से बैठा सा वोकुछ सोच रहा थाजो सोच रहा थामुझे मालूम नहींमैने देखा उसे नज़र भर केसोचा चलो कुछ बात करुंजैसे ही उठा थाऔर कुछ बोला थावो उड़ गया खिड़की से लपकतापलक झपकते ही बाहर गर्मी हैवो लौटके आयेगा ज़रुरउसकी फितरत भी है इन्सानों सीमुझको लगता था किकोई तो अलहदा है यहां।अच्छा हुआ इस बारपरिंदे ने नसीहत दे READ MORE

सपनों की नौकरी, नौकरी के सपने

March 21, 2011 // 0 Comments

दोस्त जब भी समुद्र देखता हूं तुम याद आते हो मन कहता है कि समुद्र के बीच उगने लगेंगे पहाड़ और पहाड़ों पर मालाएं बनाती सड़क पर दौड़ने लगेंगे बाईक के पहिये जैसे सूरज का रथ। हम भूल जाएंगे मील के पत्थर जहां पानी होगा, हवा होगी, मन होगा ठहर जाएंगे जहां होगा इत्मिनान वहीं उग जाएंगे दूब घास की तरह च्ुापचाप बिना किसी को बताये लेाग लाख हमें सिरफिरा कहें हम चिलचिलाती धूप में तब भी चढ़ेंगे खड़ी READ MORE

वो दिन तुझसे मिलने का

March 14, 2011 // 0 Comments

याद है मुझको वो दिन तुझसे मिलने का। सूरज ने उस दिन ठंडी सी बारिश की थी  गर्मी की। बर्फ भी उस दिन गर्म हवा सी छोड़ रही थी। और तुम्हारे गोल गुलाबी छाते के सीकों से  बारिश की गुलाबी बूंदें  टपक टपक कर आती थी मेरे हाथों में। मुझे याद है वह छोटी सी बूंद जिसमें देखा था पहली बार तेरी परछाई को। फिर देखा था  नजर उठा तेरे चेहरे की ओर। काली अलकें काली पलकों से टकराती भूरी आंखों के उपर लहराती थी। और READ MORE

मौत पर लिखी पहली कविता

March 13, 2011 // 0 Comments

मौत पर लिखनाज़िन्दगी की चाह का खत्म हो जाना नहीं हैऐसा होतातो अब तक अमर न होते पाब्लो नेरुदा। ज़िन्दगी अपने मूल रुप मेंमरने का इन्तज़ार ही हैपर मरना अपने मूल रुप मेंज़िन्दगी से हारना नहीं है। मौत गर्द सी जमी होती है हवाओं मेंमिटटी में, पानी में, सूरज की किरणों मेंऔर हर उस चीज़ में जिसका सम्बंध जीने से हैऔर गर्द को साफ किया जाना हर लिहाज से लाजमी होता है।इस तरह से मौत कोई अवांछित READ MORE

नजदीकियों की चाह

March 12, 2011 // 1 Comment

एक रतजगे बाददिन में नीद न आने की आदत साआंखों को जलाता वो अहसासअब तक एक तिलिस्म लगता रहा है।और उसी क्रम में होता रहा है महसूसकि नजदीकियां जितनी सुखदाई होती हैंउतनी ही व्याकुलता भरी होती हैंनजदीकियों की चाह। दूरियां धूल भरी सूखी हवा सीचली आती हैं संासो मेंऔर उनसे भागना लगता हैजैसे जिन्दगी से भागना,पर जब नजदीकियां दूर चली जाती हैंतो दूरियों के पास नहीं होतापास आने के सिवाय और कोई READ MORE

गुलज़ार के लिये

March 5, 2011 // 1 Comment

कभी कभी जब पढ़ता हूं गुलज़ार तुम्हें ग़ुल जैसे महकते लफ़ज़ों के मानी हो जाते हैं और लफ़ज़ ज़हन के पोरों को गुलज़ार किये देते हैं लगता है कि एक सजा सा गुलदस्ता लाकरके किसी ने ताज़ा ताज़ा रख्खा हो और विचारों की टहनी में भावों की कोमल पंखुड़ियां नाच रही हों अक्ष्रर अक्षर मेरे ज़हन में रंग से भर जाते हैं  फिर मैं भी तो गुलज़ार हुआ जाता READ MORE

मासूम दुपट्टा

March 5, 2011 // 1 Comment

हवा का वो मासूम दुपट्टाउड़ता हुआ चुपचाप चला आता है उस दिन छत पर तुम थी मैं थाऔर तभी उड़कर आया था एक दुपट्टाओढ़ा था उसे हम दोनों नेऔर ठंडी सी वो लहर देह से लिपट गई थी।बहुत देर तक दूर दूर चुपचाप खड़े थे हम दोनोंऔर दुपट्टा बहुत देर तक बोल रहा था। उस दिन पेड़ की शाखों और पत्तियों नेशायद उससे एक बात कही थीमैं उस दिन भी रोज़ की तरहा तुम्हें देखताअपने दिल के कोनों से कुछ बोल रहा थासुन न सका वो READ MORE

सवेरा

March 3, 2011 // 0 Comments

सवेरासूर्य की विजय नहीं होता।  अधिकार की लड़ाई में तारों की पराजयया चन्द्रमा का दमन भी नहीं।  सवेरा एक यात्रा है अंधेरे में नहाकर लौट जाना रोज की तरह निर्धारित सफर के लिये।  सवेरा किसी मानी का मद नही          होता  अहंकार के रंग में रंगी सुनहरी सुर्ख तलवार भी नहीं। सवेरा कलाकार का चित्र है नीले आधार पे उभरता लाल रंग और सोने की छोटी छोटी पंक्तियां। सवेराअंधेरे का अंत नहीं होता। READ MORE

ऐसी मेरी सौ कविताएं

February 24, 2011 // 0 Comments

भावों का शतक शब्दों ने कहाकुछ उगल दिया कुछ दबा रहा कुछ में था दर्द चुभन थोड़ीकुछ ने अपनी सीमा तोड़ी कुछ में था खुशी का अफसानाकुछ अपना था कुछ बेगाना कुछ में बस दिन की बातें थीकुछ में था तमस और रातें थी कुछ यूं ही भी लिख डाला थाकुछ में चिन्तन का हाला था कुछ को लिखने में रोया थाकुछ में भावों को संजोया था कुछ थी शोषित मजदूरों परकुछ आज़ादी के नूरों पर कुछ में नेताओं का छल थाकुछ में मन थोड़ा READ MORE

शब्द

February 23, 2011 // 2 Comments

शब्द गिरगिट की तरह होते हैंऔर बदल जाते हैं पल मेंमायनों की तरह। रोशनी से मिलते हैं शब्दऔर बिखर जाते हैंजैसे दूधिया चमक मेंनहा जाती हैं पानी की बूंदऔर पल भर रुककरबिखर जाती है खुशी सी। शब्द मिलते हैं अंधेरे सेऔर सिकुड़ जाते हैं सन्नाटे मेंतब शब्दों से बड़ा डर लगता हैतब वो रुलाने लगते हैं। शब्द जब चढ़ते हैंकिसी शिकारी की बन्दूक मेंभेद जाते हैं नसों को ।ताज़ा खूनफूट पड़ता है फव्वारे READ MORE

पागलों की तरह

February 23, 2011 // 0 Comments

खिड़कियों से बंद हैंजो ये दरवाजेमुझे शक हैकि इस मकान में कोई रहता है। कोई आवाज कसमाती नहींहवा चलती नहींएक धूप हैजो जलाती जाती हैन जाने किन सीखचों के रास्तेवो पा लेती है जगहभीतर घुस आने की। मेरे सवालकिसी लू में जल रहे हैंजवाबों की राखकिसी जर्द सीचिपकी पड़ी हैअलमारियों में। जाने वो कौन सी दरारें हैंजो अहसासों के इर्द गिर्दऔंधी लेटी हुई हैंजिनसे कुछ छनता हुआ सानसों में भर रहा READ MORE

जन्नत की हकीकत

February 20, 2011 // 1 Comment

ऊंची सियासत ने कीबड़ी गलतियांऔर कश्मीर कश्मीर हो गया। दिखाये गयेधरती पर स्वर्ग के सपनेपर स्वर्ग बन पाने की सभी शर्तेंदमन की कब्र में दफना दी गई। पीने लगे कश्मीरीआजादी के घूुटफूंक फूंक कर।देखने लगे आजादी केतीन थके हुए रंग।ढ़ोते हुए आजादी कोकिसी बोझ की तरह। फीका लगने लगा गुलमर्गस्ंागीनों के साये में।लगने लगा सुर्खडल झील का पानी। बर्फ की सफेदी के बीचपसरता रहा स्याह डर।दबती रही READ MORE

सवेरा

January 27, 2011 // 0 Comments

सवेरा सूर्य की विजय नहीं होता।  अधिकार की लड़ाई में तारों की पराजय या चन्दमा का दमन भी नहीं।  सवेरा एक यात्रा है अंधेरे में नहाकर लौट जाना रोज की तरह निर्धारित स र के लिये।  सवेरा  किसी मानी का मद नहीे            होतां अहं के रंग में रंगी सोने की  सुर्ख तलवार भी नहीं। सवेरा  कळाकार का चित्र है नीले आधार पे उभरता लाल रंग और सोने की छोटी छोटी पंक्तियां। सवेराकाजल की कोठरी मेंसयाने का READ MORE

इफरात

January 27, 2011 // 0 Comments

काश मैं जीता कुछ दिनकुछ न होने के लिए।कुछ बनने की शर्त को प्याज के छिलके के साथफेंक आता कूड़ेदान में।और निश्चिंत होकरलगाता, सूरज में रोशनी का अनुमान।रोश नी को भरकर बाल्टी मेंउड़ेल आतादीवार पर बनीअपनी ही परछाई परऔर देखता उसेसुनहला होते।हवा के बीच कहीं ढ़ूंढ़ता फिरताबेफिक्र अपने गुनगुनाये गीतऔर सहेज लेता कुछ चुने हुए षब्दअपनी कविता के लिए।मैं आइने में खुद को देखताकुछ न होते हुएऔर READ MORE

एक बियाबान-सा जंगल है

January 21, 2011 // 0 Comments

अहसासों की वो पगडंडीमुझे तुम तक ले आईपर मैं जब तुम्हारे पास पहुँचातो जाने क्यों लगामैं रास्ता भूल आया हूँ। तुम्हारी आंखों में मैंने खुद को पाया अपरिचित साऔर मुझे खुद से आने लगी परायेपन की बू। तुम चुराती रही नजरेंऔर भावनाओं के जखीरे सेखाली होती रही खुशियां।तुम किसी जौहरी सीतौलने लगी मुझेअपनेपन की कसौटी मेंचेहरे पर एक रुखा सा भाव लिएकि मैं लुटा-पिटा सा यहाँ क्यों चला आया हूँ। READ MORE

तुम्हारा ख़्याल

January 21, 2011 // 0 Comments

गर्मियों में सूखते गले कोतर करते ठंडे पानी-साउतर आया ज़हन में।और लगाजैसे गर्म रेत के बीचबर्फ की सीली की परतज़मीन पर उग आई हो। सपने,गीली माटी जैसेधूप में चटक जाती हैवैसे टूट रहे थे ज़र्रा-ज़र्रातुम्हारा खयालजब गूंथने चला आया मिट्टी कोसपने महल बनकर छूने लगे आसमान। तुम उगीकनेर से सूखे मेरे खयालों के बीचऔर एक सूरजमुखीहवा को सूंघने लायक बनाताखिलने लगा खयालों में। पर खयाल-खयाल होते READ MORE

इस वक्त मे उस वक्त को याद करते हुए

January 20, 2011 // 0 Comments

कुछ अनमना सा होकरजब इस वक्त मैं उस वक्त के बारे में सोचता हूंतो सोचना हवा हो जाता है और फैल जाता है बेतरतीबमैं सोचने की चाह को एक दिशा देना चाहता हूंपर दिशा होना पानी होने जैसा लगता हैजिसकी थाह लेने का इरादा समंदर की असीमता मेंअसम्भव की बिनाह पर इतराने लगता है।मुझे उस वक्त गुमान नहीं थाकि मैं कभी जियूँगा इस वक्त को भीऔर इसे जीना ऐसा होगाजैसे मरने के बीच मंडराना और न मरनाजैसे खून में READ MORE

मुम्बई के बीच से

December 14, 2010 // 0 Comments

इन दिनों मुम्बई में हूं। वहां वर्सोवा के समुद्री किनारे से मुम्बई पर कुछ लिखने का मन हुआ। गीली रेत पर अकेले कुछ घंटे चलते चलते बिताने के बीच से ये पंक्तियां आपके लिये कैसी वर्सोवा वर्सोवा वाली चुप्पी सा शहरकैसा जुहू चौपाटी सा ये शोर हैकैसी नरिमन नरिमन इसमें छाई है चकाचौंधकैसी बांद्रा किनारे वाली भोर है कैसे लहर लहर खुद तक खींच लेता हैकैसे बूंद बूंद खुद में समा लाता हैकैसे READ MORE

नैनीताल से लौटने के नशे के बीच से कुछ…

October 22, 2010 // 1 Comment

हाल ही में नैनीताल जाना हुआ। वहां ताल में बोटिंग करते हुए कुछ पंक्तियां लिखने का मन हुआ। कुछ तस्वीरें उतारने का जी किया। नैनीताल को अपने शब्दों में बयां करती शब्दों और तस्वीरों की ये जुगलबंदी आपके लिये….. वो नशीली सी झील मस्तानी गुनगुनी  धूप गुनगुना पानी। आज सूरज चांद बनके बिखरने सा लगा बनके तारा पानी में उभरने सा लगा।  बूंदों में पसरने लगी दूधिया पिघलन जैसे पानी में ही बस आया READ MORE

बोल कबीरा तब क्या हैगा

September 7, 2010 // 2 Comments

कभी गुलामी मातम थीपर आज गुलामी उत्सव हैगाकौमनवेल्थ के जरिये बिकनाआज देश का गौरव हैगा। लूट खसोट की मैराथन मेंभ्रष्टाचार का शासन हैगाअब तो वो भी बिक जाना हैघर में जितना राशन हैगा। कितना कौमन वैल्थ हमाराइसको उसको बंटता हैगाआम आदमी चुपकर प्यारेतुझको काहे खटता हैगा। बंदरबांट का मेला देखोहर चेला मदारी हैगाकब्ज न होती पच जायेगापैसा पाचनकारी हैगा। कल्माड़ी की दाड़ी भीतरकाले धन का READ MORE

सम्भावना डाट काम से तीन कविताएं

March 15, 2010 // 4 Comments

यहां बांईओर कमेन्ट बौक्स में एक मैसेज मुस्कुरा रहा है जिसमें हिन्दयुग्म के हालिया प्रकाशित काव्यसंग्रह सम्भावना डाट काम में प्रकाशित मेरी कुछ कविताओं को छापने का जिक्र है। रोहित की इस दोस्ताना गुजारिश पर उनकी कुछ कलाकृतियों के साथ उनके कुछ चित्रों और मेरी कविताओं की जुगलबंदी पेश है आपके लिये….. शब्द शब्द गिरगिट की तरह होते हैं और बदल जाते हैं पल में मायनों की तरह। रोशनी से READ MORE

1411- बाघों के नाम

February 18, 2010 // 1 Comment

आज के दौर में जंगल उदास हैं और वो लड़की जो बाघ की खाल से बना फर पहनकर शीशे में देख मुस्कुरा रही है हमें जंगली सी दिखती है। पर ये उस दौर की बात है जब जंगल उतने जंगली नहीं थे न ही आदमी उतना शहरी। जब एक दहाड़ सुनाई देने पर अक्सर कहते थे गांव के लोग कि बाघ आ गया। हम सुनते थे अपने पापा से बाघ के किस्से कि कैसे उस रोज आया था बाघ हमारे शेरा को ले जाने और पापा ने किया था टौर्च लेकर पीछा हम आज तक पापा READ MORE

पहाड़ का जीवन

July 23, 2009 // 5 Comments

आप कभी पहाड़ी इलाकों में जरुर गये होंगे। क्या महसूस किया आपने…….?यही ना कि इससे खूबसूरत कोई चीज दुनिया में शायद बनी ही ना हो। कितना खुशनुमा है यहां का जीवन। कितना साफ सुथरा, ताजगी भरा बेहद सहज और सरल। आपाधापा से दूर। मन किया होगा कि बस यहीं जीवन बिताने को मिल जाये तो जन्नत और क्या होगी। आपकी एक सैलानी की नजर जो नहीं देख पाई आइये आपको दिखाते हैं पहाड़ों के भीतर की दूसरी दुनिया का सच। READ MORE

नैनो पर सवार कवितामय बहस

April 28, 2009 // 0 Comments

अब नैनो पर बहस कविता में सवार है। लंबे समय बाद पुनेठा जी ने अपनी इस कविता के रुप में फिर दस्तक दी है। इससे पहले इस ब्लाग को पहाड़ी बनाने में उनकी कवितामय मदद मिलती रही है। अब उनकी कविता बहस का हिस्सा बन आई है तो आप भी इसे महसूसें इसे । उमेश भाई ,ब्लाग निरंतर निखर रहा है। इसलिए काफी लोग इसे पढ़ और पसंद कर रहे हैं । अपनी प्रतिक्रिया भी दे रहे हैं । ‘ नैनो’ को लेकर काफी अच्छी बहस चल रही है। आगे READ MORE

पहाड़

January 11, 2009 // 1 Comment

महेश चंद्र पुनेठा जी ने इस ब्लौग के लिए कई सारी कविताएं उपलब्ध कराई हैं। समय समय पर उनकी कविताओं के जरिये इस ब्लाग के पाठकों को पहाड़ की खुशबू और जायके का अहसास होता रहेगा। फिलहाल पेश है उनकी ये कविता। पहाड़ !कितने प्यारे लगते होजब रोज सुबह-सवेरेधर लाते हो सूरज कोअपने भारी-भरकम कंधों परतुम्हारे इस करतब परखिलखिला उठती हैं दिशाएं भीहिमाच्छादित शिखररंग जाते हैं भट्टी में गर्म हो READ MORE

घर में सर्दी के बीच हिमालय को देखते हुए

January 6, 2009 // 1 Comment

दूर हिमालय शान्त खड़ा हैदरकती हुई परतों का शोरअपनी षान्त नियति में छुपाया हुआ सा। एक लहर जो बिना चीखे समा रही है असंख्य छातियों के भीतररुह में अभेद्य सिहरन दियेजिसका नाम डर नहीं है। जलती हुई अंगीठियों के भीतरपक रहं, लाल नारंगी रंगऔर उनपर कांपती सी नीली हवाजो ठिठुरते हाथों में समा जायेगीऔर शीत लहरकुछ देर गाायब होने का स्वांग भर लौट आयेगी थोड़ी देर में। गर्म लपटें जिन्दगी की तरहठंडी READ MORE

मुम्बई मेरी जान

December 2, 2008 // 0 Comments

उन लमहों में जब हम मायानगरी को देख रहे थे छलनी होते। हम लाचार हिरन थेजिसे शिकारियों ने घेर लिया थाऔर फुर्ती से भरा होने पर भीदुबके रहना एक कोने मेंजिसकी नियति बन गई थी। उन लमहों में हम एक ऐसे लोकतंत्र के साक्षी थेजो उदार होने के नाम परअपनी सुरक्षा ताक पे रख देता है।जिसे मैत्री सम्बन्ध अपनी जान से प्यारे हैं। उन लमहों में हम राजनीति के उस रुप के दर्शक थेजो महज वोट के लिए कर रही थी READ MORE