ताज़ा रेजगारी

कविताई

फिर वही किंतु-परंतु

May 17, 2017 // 0 Comments

बहुत सारा किंतु-परंतु है जीवन में किंतु जब तुम पास होती हो तो सब ग़ायब हो जाता है   मैं बहुत पास से देखता हूँ तुम्हारी मुस्कान इतने पास से कि वो मुझे अपनी लगने लगती है मैं अपनी घबराहटों को महसूस करने लगता हूँ तुम्हारे भीतर और तुम्हारे भीतर का डर कभी-कभी कर देता है मेरे रोंगटे खड़े   किसी रात हम बहुत देर तक एक दूसरे में खोजते रहते हैं एक दूसरे को हमारे स्पर्श लाँघ जाते हैं निजता की READ MORE

यात्रा में होना

September 29, 2016 // 0 Comments

पहाड़ों की पगडंडियों पर चढ़ते हुए मैनें अपना पहना हुआ आलस उतारा और पहन ली कईयों की उतारी हुई थकान   कंकड़ों की चुभन पहनी तो उतार ली अपने तन की कोमलता अपने मन की कठोरता उतारने के बाद नदी की तरलता पहन ली   मेरे भीतर बहुत कुछ उबल रहा था जो मैंने धीरे-धीरे उतार लिया स्निग्धता से भरे हुए साफ़ सुथरी बर्फ के ग्लेशियर पर और पहन ली उसकी शीतलता   दुपहरी की धूप पहनकर मैं गला आया अपने भीतर के पत्थर READ MORE

बेकायदे का प्यार

September 20, 2015 // 0 Comments

कभी कभी मन करता है सब यहां-वहां सा हो जाए तितर-बितर एकदम कुछ भी न रहे करीने से सुबह-दिन-शाम-रात बन जाए सुबह-रात-दिन-शाम या फिर दिन-सुबह-रात-शाम सर्दियों के बीच गर्मियां होने लगें बारिशें धूप के ऊपर गिरने लगें टप-टप बोलना सुनाई देने का मोहताज न रहे शहर में गाड़ियों की जगह गाय-बकरियां तैरने लगें पंखों की मशीनी कर्कश आवाज़ को निचोड़ने पर बाल्टी में भरने लगे ग़ुलाम अली की ग़ज़ल आकाश आर्ट बुक हो READ MORE

ये नगरिया ‘पहले आप’ की, ‘जनाब’ की है

July 29, 2014 // 0 Comments

ये नगरिया ‘पहले आप’ की, ‘ज़नाब’ की है                                                                                                               यहां दूसरे की भी दुकान आपकी है ‘कड़ाई’ में है चिकन और ‘कढ़ाई’ में भी चिकन भई कुछ और बात टुंडे कबाब की है हर किसी को यहां ‘मज़ा आती’ है यहां बाग़ों के मजे़ लेते हाथी हैं मैं को हम और तू को आप कहते हैं सिम्पल सी बात भी ‘गज़ब’ हो जाती है. यहां READ MORE

खोई हुई एक चीज़

July 6, 2014 // 0 Comments

कविता यहीं कहीं तो रख्खी थी दिल के पलंग पर यादों के सिरहाने के नीचे  शायद या फिर वक्त की जंग लगी अलमारी के ऊपर तनहाई की मेज पे या फिर उदासियों की मुड़ी तुड़ी चादर के नीचे ? यहीं कहीं तो रख्खी थी कुछ तो रखकर भूल गया हूं आंखिर क्या था ये भी याद नहीं आता कई दिनों से ढूंढ रहा हूं वो बेनाम सी ,बेरंग और बेशक्ल सी कोई चीज़ ऐसी चींजें खोकर वापस मिलती हैं क्या ? एक-दूजे की ज़िंदगी में हम दोनों भी ऐसी ही READ MORE

अगर क़ुतुब मीनार के पंख होते

April 13, 2014 // 1 Comment

फोटो: उमेश पन्त महरोली टर्मिनल से वो टूटी फूटी सड़क जाती है क़ुतुब मीनार की ओर ऐसे जैसे कोई गांव का बच्चा धूल-धूसरित कपड़े पहने जा रहा हो दिल्ली देखने अपने हाथ में पकड़े इतिहास की कोई फटी पुरानी किताब दूर आकाश में बहुत ऊंचाई से क़ुतुब मीनार देखती है उस उपेक्षित सड़क को जैसे नौकरी के लिए कहीं दूर रह रही मां अपनी आंखों में बना रही हो अपने बच्चे का काल्पनिक चित्र बिखरे हुए हैं चारों तरफ चुनावी READ MORE

बोल कबीरा तब क्या हैगा

September 7, 2010 // 2 Comments

कभी गुलामी मातम थीपर आज गुलामी उत्सव हैगाकौमनवेल्थ के जरिये बिकनाआज देश का गौरव हैगा। लूट खसोट की मैराथन मेंभ्रष्टाचार का शासन हैगाअब तो वो भी बिक जाना हैघर में जितना राशन हैगा। कितना कौमन वैल्थ हमाराइसको उसको बंटता हैगाआम आदमी चुपकर प्यारेतुझको काहे खटता हैगा। बंदरबांट का मेला देखोहर चेला मदारी हैगाकब्ज न होती पच जायेगापैसा पाचनकारी हैगा। कल्माड़ी की दाड़ी भीतरकाले धन का READ MORE

पहाड़ और उतरन

October 2, 2009 // 0 Comments

महेश चंद्र पुनेठा जी की कविताएं इस ब्लाग पर मैं लगातार प्रकाशित करता रहा हूं। इसी कड़ी में आज पेश हैं उनकी ये दो उम्दा कविताएं….. अपनी जमीनपहाड़इसलिए पहाड़ हैक्योंकिजितना फैला है वह आसमान मेंउससे अधिकधॅसा है कहीं अपनी जमीन में उतरनप्रवाह है जब तकनदी नदी है ।गति है जब तकहवा हवा है ।मुक्त है जब तकप्रेम प्रेम है ।बॅधते हीनदी नदी नहींहवा हवा नहींऔर प्रेम प्रेम नहींउतरन मात्र रह READ MORE

फिल्मी गीतों के नाम

September 21, 2009 // 2 Comments

उन सभी फिल्मी गीतों के नाम जिनको गुनगगुनाते हुए हम बड़े हुए और जो हमारी उम्र के साथ बढ़ते रहेंगे हमारे साथ…. हम उम्रदराज होते रहेंगे और ये गीत और जवान सदियां जिन्हें गुनगुनाकर चली गईपर जो जिन्दा रहेंगे सदियों तकगुनगुनाने के लिए।जो बांटते रहे हैं अकेलापनबिखेरते रहे हैं खुशियांबनते रहे हैं दर्द की दवा भी।गीत जो घुल गये हैं परम्पराओं मेंमिसरी के घोल की तरहजिनमें घुल गई हैं READ MORE