ताज़ा रेजगारी

आर्टिकल

हर आत्महत्या कई सवाल छोड़ जाती है

January 19, 2016 // 0 Comments

क्या है ये जो दिमागों में इस हद तक भर जाता है कि मन को खाली कर देता है ? समाज में उन मान्यताओं का क्या अर्थ है जिनसे जीवन जैसी नायाब नेमत भी किसी ख़ास वर्ग या व्यक्ति के लिए अर्थहीन हो जाती है. हमारी जाति, हमारा धर्म, हमारी सत्ता, हमारी संस्थाएं, हमारा ओहदा इतना बड़ा कैसे हो सकता है कि उसके सामने मानवता बार-बार हार जाती है ? हमारे-आपके आस-पास होते हुए भी कोई इतना खाली इतना, बेजार कैसे हो जाता READ MORE

जगमग शहर में अंधेरे से जूझते हुए

December 5, 2015 // 1 Comment

नोट: यह लेख नवभारत टाइम्स (5 दिसंबर 2015) के सम्पादकीय पृष्ठ पर प्रकाशित हुआ है. मूल रूप से लिखा गया पूरा लेख यहां पेश है.  मुंबई के वर्सोवा बीच की रेत अभी-अभी सुनहरे रंग से लाल हुई थी और अब उसने अपना असल रंग भी खोना शुरू कर दिया था. सूरज डूब ही रहा था. किनारे चट्टान पर खड़ा एक शख्स बहुत देर से गहराते आकाश में अपनी मायूसी का रंग तलाश रहा था. मैंने कुछ दिनों में रिलीज़ होने जा रही ‘गेंग्स ऑफ़ READ MORE

मोदी जी याद रखियेगा जहां में नूरजहां और भी हैं

November 29, 2015 // 0 Comments

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कल अपने मन की बात में सोलर लालटेन की मदद से गाँव को रौशन करने वाली कानपुर के दरियांव की ‘नूरजहां’ का ज़िक्र किया और वो चर्चा में आ गई और ये खबर हर मीडिया हाउस की सुर्ख़ियों में. लेकिन ये बात तब की है जब मोदी जी प्रधानमंत्री नहीं थे, और गाँव कनेक्शन देश का सबसे बड़ा ग्रामीण अखबार नहीं था. तब कानपुर की ही ऐसी और भी कई महिलाओं पर मैंने एक विस्तृत रिपोर्ट लिखी READ MORE

हम अपने भीतर के कट्टरपंथ को फांसी क्यों नहीं दे देते ?

July 31, 2015 // 0 Comments

ऐसे मौकों पर मैं खुद को बहुत अकेला और उदास पाता हूं। मुझे नहीं पता होता कि मैं किस तरफ खड़ा होउं। मैं अपने आपको उस ‘सामूहिक चेतना’ का हिस्सा बनते हुए नहीं देख पाता जिसे ‘किसी’ को फांसी मिलने पर ‘फांसी मुबारक’ सरीखे जुमले उछालने का मौका मिल जाता है। जिसे किसी को फांसी मिलने में एक ‘उन्मादी सकून’ मिलता है। मेरे असमंजस और उदासी की मूल वजह इस सवाल के जवाब की तलाश में छिपी है READ MORE

अब उन पहाड़ी मैगी पॉइंट्स का क्या होगा ?

June 12, 2015 // 2 Comments

डियर मैगी, कल जब किराने की दूकान में गया तो जाते ही कहा…आंटी मैगी..ये कहते ही मुझको रुकना पड़ा..न चाहते हुए भी.. तुम वहीं शेल्फ में रखे थे..पर आज पहले की तरह सबसे आगे की लाइन में खड़े मुस्कुरा नहीं रहे थे…तुम्हें कहीं पीछे कई और नूडल्स से ढंकते हुए किसी अपराधी की तरह छुपाया गया था.. न चाहते हुए भी आज नज़र दूसरे नामों के नूडल्स को तलाश रही थी..समझ नहीं आ रहा था कि तुम्हारी जगह किसे चुनूं? तुम READ MORE

क्यों वीरान हो गई पहाड़ की बाखलियां

May 21, 2015 // 0 Comments

पिछले कुछ सालों में प्रदेश की अर्थव्यवस्था में जिन क्षेत्रों का बोलबाला रहा उनमें कंस्ट्रक्शन, मैन्यूफैक्चरिंग और जलविद्युत ऊर्जा प्रमुख हैं। बीते दौर में कलकारखानों और खनन में 15 फीसदी की विकास दर देखी गई जबकि कृषि में यह विकास दर केवल 2 फीसदी की रही। ज़ाहिर है कृषि क्षेत्र के विकास में सरकार की रुचि खनन और कारखानों की तुलना में बहुत कम रही और इसकी वजहें किसी से छिपी नहीं है। READ MORE

कहीं दराती बीमार तो नहीं कर रही ?

April 20, 2015 // 0 Comments

विवेकानंद पर्वतीय कृषि अनुसंधान संस्थान ने बनाये पहाड़ी खेती के लिये नये उपकरण, उपकरणों में लकड़ी की जगह रबर और, लोहे के प्रयोग पर दिया बल “हल बनाने के लिये अब तक बांज, सनड़ जैसे चौड़ी पत्ती वाले पेड़ों की लकड़ी का इस्तेमाल किया जाता है। ये पेड़ अपनी जड़ों में बारिश के पानी का संचय करते हैं। ज़मीन की सतहों पर अब 10 इंच तक भी पानी नहीं रह गया है जिसकी मुख्य वजह कृषि उपकरणों के लिये होने READ MORE

क्या सचमुच सम्भव है ‘नेट न्यूट्रेलिटी’ ?

April 15, 2015 // 0 Comments

जनाब आप किस नेट न्यूट्रेलिटी की बात कर रहे हैं ? क्या सचमुच नेट पर न्यूट्रेलिटी या इन्टरनेट तटस्थता जैसी कोई चीज़ सम्भव है ? क्या वर्तमान परिप्रेक्ष में इन्टरनेट की दुनिया वैसी है जैसी हम असल दुनिया को बनाना चाहते हैं ? वो दुनिया जिसमें तमाम संसाधनों पर सभी का बराबर हक हो। क्या सचमुच ये घास उतनी ही हरी है जितनी इसे बताया जा रहा है ? फर्ज कीजिये कि आप गो डैडी पर एक डोमेन खरीदते हैं। तो READ MORE

सिनेमा : शटर से थियेटर तक

April 10, 2015 // 0 Comments

मैं इस वक्त उत्तराखंड के पिथौरागढ़ में हूं।अपने ननिहाल में।कुछ हफ्ते भर पहले रिलीज़ हुई एनएच 10 देखने का मन है।पर अफ़सोस कि मैं उसे बड़े परदे पर नहीं देख पाऊंगा।क्यूंकि ज़िला मुख्यालय होते हुए भी यहां एक सिनेमाघर नहीं है जहां ताज़ा रिलीज़ हुई मुख्यधारा की फ़िल्में देखी जा सकें।एक पुराना जर्ज़र पड़ा सिनेमाघर है जिसके बारे में मेरी मामा की लड़की ने मुझे अभी अभी बताया है – “वहां तो बस बिहारी READ MORE

महत्वाकांक्षाओं का ‘आप’निवेशिक काल

March 28, 2015 // 0 Comments

ये राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं का ‘आप’निवेशिक काल था. वो धारा जो न दक्षिणपंथी लगती थी, न वामपंथी अब वो ‘कमीनपंथी’ पर उतर आई थी. पार्टी बनाने वाले, पार्टी चलाने वाले के लिए ‘कमीने-साले’ हो गए थे. इस ‘आप’निवेशिक काल का अविर्भाव आदर्शों के अतिरेक की ज़मीन पर हुआ, वो ज़मीन जो दरअसल अपनी नहीं थी. देश के अन्नाओं, गांधियों, अम्बेडकरों की ज़मीन का अतिक्रमण करके वो ज़मीन कब्जाई गई थी. ठीक उसी दौर में READ MORE

आप इतने बैन-खोर क्यों हैं सरकार ?

March 11, 2015 // 0 Comments

प्रिय सरकार, सुनिये ना। यहां तो कुछ भी कुशल से नहीं है फिर आपकी कुशलता की कामना हम करें भी तो कैसे ? फिर भी आपसे एक बात कहनी थी। आप ये बात-बात पर जो बैन-बैन खेलनेे लगते हो ना बड़ा अजीब लगता है। और फिर उसके पीछे जो तर्क देने लगते हो उसपर बड़ी हंसी छूटती है। गुस्सा तो खैर आता ही है। अब निर्भया पर बनी फिल्म इन्डियाज़ डाॅटर को लेकर ये मौजूदा विवाद ही देख लो। आपकी दिक्कत है कि इससे READ MORE

आपकी अदालत में आपके लिये भी तो कोई कठघरा हो

July 1, 2014 // 0 Comments

“और ये जो नया काम आपने शुरु किया है ज़रा बताइये कि इसका न्यूज़रुम से क्या सरोकार है ? इस नये काम को क्या कहते हैं क्या आप जानते हैं ? रितु धवन, अनिता शर्मा और प्रसाद जिनका नाम तनु ने अपने सुसाइड नोट में लिखा है उन्हें आप जानते तो होंगे ना ? कोई विशाखा गाइडलाइन होती है ऐसे मसलों के लिये, आपने सुना तो होगा ही। इस गाइडलाईन के तहत खुद पर और इन लोगों पर कोई कार्रवाई करें तो खबर ज़रुर चलवा READ MORE

मोबाइल के इस्तेमाल से माँओं की देखभाल

February 6, 2013 // 0 Comments

जयपुर से तकरीबन 120 किलोमीटर दूर रुपनगढ़ ग्रामपंचायत में रहने वाली स्वास्थ्य कार्यकर्त्री (आशा), अल्का सारना रोज हाथों में मोबाईल फोन लेकर अपने गांव की महिलाओं के घर जाती हैं। घरों में मौजूद महिलाओं को अपने पास बैठाकर वो मोबाईल के कीपैड पर कुछ बटन दबाना शुरु करती हैं। थोड़ी ही देर में बारी बारी से मोबाईल पर एक आवाज़ इन महिलाओं से गर्भावस्था के दौरान बरती जाने वाली सावधानियों, READ MORE

इलाज के लिए ‘अमरीका’ भी करता है बंधुआ मजदूरी

January 15, 2013 // 0 Comments

लखनउ से तकरीबन 100 किलोमीटर दूर सीतापुर के पगरोर्इ गांव में रहने वाले अमरीका प्रसाद दिसम्बर की 19 तारीख से किंग जौर्ज मेडिकल कालेज में डेरा जमाये हुए हैं। न्यूरोलौजी डिपार्टमेंट के ठीक बाहर कड़कड़ाती ठंड में अपने पूरे परिवार के साथ वो बस इसी उम्मीद में बैठे हैं कि उनकी 10 महीने की बेटी का इलाज हो जाये। “बच्ची बीमार है। डॉक्टर को दिखाया तो उन्होंने कहा कि अभी छुटटी पे जा रहे हैं। 14 READ MORE

यहां या तो भूत चलता है या सलमान खान

January 15, 2013 // 0 Comments

लखनउ से 14 किलोमीटर उत्तर दिशा में काकोरी नाम का एक छोटा सा कस्बा है। इस कस्बे में संकरी सी रोड पर चलते हुए हैंडपंप के पीछे चूने से पुती हुई एक दीवार पर लकड़ी का एक पटला सा दिखता है। उस पटले पर एक फिल्मी पोस्टर चस्पा है जिसपर लिखा है ‘मौत का खेल’। दीवार से सटे हुए गेट के अन्दर जाने पर सामने की दीवार पर रिक्शेवाली और फांदेबाज़ से लेकर रजनीकांत की बाशा और संजय दत्त की अग्निपथ जैसी READ MORE

क्योंकि मिस कॉल भी है बड़े काम की चीज़

January 15, 2013 // 0 Comments

टेलीकॉम इन्डस्ट्री के पंडितों ने जब मोबाईल टेलीफोनी के बारे में सोचा होगा तो मिस कॉल नाम का ये शब्द उनके ज़ेहन में शायद ही आया हो। वाशिंग मशीन में लस्सी बना लेने का माद्दा रखने वाले हमारे इस जुगाड़ू देश ने मिस कॉल नाम के इस शब्द को अपनी भाषा और यहां तक कि रोज़मर्रा की बातचीत हिस्सा बना लिया है। भोजपुरी गानों से लेकर बालिवुड आईटम नम्बर तक में सैंया को पटाने के नुस्खों में शामिल होने READ MORE

हर तीसरा भारतीय किसान, पर कृषि वैज्ञानिकों के आधे पद खाली

January 12, 2013 // 0 Comments

भारत के बढ़ते कृषि व्यापार की चकाचैंध से प्रभावित होकर लखनऊ के अफाक अहमद ने कृषि विषय में एमबीए करने का मन बनाया और लखनऊ विश्वविद्यालय के प्रबन्धन विज्ञान संस्थान में एडमिशन ले लिया। अफाक के अध्यापकों ने उसे यही बताया था कि एग्रिकल्चर की पढ़ाई में आगे बहुत अच्छे अवसर हैं। दक्षिण भारत के कृषि व्यापार की नज़ीर देकर उसे समझाया गया कि मौजूदा समय में इस क्षेत्र से उच्च शिक्षा लेने READ MORE

कितना जायज़ है मौत का मज़ाक

November 26, 2012 // 0 Comments

इस बीच फेसबुक पर दो मसलों को लेकर प्रतिक्रियाओं का अनवरत दौर जारी है। बाला साहब ठाकरे का देहावसान और अजमल कसाब को गुपचुप दी कई फांसी। इन दोनों ही विषयों में यूं तो तुलना करने के लिये कुछ भी समानता नहीं है पर इन पर आ रही प्रतिक्रियाओं में जो एक बात कौमन है वो है इन पर की जा रही बेहद असंवेदनशील टिप्पणियां। फेसबुक पर इन मौतों को लेकर तमाम तरह के मज़ाक किये जा रहे हैं। लोगों ने यहां तक READ MORE

जिन्दगी की कोचिंग क्लास हैं स्टीव जौब्स की बातें

October 5, 2012 // 1 Comment

स्टीव जौब्स का व्यकितत्व मुझे जिन्दगी की कोचिंग क्लास की तरह लगता है। उनके बारे में पढ़ते चले जाना जि़न्दगी को सीखते चले जाने की तरह है। आविष्कार ही वो चीज़ है जो एक लीडर को एक फौलोवर से अलग करती है। स्टीव जौब्स की कही ये बात इसलिये अहम हो जाती है क्योंकि उन्होंने जो कहा वो अपने खुद के अनुभवों के आधार पर कहा। उनकी कही हर बात को उनकी जिन्दगी के अलग अलग हिस्सों में झलकते हुए देखा जा READ MORE

अफवाहें गढ़ती वर्चुअल दुनिया

September 16, 2012 // 0 Comments

फेसबुक जैसी नेटवर्किंग सार्इट पर फैली अफवाह ने बैंग्लौर से लगभग 3 हज़ार उत्तर भारतीय लोगों को अपने अपने घरों की ओर जाने को मजबूर कर दिया। इस घटना ने एक अजीब सा डर पैदा किया है जिसे आपसे साझा कर रहा हूं। इन दिनों इन्टरनेट के सामने बैठे बैठे अक्सर मैं सोचता हूं कि कहीं हमें दरवाजों में बंद होने की आदत तो नहीं हो रही? कभी कभी  लगता है कि मेरे आस पास कर्इ किस्म के दरवाजे हैं जो बंद रहते हैं। READ MORE

उधारी की मौज और परेशानियों की नकदी

September 15, 2012 // 0 Comments

मुम्बर्इ में नया नया आया था तो टीवी के एक लेखक से मिलने गया। लोखंडवाला की पौश कौलानी में टूबीएचके लेकर अकेले रहते थे। मतलब ये कि पैसा अच्छा कमाते थे। बातों बातों में उन्होंने बताया जिमिंग, स्वीमिंग, कार जैसे कर्इ नये शौक उन्होंने टीवी की दुनिया में आकर पाल लिये। क्यूंकि अभी पैसा अच्छा मिल रहा था तो र्इएमआर्इ नाम के उस जादुर्इ तरीके ने चीजें आसान कर दी थी। हर महीने कटने वाली इस READ MORE

मैने दिल से कहा, ढूंढ़ लाना खुशी…

September 14, 2012 // 0 Comments

मैने दिल से कहा ढ़ूंढ़ लाना खुशी……कल मशहूर गीतकार और पटकथा लेखक नीलेश मिस्रा के लिखे गीत की इन पंकितयों को सुनते हुए अचानक खयाल आया कि वाह क्या सच्ची बात कही है। अक्सर हम नासमझों की तरह खुशी के छोटे छोटे पलों को बहुत छोटा और गमों के छोटे छोटे लमहों को भी बहुत बड़ा करके आंकते हैं। खुशी की तलाश में निकलते तो हैं पर रासते से बेवजा ही ग़मों के तिनके समेटकर ले आते हैं। और फिर उन्हीं READ MORE

तनहा तनहा यहां पे जीना ये कोर्इ बात है?

September 14, 2012 // 0 Comments

अकेलापन हमारे समय के उन अहसासों में से एक है जो संक्रामक रोग की तरह दिन पर दिन फैल रहा है। किसी ने कहा है कि जिस वक्त आप अकेला महसूस करते हैं उस वक्त आपको खुद के साथ रहने की सबसे ज्यादा ज़रुरत होती है। जिन हालातों में हम रह रहे हैं वहां रोज़मर्रा की चीजों के साथ वक्त भी दिन पर दिन महंगा होने लगा है। ऐसे में दूसरों के लिये तो दूर की बात हम अपने लिये भी फुरसत के लमहे नहीं निकाल पाते। और इस READ MORE

किसके लिए लड़ रहे हैं अन्ना हजारे….

April 6, 2011 // 0 Comments

जन लोकपाल विधेयक पर अंग्रेजी में बहुत सी पाठ्यसामागी इन्टरनेट पर मौजूद है। हिन्दी में ना के बराबर जानकारी है। इसलिये ये लेख हिन्दी पाठकों के लिये जो मेरी ही तरह इस बिल के बारे में ज्यादा जानना चाहते हैं।     सुना कि अन्ना हजारे अनशन पे बैठे हुए हैं। लगा कि समझना चाहिये कि आंखिर मुद्दा क्या है। और जब समझा तो लगा कि दरअसल ये मुद्दा तो हमारे अपने जीवन से जुड़ा है। लोकपाल विधेयक एक ऐसा READ MORE

मानव व्यापार की राष्ट्रीय शर्म

November 23, 2010 // 0 Comments

आज विकीपीडिया पूरी दुनिया को ये बता रहा है कि भारत पूरी दुनिया में इन्सानों की खरीद फरोक्त का मूल केन्द्र है और यहीं से इस व्यापार के संक्रमण की शुरुआत होती है। ये उस देश के लिये बेहद शर्मनाक बात है जो हालिया सुरक्षा परिषद में अपनी स्थाई सदस्यता के दावे कर रहा है, जिसको विश्व में सबसे तेजी से उभरते देश के रुप में देखा जाता है। एक ऐसा देश जो कौमनवैल्थ जैसे बड़े आयोजन करवाके पूरी READ MORE

जीविका से जुड़ी आम आदमी की फिल्में

September 6, 2010 // 2 Comments

वृत्त्चित्रों को लेकर भारत में अपेक्षाकृत ठीक ठाक काम होता है लेकिन उनके प्रदर्शन को लेकर उतने प्रयास नहीं दिखाई देते। शहरी इलाकों में कभी कभार कुछ फिल्म फेस्टिवल्स को छोड़ दें तो इनके प्रदर्शन के लिये कोई सुचारु व्यवस्था हमारे देश में देखने को नहीं मिलती। शायद यही वजह है कि कई गम्भीर मुद्दे इन फिल्मों की शक्ल में उठते तो हैं पर दर्शकों के अभाव में अपनी मौत मर जाते हैं। और ये READ MORE

गिर्दा के इर्द गिर्द

September 5, 2010 // 1 Comment

दिल लगाने में वक्त लगता है, डूब जाने में वक्त लगता है, वक्त जाने में कुछ नहीं लगता, वक्त आने में वक्त लगता है। गिरीश तिवारी गिर्दा वक्त जा चुका है। गिरदा नहीं रहे। अब ऐसा वक्त आने में समय लगेगा जब गिरदा जैसा कोई जनकवि, जनसेवक फिर पैदा होगा और हमसे झूमते हुए कह उठेगा ततुक नी लगा उदेख, घुनन मुनई न टेक। दिल्ली के राजेन्द्र भवन में गिरदा की दिवंगत आत्मा को सृद्धान्जली देने के लिये आज उमड़ी READ MORE

जनस्वास्थ्य पर भारी पड़ता कौमनवैल्थ

August 27, 2010 // 1 Comment

हैल्थ इज वैल्थ। इस जुमले का भरपूर प्रयोग आप हम अपने जीवन में भले ही कई बार करते हैं किन्तु स्वास्थ्य सम्बन्धी नीतियों के मामले में सरकार को शायद यह बात समझ नहीं आती। इस बात का अन्दाजा कौमनवैल्थ में किये जा रहे खर्च और कौमन यानी आम आदमी की हैल्थ पर हो रहे मौजूदा खर्च की तुलना करके लगाया जा सकता है। यह बात अब किसी से छिपी नही है कि कौमनवैल्थ खेलों के नाम पर इन कुछ में महीनों में किस तरह READ MORE

बांधों का विरोध करते फिल्मकार और फिल्में

May 1, 2010 // 1 Comment

बड़े बांधों को बनाये जाने को लेकर दुनिया भर में चर्चाएं हो रही हैं। विश्वभर में कुलमिलाकर 47665 छोटे बड़े बांध हैं जिनमें से सबसे ज्यादा 22 हजार बांध चीन मे, 6600 से ज्यादा बांध संयुक्त राज्य अमेरिका और उसके बाद 4291 बांध भारत में हैं। लेकिन अब इन बांधों को लेकर बड़े बड़े आन्दोलन ही खड़े नहीं हो रहे बल्कि इस विशय पर वृत्तचित्र और फिल्में भी बन रही हैं। इससे साफ जाहिर होता है कि अंधाधुृध READ MORE

पंचेश्वर- टूटती उम्मीदों का बांध

January 15, 2010 // 3 Comments

पंचेश्वर बांध इन दिनों उत्तराखंड में चर्चा का केंद्र बना हुआ है और संभावित डूब क्षेत्र के इलाकों में ये बांध प्रतिरोध को भी जन्म दे चुका है। ये प्रतिरोध जाहिर तौर पर उन लोगों का है, जो इस बांध के बन जाने के बाद सीधे तौर पर प्रभावित होंगे। इस बांध के कारण कितने लोगों का विस्थापन होगा, इसका अनुमान कई विश्लेषक लगा चुके हैं। ये बांध भारत और नेपाल के बीच 1994 में हुई संधि के अंतर्गत READ MORE

पहाड़ी जायके के बहाने

January 10, 2010 // 3 Comments

मम्मी ने रात को भट के दाने भिगा दिये । सुबह सुबह मैं जब इन दानों को देखता हूं तो इनमें एक अजीब सी विशालता आ जाती है। रात को ये दाने इतने बड़े कहां थे। मुझे हैरानी होती है। कहीं संबह सुबह की धूप के घुलने से तो ये दाने फूल नहीं गये होंगे। मैं इस समय विज्ञान भूल जाना चाहता हूं। मम्मी ने जब इन्हें भिगाया होगा तो क्या उसे भी विज्ञान याद रहा होगा। नहीं ना। फिर क्यों मैं इन दानों के फूल जाने में READ MORE

बदतर होते ये सरकारी स्कूल

December 19, 2009 // 1 Comment

जामिया के एमसीआरसी में उस दिन एक अजीब वाकया सुनने को मिला। सुनकर सभी चैंके। और एक अजीब वितृष्णा से मन भर उठा। फस्र्ट ईयर के कुछ छात्रों ने बताया कि उनकी क्लास की एक लड़की को भरतनगर के सरकारी स्कूल के लड़कों ने स्कूल कैंपस में मोलेस्ट किया है। दिल्ली के सरकारी स्कूल। सुनकर जो छवि अब तक बनती रही थी वो यही थी कि सफेद कमीज और नीली पैंट पहने जो लड़के बसों में बुरी तरह लटकते हुए कन्डक्टरों READ MORE

कोपेनहेगन के बहाने

December 13, 2009 // 3 Comments

जलवायु परिवर्तन के मुददे पर बहुत कुछ लिखा जा रहा है आजकल। बहुत सी बहसें। बहुत से जुलूस। बहुत से कोंन्फ्रेस, सेमीनार, किताबें और न जाने क्या क्या। पर असल में किया क्या जा रहा है कम से कम ऐसे बड़े श्हरों में जहां बहसें अपने इन्टलैक्चुअल रिदम के साथ उफान पर हैं, यह जरा देखने वाली बात है। दिखे तो कोई बता दे। इस ब्लाग को लिखने की एक खास वजह है। जो इस वैश्विक मुददे को स्थानीय होकर देखने से READ MORE

एक ज्यादती है कपिल साहब का बयान

October 20, 2009 // 1 Comment

15 जुलाई 2009 को कपिल सिब्बल ने लोकसभा में अपने भाषण में कहा था कि शिक्षा व्यवस्था में सभी तरह के नये प्रयोगों को शामिल किया जायेगा। और हाल ही में उन्होंने बयान जारी किया आआईटी में प्रवेश के लिए 80-85 प्रतिशत अंक लाना अनिवार्य होना चाहिये। 15 जुलाई को दिये हुए वक्तव्य में उनका मन्तव्य शायद इसी तरह के प्रयोगों से था। उनका मानना है कि जो बारहवीं में इतने अंक नहीं ला सकता उसे इतने प्रतिश्ठित READ MORE

यारसा गुम्बा के साईड इफैक्ट

August 21, 2009 // 0 Comments

कुछ समय पहले जब उत्तराखंड जाना हुआ तो वहां यूं ही चलते चलते यारसा गम्बू पर विनोद भाई से बात हो रही थी। बात करते करते महसूस हुआ कि कुछ रोचक जानकारियां सामने आ रही हैं। मैने बिना उन्हें बताये अपना फोन निकाला और उनकी सारी बातें रिकोर्ड कर ली। विनोद उप्रेती दरअसल उच्च हिमालयी क्षेत्रों की वनस्पतियों पर विभिन्न सरकारी योजनाओं के तहत शोध कार्य कर रहे हैं। यहां पेश है उनसे हुई बातचीत के READ MORE

किनके नयनों को प्यारी है नैनो

March 26, 2009 // 4 Comments

नैनो अब सड़कों पर होगी और कई बे कार लोगों के दिमाग में चुहल पैदा करेगी कि काश अब बहुत हो गया। इस कार के आने के बाद कई पहलुओं पर चर्च ए आम है। इस ब्लौग के लिए रोहित ने ये आलेख आ भेजा हैं साभार छाप रहा हूंरोहित जोशी एक लम्बे इन्तजार के बाद टाटा ‘नैनो’ बाजार में उतर आई है। जुलाई माह से ‘नैनो’ सड़कों में भागती-दौड़ती दिखाई देने लगेंगी। सम्पूर्ण मीडिया जगत् ने भी ‘नैनों’ पर बिठाकर इसका स्वागत READ MORE

मीडिया पर एक और तालिबानी हमला

February 19, 2009 // 1 Comment

पाकिस्तान की स्वात घाटी में एक बार फिर पाकिस्तान की तालिबानी ब्रिगेड ने अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की हत्या की है। दरअसल यह हत्या उस पाकिस्तानी पत्रकार मूसा खान की हत्या ही नहीं है बल्कि यह मामला हमारी मौलिक स्वतंत्रता के अधिकार के हनन का मामला है। यह हत्या भले ही पाकिस्तान में हुई हो लेकिन ऐसा नहीं है कि किसी और देश के लिए इसकी कोई अहमियत नहीं रह जाती। यहां सवाल आतंकवाद के बुलन्द READ MORE

ब्लैक होल (Black Hole) – अंतरिक्ष के गर्भ में छिपा रहस्य

November 29, 2008 // 2 Comments

Black hole, Kanchan Pant कंचन पंत कंचन एनडीटीवी इन्डिया में पत्रकार है। बह्मांड के अनंत विस्तार में ढेरों रहस्य और अदभुत करिश्मे छिपे हुए हैं। ब्लैक होल भी अंतरिक्ष का ऐसा ही एक रहस्य है। इस अदभुत आकाशीय रचना को समझाने के लिए साइंटिस्टों ने कई सिद्यांत दिए, कई तर्क पेश किए। लेकिन क्या ब्लैक होल को समझना इतना आसान है? सैद्यांतिक तौर पर देखें तो हां लेकिन जब बात प्रायोगिक तौर पर इसे सिद्ध करने की READ MORE

धारावाहिकों में लौटता सामाजिक सन्देश

November 25, 2008 // 3 Comments

भारत में टेलीविजन पर मनोरंजन परक कार्यक्रमों की शुरुआत सोप ओपरा से हुई। 1985 में मनोहर श्याम जोशी द्वारा लिखा गया धारावाहिक हम लोग पहला धारावाहिक था। कक्का जी कहिन या नीम का पेड़ जैसे धारावाहिकों में सामाजिक सन्देश की महक साफ महसूस की जा सकती थी। गांव की मिट्टी की गंध लिए रोज रात बुधई दर्शकों के परिवारों के साथ अपने सुख दुख बांटता। धीरे धीरे यह फिजा बदली, धारावाहिक मध्य और उच्च वर्ग READ MORE

देखने की चीज बनते विज्ञापन

November 25, 2008 // 2 Comments

वे दौर अब नहीं रहा जब टीवी पर विज्ञापन आते ही आपकी नजर रिमोट पर दौड़ती थी और आप फट से चैनल बदल देते थे। मौजूदा दौर में एकता कपूर के के सीरियल भले ही उबाउ हो चले हों पर विज्ञापन समय दर समय रोचक होते जा रहें हैं। अब किसी खास विज्ञापन की वजह से आप चैनल बदलते बदलते उंगलियों को रोक दें ऐसा सम्भव है। विज्ञापन अब एक बड़ा उद्योग बन चला और इस उद्योग में रचनात्मकता की उड़ान अपने उफान पर है। विज्ञापन READ MORE

आज का समाज और जनआन्दोलन

November 25, 2008 // 3 Comments

रंजना कुमारी ,निदेशक, सेन्टर फार सोशल रिसर्चलोकतंत्र में जनआन्दोलनों की भूमिका काफी अहम रही है। यह भूमिका आज के दौर में बढ़ गई है। आज समाज का गरीब तबका कमजोर है। जन आन्दोलन ही सरकार और बाजार के बीच उलझे आम जन के मुददों को उठा सकते हैं। आज मानवाधिकार, महिलाओं से जुड़े मुददे समाज में सबसे ज्यादा जरुरी दिखई दे रहे हैं। राजनीति का स्वरुप जनमुखी नहीं रह गया है जिस वजह से ये मुददे कहीं दब से READ MORE

मीडिया बनाम जनस्वास्थ्य

November 24, 2008 // 2 Comments

जनस्वास्थ्य एक ऐसा मुद्दा है जो भारतीय मीडिया में अछूत सी हैसियत रखता है इसीलिये एनडीटीवी इन्डिया पर स्वास्थ्य पर फीचर देखकर एकबारगी हैरानी हुई कि यह कैसे हो गया? विशेषकर हिन्दी मीडिया में यह विषय बेहद उपेक्षित है। देश में एक ओर पंचसितारा अस्पतालों के चलन ने जोर पकड़ा है। हेल्थ टूरिजम के बहाने विदेशी पर्यटक बेहतर स्वास्थ्य की उम्मीद में यहां आते हैं और हमारा देश उनकी उम्मीदों पर READ MORE