ताज़ा रेजगारी

Articles by pantumesh

पर तेरा मुस्काना भर कितनों का रोशनदान हुआ

June 17, 2017 // 0 Comments

तेरे बाद ज़माना ये कुछ इस तरह हलकान हुआ दिल्ली तेरी याद में रोई मुंबई तक वीरान हुआ   तेरे हिज़्र के कई दिनों तक यही समझना मुश्किल था शहर हुआ या क़त्ल हुए अरमानों का शमशान हुआ   तूने अपनी एक नज़र से कितने ही दिल ढहा दिए हाय तेरा ये हुस्न ओ ज़ालिम, हुस्न हुआ-तूफ़ान हुआ   ख़ुद को शायर कहने वाले तेरे इश्क़ में ख़ाक हुए उनका तुझपर लिखना भी जैसे तेरा एहसान हुआ   तू तो नहीं आई पर अक्सर आती READ MORE

फिर वही किंतु-परंतु

May 17, 2017 // 0 Comments

बहुत सारा किंतु-परंतु है जीवन में किंतु जब तुम पास होती हो तो सब ग़ायब हो जाता है   मैं बहुत पास से देखता हूँ तुम्हारी मुस्कान इतने पास से कि वो मुझे अपनी लगने लगती है मैं अपनी घबराहटों को महसूस करने लगता हूँ तुम्हारे भीतर और तुम्हारे भीतर का डर कभी-कभी कर देता है मेरे रोंगटे खड़े   किसी रात हम बहुत देर तक एक दूसरे में खोजते रहते हैं एक दूसरे को हमारे स्पर्श लाँघ जाते हैं निजता की READ MORE

‘दुनाली में लगी जंग’ दिखाती ‘अनारकली आरा’

March 29, 2017 // 0 Comments

हमारे समाज की अनारकलियों के जीवन को एक बाहरी की तरह देखने के बजाय ये फ़िल्म उनके अंतर्मन तक पहुंचाती है. ये फ़िल्म हमारे समाज के दुनाली-धारियों की दुनाली में लगी उस जंग को दिखाती है जिसे गोली खाने के डर से हमारा डरा हुआ समाज देखकर भी अनदेखा कर देता है. लेकिन हमारे ही बीच की कोई अनारकली उसे ज़रा घिसती है, तनिक रगड़ती भी है और ज़रुरत पड़ने पर उस दुनाली को पकड़कर उसी पर तान देती है जो उसकी धौंस में READ MORE

यात्रा में होना

September 29, 2016 // 0 Comments

पहाड़ों की पगडंडियों पर चढ़ते हुए मैनें अपना पहना हुआ आलस उतारा और पहन ली कईयों की उतारी हुई थकान   कंकड़ों की चुभन पहनी तो उतार ली अपने तन की कोमलता अपने मन की कठोरता उतारने के बाद नदी की तरलता पहन ली   मेरे भीतर बहुत कुछ उबल रहा था जो मैंने धीरे-धीरे उतार लिया स्निग्धता से भरे हुए साफ़ सुथरी बर्फ के ग्लेशियर पर और पहन ली उसकी शीतलता   दुपहरी की धूप पहनकर मैं गला आया अपने भीतर के पत्थर READ MORE

लड़कियों की ‘हिंट’ समझने से पहले ‘पिंक’ देखें

September 21, 2016 // 0 Comments

कभी-कभी केवल अंडरटोन से काम नहीं चलता. कुछ बातें होती हैं जो दो-टूक , साफ़-साफ़ कहनी पड़ती हैं. जब समाज का एक बड़ा हिस्सा ग़लत ‘हिंट’ लेने लगता है तो उसे केवल ‘हिंट’ देने से काम नहीं चलता. इसलिए पिंक में एकदम बोल्ड और साफ़-साफ़ शब्दों में ‘नो मतलब नो’ का सन्देश दिया जाना सही समय पर एक ज़रूरी हस्तक्षेप की तरह लगता है. पिंक. ये रंग लड़कियों के हिस्से में क्यों आया होगा ? जब पहली बार खुद से हम ये सवाल कर READ MORE

वो घर मेरा ही था जहां रहता नहीं था मैं

August 1, 2016 // 0 Comments

जिसपे निगाह ठहरे वो शफहा नहीं था मैं एक हर्फ़ था, खुद भी जिसे पढ़ता नहीं था मैं होती किसे आखिर मेरे होने की ज़रुरत अपनी ही ज़रुरत का सामां नहीं था मैं खुदको कभी तफसील से जाना नहीं मैंने जाने कि क्या-क्या था और क्या नहीं था मैं मुझको मेरी सांसों की सदा शोर सी लगी बेइंतहा तनहाई थी, तनहा नहीं था मैं लोगों के साथ रास्ते भी भाग रहे थे कबसे खड़ा था फिर भी ठहरा नहीं था मैं दहलीज़ उसकी छूंके कई बार मैं READ MORE

बीमार, तीमारदार और इंतज़ार

June 1, 2016 // 0 Comments

अस्पताल इंतज़ार के मायने समझने की सबसे अच्छी युक्तियों में होते हैं. बच जाने और ख़त्म हो जाने के बीच, ज़ख्म और दवाओं के बीच, उम्मीदों और हताशाओं के बीच, बीमारों और तीमारदारों के बीच वहां इंतज़ार का एक अदृश्य पुल होता है जिसपर चलते हुए अचानक ज़िंदगी एक दर्शनशास्त्र में बदल जाती है. और हम आप एक दार्शनिक में. कई बार ज़िंदगी भी उसी अस्पताल की तरह लगने लगती है जहां अपनी-अपनी देह के बिस्तर पर हम-आप READ MORE

ख़ुद से वादा था पुराना जो निभाया मैंने

May 18, 2016 // 0 Comments

एक झूठा ही सही ख़्वाब सजाया मैंने तुझे अलसुबह अपने पास में पाया मैंने   मेरे जानिब मुझे जो भी मिला बेचेहरा उसके सांचे पे तेरा नक्श बनाया मैंने   तू नहीं थी, मगर उसमें थी महक तेरी हाय क्या सूंघ लिया है ये खुदाया मैंने   तेरे आने का ये जो शोर है, अफवाह है ये अपनी तन्हाई को इक दिन ये बताया मैंने   न तुझे जाने से रोका, न बुलाया वापस न इस बात पे अफ़सोस जताया मैंने   अपनी उम्मीद का घोंटा गला फिर READ MORE

उस बच्चे के होंठ में पालथी मार के बैठी थी पागल

May 1, 2016 // 0 Comments

खिड़की पर परदे और दरवाजों पे रहती है सांकल फिर जाने किस रस्ते से दबे पांव वो गई निकल सड़कों, चौराहों, बाज़ारो, घर से, दफ्तर से गायब दिल से, बातों से, चेहरे से, होंठो से भी गई फिसल इसका, उसका, सबका, चेहरा मुरझाया सा लगा मुझे कुछ तो था जो सबके अन्दर धीरे-धीरे गया बदल जब फुर्सत के दिन थे तो चौखट पे ही दिख जाती थी ‘खुशी’ नाम की वो चिड़िया ना जाने कहां हुई ओझल दिन भर भाग दौड़ कर जाने कहां-कहां खोजी READ MORE

बैठ के बालकनी में मौसम गाये एक ग़ज़ल

April 7, 2016 // 0 Comments

जीने का ढब कुछ दिन को इतना आवारा हो अजनबी पहाड़ी रस्ता हो, पानी का धारा हो वक्त नदी की लहरों में कुछ देर ठहर जाए डूब रही उम्मीदों को तिनके का सहारा हो जल्दीबाजी, शोर-शराबा सबकी छुट्टी कर खुला हुआ आकाश हो और एक टूटता तारा हो रुपया-पैसा, बटुवा, सबकुछ एक किनारे रख मनमर्जी के सिक्कों से जीवन का गुज़ारा हों तितली आँख मिचोली खेले हवा के आंगन में दूर कहीं मीठी लय में बजता इकतारा हो बैठ के बालकनी READ MORE

सोलांग वैली : बर्फ से बाबस्ता वो ढाई घंटे

April 1, 2016 // 0 Comments

ये एक आम ट्रिप होने जा रहा था. हम पहली रात कुल्लू (हिमांचल प्रदेश) में एक होटल बुक कर चुके थे. जिसकी बालकनी से जगमगाता कुल्लू का एक हिस्सा हमारी तरफ झांक रहा था और पेड़ की ओट से मुस्कुराता चाँद कह रहा था – मज़े करो. लकड़ी के बारामदे में बिछी कुर्सियों पर पसरे हमने करीब चौदह घंटे लम्बे सफ़र की थकान मिटाई. दिल्ली से हम पिछली रात के करीब बारह बजे भारत की बांग्लादेश पर ज़बरदस्त जीत के रोमांच के READ MORE

रंगों के मसीहा इस होली, रंगने की समझदारी देना

March 23, 2016 // 0 Comments

रंगों के मसीहा इस होली रंगने की समझदारी देना जिसके छींटे सब तक पहुँचे इक ऐसी पिचकारी देना   उम्मीद  की खाली चादर में मुस्कान मरुनी रंग देना तकलीफ के काले रस्तों पर एक धूप गुलाबी संग देना   इस बार ‘अबीरी सुबहों’ में कुछ और करीबी बढ़ जाएं ताज़ी सी खुशी के गहरे रंग शिद्दत से सभी पर चढ जाएं   मेरे हिस्से का भी सूरज उगना होगा, उग जाएगा रंगों से भरा वो इन्द्रधनुष जब आएगा तब आएगा   मैं READ MORE

ये ‘जेएनयू’ तो एक ऐसा शज़र है

February 15, 2016 // 0 Comments

#StandWithJNU अभी माहौल कुछ बिगड़ा इधर है मगर मुंह खोलना ही पेशतर है अभी चुप रहने का मंजर नहीं है सुनो यह बात मेरी मुख़्तसर है मैं तुमको अहतियातन कह रहा हूं नहीं आसान आगे का सफ़र है बताओ चोट कैसे ठीक होगी वो देता ज़ख्म है, पर चारागर है नया पन्ना पलटना चाहता हूं मगर वो फाड़ देंगे मुझको डर है हैं अब लफ़्ज़ों के मानी मुश्किलों में समझने का कहां उनमें सबर है किताबों से डरे सब लोग हैं ये इल्म की बात इनपर READ MORE

सूरजकुंड मेले पर एक वीडिओ कोलाज

February 10, 2016 // 0 Comments

मेरे घर की दीवारों पर अब राजस्थान की कुछ कठपुतलियां मुस्कुरा रही हैं. दक्षिण भारत की कुछ लकड़ी की चिड़ियाएं मूक चहचहा रही हैं. कुछ रंग-बिरंगे कागज़ के सिपाही मेरी दीवार से मुझे लिखता हुआ देख जाने क्या सोच रहे हैं. और वो एक जापानी मुस्कराहट मेरी आंखों के सामने अब भी नाच रही है. सूरजकुंड मेले से लौटे दो दिन हो गए हैं पर कुछ है जो भीतर रह गया है. ‘देश की विविधता’ नाम की ये चीज़ जब राजनीतिक READ MORE

अंधेरा, रोशनी से बात करता पाया गया

February 3, 2016 // 0 Comments

राह भर जितनी दूर मेरा-तेरा साया गया अंधेरा, रोशनी से बात करता पाया गया. दूर जाना ही मुकद्दर है हमारा शायद पास आकर एक दूजे को समझाया गया हवा को शक था तेरी और मेरी निगाहों में उसे अपनी जुदाई का यकीं दिलाया गया दिल ने तो खैर जो कहा सो कहा ज़हन ने जो कहा उस दिन उसे अपनाया गया वो आख़री आंसू था जिसे पोंछ दिया हर गिले-शिकवे को यूं भुलाया गया उस रोज फिर न मिलने का जो वादा किया उस वादे को ताउम्र फिर READ MORE

एक चुटकुला हंसी की कमी से मर गया

January 31, 2016 // 0 Comments

ये भीड़ से भरा शहर यूं अकेला कर गया एक चुटकुला हंसी की कमी से मर गया यहीं रहता था, मसखरा था एक कल से मिलता नहीं, जाने किधर गया तुमने देखा हो तो बता दो ना वो शायद मेरी खुशी लेकर गया सबके चेहरे क्यूं यहां बेरौनक हैं कौन बेनूर सबको यूं कर गया वो जिसे सब ढूंढने में हैं मसरूफ वो कहीं है ही नहीं कोई बताकर गया कपड़ों के सिवा कुछ नहीं बदला कबसे सुबह उठा, नहाया, और दफ्तर गया मैं शहर आया, रहा, आखिर में READ MORE

बंद दरवाज़े पे बस अखबार डलता रह गया

January 29, 2016 // 0 Comments

बेरंग सा एक दिन अपने रंग बदलता रह गया रोशनी में डूबकर सूरज पिघलता रह गया बिक रहा था यूं अकेलापन खुले बाज़ार में बिन खरीददारों के कारोबार चलता रह गया नीद को भी जागने की इस कदर लत लग गई ख़्वाब एक मायूस सा बैठा मचलता रह गया बंद कमरे में अकेले रोशनी घुटती रही एक कोने में दिया बेकार जलता रह गया जिस तरफ खिड़कियां खोली उस तरफ दीवार थी अलसुबह खिड़की का परदा आंख मलता रह गया पार्क की उस बेंच ने तापी READ MORE

बड़ा शायर था वो कुछ शेर लिखकर मर गया होगा

January 27, 2016 // 0 Comments

वो कुछ अलफ़ाज़ अपने नाम सबके कर गया होगा बड़ा शायर था वो कुछ शेर लिखकर मर गया होगा सभी मसरूफ रहते हैं कि इतना वक्त किसको है मुझे शक है कोई उसके जनाजे पर गया होगा किसी की शान में शायद कसीदे पढ़ नहीं पाया किसी के गाल पर शायद तमाचा कर गया होगा गरीबों के हुकूकों पर लिखा करता था वो अक्सर कोई उसकी गरीबी देखकर ही डर गया होगा न जाने क्यों कलम से उसकी, कुर्सी खौफ खाती थी उसे वो जूतियों की नोक पर रखकर READ MORE

सीख रहे हैं हम इस तरह शहर होना

January 25, 2016 // 0 Comments

धूप सेकना, बरसातों में तर होना बर्फ पड़े तो गरम-गरम बिस्तर होना मां का गरम पकौड़ी तलकर ले आना ‘गप्प’ मारकर दिन की गुजर-बसर होना अंगीठी में तपे कोयले सी एक शाम रात का खाना साथ में मिलजुल कर होना बंद कमरों ने सारे मौसम छीन लिए ऐसे ‘शिफ्टों’ में घर का दफ्तर होना अपने आज को टांक के वक्त की सूली पर                             चाहें जाने किस कल का बेहतर होना फुर्सत भी चिड़ियों जैसी लापता हुई सीख READ MORE

हर आत्महत्या कई सवाल छोड़ जाती है

January 19, 2016 // 0 Comments

क्या है ये जो दिमागों में इस हद तक भर जाता है कि मन को खाली कर देता है ? समाज में उन मान्यताओं का क्या अर्थ है जिनसे जीवन जैसी नायाब नेमत भी किसी ख़ास वर्ग या व्यक्ति के लिए अर्थहीन हो जाती है. हमारी जाति, हमारा धर्म, हमारी सत्ता, हमारी संस्थाएं, हमारा ओहदा इतना बड़ा कैसे हो सकता है कि उसके सामने मानवता बार-बार हार जाती है ? हमारे-आपके आस-पास होते हुए भी कोई इतना खाली इतना, बेजार कैसे हो जाता READ MORE

जगमग शहर में अंधेरे से जूझते हुए

December 5, 2015 // 1 Comment

नोट: यह लेख नवभारत टाइम्स (5 दिसंबर 2015) के सम्पादकीय पृष्ठ पर प्रकाशित हुआ है. मूल रूप से लिखा गया पूरा लेख यहां पेश है.  मुंबई के वर्सोवा बीच की रेत अभी-अभी सुनहरे रंग से लाल हुई थी और अब उसने अपना असल रंग भी खोना शुरू कर दिया था. सूरज डूब ही रहा था. किनारे चट्टान पर खड़ा एक शख्स बहुत देर से गहराते आकाश में अपनी मायूसी का रंग तलाश रहा था. मैंने कुछ दिनों में रिलीज़ होने जा रही ‘गेंग्स ऑफ़ READ MORE

मोदी जी याद रखियेगा जहां में नूरजहां और भी हैं

November 29, 2015 // 0 Comments

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कल अपने मन की बात में सोलर लालटेन की मदद से गाँव को रौशन करने वाली कानपुर के दरियांव की ‘नूरजहां’ का ज़िक्र किया और वो चर्चा में आ गई और ये खबर हर मीडिया हाउस की सुर्ख़ियों में. लेकिन ये बात तब की है जब मोदी जी प्रधानमंत्री नहीं थे, और गाँव कनेक्शन देश का सबसे बड़ा ग्रामीण अखबार नहीं था. तब कानपुर की ही ऐसी और भी कई महिलाओं पर मैंने एक विस्तृत रिपोर्ट लिखी READ MORE

देश की राजधानी में नींद भी है एक सपना

November 14, 2015 // 0 Comments

नोट: लेख मूलतः नवभारत टाइम्स के लिए लिखा गया है और  14 नवम्बर 2015 के सम्पादकीय पृष्ठ पर प्रकाशित हो चुका है. दिल्ली में जिन सड़कों, फ़्लाइओवरों, से आप गुजरते हैं उनके आस-पास रात के वक्त ऐसे लोगों की दुनिया बस जाती जिनकी ज़िंदगी का सबसे बड़ा सपना है – नींद. उस शहर में जहां रियल एस्टेट का बाज़ार अपने बूम पर हो, तीन कमरों और एक छत के लिए जहां लोग करोड़ रूपये तक खर्च कर देने की हैसियत रखते हों वहां एक READ MORE

एक गिलहरी धूप के हाथ से बिस्किट छीन के भागी थी

October 24, 2015 // 0 Comments

उस दीवार पे खिड़की थी और खिड़की पर एक गोरैया बहुत दिनों से ढूंढ रहा हूं, वो तस्वीर मिलेगी क्या ? एक गिलहरी धूप के हाथ से बिस्किट छीन के भागी थी लौट के बरसों से ना आई, फिर से धूप खिलेगी क्या ? एक कटोरी खुशी रखी थी कबूतरों के चुगने को वक्त के पांव से छलक गई है, फिर से खुशी भरेगी क्या ? मां के हाथ में सलाइयों की चोचें अक्सर लड़ती थी यहां शहर में ठंड नहीं है, मां बनियान बिनेगी क्या ? ईद से पहले शबनम READ MORE

‘हंसा’ :गांव में शहर की गुपचुप घुसपैठ

October 18, 2015 // 0 Comments

हंसा। थियेटर और सिनेमा के अदाकार मानव कौल ने जब इस फिल्म को अपनी फेसबुक टाइमलाइन पे शेयर किया तो पता नहीं था कि इस लिंक के ज़रिये मैं उस दुनिया में पहुंचने वाला हूं जिसे मैने बचपनभर जिया है।   आइएमडीबी बताता है कि ये फिल्म 2012 में रिलीज़ हुई और इसे 8.3 की रेटिंग से भी नवाजता है। यूट्यूब पर शायद ये फिल्म ताज़ा ताज़ा अपलोड की गई है। मेरे लिये उत्तराखंड के परिवेश पर अब तक मानीखेज़ एक ही READ MORE

बेकायदे का प्यार

September 20, 2015 // 0 Comments

कभी कभी मन करता है सब यहां-वहां सा हो जाए तितर-बितर एकदम कुछ भी न रहे करीने से सुबह-दिन-शाम-रात बन जाए सुबह-रात-दिन-शाम या फिर दिन-सुबह-रात-शाम सर्दियों के बीच गर्मियां होने लगें बारिशें धूप के ऊपर गिरने लगें टप-टप बोलना सुनाई देने का मोहताज न रहे शहर में गाड़ियों की जगह गाय-बकरियां तैरने लगें पंखों की मशीनी कर्कश आवाज़ को निचोड़ने पर बाल्टी में भरने लगे ग़ुलाम अली की ग़ज़ल आकाश आर्ट बुक हो READ MORE

जो करके खोखला गया

August 10, 2015 // 0 Comments

मैं कुछ तलाशता तलाशता किधर चला गया जो साफ़-साफ़ दिख रहा था वो भी धुंधला गया जो सच था वो भी झूठ ही मिला तो तब बुरा लगा यकीन मानने का मेरा हौसला चला गया जो प्यास थी बुझी नहीं, न जाने किसकी प्यास थी सूखते गले में वो उदासिया पिला गया खुशी भी उम्र लेके आई बीतकर चली गई गया भी वो औ यूं कि हमको करके इत्तला गया न जाने किसको क्या मिला, न जाने किसका क्या गया कुछ तो ऐसा भर गया जो करके खोखला READ MORE

एफटीआईआई के छात्रों के समर्थन में जुटे सैकड़ों कला-प्रेमी

August 3, 2015 // 0 Comments

जंतर मंतर पर विरोध-प्रदर्शन :   एफटीआईआई में गजेन्द्र चौहान की चेयरमैन के रूप में नियुक्ति के विरोध में आज जंतर-मंतर पर विरोध प्रदर्शन हुआ. जिसमें फिल्म संस्थान पुणे (एफटीआईआई ) के छात्रों के समर्थन में डीयू, जामिया सहित दिल्ली के तमाम विश्वविद्यालयों के छात्र-छात्राओं ने बढ़-चढ़ कर भाग लिया. साथ ही आइसा, केवाईएस, इप्टा, अस्मिता सहित तमाम  संगठनों ने इस विरोध प्रदर्शन को समर्थन दिया. READ MORE

हम अपने भीतर के कट्टरपंथ को फांसी क्यों नहीं दे देते ?

July 31, 2015 // 0 Comments

ऐसे मौकों पर मैं खुद को बहुत अकेला और उदास पाता हूं। मुझे नहीं पता होता कि मैं किस तरफ खड़ा होउं। मैं अपने आपको उस ‘सामूहिक चेतना’ का हिस्सा बनते हुए नहीं देख पाता जिसे ‘किसी’ को फांसी मिलने पर ‘फांसी मुबारक’ सरीखे जुमले उछालने का मौका मिल जाता है। जिसे किसी को फांसी मिलने में एक ‘उन्मादी सकून’ मिलता है। मेरे असमंजस और उदासी की मूल वजह इस सवाल के जवाब की तलाश में छिपी है READ MORE

दस्तूरी समाज में कस्तूरी तलाशते दिलों की कहानी : मसान

July 27, 2015 // 0 Comments

वो कहती है- “तुम बहुत सीधे और ईमानदार हो। बिल्कुल निदा फाज़ली की गज़लों की तरह।” वो पूछता है – “निदा फाजली, वो कौन हैं ?” और उसका एक मासूम सा जवाब-“यही तो तुम्हारी ईमानदारी है। “ ये स्वीकार्यता हर रिश्ते में नहीं होती। नायिका बशीर बद्र की फैन है। दुश्यंत कुमार की कविताओं की शौकीन है। और जानती है कि नायक ने अगर चकबस्त को सुन लिया तो वो बेहोश हो जाएगा। पर इस जानने में अहमन्यता READ MORE

भारतीय समाज का ‘चेस्टिटी टेस्ट’ : ‘सेक्रेड ग्लास बाउल’

July 25, 2015 // 0 Comments

प्रिया ‘सेक्रेड ग्लास बाउल’ का जो खूबसूरत प्रतीक अपनी फिल्म में गढ़ती हैं उसका सीधा सा अर्थ यही है कि लड़कियों को हमेशा ये सिखाया जाता है कि उनके पास एक ऐसी चीज़ है जिसे उन्हें सुरक्षित रखना है। सुरक्षा का यही भाव उन्हें एक खास उम्र के बाद डरकर रहने को मजबूर कर देता है। वो तबतक खुलकर नहीं जी पाएंगी जबतक उनके मन में इस ग्लास बाउल को बचाकर रखने का दबाव बना रहेगा। जबतक उनके चरित्र को READ MORE

बाद बारिश के

June 21, 2015 // 0 Comments

फूल चादर की तरह लाल मिट्टी वाली उस कच्ची सड़क पर बिछे थे। रेंगती हुई चींटियां खुश थी कि बारिश के बाद ही सही उन्हें नयी सलवटें नसीब हुई. गिलहरियां आहटों का रास्ता काटती हुई सी फुदक कर कहीं दूर ओझल होती रही थी. मोर अपने पंख फैलाए धूप की अचकनें पहनकर जंगलों में खो रहे थे. दूर कहीं तितलियां भी थी जो टहनियों की पत्तियों से दोस्ती बढ़ाने में मशगूल थी. हवा आज देह को झुलसाने पर आमादा नहीं थी.. READ MORE

सुबह की सैर जैसे सपना हो गई हो

June 20, 2015 // 0 Comments

बाद बारिश के सुबह की सैर जैसे रात का सपना हो गई थी.. ज़मीन अभी भी नम थी.. जैसे कभी कभी उसकी आंखें हो जाया करती हैं उसकी याद में.. उतनी ही पाक-साफ़, उतनी ही मासूम.. ज़मीन पर बिखरे हुए फूलों को देखकर उसे लगा कि उसकी यादों का रंग शायद हल्का पीला होता होगा.. उसने गीली हो गई उस हरी बेंच पर बिखरी उन मासूम पंखुडि़यों को गौर से देखा.. उनके बिखरने में खूबसूरती तो थी पर उस खूबसूरती के पीछे एक टूटना रहा READ MORE

अब उन पहाड़ी मैगी पॉइंट्स का क्या होगा ?

June 12, 2015 // 2 Comments

डियर मैगी, कल जब किराने की दूकान में गया तो जाते ही कहा…आंटी मैगी..ये कहते ही मुझको रुकना पड़ा..न चाहते हुए भी.. तुम वहीं शेल्फ में रखे थे..पर आज पहले की तरह सबसे आगे की लाइन में खड़े मुस्कुरा नहीं रहे थे…तुम्हें कहीं पीछे कई और नूडल्स से ढंकते हुए किसी अपराधी की तरह छुपाया गया था.. न चाहते हुए भी आज नज़र दूसरे नामों के नूडल्स को तलाश रही थी..समझ नहीं आ रहा था कि तुम्हारी जगह किसे चुनूं? तुम READ MORE

‘ओल्ड स्कूल’ होकर भी ‘घणी बांवरी’ सी फिल्म

May 24, 2015 // 0 Comments

एक शक्ल की दो लड़कियां हैं जिनमें एक ओरिजनल है एक डुब्लिेकेट। अब असल मुद्दा ये है कि जो आॅरिजनल है वो नायक को अब आॅरिजनल नहीं लगती। वो डुब्लिकेट में आॅरिजनल तलाश रहा है। नायक को यहां चाॅइस मिलती है कि वो रिबाॅक पसंद करे या फिर रिब्यूके ? पर असल सवाल ये है कि क्या आॅरिजनल भी यही रखेंगे और डुब्लिकेट भी ? यहां कोई ईंट से ईंट जोड़ने के लिये सीमेन्ट तलाश रहा है वो चाहे किसी भी कंपनी का हो और READ MORE

क्यों वीरान हो गई पहाड़ की बाखलियां

May 21, 2015 // 0 Comments

पिछले कुछ सालों में प्रदेश की अर्थव्यवस्था में जिन क्षेत्रों का बोलबाला रहा उनमें कंस्ट्रक्शन, मैन्यूफैक्चरिंग और जलविद्युत ऊर्जा प्रमुख हैं। बीते दौर में कलकारखानों और खनन में 15 फीसदी की विकास दर देखी गई जबकि कृषि में यह विकास दर केवल 2 फीसदी की रही। ज़ाहिर है कृषि क्षेत्र के विकास में सरकार की रुचि खनन और कारखानों की तुलना में बहुत कम रही और इसकी वजहें किसी से छिपी नहीं है। READ MORE

ये ‘निर्णय’ आखिर किसका है ?

April 28, 2015 // 0 Comments

पुष्पा रावत कैमरा लेकर निकलती है निम्न मध्यवर्गीय परिवार की युवा लड़कियों की उन इच्छाओं की खोज में जिन्हें रोजमर्रा की जिन्दगी जीते हुए उनके चेहरे, उनके व्यवहार में खोज पाना मुश्किल है। वो इच्छाएं या तो धीरे धीरे मर रही हैं या फिर उन पर थोप दी गई जिम्मेदारियों के मलवे में इतनी नीचे दबी हुई हैं कि कई बार ये इलहाम तक हो जाता है कि वो हैं भी या नही। उस कमरे में जिसकी दीवार का रंग एकदम READ MORE

राहे सुखन है संजय वन

April 23, 2015 // 0 Comments

उस जंगल की परिधि से लगी छोटी-बड़ी इमारतें ऐसी लग रही थी जैसे किसी शांत सी झील को कंटीले तार-बाढ़ से घेर दिया गया हो. जैसे पूरा शहर धीरे धीरे इस जंगल को अपने चंगुल में घेर रहा हो..लील जाने के लिए और हज़ारों पेड़ इस घेरे में सिमटे हुए अपने बचे रहने के लिए जी-तोड़ संघर्ष में लगे हों. कुछ देर यूं ही मचान के पास ही के उस मखमली घास के मैदान में लेटे रहे. आसमान से गिरती धूप को चेहरे पर पड़ने से बचाने के लिए READ MORE

कहीं दराती बीमार तो नहीं कर रही ?

April 20, 2015 // 0 Comments

विवेकानंद पर्वतीय कृषि अनुसंधान संस्थान ने बनाये पहाड़ी खेती के लिये नये उपकरण, उपकरणों में लकड़ी की जगह रबर और, लोहे के प्रयोग पर दिया बल “हल बनाने के लिये अब तक बांज, सनड़ जैसे चौड़ी पत्ती वाले पेड़ों की लकड़ी का इस्तेमाल किया जाता है। ये पेड़ अपनी जड़ों में बारिश के पानी का संचय करते हैं। ज़मीन की सतहों पर अब 10 इंच तक भी पानी नहीं रह गया है जिसकी मुख्य वजह कृषि उपकरणों के लिये होने READ MORE

क्या सचमुच सम्भव है ‘नेट न्यूट्रेलिटी’ ?

April 15, 2015 // 0 Comments

जनाब आप किस नेट न्यूट्रेलिटी की बात कर रहे हैं ? क्या सचमुच नेट पर न्यूट्रेलिटी या इन्टरनेट तटस्थता जैसी कोई चीज़ सम्भव है ? क्या वर्तमान परिप्रेक्ष में इन्टरनेट की दुनिया वैसी है जैसी हम असल दुनिया को बनाना चाहते हैं ? वो दुनिया जिसमें तमाम संसाधनों पर सभी का बराबर हक हो। क्या सचमुच ये घास उतनी ही हरी है जितनी इसे बताया जा रहा है ? फर्ज कीजिये कि आप गो डैडी पर एक डोमेन खरीदते हैं। तो READ MORE

सिनेमा : शटर से थियेटर तक

April 10, 2015 // 0 Comments

मैं इस वक्त उत्तराखंड के पिथौरागढ़ में हूं।अपने ननिहाल में।कुछ हफ्ते भर पहले रिलीज़ हुई एनएच 10 देखने का मन है।पर अफ़सोस कि मैं उसे बड़े परदे पर नहीं देख पाऊंगा।क्यूंकि ज़िला मुख्यालय होते हुए भी यहां एक सिनेमाघर नहीं है जहां ताज़ा रिलीज़ हुई मुख्यधारा की फ़िल्में देखी जा सकें।एक पुराना जर्ज़र पड़ा सिनेमाघर है जिसके बारे में मेरी मामा की लड़की ने मुझे अभी अभी बताया है – “वहां तो बस बिहारी READ MORE

महत्वाकांक्षाओं का ‘आप’निवेशिक काल

March 28, 2015 // 0 Comments

ये राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं का ‘आप’निवेशिक काल था. वो धारा जो न दक्षिणपंथी लगती थी, न वामपंथी अब वो ‘कमीनपंथी’ पर उतर आई थी. पार्टी बनाने वाले, पार्टी चलाने वाले के लिए ‘कमीने-साले’ हो गए थे. इस ‘आप’निवेशिक काल का अविर्भाव आदर्शों के अतिरेक की ज़मीन पर हुआ, वो ज़मीन जो दरअसल अपनी नहीं थी. देश के अन्नाओं, गांधियों, अम्बेडकरों की ज़मीन का अतिक्रमण करके वो ज़मीन कब्जाई गई थी. ठीक उसी दौर में READ MORE

हत्याओं के प्रतिशोध से गुजरता हाइवे

March 23, 2015 // 0 Comments

एन एच 10 के एक दृश्य में मीरा (अनुष्का शर्मा) हाइवे के किसी ढाबे के गंदे से टॉयलेट के दरवाज़े पर लिखे उस एक शब्द को मिटाती हैं- रंडी. हमारे समाज के एक बड़े हिस्से की मानसिकता उसी गंदे टॉयलेट के सड़े-गले टीन के दरवाज़े की तरह ही है. एनएच 10 उस एक गीले कपड़े की तरह उस मानसिक गंदलेपन को पोंछने की एक अच्छी कोशिश करती है. फिल्म हाइवे पे तो निकलती है लेकिन ऐसी पगडंडियों को नमूदार करते हुए जिनके READ MORE

आप इतने बैन-खोर क्यों हैं सरकार ?

March 11, 2015 // 0 Comments

प्रिय सरकार, सुनिये ना। यहां तो कुछ भी कुशल से नहीं है फिर आपकी कुशलता की कामना हम करें भी तो कैसे ? फिर भी आपसे एक बात कहनी थी। आप ये बात-बात पर जो बैन-बैन खेलनेे लगते हो ना बड़ा अजीब लगता है। और फिर उसके पीछे जो तर्क देने लगते हो उसपर बड़ी हंसी छूटती है। गुस्सा तो खैर आता ही है। अब निर्भया पर बनी फिल्म इन्डियाज़ डाॅटर को लेकर ये मौजूदा विवाद ही देख लो। आपकी दिक्कत है कि इससे READ MORE

कसेट वाले ज़माने में मोह के धागे

March 4, 2015 // 0 Comments

बाज़ार के सामने बार-बार हारता बाॅलिवुड जब दम लगाता है तो दम लगाके हाइशा सरीखा कुछ सम्भव हो पाता है। दम लगाके हाइशा खुद को हारते हुए देखकर भी जीतता हुआ महसूस करने सा अनुभव है। हमारी नज़र भर से जि़न्दगी के तमाम चेहरे एकदम बदल जाते हैं। जो चीज़ हमें जैसी लगती है ठीक वैसी वो कभी होती ही नहीं। हमारी अपनी सीमाएं उस चीज़ के हमारी जि़न्दगी में मायने बदल देती हैं। इसके असर कई बार दूसरों से और READ MORE

‘यात्री मोड’ के नफे नुकसान

January 20, 2015 // 0 Comments

दिल्ली में किये काम के (छोटे-मोटे विलंबित) चैक  मुंबई के पते पर मंगाते हुए लग रहा है कि इन दिनों शहर कपड़ों की तरह बदल रहा हूं…  जनवरी के आते आते दिल्ली और मुंबई के बीच बदलता यही है कि जेकेट से लदे दिन टी-शर्ट से हल्के हो जाते हैं… जैसे सिहराती सर्दी और हल्की सी  हवा वाले गुनगुने दिन दो बच्चों की तरह साथ साथ दौड़ रहे हों.. कभी कोई आगे तो कभी कोई पीछे.. ‘कब आओगे’ या ‘कब जाओगे’ का ठीक READ MORE

पीके एकदम ‘लुल’ नहीं है

December 21, 2014 // 0 Comments

चलिये शुरु से शुरु करते हैं। पीके इसी भाव से शुरु होती है। एकदम नग्न। आवरणहीन। इस विशाल दुनिया के मरुस्थल में एक नंगा आदमी खड़ा है जिसे दुनिया के बारे में कुछ नहीं पता। ठीक उस मानसिक अवस्था में जैसे हम पैदा होने के ठीक बाद होते हैं। ठीक इसी बिन्दु पर फिल्म से बड़ी उम्मीदें बंध जाती हैं। एक एलियन की नज़र से इस दुनिया को देखना जिसके लिये ये दुनिया एक अनजान गोला भर है। वो नज़र जिसमें कोई READ MORE

क्या इन्द्रधनुष एक सच है

December 19, 2014 // 0 Comments

“ये“ लोग 2021 तक पूरे देश को हिन्दू बना देने की बात करते हैं। और सरहद पार से “वो“ लोग चाहते हैं कि पाकिस्तान के बाद भारत में इस्लाम अपनी परवाज़ भरने लगे। ये पहचान के कुछ चैखटे हैं जिनमें कट्टरपंथी अपनी-अपनी मजऱ्ी के मुताबिक आपको और हमें फिट कर देना चाहते हैं। पहचानों की इस रणभूमि में जो ताकतवर है उसकी आवाज़ें अखबारों, समाचार पत्रों और यहां तक कि सोशियल मीडिया में सुखिर्यां बटोर लेती READ MORE

उत्तराखंड बाइक यात्रा -4

December 4, 2014 // 1 Comment

चौथा दिन : बेरीनाग-चौकौड़ी-राईआगर-गंगोलीहाट    सुबह-सुबह हम बेरीनाग से चौकोड़ी के रवाना हो गए. मौसम एकदम खुला हुआ था. आकाश एकदम साफ़ और हवा मंद मंद बह रही थी. बाइक-यात्रा के लिए ये एकदम मुफीद मौसम था. चौकोड़ी पहुंचकर हम काफी देर तक खुद के वजूद को जंगल के हवाले किये बैठे रहे. एकदम शांत माहौल और सामने हिमालय की श्रृंखलाओं का मनोरम दृश्य. बिना कुछ बोले केवल प्रकृति को निहारते हुए ही यहां कई READ MORE

उत्तराखंड बाइक यात्रा – 3

December 3, 2014 // 0 Comments

तीसरा दिन: अल्मोड़ा-धौलछीना-सेराघाट-राईआगर-बेरीनाग सुबह के करीब साड़े नौ बजे हम अल्मोड़ा से रवाना हुए। अब तक बिना नागा भागती बाइक को अब कुछ ईंधन की ज़रुरत आन पड़ी थी। हमने अल्मोड़ा में ही उसकी इस ज़रुरत को पूरा कर लिया। टैंक दूसरी बार फुल कराया जा चुका था। आज का हमारा अगला तय पड़ाव गंगोलीहाट था। हम किसी जल्दबाजी में नहीं थे। अव्वल तो अल्मोड़ा से गंगालीहाट की दूरी तकरीबन 109 किलोमीटर READ MORE

उत्तराखंड बाइक यात्रा – 2

December 2, 2014 // 0 Comments

दूसरा दिन: नौकुचियाताल-गागर-रामगढ़-प्यूरा-अल्मोड़ा पहले दिन के सफर की थकन रात को एक अच्छी नीद में तब्दील हुई तो सुबह-सुबह आंख खुल गई। करीब साढ़े छह बजा था। हम पहले ही तय कर चुके थे कि सूरज के जागते ही हम उससे मिल आयेंगे। बस ज़रुरत भर पानी की छपकियां मुंह में देकर हमने जूते कसे, जैकेट लादे और कैमरा उठाकर चल पड़े। इस ताज़ी सुबह में बाइक पर बैठे पहाड़ी पर चढ़ते उस कच्चे रास्ते पर हम बढ़े READ MORE

उत्तराखंड बाइक यात्रा -1

December 1, 2014 // 0 Comments

पहला दिन: दिल्ली-रामपुर-नौकुचियाताल 21 नवम्बर से 27 नवम्बर हम लगातार हिमालय का पीछा करने वाले थे। 20 तारीख की सुबह ठीक साड़े छह बजे जब हम दिल्ली से रवाना हो रहे थे तो ये बात हमारे ज़हन में कहीं नहीं थी। सुबह अभी एक धुंधलके से जाग रही थी। पैट्रोल टैंक फुल किया चुका था। धीरे धीरे अपने चेहरे से अंधेरे की चादर हटाता सूरज हमें अपने बैगपैक के साथ एवेन्जर बाइक पर दिल्ली की सड़कों से गुजरता हुआ READ MORE

अधूरी होकर भी मुकम्मल दुनिया

September 13, 2014 // 0 Comments

फाइन्डिंग फैनी इस स्वार्थी और व्यस्त होती जा रही दुनिया में एक ऐसी जगह की खोज की कहानी है जहां सबसे सबको मतलब होता है। या फिर ये कि स्वार्थी और व्यस्त जैसे बड़े और गम्भीर लफ्ज़ों से उपजने वाले भावों को किसी पुरानी जंग लगी कार में बिठाकर रोजी की उस उस मरी हुई बिल्ली के साथ दफना आने की कहानी है फाइन्डिंग फैनी। रात के वक्त एक अकेले से घर में रह रहे फर्डी को एक खत आता है। खत देखकर फर्डी READ MORE

कहानी : घुटने का दर्द

September 5, 2014 // 0 Comments

 1. अगस्त क्रान्ति राजधानी मुंबई सेन्ट्रल के प्लेटफाॅर्म एक से चल पड़ी थी। मम्मी खिड़की के बाहर भागती हुई दुनिया को देख रही थी और पापा अभी अभी आये मिड डे अखबार को पलट रहे थे। हमारी तीन सीटों में से एक सीट 8 नम्बर की थी जो उस कोच के दूसरे छोर पर थी। मैं उस सीट को देखने के लिये जाकर वापस लौटा तो देखा कि एक 45-46 साल का लगने वाला, उचले चेहरे पर नज़र के चश्मे पहना वो अजनबी आदमी पापा को कुछ बताये जा READ MORE

वक्त की उंगलियों में नाचती है ज़िंदगी की कठपुतली

August 27, 2014 // 0 Comments

रात का तकरीबन नौ बज रहा था। संगीत नाटक अकादमी से बाहर निकला ही था कि मेनरोड पर एक रिक्शेवाले को अपने रिक्शे पर कपड़ा मारते हुए देखा। पूछा कि क्या वो अम्बेडकर पार्क की तरफ जाएगा? मुझे इसी ओर आना था। रिक्शेवाले ने मना कर दिया। तभी पीछे एक शख्स को साईकिल के खड़ा पाया। वो शख्स अपनी साईकिल रोक के मेरी ओर देख रहा था। मेरे मुड़ने पर तकरीबन 40-45 साल के उस आदमी ने कहा कि ”मैं भी चारबाग की तरफ जा READ MORE

मैगी बनाने में १० मिनट पर सेक्स ‘टू मिनट नूडल्स’ की तरह क्यूं ?

August 24, 2014 // 0 Comments

Lucknow Diary (नोट : डायरी करीब २ साल  पुरानी है पर गुल्लक में पहली बार छप रही है ताकि आगे के लिए सहेजी जा सके) सेक्स सोसाईटी एन्ड शी…. लखनऊ में इस नाम से कोई थियेटर शो है, पहले तो ये जानकर ही जरा आश्चर्य हुआ। साथी गौरव मस्तो स्रीवास्तव निमंत्रण पत्र देके गये थे। लखनऊ में थियेटर देखने का पहला अवसर था ये इसलिये उत्साह भी बहुत था। संगीत नाटक अकादमी पहुंचे तो वहां पहले से भोजपुरी महोत्सव के रंग READ MORE

Singham returns : A poetic review

August 15, 2014 // 1 Comment

  मन  बिफर उठे, तन तड़प उठे परदे पे फिल्म जब आवे सिंघम ना फन आये, ना  मन आये सेम कथा दोहरावे सिंघम कॉपी पेस्ट बनावत सिंघम फिर गाड़ियां उड़ावत सिंघम लॉजिक नहीं लगावत सिंघम धत तेरे की हो जावत सिंघम साथ में लेके करीना को बोझिल लव ट्रेक बनाए सिंघम ढाई घंटे की मूवी में बिलकुल इन्ट्रेस्ट ना आये सिंघम फ्री में पुलिस की प्रचारक सिंघम एंड में शर्ट उतारक सिंघम आर एस एस अवतारक सिंघम पहले से कम मारक READ MORE

आँखें खोलने की नसीहत देती ‘आँखों देखी’

August 8, 2014 // 1 Comment

दो समानान्तर रेखाएं अनन्त पर मिलती हैं। बाउजी इस बात को मानने से इनकार देते हैं। दो समानान्तर रेखाएं अगर मिल गई तो वो समानान्तर हो ही नहीं सकती। बाउजी के लिये ऐसा कोई अनन्त नहीं बना जहां हम-आप अपनी सुविधा के लिये दो समानान्तर रेखाओं को मिला देते हैं। दरअसल बाउजी उस गणित को अपनी दुनियां से बेदखल करने की ठान चुके हैं जो किसी और के सच के हिसाब से अपने समीकरण तय करता है। वो गणित जो READ MORE

उन चीज़ों को खोते हुए देखना जो आपको बनाती हैं

August 3, 2014 // 0 Comments

Beasts of the southern wild हशपपी का खुद पर और जीवन की अच्छाईयों पर एक गहरा और अटूट भरोसा है। ये भरोसा उसकी अपनी बनाई दुनिया से जुटाये आत्वविश्वास से आता है। हशपपी मानती है कि पूरी दुनिया का अस्तित्व इस बात पर निर्भर करता है कि हर जीज़ अपनी-अपनी जगह पर सही तरीके से फिट हो। यदि इनमें किसी एक भी चीज़ यहां तक कि सबसे छोटी चीज़ में विध्वंश होता है तो पूरी दुनिया नष्ट हो जाएगी। वो खुद को इस बड़े संसार  का READ MORE

ये नगरिया ‘पहले आप’ की, ‘जनाब’ की है

July 29, 2014 // 0 Comments

ये नगरिया ‘पहले आप’ की, ‘ज़नाब’ की है                                                                                                               यहां दूसरे की भी दुकान आपकी है ‘कड़ाई’ में है चिकन और ‘कढ़ाई’ में भी चिकन भई कुछ और बात टुंडे कबाब की है हर किसी को यहां ‘मज़ा आती’ है यहां बाग़ों के मजे़ लेते हाथी हैं मैं को हम और तू को आप कहते हैं सिम्पल सी बात भी ‘गज़ब’ हो जाती है. यहां READ MORE

एक औरत के मन तक ले जाती फिल्म

July 12, 2014 // 0 Comments

Film : A woman under influence कितनी फिल्में होंगी जो स्त्रियों के मनोविज्ञान में बहुत गहरे तक झांकने की कोशिश करती हैं। फिल्म जगत में ऐसी फिल्मों की स्थिति माइनोरिटी की तरह ही होगी। जाॅन कैसेवेटस (John cassavetes) की फिल्म अ वुमन अन्डर इन्फलुएंस ऐसी ही फिल्मों में है जो रिश्ते, परिवार, अपने व्यवहार और यहां तक कि अपने वजूद के प्रति एक स्त्री की असुरक्षा, भय और इस वजह से पनपी मनोवैज्ञानिक अस्थिता को मानव स्वभाव READ MORE

अकेलापन समेटकर मुस्कराहट बिखेरती Amelie

July 9, 2014 // 0 Comments

एमिली अकेलेपन से जूझती एक लड़की है जो अपनी दुनियां को परिकथाओं सा बनाकर अपने अकेलेपन का हल खोज रही है। एक सनकी से मां बाप की लड़की जिन्हें लगता है कि उसकी बेटी को दिल की बीमारी है, इसलिये उसके बचपन भर में उसे घर से बाहर जाने की मनाही रही। यहां तक कि उसकी पढ़ाई भी घर मे ही हुई है। एक दुर्घटना में मां की मौत के बाद वो घर छोड़ देती है और एक कैफे में काम करना शुरु करती है। एक सीधी-साधी सी दिखने READ MORE

खोई हुई एक चीज़

July 6, 2014 // 0 Comments

कविता यहीं कहीं तो रख्खी थी दिल के पलंग पर यादों के सिरहाने के नीचे  शायद या फिर वक्त की जंग लगी अलमारी के ऊपर तनहाई की मेज पे या फिर उदासियों की मुड़ी तुड़ी चादर के नीचे ? यहीं कहीं तो रख्खी थी कुछ तो रखकर भूल गया हूं आंखिर क्या था ये भी याद नहीं आता कई दिनों से ढूंढ रहा हूं वो बेनाम सी ,बेरंग और बेशक्ल सी कोई चीज़ ऐसी चींजें खोकर वापस मिलती हैं क्या ? एक-दूजे की ज़िंदगी में हम दोनों भी ऐसी ही READ MORE

Photo Diary 1 : Birds

July 6, 2014 // 0 Comments

Photo diary: 1) दिल्ली के महरोली में अपने कमरे की खिड़की के बाहर इस मादा कबूतर को देखा. खिड़की खोलने की आहट भर से चौकन्नी हो जाती. लगातार अपने अंडे के आस पास मडराने वाले हर खतरे पर नज़र रखती. मां किसी भी रूप में हो उसके लिए उसकी आने वाली संतान शायद सबसे बड़ी खुशी लेकर आती है. खुशी से पहले फ़िक्र का ये लामहा मैंने अपने कैमरे में कैद कर लिया. Delhi, India   2) नैनीताल सैलानियों का शहर है. इस छोटे से पहाड़ी शहर में READ MORE

आपकी अदालत में आपके लिये भी तो कोई कठघरा हो

July 1, 2014 // 0 Comments

“और ये जो नया काम आपने शुरु किया है ज़रा बताइये कि इसका न्यूज़रुम से क्या सरोकार है ? इस नये काम को क्या कहते हैं क्या आप जानते हैं ? रितु धवन, अनिता शर्मा और प्रसाद जिनका नाम तनु ने अपने सुसाइड नोट में लिखा है उन्हें आप जानते तो होंगे ना ? कोई विशाखा गाइडलाइन होती है ऐसे मसलों के लिये, आपने सुना तो होगा ही। इस गाइडलाईन के तहत खुद पर और इन लोगों पर कोई कार्रवाई करें तो खबर ज़रुर चलवा READ MORE

नीद से जागा हुआ शब्द

June 24, 2014 // 1 Comment

एक दिन अचानक नीद से जागा एक सोया हुआ शब्द लेने लगा तेज़ तेज़ सासें और बिखरने लगे हवा में कई डरे हुए अक्षर उसने अभी अभी देखा था एक सपना जिसमें एक जंग खाती अल्मारी में बंद थी कई कहानियां जो वापस जाना चाहती थी अपनी अपनी किताबों में नौकरी नाम का वो हत्यारा जिसका वज़न पंद्रह  घंटे से भी ज्यादा था वक्त की छुरी से कर रहा था एक एक कहानी की हत्या कहानियां रोती, चीखती ,चिल्लाती तोड़ रही थी एक एक READ MORE

‘मैट्रो’ की नयी भाषा सीखती एक मैट्रोसिटी

June 23, 2014 // 1 Comment

Mumbai Diary (23  Jun 2014) तकरीबन साड़े तीन महीने बाद मुम्बई लौटा हूं। दिल्ली की लू के बनिस्पत मुम्बई की ठन्डी हवाएं राहत देने वाली हैं। ये इस शहर के और खूबसूरत हो जाने के शुरुआती दिन हैं। दिन में उमस रहती है ज़रा-ज़रा पर साथ में जो ठन्डी हवाएं चलती हैं, वो सुकून देने वाली हैं। मौसम ही नहीं इस बार के लौटने में कुछ और भी नया है यहां। ये शहर बस अभी-अभी एक नई भाषा सीख रहा है। एस्केलेटर में डर-डर के कदम रखती READ MORE

आंखिर किनकी शय पर चलती है रेल ?

June 21, 2014 // 1 Comment

Mumbai Diary  15 ( Jun 2012 ) मुम्बई में हूं और खफा हूं। खफा हूं कि देश की आर्थिक राजधानी में बैठा देश के नैतिक दिवालियेपन का शिकार हो रहा हूं। देश के राजनैतिक खोखलेपन का हिस्सा बन रहा हूं। अप्रैल की 22 तारीख को मुम्बई आया था। तब देखा था कि कितनी मुश्किल से ट्रेन की वेटिंग क्लियर हुई थी। और ये भी कि जिस कोच में था उसमें एक लम्बी दूरी तक दो बर्थ खाली पड़ी रही थी। 4 तारीख की वापसी की टिकिट थी। जिसकी अन्तहीन READ MORE

हे IRCTC ! ट्रेन का टिकिट मांगा है, लोकसभा का नहीं

June 17, 2014 // 0 Comments

  Delhi Diary ( Jun 2014)                                                                                      Feeling: IRCTC sucks ये असम्भव सा काम आज बस होने ही वाला था। जिस काम के लिये पिछले हफते भर से तरह तरह के जुगाड़ काम ना आये उस काम को आज मैं घर बैठे कर ही लेने वाला था। उम्मीद पूरी थी। बावजूद इसके कि पुराने अनुभव इस पूरी उम्मीद का समर्थन करने वाले तो कतई नहीं थे। पर हम तो ठहरे उम्मीद पालने में माहिर। घोर आशावादी किसम के मासूम READ MORE

आख़री सांसें लेती ज़िंदगी की कहानी

June 15, 2014 // 0 Comments

Mumbai Diary : 14 (Mumbai Film Festival 2012) पिछले पांच दिनों से मुम्बई के पांच अलग अलग थियेटरों का पीछा किया है। हर थियेटर जैसे एक ट्रेन सा हो और फिल्म शुरु होने का वक्त जैसे किसी सफर के शुरु होने का वक्त हो। रोज कई ऐसे ही सफर तय किये हैं इन दिनों में। सुबह उठना, घर से निकलने के पहले ज़रुरी काम निपटाना, रेलवे स्टेशन की तरफ भागना, चलती हुई टेन में मुम्बई फिल्म फेस्टिवल के कैटलौक पर डौट पेन से टिक करके सम्भावित READ MORE

फ़िल्में देखने के लिए भी कम चप्पल नहीं घिसने पड़ते

June 10, 2014 // 0 Comments

Mumbai Diary 13 (Mumbai Film Festival 2012) एक और दिन मुम्बई फिल्म फेस्टिवल के नाम रहा। शुरुआत खराब थी। इतवार की सुबह सुबह सायान के सिनेमेक्स सिनेमाहौल में औडिटोरियम के बाहर 12 बजकर 45 मिनट पर लगने वाली फिल्म गॉड्स हौर्सेज़ बिना किसी पूर्व सूचना के कैंसल कर दी गई। स्क्रीनिंग हौल के बाहर दूर दूर से फिल्म देखने आने वाले लोग इन्तज़ार करते रहे पर वहां उन्हें बताने वाला भी कोई नहीं था कि फिल्म किस वजह से ऐसे अचानक READ MORE

हर बुरे वक्त का एक अच्छा पहलू भी होता है

June 8, 2014 // 0 Comments

Mumbai Diary : 12 (मुम्बई फिल्म फेस्टिवल 2012) सुबह सुबह नीद खुली तो देर हो चुकी थी। साढ़े नौ बज चुके थे। रात को सोते वक्त सोचा था कि मुम्बई फिल्म फेस्टिवल के दूसरे दिन की पहली फिल्म से शुरुआत की जाएगी। और फिर पूरा दिन थियेटर की कुर्सियों पर टिककर फिल्मी अनुभवों को अपनी जि़न्दगी का हिस्सा बनाया जाएगा। पर रात को देर से सोने की आदत सुबह देर से उठने की मजबूरी पैदा कर ही देती है। खैर उठते ही फटाफट नहा READ MORE

गणपति के बाद फिल्मों का उत्सव

June 4, 2014 // 0 Comments

Mumbai Diary : 11 (October 2012) गणपति बप्पा ने अलविदा कह दिया है। गणेश के इस बड़े उत्सव को देखकर लगता है कि मुम्बई में लोग मस्त रहना जानते हैं। गणेश उत्सव के तुरन्त बाद ही निर्देशक उमेश शुक्ला की फिल्म ओह माई गौड देखते हुए अभी अभी बीते गणपति उत्सव के जलसे के दृश्य जैसे रिवाईन्ड होते हैं। कांजुरमार्ग से अंधेरी जाते हुए पहले पवई लेक, फिर जुहू बीच, फिर वर्सोवा बीच की तरफ न जाने कितने हज़ारों लोगों की जमात READ MORE

नाराजगी कितनी अर्थहीन और क्षणभंगुर भावना़ है

June 3, 2014 // 2 Comments

Mumbai Diary 10 डोंगरी टु दुबई का बुक लांच था। बेंड्रा की कार्टर रोड में समुद्री किनारे के पास औलिव नाम का वो बार। और उस बार का एक छोटा सा अहाता जिसके फर्श पर नदियों के किनारे पाये जाने वाले, पानी से घिसे मुलायम से कंकड़ बिछाये गये थे। जो दिख अच्छे रहे थे, पर उनपर चलने में एक असहजता महसूस हो रही थी। उस अहाते के बीच में एक पेड़ का कंकाल था, जिससे पत्तियां नदारद थी। उस सूखे नंगे पेड़ को सलेटी रंग से READ MORE

वक्त की पटरी और यादों के बेनाम स्टेशन

May 31, 2014 // 0 Comments

Mumbai Diary 9 अभी अभी कांजुरमार्ग स्टेशन के पास पूरब से पश्चिम की ओर जाने वाले पुल पे कुछ वक्त बिताया। वक्त के साथ साथ पुल के ठीक नीचे बीतती रेलगाडि़यां थी जो अलग अलग ट्रेक पर अपनी अपनी गति से आ जा रही थी। जैसे पटरियां वक्त हों और हर रेलगाड़ी अलग अलग लमहा। जैसे हर लमहा अपने अपने हिस्से के वक्त में गुजरता है और अन्ततह जिन्दगी नाम के एक लम्बे सफर का हिस्सा हो जाता है, वैसी ही तो होती है हर READ MORE

मैक्सिमम सिटी के मिड नाईट अन्ना

May 30, 2014 // 0 Comments

Mumbai Diary 8 ( April 2012) मुम्बई पे छतें सरों से कोई खास सरोकार नहीं रखती। अपने अनुभव देखकर तो यही लगता है। व्यक्तिगत अनुभवों से शुरु करुं तो जुम्मा जुम्मा एक साल और कुछ महीने हुए हैं यहां आये और तीन बार घर बदली कर लिया है, चैथी जगह शिफ्ट करने की तैयारी चल रही है। इस बार छंलांग थोड़ी लम्बी है। अंधेरी से सुदूर पवई। खैर इस लम्बी छलांग ने वक्त पर उठना और खाना.-पीना मयस्सर करवाया है, हांलांकि सोने के READ MORE

इतवारी शामों में सुकून के किनारे

May 28, 2014 // 0 Comments

Mumbai Diary 7 ( February 2012) मुम्बई और मेरे रिश्ते की उम्र आज एक साल एक महीना और कुछ 7 दिन हो चुकी है… ये शहर मेरे लिये अब उतना अजनबी नहीं रह गया है…. जैसे जैसे अजनबियत खत्म होने लगती है… वैसे वैसे रहस्य छंटने लगते हैं… नयापन धुंधला होने लगता है… पुरानापन हावी होने लगता है… आकर्षण खत्म होने का डर लगने लगता है… पर मायानगरी मुम्बई के अनुभवों के इस अथाह समुन्दर के लिये मेरे ही क्या हर किसी के READ MORE

ये पैसा नहीं हो तो कितना सही हो

May 27, 2014 // 0 Comments

ये हर चीज़ बिकने के बाज़ार ज़ालिम ये सौदे, ये उनके खरीददार ज़ालिम बस इक चीज़ पर टिक गई है जो दुनिया यूं अनजाने में बिकता संसार ज़ालिम ऐसा नहीं हो तो कितना सही हो ये कागज़ जो सब कुछ ख़तम कर रहा है ये पैसा नहीं हो तो कितना सही हो खुशियों की होती अठन्नी, चवन्नी भरोसे पे चलती, नहीं पड़ती गिननी ये बटुए न होते, कटौती न होती ख्वाहिश की फेहरिश्त छोटी न होती ये खातों पे चलते घरबार ज़ालिम ये मर मर के जीना हर READ MORE

‘घोस्ट राइटर’ लिखते हैं मुंबई की किस्मत

May 26, 2014 // 0 Comments

Mumbai Diary :6 ( October 2011) देर शाम अंधेरी वैस्ट के रिहायशी इलाके मलाड की एक मीटिंग से लौटते हुए ओशीवारा के लोटस पैट्रोल पंप से गुजरने के दरमियान कुछ यूं होता है…..सड़क पर सरकती रफतार के बीच अचानक एक बत्ती जलती है, एक गाड़ी रुकती है, एक खिड़की दिखती है। कार के बांईं सीट पे बैठी वो, थोड़ी देर मुझे देखती है। फिर थोड़ी देर मैं भी उसे देखता हूं। हाये, फिर वो मुस्कुरा देती है। हम एक मुस्कुराहट साझा करते READ MORE

The great ‘Kumaoni wedding’

May 24, 2014 // 2 Comments

इस बार अपने गांव चिटगल गया , काफी वक्त हो गया था वहां गए हुए. चिटगल, उत्तराखंड में गंगोलीहाट नाम की एक खूबसूरत सीमान्त तहसील का एक बेहद खूबसूरत गाँव है. पर उस ख़ूबसूरती को संवारने के लिए, उसे महसूस करने के लिए और उसे बचाए रखने के लिए वहां लोग लगातार कम होते जा रहे हैं. असुविधाओं और अभावों के चलते परिवार के परिवार  अपने पुश्तैनी घरों में ताला जड़कर वहां से बाहर आ रहे हैं. रोजगार, शिक्षा, READ MORE

बादलों के पंख होते, बारिशों के पांव

May 22, 2014 // 0 Comments

काश कि ऐसा भी होता चैन का एक गाँव जिस तलक लेकर के जाती खुशी की एक नाव ज़िंदगी की कश्मकश की धूप से कुछ दूर नीद की पगडंडियों पर, ख़्वाब की एक छाँव सुबह के पर्वत के पीछे, शाम के कुछ पास चांद के झरने से बहती चांदनी की ठांव खिलखिलाती धूप की मासूम दुनिया में बादलों के पंख होते, बारिशों के पांव शहर से, बाज़ार से और शोरगुल से दूर चुप की धुन में बात करती नदी सा ठहराव काश कि ऐसा भी होता चैन का एक गाँव READ MORE

मुंबई में स्वाद की एक सड़क : मोहम्मद अली रोड

May 21, 2014 // 0 Comments

Mumbai Diary 5 (September 2011) कई जगहें ऐसी होती हैं जहां ना भी गये होते तो कुछ नहीं होता पर जहां जाने के बाद ऐसा लगता है कि यहां ना आये होते तो कुछ मिस हो जाता। तो ये कहानी एक खोज से शुरु होती है। कुछ दिनों पहले इसी मोहल्ले के जमीदार साहब अविनाश जी ने मिलने बुलाया…बातों ही बातों में फिल्मों की चीरफाड़ करने वाले अजय ब्रहमात्मज जी ने कहां कि आज हम एक खास जगह जा रहे हैं….चलोगे…? कहां पूछने पर जवाब नहीं READ MORE

आप लाख चाहें, रिश्ते कभी सेकंडहैन्ड नहीं हो सकते

May 20, 2014 // 0 Comments

Mumbai Diary : 4 ( Jun 2011) आज ही घर शिफ्ट किया है। यारी रोड से यारी और वर्सोवा की लहरें प्यारी हो गई थी। उस गली को छोड़ आये हैं अब। इन्डियन आईल नगर के पास अपना बाजार के बाजू कहीं एक घर मिला है। बाजार भी कभी किसी का अपना हुआ है भला। खैर यहां अभी अभी खिड़की खोलकर देखा तो सामने एक दस बारह मंजिली इमारत बन रही है। बाहर अंधेरा है। नीव के इर्द गिर्द एक टिन की टेम्प्रेरी दीवार बनी है। दरवाजे की शक्ल के एक कोने READ MORE

खुश रहना हमारी नैतिक जिम्मेदारी ही है

May 19, 2014 // 0 Comments

Mumbai Diary : 3 (April 2011) कभी कभी लगता है कि मैं एक तिनका हूं और ये शहर बारीक सा एक घोंसला। मेरी ही तरह तिनका तिनका लोग इससे जुड़ते जाते हैं, ठीक उसी तरह जैसे समय का कोई हिस्सा यथार्थ से जुड़ रहा होता है। सुना है मुम्बई मुलाकातों से चलती है। कौन्टेक्ट्स यहां आपकी एक बहुत बड़ी पूंजी है। प्रोफेश्नल मीटिंग्स। पता नहीं क्यूं ये शब्द सुनने में बहुत अच्छा नहीं लगता। कभी कभी यहां हर कोई असुरक्षित नज़र READ MORE

बिसराया गांव सोचता है, मैं भी तो कभी तो रखवाला था

May 18, 2014 // 0 Comments

फोटो : उमेश पन्त नदी किनारे एक घर था, जिसकी कुंडी पर ताला था एक टूटी सी छत थी जिसपर, खालीपन का जाला था एक गाँव नाम की कविता थी, जो धीरे धीरे मिटती रही और दूर कहीं वीराने में एक सूरज डूबने वाला था पहले टूटे परिवार वहां, फिर बाखलिया वीरान हुई फिर वो दीवार भी दरक गई जिसने बरसों से संभाला था पाथर वाली काली छत पर भुट्टे के बीज उदास से थे आँगन में पडा सिल-बट्टा भी जैसे बस रोने वाला था शाम ढले उस READ MORE

बरसात, छाता और वो लड़की

May 18, 2014 // 0 Comments

Mumbai Diary : 2 ( Jun 2011) मुम्बई के बारे में एक बात सुनी थी। मानसून आने के बाद यहां जब बारिश शुरु होती है ना, फिर इतनी जल्दी थमती नहीं। सच ही है। जून से शुरु होकर सितम्बर तक वही झमाझम झमाझम….बारिश जब रिमझिम की आवाज़ में बोलती है तो सन्नाटे की सांय सांय कहीं गायब हो जाती है। मैने बचपन में अपनी हिन्दी की किताब गद्य मंजूषा के किसी पन्ने पर एक निबंध में पढ़ा था कि सन्नाटे की आवाज़ सांय सांय होती है। खैर READ MORE

कभी कभी लगता है लोग अजनबी क्यों होते हैं ?

May 17, 2014 // 3 Comments

मुंबई डायरी: १ (जून 2011) कुछ दिन पहले हिन्दी की जानी मानी वैबसाईट मोहल्लालाईव के सम्पादक अविनाश जी ने फेसबुक पे पिंग किया। न हैलो। न हाय। सीधे कहा उमेश मुम्बई डायरी लिखा करो। आईडिया मुझे अच्छा लगा। उस बात को हफ्ते से उपर हो आया था। कुछ लिख नहीं पाया। कुछ ऐसा नया और खास हो ही कहां रहां था। वही रोज घर से आफिस (बालाजी टेलीफिल्म्स) का काम निपटा रहा था। रोज वर्सोवा का एक चक्कर लग रहा था। हां READ MORE

कल को पकड़ कर बैठे रहना, यूं भी अच्छी बात नहीं

May 16, 2014 // 1 Comment

बुरे दिनों में साथ रहे जो, अच्छे दिन में साथ नहीं दुनिया ऐसे ही चलती है, चलिए कोई बात नहीं रिश्तों की दुनिया का भी एक अंक गणित सा होता है समीकरण के खेलों में चलते कोई जज़्बात नहीं दांयी तरफ से जितना हो, बांयी ओर भी वही रखो बिना आंकलन किये यहां, हल होते सवालात नहीं हम जब तक भी साथ रहे हमने बस दिल का कहा सुना वो भी दिल की बात सुनें, इतना भी वक्त इफरात नहीं कल जो हुआ सो हुआ यहां, खैर चलो अब जाने दो READ MORE

इस ज़िंदगी का कोई निर्देशक नहीं होता

May 14, 2014 // 0 Comments

 बांद्रा स्टेशन की तरफ आती हुई सड़क। हाथ में कतई लाल रंग के दिल के आकार के 25-30 गुब्बारों का गुच्छा। वो सफेद टाॅप और नीली रंग की जींस पहनी हुई लड़की हाथ में छतरी के हैंडल की तरह एक डोरी थामे पूरे आत्मविश्वास से इस गुच्छे को लिये आगे बढ़ती जा रही थी। चेहरे पर न कोई डर न कोई घबराहट। चैदह फरवरी का दिन और बूढ़े, बच्चे, वयस्कों से भरी एक व्यस्त सड़क। कुछ देर उसे देखने के बाद आस पास देखा। लड़के, READ MORE

अपनी अलमारी में देखो मेरी नीद पड़ी होगी

May 2, 2014 // 0 Comments

नीले आसमान पर फिर से काले बादल छाए हैं किसी बात पर धूप की सूरत सुबह-सुबह उखड़ी होगी सूरज भी कल खफ़ा खफ़ा था तू कल रात उदास थी क्या ? या फिर तारों की टोली अंधेरे से झगड़े होगी बिना बताये एक दिन यूं ही मुझे छोड़ कर चली गई तेरे दरवाज़े के बाहर एक उम्मीद खड़ी होगी उस दिन मैंने ख्वाबों के संग तहें लगाकर रख्खी थी अपनी अलमारी में देखो मेरी नीद पड़ी होगी     READ MORE

आपकी ज़िंदगी से बात करती एक फिल्म : ‘Her’

April 22, 2014 // 0 Comments

 फेसबुक पर एक दोस्त के स्टेटस को देखकर ये फिल्म डाउनलोड की और अब रात के दो बजकर 30 मिनट हो चुके हैं..वो फिल्म जो अभी अभी पूरी हुई है नीद की हथेली पकड़कर उसे किसी दूसरे कोने में कुछ देर और बैठने को कह आई है। स्पाइक जोन्ज (Spike Jonze) निर्देशित फिल्म ‘हर‘ आपको टूटे हुए रिश्तों से उपजे अकेलेपन, इन्तजार, विछोह जैसी भावनाओं के रास्ते उस खालीपन की तरफ ले जाती जिसे भरा जाना ज़रुरी सा लगने लगता है। READ MORE

उड़ती हुई पतंगें हिन्दू-मुस्लिम कैसे पहचानें

April 21, 2014 // 0 Comments

              बुझने से पहले हर लौ अक्सर लगती है इतराने                                                                                              बनते बनते रह जाते हैं यूं भी दुनिया में अफ़साने उंगली की स्याही का रंग, नीला होता है, लाल नहीं याद रहे ये आये हैं हमको बातों में उलझाने अब भी याद में ताज़ा है अप्पी की सेंवई का मीठापन होली में वो भी आई थी मेरे घर गुजिया खाने छत पर साथ खड़े होकर के  ढील दी हमने माझे में READ MORE

‘एक सौ दर्द जले जब दिल में, एक नज़्म का जन्म हुआ’

April 14, 2014 // 0 Comments

गुलज़ार  साहब को दादा साहेब फाल्के पुरस्कार मिलने की बधाई देते हुए मोहल्ला लाइव पर छपने वाली अपनी ‘मुंबई डायरी’ में से एक दिन जो गुलज़ार के नाम है, ‘गुल्लक’ पढने वालों के लिए भी .. गुलज़ार। ये नाम मेरे लिये उन शुरुआती साहित्यिक सुविधाओं में से था जो मुझे अपने छोटे से कस्बे गंगोलीहाट में रहने के दिनों में ही मिल गई थी। पुखराज, त्रिवेणी और रात पस्मिने की, ये तीन किताबें ऐसी थी जिनके READ MORE

अगर क़ुतुब मीनार के पंख होते

April 13, 2014 // 1 Comment

फोटो: उमेश पन्त महरोली टर्मिनल से वो टूटी फूटी सड़क जाती है क़ुतुब मीनार की ओर ऐसे जैसे कोई गांव का बच्चा धूल-धूसरित कपड़े पहने जा रहा हो दिल्ली देखने अपने हाथ में पकड़े इतिहास की कोई फटी पुरानी किताब दूर आकाश में बहुत ऊंचाई से क़ुतुब मीनार देखती है उस उपेक्षित सड़क को जैसे नौकरी के लिए कहीं दूर रह रही मां अपनी आंखों में बना रही हो अपने बच्चे का काल्पनिक चित्र बिखरे हुए हैं चारों तरफ चुनावी READ MORE

चुनावी दिल्ली में एक बीमार सा दिन

April 8, 2014 // 0 Comments

 सीने में इन दिनों कभी कभी तेज़ दर्द होता है.. लगता है की पेट के अन्दर कोई जा बैठा है जो कभी कभी फेफड़ों को जोर से पकड़ लेता है और निचोड़ने लगता है.. घर के बाहर टूटी-फूटी सड़कों में बहुत सारी धूल है और पास में एक प्राइवेट अस्पताल.. हरे रंग के शीशे से बना बड़ा सा अस्पताल.. मैं अन्दर जाता हूं.. रिसेप्शन पर बैठी गाढ़ी लिप स्टिक वाली लडकी मुझसे तीन सौ रूपये यूं निकलवा लेती है जैसे मैंने उससे कभी उधार READ MORE

आय हाय रे मिजाता

April 6, 2014 // 1 Comment

उत्तराखंड के लोक-गायक ‘हीरा सिंह राणा’ की गीतों के क्रम में एक और गीत ‘गुल्लक’ के ज़रिये आपको सुनाया जा रहा है.. ‘मिजाता’ नाम के इस गीत में प्रकृति और एक सुन्दर कन्या दोनों की सुन्दरता को बड़ी मासूमियत से दर्शाया गया है. सुनिए और गीत की लिखाई और अदायगी दोनों का लुत्फ़ उठाइये. READ MORE

‘उत्तराखंड आन्दोलन’ का जनगीत ‘लस्का कमर बांधा’

April 2, 2014 // 0 Comments

पिछली पोस्ट में आपने सुना उत्तराखंड के  मशहूर जनकवि और गीतकार हीरा सिंह राणा का गाया  गीत ‘संध्या ‘. आज सुनिए उनका लिखा और गाया गीत ‘लस्का कमर बांधा’. इस वीडियो को मैंने उत्तराखंड के गैरसैण में २४ मार्च को हुए ‘उमेश डोभाल स्मृति व्याख्यान एवं सम्मान समारोह’ के दौरान शूट किया था. आप भी सुनिए इस गीत को जो ‘उत्तराखंड आन्दोलन’ के दौरान प्रचलित हुआ और उसके बाद आज तक  READ MORE

संध्या: हीरा सिंह राणा

March 31, 2014 // 0 Comments

हीरा सिंह राणा उत्तराखंड के मशहूर जनकवि एवं गीतकार हैं. उनके द्वारा लिखे गए गीत उत्तराखंड के तमाम आन्दोलनों  में गाये जाते रहे हैं… उनका लिखा गीत ‘लस्का कमर बांधा’ उत्तराखंड आन्दोलन के दौरान आन्दोलनकारियों के बीच बहुत लोकप्रिय हुआ. यह वीडिओ २३ मार्च २०१४ को गैरसैण में हुए ‘उमेश डोभाल स्मृति व्याख्यान एवं पुरस्कार समारोह’ के दौरान बनाया गया है.. ‘संध्या’ यानी शाम की READ MORE

दो महीने की बातें

March 22, 2014 // 1 Comment

धरना-वर्ना, जंतर-मंतर, दिल्ली तक ही चलता है बाकी का सच गोली की बौछारों में छुप जाएगा जो छाती तान के सामने आएगा उसको मरना होगा जिसको जीना होगा वो हत्यारों में छुप जाएगा चौबीस घंटे खबर चलेगी अलग-अलग अल्फाजों में सड़कों पर जो खून बहा था नारों में छुप जाएगा सोमवार से शनिवार तक जमकर वाद-विवाद करो दो दो पैग लगाकर सब इतवारों में छुप जाएगा जो विरोध में मुह खोले उसको ‘अश्लील’ बता देना बाकी READ MORE

जेएनयू की होली – 5 अनुभव

March 18, 2014 // 0 Comments

तो इस बार की होली जेएनयू में खेली। बाबा गंगनाथ मार्ग से जेएनयू के गेट की तरफ बड़ते ही माहौल एकदम बदल सा जाता है। जेएनयू कैम्पस के भीतर रंग जैसे इन्सानों के शरीरों पर झूलते हुए नज़र आते हैं। कई तरह के रंग और उसमें सबसे गहरा रंग खुशी का। होली है हुड़दंग नहीं जेएनयू के मेन गेट से अन्दर आते हुए सैकड़ों रंगे-पुते लड़के लड़कियों का हुजूम देखके ऑटो वाला ज़रा डर रहा था। “भैया चिन्ता मत करो। READ MORE

लड़के के लिए तबाह होती जिंदगियों का ‘किस्सा’

March 12, 2014 // 0 Comments

  पिछले मुंबई फिल्म फेस्टिवल में अनूप सिंह के निर्देशन में बनी फिल्म ‘किस्सा’ देखी थी.. उसी फिल्म पर की गई टिप्पणी को यहां पोस्ट कर रहा हूँ..फिल्म अभी रिलीज़ नहीं हुई है . ये टिप्पणी  ‘स्पौइलर’ भी हो सकती है ..   भारत-पाकिस्तान के विभाजन के उस दौर में जब सिख अपनी रिहाइश के लिए जूझते हुए पाकिस्तान के पंजाब से भारत के पंजाब आ रहे थे, उनसे उनके पैतृक घर छूट रहे थे। उस दौर के भूगोल से अनूप READ MORE

एक ‘क्वीन’ का आज़ाद होना

March 11, 2014 // 0 Comments

दिल्ली में कॉलेज आने जाने वाले लड़कों के बीच एक टर्म बहुत प्रचलित है। ‘बहन जी‘। ‘बहन जी टाइप‘ होना शहरी परिप्रेक्ष में एक लड़की के लिये अच्छा नहीं माना जाता। ‘यूथ‘ की भाषा में कहें तो ‘हैप‘ होना शहर के युवाओं की मुख्यधारा में आने के लिये एक ज़रुरी मानदंड है। इसके उलट परिवार और सगे सम्बन्धियों की परिभाषा में ‘बहन जी टाइप‘ लड़की एक आदर्श लड़की है। फिल्म क्वीन की कहानी में रानी की READ MORE

शुरुआत ‘मासिक धर्म’ की या गुलामी की ?

March 9, 2014 // 0 Comments

महिला दिवस का दिन। रात के तकरीबन दस बज रहे थे। दिल्ली के जेएनयू के माही मांडवी छात्रावास के लॉन में अभी-अभी पत्रकार प्रेक्षिस नाम के समूह द्वारा रोहित जोशी के सम्पादन में निकाली गई पुस्तक उम्मीदों की निर्भयाएं का लोकार्पण हुआ था। ये पुस्तक 16 दिसम्बर को हुई बलात्कार की घटना के बाद बलात्कार और उससे जुड़े विषयों पर हुए विमर्शों पर छपे लेखों का एक ज़रुरी संकलन है। मौजूदा समय में READ MORE

देखकर भी न देखना

March 6, 2014 // 2 Comments

मैं अपने शरीर को जंग लगे पुर्जों में ढ़लता हुआ देखता हूं मैं खुद को उतना ही देखता हुआ देखता हूं जितना देखकर मुझे देखने से डर न लगे मैं अपनेआप को जंग में गोलियां खाते नहीं देखता भीड़ में लाठियां भांचते उस पुलिस वाले को नहीं देखता जो मुझे देखता हो बर्बर निगाह से ट्रेफिक वाले को रिश्वत लेता हुआ देखकर भी मैं देखता हूँ ऐसे जैसे मैंने कुछ न देखा हो मैं नदी देखता हूं, समुद्र देखता हूं, जंगल READ MORE

तुम आई हो

February 15, 2014 // 0 Comments

Photo: Umesh Pant जब जब  खुशी गीले कपड़ों की तरह लटकी हुई होती है उदासी की तार में  टपक रही होती हैं अकेलेपन की बूदें टप टप टप सूरज थका हारा सा बैठा रहता है कहीं दूर कई कई दिन  मन कर रहा होता है एक अदद धूप का इंतज़ार ऐसे में तुम्हारा आना उस धूप का आना है जो दिन-रात आ-जा सकती है बेरोक टोक तुम वो मौसम हो जिसके आते ही भाप हो जाती हैं अकेलेपन की बूदें आज फिर कई दिनों बाद गम के मैले कपड़े उतारकर साफ़ सुथरी खुशी READ MORE

एकांत से घिरे शोर सा शहर

January 25, 2014 // 0 Comments

यहां मुंबई में कई बार आप उस पत्ते की तरह महसूस करने लगते हैं, जो नदी के प्रवाह के बीच किसी पत्थर में अटक गया हो। आसपास सबकुछ लगातार बह रहा हो पर आपके मन का कोई सिरा उस पथरीली सतह पर कहीं दबा रह गया हो। बहता हुआ पानी लगातार आपको धकेलता जा रहा हो। पर आप आगे बढ़ ही नहीं पा रहे हों। चोटिल होते जा रहे हों। अदृश्य सी चोटें, जो दिखती नहीं, शायद होती भी नहीं पर सालती हैं। नदी जो समय है, बहाव जो READ MORE

समानार्थक शब्द

December 10, 2013 // 0 Comments

इस बेमायने से समय में हमने साथ रहकर खोजे कुछ शब्द जिनके अर्थ जानते हैं सिर्फ दो लोग तुम और मैं हमने तय किये बहुत से अल्प विराम. जो नहीं पहुचते किसी पूर्ण विराम तक.. हम बढते गए शब्द दर शब्द लिखते गए  ज़िन्दगी के पैराग्राफ समय के रूलदार पन्नों पर प्यार का अर्थ बस प्यार नहीं होता अक्षरशः प्यार की भाषा में नहीं होता कुछ भी तत्सम और तत्भव मैंने प्यार में सीखा है इतना  कि प्यार एक ऐसी भाषा है  READ MORE

उनके काले सच

November 25, 2013 // 0 Comments

जनता को भरमाने वाले उनके काले सच कड़वे राज़ छुपाने वाले उनके काले सच झूठ की चादर तान के चैन से सोने वाले लोग सबकी नीद उड़ाने वाले उनके काले सच गलती करके वो कहते हैं बहक गए थे हम खुद को न्याय दिलाने वाले उनके काले सच अपनी धमक के आगे जो सबको बौना समझें दुनिया को धमकाने वाले उनके काले सच सत्ता को अलबत्ता मानें जो अपनी जागीर तर्कों को झुठलाने वाले उनके काले सच आदर्शों का झोला लेकर घूमा करते READ MORE

पत्थर नहीं लगवाया तो प्रसाद नहीं दिया

October 1, 2013 // 1 Comment

(यह लेख गाँव कनेक्शन  के ४४ वें अंक में प्रकाशित हो चुका है.) अयोध्या के बारे में अब तक अर्जित मेरी सारी जानकारियों के स्रोत किताबी रहे हैं। स्कूल के पाठ्यक्रम में मौजूद रामायण और रामचरित मानस की किताबों से शुरु हुआ ये सफर अखबारों और समाचार चैनलों से मिली जानकारियों से ज़रिये जारी रहा। रामलीलाओं में भी अक्सर अयोध्या का जि़क्र होता रहा। अलग-अलग शहरों की अलग-अलग रामलीलाओं में न जाने READ MORE

आख़िरी कश

August 29, 2013 // 2 Comments

पलकों से लिया मैने तुम्हारे चेहरे का आख़िरी कश आंखों की ऐश ट्रे में अधबुझे से ख्वाब रह गये हैं बस। तुम ऐसी तलब हो जो कभी राख नहीं होती। अब सब कुछ धुंआ-धुंआ है तुम्हारे READ MORE

आंखिरी कश

August 29, 2013 // 2 Comments

पलकों से लिया मैने तुम्हारे चेहरे का आंखिरी कश आंखों की ऐश ट्रे में अधबुझे से ख्वाब रह गये हैं बस। तुम ऐसी तलब हो जो कभी राख नहीं होती। अब सब कुछ धुंआ-धुंआ है तुम्हारे READ MORE

पुर्जों से बने शरीर के अंदर ‘कुछ और’ तलाशती एक फिल्म : शिप ऑफ थीसियस

August 14, 2013 // 0 Comments

एक शहर के रुप में मुम्बई की आईरनी यही है कि उसकी बसावट में खुलेपन का अभाव है। पहली बार जब मैं मुम्बई आया था तो मुम्बई को देखकर गहरी निराशा हुई थी। एक शहर इतना बदसूरत कैसे दिख सकता है ? संकरी गलियों में किसी तरह आपस में चिपके हुए उखड़े पलस्तर वाले मकान। फिल्मों में देखे मुम्बई की माया टूट सी गई थी उस वक्त। पर यही कोई तीन साल बाद इस शहर में रहने के लिये आया तो इस शहर को दूसरी तरह से देखना READ MORE

कहीं आप भी नीरो के मेहमान तो नहीं हैं

June 13, 2013 // 0 Comments

नोट: मेरा यह लेख साप्ताहिक समाचार पत्र गाँव कनेक्शन में प्रकाशित हो चुका है। रोम में एक शासक हुआ करता था- नीरो। एक ऐसा शासक जिसके शासनकाल में लगी आग की लपटें आज तक इतिहास के पन्नों को झुलसाती हैं। जब भी उन लपटों की बात होती है तो घोर जनता विरोधी शाषन की तस्वीरें उभरकर सामने आ जाती हैं, कुछ कुछ वही होता है जब भारत में पिछले सालों में हुई किसानों की आत्महत्याओं की बात होती है। किसानों की READ MORE

जल्द ही गाँव पर फिल्म बनाउंगा : दीपक डोबरियाल

May 7, 2013 // 0 Comments

 मूलतः गाँव कनेक्शन के लिए लिए गए इस साक्षात्कार को यहां भी पढ़ा जा सकता है.  भारतीय सिनेमा में गाँव के किरदारों के बारे में जब भी बात होती है तो दीपक डोबरियाल का नाम ज़हन में ज़रुर आता है। ओमकारा, गुलाल, तनु वेड्स मनु, मकबूल, दांये या बांये से लेकर दबंग-2 जैसी फिल्मों में अपने गंवई अंदाज़ से दर्शकों के बीच अपनी अलग पहचान बनाने वाले दीपक डोबरियाल से बात की उमेश पंतने। पेश हैं इस बातचीत READ MORE

ट्रेन के छूटने का वक्त

April 10, 2013 // 1 Comment

कुछ रिश्ते जैसे बहुत जल्दी बहुत पास आ जाते हैं आते हैं लेकर जरा सी फिक्र, जरा सा प्यार, जरा जरा अपनापन भी कुछ रिश्ते जैसे उन एक दिन के मेहमानों के से होते हैं जिनको छोड़ आते हैं हम स्टेशन जो चढ चुके होते हैं ट्रेन में जिनसे कह चुके होते हैं हम अलविदा ना चाहने के बावजूद हो चुका होता है जिनकी ट्रेन के छूटने का वक्त घुल जाता है हथेली की रेखाओं में कहीं जिनके हाथों का स्पर्श रह जाती है आंखो READ MORE

हर गली पर

April 8, 2013 // 0 Comments

सामने है एक विशाल इमारत लगी है जिसपर एशियन पेन्ट से सनी पत्थरों की मोटी चाहरदीवारी। ये मोटी दीवारें छिपा रही हैं नेपत्थ्य में छिपे मजदूरों के दर्द को। इन दीवारों के किनारे काटी गई सीढि़यों की कलात्मकता बता रही है कि काटा गया था यूं ही पैनी धार से मजदूरों के मेहनताने का एक बड़ा हिस्सा। इमारतों की खिड़कियों से झांकते हैं वे लोग जो बैठे हैं काटकर मेहनताने को अपने मजे से कटते समय की READ MORE

परसों रात की बात

March 14, 2013 // 1 Comment

फोटो: उमेश पंत मैने परसों रात अंधेरे को उलझते हुए देखा देखा उसे रोशनी से लड़ते हुए वो मिटा रहा था उजाले के हस्ताक्षर सुबह बस होने को थी और अंधेरा मानने को तैयार नहीं था इतनी उजली नहीं है दुनिया ये जो खामोश मुगालते हैं जिन्हें हम ‘सब बढि़या है’ कहकर पालते हैं वो सब कुपोषण के शिकार हैं उनके खून में बहता है एनीमिया आप किस दुनिया में रहते हैं मियां ?? अंधेरा बता रहा था उजाले को तुम्हारी READ MORE

अकेलापन

February 27, 2013 // 0 Comments

जैसे फुर्सत से की बिनाई का कोई धागा उधड़ गया हो, छूट गये हों फंदे।वक्त के खालीपन में, गुम गई हो सीकें ।पूरा होते होते अधूरा रह गया हो किसी के लिये रतजगे रखकर, प्यार के ऊन से बिना रिश्तों का स्वेटर । जैसे बिना हुआ सबकुछ हो गया हो बेमायने। रह गया हो धागाभर अकेलापन ऊन का एक गोला लुड़कता जा रहा हो किसी स्याह अनन्त अंधेरे की तरफ, छोड़ता जा रहा हो उलझते धागे, और कोई भी न हो जो उसे थामे और समेट ले READ MORE

ये जो संसद है, हद है

February 18, 2013 // 0 Comments

ये जो इंडिया हैबढि़या है एक ही कष्ट हैसब भ्रष्ट है भारतवासी हैसर्दी, खांसी है योजनाओं में मुद्रा हैइफरात है, खुदरा हैटनों टन हैआवंटन है ये जो कर्ता है, धर्ता हैजेबें भरता हैमुफत वोट लेता हैडाकू है, नेता है वो जो घिसता है, पिसता हैगुमनाम आदमीआलू से सस्ता हैआम आदमी ये जो काला धन है, मन हैटू इन वन है कोयला  है किसी पे,किसी पे चारा हैसब हैं अपराधी,सब पर धारा है कानून है, जेल है,सब फेल हैजेब READ MORE

मोबाइल के इस्तेमाल से माँओं की देखभाल

February 6, 2013 // 0 Comments

जयपुर से तकरीबन 120 किलोमीटर दूर रुपनगढ़ ग्रामपंचायत में रहने वाली स्वास्थ्य कार्यकर्त्री (आशा), अल्का सारना रोज हाथों में मोबाईल फोन लेकर अपने गांव की महिलाओं के घर जाती हैं। घरों में मौजूद महिलाओं को अपने पास बैठाकर वो मोबाईल के कीपैड पर कुछ बटन दबाना शुरु करती हैं। थोड़ी ही देर में बारी बारी से मोबाईल पर एक आवाज़ इन महिलाओं से गर्भावस्था के दौरान बरती जाने वाली सावधानियों, READ MORE

इलाज के लिए ‘अमरीका’ भी करता है बंधुआ मजदूरी

January 15, 2013 // 0 Comments

लखनउ से तकरीबन 100 किलोमीटर दूर सीतापुर के पगरोर्इ गांव में रहने वाले अमरीका प्रसाद दिसम्बर की 19 तारीख से किंग जौर्ज मेडिकल कालेज में डेरा जमाये हुए हैं। न्यूरोलौजी डिपार्टमेंट के ठीक बाहर कड़कड़ाती ठंड में अपने पूरे परिवार के साथ वो बस इसी उम्मीद में बैठे हैं कि उनकी 10 महीने की बेटी का इलाज हो जाये। “बच्ची बीमार है। डॉक्टर को दिखाया तो उन्होंने कहा कि अभी छुटटी पे जा रहे हैं। 14 READ MORE

यहां या तो भूत चलता है या सलमान खान

January 15, 2013 // 0 Comments

लखनउ से 14 किलोमीटर उत्तर दिशा में काकोरी नाम का एक छोटा सा कस्बा है। इस कस्बे में संकरी सी रोड पर चलते हुए हैंडपंप के पीछे चूने से पुती हुई एक दीवार पर लकड़ी का एक पटला सा दिखता है। उस पटले पर एक फिल्मी पोस्टर चस्पा है जिसपर लिखा है ‘मौत का खेल’। दीवार से सटे हुए गेट के अन्दर जाने पर सामने की दीवार पर रिक्शेवाली और फांदेबाज़ से लेकर रजनीकांत की बाशा और संजय दत्त की अग्निपथ जैसी READ MORE

क्योंकि मिस कॉल भी है बड़े काम की चीज़

January 15, 2013 // 0 Comments

टेलीकॉम इन्डस्ट्री के पंडितों ने जब मोबाईल टेलीफोनी के बारे में सोचा होगा तो मिस कॉल नाम का ये शब्द उनके ज़ेहन में शायद ही आया हो। वाशिंग मशीन में लस्सी बना लेने का माद्दा रखने वाले हमारे इस जुगाड़ू देश ने मिस कॉल नाम के इस शब्द को अपनी भाषा और यहां तक कि रोज़मर्रा की बातचीत हिस्सा बना लिया है। भोजपुरी गानों से लेकर बालिवुड आईटम नम्बर तक में सैंया को पटाने के नुस्खों में शामिल होने READ MORE

हर तीसरा भारतीय किसान, पर कृषि वैज्ञानिकों के आधे पद खाली

January 12, 2013 // 0 Comments

भारत के बढ़ते कृषि व्यापार की चकाचैंध से प्रभावित होकर लखनऊ के अफाक अहमद ने कृषि विषय में एमबीए करने का मन बनाया और लखनऊ विश्वविद्यालय के प्रबन्धन विज्ञान संस्थान में एडमिशन ले लिया। अफाक के अध्यापकों ने उसे यही बताया था कि एग्रिकल्चर की पढ़ाई में आगे बहुत अच्छे अवसर हैं। दक्षिण भारत के कृषि व्यापार की नज़ीर देकर उसे समझाया गया कि मौजूदा समय में इस क्षेत्र से उच्च शिक्षा लेने READ MORE

अनजान शहर में पहचान की तलाश

December 18, 2012 // 0 Comments

साप्ताहिक अखबार गांव कनेक्शन (16  से 22 दिसम्बर)  में प्रकाशित मुम्बई के अंधेरी स्टेशन के भीतर उस ओवरब्रिज पर भागती भीड़ का न कोई सर पैर है, न कोई ओर छोर। अजनबी अनजान चेहरों में पहचान तलाशने की तमाम कोशिशें जब हारकर लौटती हैं तो अपना पीछे छूट गया कस्बा याद आता है। स्टेशन से गुजरती कोई भी लोकल ट्रेन उस कस्बे की ओर नहीं लौटती। कितनी आसानी से चिलचिलाती सर्दी की सिहरनें गंधाते पसीनों की बू READ MORE

कितना जायज़ है मौत का मज़ाक

November 26, 2012 // 0 Comments

इस बीच फेसबुक पर दो मसलों को लेकर प्रतिक्रियाओं का अनवरत दौर जारी है। बाला साहब ठाकरे का देहावसान और अजमल कसाब को गुपचुप दी कई फांसी। इन दोनों ही विषयों में यूं तो तुलना करने के लिये कुछ भी समानता नहीं है पर इन पर आ रही प्रतिक्रियाओं में जो एक बात कौमन है वो है इन पर की जा रही बेहद असंवेदनशील टिप्पणियां। फेसबुक पर इन मौतों को लेकर तमाम तरह के मज़ाक किये जा रहे हैं। लोगों ने यहां तक READ MORE

एक मुठ्ठी फुर्सत

November 19, 2012 // 1 Comment

मशरूफियत की जेबों मेंसुबह सुबह यू ही तलाशी ली.टटोला तो निकल आई कुछ पुरानी चींजेंकुछ भीगे कागज उम्मीदों केकुछ रूखे छिलके सुकून केएक मुड़ा हुआ विजिटिंग कार्ड खुशी का(जिससे कभी मिलना ना हुआ)पुरानी डायरी के पन्ने पे लिखी ख्वाहिशों की एक फेहरिश्त( जिसकी स्याही पूरी तरह धुल चुकी थी अब)निकालकर फेंक दिया इन चीज़ों कोवक्त के पास रखे उस कूडेदान में.पर अब भी कुछ था जो बचा रह गया था. बरसों पहले READ MORE

आंखिरी लमहों में मुम्बई फिल्म फेस्टिवल

October 31, 2012 // 0 Comments

मुम्बई फिल्म फेस्टिवल  के छटे दिन फेसबुक पर फेस्टिवल के पेज से जानकारी मिली कि मुम्बई डाईमेन्शन कैटेगरी के अन्दर आने वाली 25 शौर्ट फिल्म्स का प्रदर्शन एक बार फिर किया जा रहा है। मुम्बई डाईमेन्शन की पहली स्की्रनिंग छूट जाने का बहुत मलाल हुआ था। इसलिये इस स्क्रीनिंग को किसी भी हाल में न छोड़ने का मन बना लिया था। मैने फेसबुक पर पढ़ा था कि दिन के एक बजकर तीस मिनट पर फिल्म गोदरेज थियेटर READ MORE

मुंबई फिल्म फेस्टिवल : पांचवा दिन

October 29, 2012 // 0 Comments

पिछले पांच दिनों से मुम्बई के पांच अलग अलग थियेटरों का पीछा किया है। हर थियेटर जैसे एक ट्रेन सा हो और फिल्म शुरु होने का वक्त जैसे किसी सफर के शुरु होने का वक्त हो। रोज कई ऐसे ही सफर तय किये हैं इन दिनों में। सुबह उठना, घर से निकलने के पहले ज़रुरी काम निपटाना, रेलवे स्टेशन की तरफ भागना, चलती हुई ट्रेन में मुम्बई फिल्म फेस्टिवल के कैटलौक पर डॉट पेन से टिक करके सम्भावित अच्छी फिल्मों की READ MORE

मुंबई फिल्म फेस्टिवल- चौथा दिन

October 25, 2012 // 0 Comments

एक और दिन मुम्बई फिल्म फेस्टिवल के नाम रहा। शुरुआत खराब थी। इतवार की सुबह सुबह सायान के सिनेमेक्स सिनेमाहौल में औडिटोरियम के बाहर 12 बजकर 45 मिनट पर लगने वाली फिल्म गौडस हौर्सेज़ बिना किसी पूर्व सूचना के कैंसल कर दी गई। स्क्रीनिंग हौल के बाहर दूर दूर से फिल्म देखने आने वाले लोग इन्तज़ार करते रहे पर वहां उन्हें बताने वाला भी कोई नहीं था कि फिल्म किस वजह से ऐसे अचानक टाल दी गई है। 60-62 साल READ MORE

मुम्बई फिल्म फेस्टिवल- दूसरा और तीसरा दिन

October 23, 2012 // 0 Comments

सुबह सुबह नीद खुली तो देर हो चुकी थी। साढ़े नौ बज चुके थे। रात को सोते वक्त सोचा था कि मुम्बर्इ फिल्म फेसिटवल के दूसरे दिन की पहली फिल्म से शुरुआत की जाएगी। और फिर पूरा दिन थियेटर की कुर्सियों पर टिककर फिल्मी अनुभवों को अपनी जि़न्दगी का हिस्सा बनाया जाएगा। पर रात को देर से सोने की आदत सुबह देर से उठने की मजबूरी पैदा कर ही देती है। खैर उठते ही फटाफट नहा धोकर कदम स्टेशन की ओर बढ़ाए जा READ MORE

MAMI DIARY-1 : फिर आया मुंबई फिल्म फेस्टिवल

October 23, 2012 // 0 Comments

एक जलसा मुंबर्इ में दस्तक देने वाला है। इस जलसे की उत्सवधर्मिता का स्वरूप बिल्कुल अलहदा है। इस जलसे में जो होगा, वो स्क्रीन पर होगा और उसका असर लोगों के दिलो-दिमाग और शायद मानसिकताओं पर होगा। सिनेमा को पालते पोसते इस शहर में सिनेमा के इस उत्सव को लेकर कितना उत्साह है, ये कल से पूरे एक हफ्ते देखने को मिलेगा। मामी मुंबर्इ के रास्ते पर है। बस आज यह हम तक पहुंच जाएगा। इस बार मिस नहीं करना READ MORE

तस्वीरें और दीवारें

October 23, 2012 // 0 Comments

वक्त के चौखटे में कहींपुरानी यादों की एक तस्वीर लटकी हुई थीअरसे से कुछ खटकता रहा था उसमेंकुछ तल्खियां थी शायदकई मर्तबा सोचा किउस तस्वीर को दीवार से उतार फेंकूंकई दफा कोशिश भी कीपर तस्वीर को न हटना था, न हटीबार बार हटाने पर भीकिसी काई सी उग आती थी कमज़र्फअब जाके समझ आया हैकि कुछ तस्वीरें वक्त की दीवार से नहीं हटतीकुछ दीवारों को वक्त की तस्वीर से हटाना होता READ MORE

जिन्दगी की कोचिंग क्लास हैं स्टीव जौब्स की बातें

October 5, 2012 // 1 Comment

स्टीव जौब्स का व्यकितत्व मुझे जिन्दगी की कोचिंग क्लास की तरह लगता है। उनके बारे में पढ़ते चले जाना जि़न्दगी को सीखते चले जाने की तरह है। आविष्कार ही वो चीज़ है जो एक लीडर को एक फौलोवर से अलग करती है। स्टीव जौब्स की कही ये बात इसलिये अहम हो जाती है क्योंकि उन्होंने जो कहा वो अपने खुद के अनुभवों के आधार पर कहा। उनकी कही हर बात को उनकी जिन्दगी के अलग अलग हिस्सों में झलकते हुए देखा जा READ MORE

गणपति बप्पा मोरिया……..

September 29, 2012 // 0 Comments

नेता ले गये लूट के दिल्लीदेश हमारा सोरियागणपति बप्पा मोरिया…….. जेबें हमरी खाली करकेभर गये अपनी बोरियांगणपति बप्पा मोरिया मंहंगा राशन, बिजली महंगीजीना मेहंगा होरियागणपति बप्पा मोरिया वालमार्ट का बोर्ड देखकेकल्लू बनिया रोरियागणपति बप्पा मोरिया कोल के घोल से लगे दाग कोएफडीआर्इ से धोरियागण्पति बप्पा मोरिया संसद भवन के पीछे मटरुसर पे मैला ढ़ोरियागणपति बप्पा मोरिया लोक READ MORE

बर्फी के साथ- ‘चल भटक ले ना बांवरे’….

September 20, 2012 // 2 Comments

आपके जीवन में जब कविताएं घट रही होती हैं, जिन्हें महसूसने के लिये आपको शब्दों के सहारे की ज़रुरत नहीं पड़ती, जब दिखाई देता हुआ और सुनाई देता हुआ भी अर्थहीन हो जाता है, कुछ बेवजह सा, बेनाम सा होता है जो दिल पे गहरी छाप छोड़ जाता है, जैसे ताजे ताजे फाहों वाली बर्फ गिर रही हो, जैसे हौले हौले से बारिश हो रही हो, जैसे नीले आसमान में बादल कोई टुकड़ा खामोशी से रैंग रहा हो, जैसे आप इन सारी घटनाओं READ MORE

अफवाहें गढ़ती वर्चुअल दुनिया

September 16, 2012 // 0 Comments

फेसबुक जैसी नेटवर्किंग सार्इट पर फैली अफवाह ने बैंग्लौर से लगभग 3 हज़ार उत्तर भारतीय लोगों को अपने अपने घरों की ओर जाने को मजबूर कर दिया। इस घटना ने एक अजीब सा डर पैदा किया है जिसे आपसे साझा कर रहा हूं। इन दिनों इन्टरनेट के सामने बैठे बैठे अक्सर मैं सोचता हूं कि कहीं हमें दरवाजों में बंद होने की आदत तो नहीं हो रही? कभी कभी  लगता है कि मेरे आस पास कर्इ किस्म के दरवाजे हैं जो बंद रहते हैं। READ MORE

उधारी की मौज और परेशानियों की नकदी

September 15, 2012 // 0 Comments

मुम्बर्इ में नया नया आया था तो टीवी के एक लेखक से मिलने गया। लोखंडवाला की पौश कौलानी में टूबीएचके लेकर अकेले रहते थे। मतलब ये कि पैसा अच्छा कमाते थे। बातों बातों में उन्होंने बताया जिमिंग, स्वीमिंग, कार जैसे कर्इ नये शौक उन्होंने टीवी की दुनिया में आकर पाल लिये। क्यूंकि अभी पैसा अच्छा मिल रहा था तो र्इएमआर्इ नाम के उस जादुर्इ तरीके ने चीजें आसान कर दी थी। हर महीने कटने वाली इस READ MORE

मैने दिल से कहा, ढूंढ़ लाना खुशी…

September 14, 2012 // 0 Comments

मैने दिल से कहा ढ़ूंढ़ लाना खुशी……कल मशहूर गीतकार और पटकथा लेखक नीलेश मिस्रा के लिखे गीत की इन पंकितयों को सुनते हुए अचानक खयाल आया कि वाह क्या सच्ची बात कही है। अक्सर हम नासमझों की तरह खुशी के छोटे छोटे पलों को बहुत छोटा और गमों के छोटे छोटे लमहों को भी बहुत बड़ा करके आंकते हैं। खुशी की तलाश में निकलते तो हैं पर रासते से बेवजा ही ग़मों के तिनके समेटकर ले आते हैं। और फिर उन्हीं READ MORE

तनहा तनहा यहां पे जीना ये कोर्इ बात है?

September 14, 2012 // 0 Comments

अकेलापन हमारे समय के उन अहसासों में से एक है जो संक्रामक रोग की तरह दिन पर दिन फैल रहा है। किसी ने कहा है कि जिस वक्त आप अकेला महसूस करते हैं उस वक्त आपको खुद के साथ रहने की सबसे ज्यादा ज़रुरत होती है। जिन हालातों में हम रह रहे हैं वहां रोज़मर्रा की चीजों के साथ वक्त भी दिन पर दिन महंगा होने लगा है। ऐसे में दूसरों के लिये तो दूर की बात हम अपने लिये भी फुरसत के लमहे नहीं निकाल पाते। और इस READ MORE

खाली जगह

May 19, 2012 // 0 Comments

लाखों, करोड़ों में से,   किसी एक के कम होने से यूं तो फर्क नहीं पड़ना चाहिये फिर भी पड़ता है फर्क…. कुछ जो कम होकर छोड़ जाता है , कहीं किसी कोने में खाली जगह… जिसे न हवाएं भर सकती हैं, न यादें….. सम्भावनाओं के कुछ बुलबुले रह जाते हैं उस जगह, जो पैदा करते रहते हैं कई और बुलबुलों का भ्रम….. जिनके बनने और टूट जाने के बीच  वक्त के सिवा कुछ नहीं बदलता…. उस खाली जगह पर  एक अदृश्य सी कसर रह READ MORE

ख़बर दर ख़बर

April 5, 2012 // 1 Comment

टीवी पर आने वाली हर नई ख़बर के साथहमारी आत्माएं और भ्रष्ट होती जाएंगी। नीदों की आंखों में धूल झोंकता शहररोशनी बनकर हमारे अंधेरों में शामिल हो जाएगा। ग्ंधाते पसीनों की भीड़ मेंहमसे छीन लिये जाएंगे हमारे मोबाईल फोन। सरेबाज़ार सड़कों के बीच सेउठा ली जाएंगी हमारी खुशियां दिन दहाड़े। हमारी शिकायतों पर टलती रहेंगी कार्रवाईयां। हमारे इलाज के पैसे लूटकरबनाये जाते रहेंगे हाथी वाले READ MORE

एक ईमानदारी से बोले गये झूठ की ‘कहानी’

March 11, 2012 // 1 Comment

कहानी के ट्रेलर देखकर लग रहा था कि कोई रोने धोने वाली फिल्म होगी… जिसमें शायद कलकत्ते को लेकर नौस्टेल्जिया जैसा कुछ होगा… शायद एक पीडि़त प्रेग्नेंट औरत होगी जो अपने अधिकारों के लिये लड़ रही होगी… शायद नो वन किल्ड जैसिका जैसा ही कुछ… पर फिल्म देखने के बाद अच्छा लगा कि कुछ नया देखने को मिला… प्रिडिक्टिबिलिटी से परे… बौलिवुड के मौजूदा परिदृश्य में जिस तरह फिल्मों से READ MORE

हमारे सिनेमा को जरुरत है पान सिंह तोमर जैसे बागियों की

March 4, 2012 // 4 Comments

बीहड़ में बागी होते हैं… डकैत मिलते हैं पार्लामेन्ट में….  पान सिंह तोमर का ये डायलौग फेसबुक की दीवारों पे बहुत दिनों से छाया हुआ था…. तिग्मांशू धूलिया की हासिल देखने के बाद उनकी इस फिल्म से उम्मीदें महीनों पहले से बांध ली थी… आज पवई आईआईटी के पड़ौसी बिग सिनेमा के थियेटर में फिल्म देखने के बाद लगा जैसे कोई साध पूरी हो गई।  एक बागी के लिये इतना सम्मान, और अपने सिनेमा के लिये READ MORE

शहर में लड़की

February 14, 2012 // 1 Comment

तमाम टीवी चैनलों पर कई लोग थे तुम नहीं थी… हर विषय पर बोल रहे थे लोग हो रही थी चर्चाएं ज़ोर ज़ोर से। पर कोई नहीं बोला तुम्हारे बारे में। मैं जानना चाहता था कहां हो तुम? देखना चाहता था तुम्हारी एक झलक, पर कोई कैमरा तुम पर फोकस नहीं हुआ। पेज थ्री की जगमग और स्टार की हाईप्रोफाईल कहानियों में तुम दिखती भी तो कैसे? तुम्हारी मलिनता कैमरे पे अच्छी नहीं लगती। वहां तो चढ़ती है कई परतें चेहरे READ MORE

‘आईस-पाईस’ और ‘धप्पी’

December 31, 2011 // 2 Comments

फिर पिट्ठी में बस्ता रखके,  इस्कूल को जाना मंगता है.बाजू में प्याज दबा करके,छुटटी का बहाना मंगता है….. बरसात में कीचड़ के उपर,फुटबाल खेलना मंगता है.साईकिल का टायर हाथों से,सड़कों पे ठेलना मंगता है… वो सात पत्थरों का टावर,कपड़े की बॉल से गिर जाना.गुडडू की छत पे फिर एक शाम,‘किंग-कौंग’ खेलना मंगता है… फिर से किरकेट का टूर्नामेंट,कस्बे में हंगामा कर दे.‘हिप हिप हुर्रे’… ‘हिप हिप READ MORE

दूर से आई है खबर कि वो शहर में है….

December 30, 2011 // 1 Comment

आज फिर खुला, कोई दरवाज़ा हैआज फिर से पुरानी यादें ताज़ा हैंआज फिर कोई हलचल है.. कहीं कुछ तो है खोल के फिर से खिड़कियां शायद भूल गयाहवा के रास्ते कोई तो चला आया हैमेरे कमरे में आज फिर घुली बेचैनी हैजाना पहचाना कोई अजनबी सा साया है… मुझसे कहता है नज़र फेर के बैठे रहनायाद मत करना, भुला देना, यही बेहतर हैअपने तकिये से रोक लेना, सांस मत लेना अपने सपनों को सुला देना, यही बेहतर हैऔर एक टीस भी देता READ MORE

ब्लू वैलेन्टाईन: एक खूबसूरत तनाव

December 22, 2011 // 0 Comments

“You got to be careful that person you fall in love is worth it to you” “How can you trust your feelings when they can disappear like that..” किसी से प्यार करते वक्त जो बात सबसे जरुरी है वो ये कि इस बात का पूरा ध्यान रखा जाये कि जिससे आपको प्यार हो रहा है वो इस लायक है भी कि नहीं कि उसे प्यार किया जा सके। ये बात भले ही थोड़ा अटपटी लगे लेकिन ब्लू वैलेन्टाईन यही बात व्यावहारिक ढ़ंग से समझाती है…अक्सर हम अपनी भावनाओं के वश में आकर प्यार करते हैं… भावनाओं का भरोसा READ MORE

ये हो न सका

December 21, 2011 // 1 Comment

मैं मिलना चाहता था तुमसेठीक उस वक्तजिसके लिये कोई गिनती न होन घंटा, न मिनट न सेकंडन सुबह, न शाम,न बारिश, न धूप, न वजह…… उजाले और अंधेरे के बीच तलाशना चाहता था वो वक्तजिसमें हम दोनो धुंधले से दिखते न पूरी तरह उजले… न पूरी तरह स्याह सुनना चाहता था वो आवाज़जो सुनाई देने और न देने के बीच की होतीन पूरी तरह सच… न पूरी तरह झूठ खोजना चाहता था एक जगहजहां समुद्र के उपर एक जंगल होतापहाड़ों के READ MORE

नादान परिंदे घर आजा…..

November 14, 2011 // 3 Comments

कुछ दिन पहले भवन्स कौलेज में रौकस्टार के प्रोमोशन का लाईव शो देखते हुए कई सारे टैक्निकल एरर हुए तो कुछ शक सा हुआ। स्टेज के दोनों ओर दो एलिवेटर लगे थे जिन्हें नर्गिस फखरी और रणबीर कपूर को उनके परफोर्मेंस के बाद नीचे वापस पहुचाना था। रणबीर तो वापस पहुंच गये लेकिन नर्गिस का एलिवेटर गच्चा दे गया। फिर रहमान के गाते वक्त पियानो खराब हो गया तो उन्हें अपना गाना स्किप करना पड़ा। वहां दोनों READ MORE

काश प्यार एक बच्चा होता।

August 14, 2011 // 2 Comments

काश प्यार एक बच्चा होता। छोटी छोटी बातों से नावाकिफ होतानादानी में कभी कभी कह जाता बातें बड़ी बड़ी।और पास में होती मांसुनती हंस देती खड़ी खड़ी।कितना अच्छा होता।काश प्यार एक बच्चा होता। उसे न पैसे से कोई मतलब होतासौ पचास के हरे नोट वह नहीं जानतापैसा उसके लिये होता एक चौकलेटजो लाते पापा रोज शाम।कुछ भी कह जाता जो मन में होताइतना सच्चा होता।काश प्यार एक बच्चा होता। अपनी साईकिल के READ MORE

दांये या बांये देखने के बाद

June 25, 2011 // 1 Comment

यहां मुम्बई में बैठे दायें या बायें देखते हुए एक कार थी जो पहाड़ के एक गांव कांडा के कलाकेन्द्र तक छोड़ आई। ये पूरा सफर बहुत ही आत्मीय था। चीजें जब आम्मीय होती हैं तो हम उनकी खामियों को अनदेखा कर देते हैं। बेला नेगी की दांयें या बांये देखने के बाद अनदेखियां करने का मन होता है। एक समय था जब अपनी मां के साथ बागेश्वर के पास के उस कांडा गांव में जाना होता था। मैं थक जाता था। वो नहीं थकती READ MORE

खुशी की आदत…

June 13, 2011 // 1 Comment

ये अंधेरा कभी तोउस उजाले सा रहा होगातुम्हें जब कुछ नहीं दिखाबहुत कुछ हो रहा होगा बहुत थोड़ी सी बारिशथोड़ी सी बूंदेंज़मी पर अब भी बाकी हैंवो भीगा पत्ताशायद गर्द अपनी धो रहा होगा। कड़ी गर्मी मेंतुम्हारे घर पे अपना घर बनाते हैंके जब बरसात आती हैकबूतर लौट जाते हैंउन्हें मालूम हैकहीं कोई अंबर कुहासा खो रहा होगा यहां जब रात की कालिकमेरी आंखों में छाई थीअमावस पास आया थामुझे पूरा यकी READ MORE

बदलाव भी एक लहर है

May 27, 2011 // 0 Comments

बदलाव भी एक लहर हैबूंद बूंद, लमहा लमहा,तर बतर,भीगी भीगी,  बहती सी लहर…. और एक सूर्य है तपाता -जलाता सामुश्किलों का सूर्यऔर राहतों का एक चांद भी तो है……. दिन ब दिन तय है कि हमें बदलना होगावक्त की करवटों के साथ ढ़लना होगा जिन्दगी ऐसीजैसे किसी गाड़ी सेजा रहे हों किसी पहाड़ी सड़क परहरे पेड़, पीले पत्ते, बंजर खेत, टूटे मकानफूल, क्यारियां, झरने, नदीधूप, छांव, सुख और दुख पीछे छोड़ते हुएकिसी READ MORE

समुद्र के लिये

May 24, 2011 // 0 Comments

कैसे हो पाते हो अपनी नमकीनियत में भी इतने मीठे कैसे रोज तपने के बाद जल नहीं जाते बुझ ही नहीं जाते सूरज के साथ देखता हूं कई मर्तबा तुम्हें उफनते हुए तुम कुछ तो सोचते हो किसी के बारे में जानता हूं कि एक ज्वार है तुम्हारे भीतर सुनामी की भीषण सम्भावना लिये पर समझ नहीं पाया हूं आज तक कैसे रह पाते हो इतने शान्त और बांट पाते हो शान्ति को बिना भेदभाव के मैने भगवान के बारे में कुछ ऐसा ही सुना है READ MORE

कुछ तो कहना था अलविदा ही सही

May 19, 2011 // 0 Comments

अब ये बेचैनी जाविदा ही सहीकुछ तो कहना था अलविदा ही सही यूं भी तो पास कभी आ न सकेअब ये दूरी ही सही हम जुदा जुदा ही सही कब तलक यूं किसी मजधार में बहते रहतेगमे साहिल ये तयशुदा ही सही अब ये किस्मत की लकीरें तो बदलने से रहीहम सवाली ही सही तुम खु़दा ख़ुदा ही READ MORE

छोटी कहानियां

May 14, 2011 // 0 Comments

टाकिंग टम्स वो दोनों टाकिंग टम्स में नहीं थे। फेसबुक, जीटाक, स्काईप, बीबीएम सारे दरवाजे बंद थे। उसे लगा आज सचमुच खिड़कियों से हवा नहीं आ रही। रफ्ता रफ्ता उसके दिमाग में न जाने क्या बारुद की तरह जमा होने लगा। लगा कि कुछ ही देर में दिमाग आरडीएक्स हो जायेगा। वो रास्ते तलाशने लगा। सोचा कि कोई तो होगा जिससे उसके बारे में बात कर सकूं। रात के चार बज रहे थे और सब लोग आफलाईन । उसे लगा सारे READ MORE

वक्त होता है कतरनों की तरह

May 14, 2011 // 2 Comments

मैने कड़ियों को जोड़ना चाहा वो जो टूटी थी शायद समय की माला थी वो जो बिखरी तो जुड़ न पाई कभी। वक्त होता है कतरनों की तरह वो भी डरता है आंधियों से कहीं कोई आंधी उसे उड़ा ही न दे कोई पानी उसे गला ही न दे एक स्याही थी बड़ी गाढ़ी सी तूने मेरे समय पे पोती थी तबसे समय की वो कतरन दिल की अलमारियों में रक्खी है उसपे दो शब्द लिख नहीं पाया उसका कुछ और हो नहीं पाया मुझे हर बार यही लगता है अब वो किसी भी READ MORE

अभी वीसी ने मिलने बुलाया है….देखें साहब क्या कहते हैं

May 10, 2011 // 1 Comment

एमसीआरसी की छात्रा सबा रहमान की टिप्पणी कल एमसीआरसी के छात्रों के विरोध प्रदर्शन का तीसरा दिन था। बिना खाये पिये वो अपनी मांगों को लेकर डटे हुए हैं। फाईनल इयर की सानिया अहमद और फहद की हालत आज बिगड़ गई। उन्हें होली फैमिली हौस्पिटल में भर्ती कराना पड़ा। कल की हिंसक कार्रवाई के बाद आज इन छात्रों के समर्थन में कुछ ज्यादा लोग जुटे। लेकिन जामिया के वीसी और एमसीआरसी के डाईरेक्टर दोनों READ MORE

पढ़ाई की जगह पिटाई, क्या यही है एमसीआरसी का असली चेहरा

May 8, 2011 // 0 Comments

जामिया के एमसीआरसी के छात्रों की भूख हड़ताल का आज दूसरा ही दिन था और प्रशासन को ये गवारा न हुआ कि उन्हें अपनी बात शान्तिपूर्ण तरीके से रखने दी जाये। उन्होंने छात्रों के शान्तिपूर्ण विरोध का दमन करने के लिये जो तरीका अपनाया आप इस वीडियो में देख सकते हैं। पुलिस ने स्थानीय एसएचओ सतबीर सिंह डागर के नेतृत्व में इन छात्रों पर लाठीचार्ज किया। आज जामिया के छात्रों के साथ दिल्ली READ MORE

आप सभी से एक अपील

May 6, 2011 // 0 Comments

उन लोगों ने दिन रात मेहनत करके अपनी डिप्लोमा फिल्मों की स्क्रिप्ट लिखी। उसे पिच गया। लेकिन जब फिल्म बनाने के दिन नजदीक आये तो उन्हें कहा गया कि उनकी अटेंडेंस सौर्ट है। इसलिये उन्हें ये फिल्म नहीं बनाने दी जायेगी। और न ही वो इस साल एक्जाम दे पायेंगे। एमसीआरसी जामिया। एक निहायत ही जाना माना संस्थान जिसे फिल्म और जनसंचार की प-सजय़ाई के लिये आउटलुक का एक सर्वे तीसरे स्थान पर रखता है। READ MORE

परायेपन की बू

May 5, 2011 // 0 Comments

यूं ही अकेले साहिल पे चलते चलतेएक नाव मिली थीलगा कि जैसे इतनी प्यारी चीजकभी देखी ही नहीं थीलगा कि जैसे कोई साथीदूर तलक अब संग चलेगा।पास गया और अपनी मरजी सेएक पतवार उठा लीकुछ आगे तक नाव चलाने कीकोशिश भी कीपर नाव वही रुकी ही रहीडगमग करती सी।नाव को देखाकोई कमी या मीनमेक कुछ भी न दिखातभी अचानक याद आयाएक चीज नहीं थीआसपास देखा जाकर साहिल पे तलाशातबसे अबतक रोज तलाशी लेता हूं साहिल READ MORE

एक लड़की जो आपकी प्रेमिका नहीं हो सकी

April 28, 2011 // 2 Comments

आपके लाख चाहने के बावजूदएक लड़की जो आपकी प्रेमिका नहीं हो सकीएक ऐसे सपने की तरह हैजिसे शायद आप कभी ठीक से नहीं देख पायेउस नीद की तरह जिसमें आप बेचैन थेउस चैन की तरह जो सबसे खूबसूरत थाएक यात्रा रास्ता भूली हुईएक गलती जो जानबूझ के की गईएक गीत जिसमें दर्द थाएक लहर जो कभी नहीं थमीएक  ट्रेन  जो दूर से आती दिखीपर आप तक कभी नहीं पहुंचीएक इत्मिनान जिसे आपने हर पल जियाएक दुखजिसे आप सांसों के READ MORE

चार छोटी कविताएं

April 21, 2011 // 0 Comments

सन्नाटे की मौत तुम न कहोमैं समझ न पांउं।कुढ़ता रहूं हमेशा।तुम भी रहो परेशान।रहे सदाअवान्छनीय मौन।बेहतर हैमौत जैसे सन्नाटै सेसन्नाटे की मौत।हम तुम तय कर लेंकब बोलना हैकहां चुप रहना है। सदा  सदा एक सदा आती हैसदा बहार है सदासदा डराती है।और वो रहते हैंसदा खौफजदा।चुप रहने की आदत ने ऐसी मौत दी हैवो जी भर के मरते हैं सदा सर्वदा। मंत्री जी का मैसेज  दिल्ली में प्लेन का रनवे हैदेहरादून READ MORE

शहर इतने खराब नहीं होते

April 11, 2011 // 3 Comments

अगर थोड़ा सा समय निकालकर गौर करेंतो ये कोई पत्थर पर लिखी लकीर नहीं हैकि शहर हमेशा खराब होता है।शहर में एक क्यारी हो सकती हैजहां जल्दबाजी की टहनियों में फुरसत के फूल होंऔटो के भागते मीटर मेंठहरी हुई उम्मीद हो सकती हैकिसी बाम्बे टाईम्स के चौथे पन्ने परखबर हो सकती है खुशी कीआठवें माले से नीचे झांक सकती है प्यार भरी नजरजो कूद सकती है आपकी आखों मेंऔर कर सकती है रोमांटिक गाने सुनने को READ MORE

किसके लिए लड़ रहे हैं अन्ना हजारे….

April 6, 2011 // 0 Comments

जन लोकपाल विधेयक पर अंग्रेजी में बहुत सी पाठ्यसामागी इन्टरनेट पर मौजूद है। हिन्दी में ना के बराबर जानकारी है। इसलिये ये लेख हिन्दी पाठकों के लिये जो मेरी ही तरह इस बिल के बारे में ज्यादा जानना चाहते हैं।     सुना कि अन्ना हजारे अनशन पे बैठे हुए हैं। लगा कि समझना चाहिये कि आंखिर मुद्दा क्या है। और जब समझा तो लगा कि दरअसल ये मुद्दा तो हमारे अपने जीवन से जुड़ा है। लोकपाल विधेयक एक ऐसा READ MORE

ब्लू वेल्वेट- माने मखमल के उस पार

March 31, 2011 // 1 Comment

परसों रात दो बजे जब फाईनली डिसाईड हो गया कि आज नीद नहीं ही आयेगी तो अपने फिल्मों के कलेक्शन पे गौर किया। रात काटने का ये एक बेहतरीन विकल्प मालूम हुआ। ब्लू वेल्वेट। डेविड लिंच की ये फिल्म किसी तरह छूट गई थी। सोचा देखी जाये। देखने के बाद लगा कि इसे देखने का इससे बेहतर वक्त शायद कोई और नहीं हो सकता था। अगर आपने अल्फ्रेड हिचकौक की फिल्म साईको देखी हो और आपको उस जौनर की फिल्में पसंद हों तो READ MORE

ब्लैक स्वान को देखकर

March 26, 2011 // 0 Comments

हमारा अपना काल्पनिक मानसिक संसार जब हमारी जिन्दगी में शामिल होने लगता है तो हमारा व्यवहार उसे ज़ाहिर कर देता है। इस रियल और इमेजनरी मेंटल वर्ड का मिक्सचर सिनेमा के जरिये कभी कभी एक जबरदस्त अनुभव बन जाता है। फिल्म देखते हुए तो आप फिल्म के साथ जीने ही लगते हैं फिल्म देखने के बाद भी आप कुछ देर उस दुनिया से बाहर नहीं निकलना चाहते। उस दुनियां में क्या, क्यों और कैसे हो रहा था आपको इन READ MORE

इस बार परिंदे ने नसीहत दे दी

March 25, 2011 // 0 Comments

मेरे कमरे में कबूतर आयाअच्छा लगा किकोई तो है साथ मेरेबहुत देर से बैठा सा वोकुछ सोच रहा थाजो सोच रहा थामुझे मालूम नहींमैने देखा उसे नज़र भर केसोचा चलो कुछ बात करुंजैसे ही उठा थाऔर कुछ बोला थावो उड़ गया खिड़की से लपकतापलक झपकते ही बाहर गर्मी हैवो लौटके आयेगा ज़रुरउसकी फितरत भी है इन्सानों सीमुझको लगता था किकोई तो अलहदा है यहां।अच्छा हुआ इस बारपरिंदे ने नसीहत दे READ MORE

सपनों की नौकरी, नौकरी के सपने

March 21, 2011 // 0 Comments

दोस्त जब भी समुद्र देखता हूं तुम याद आते हो मन कहता है कि समुद्र के बीच उगने लगेंगे पहाड़ और पहाड़ों पर मालाएं बनाती सड़क पर दौड़ने लगेंगे बाईक के पहिये जैसे सूरज का रथ। हम भूल जाएंगे मील के पत्थर जहां पानी होगा, हवा होगी, मन होगा ठहर जाएंगे जहां होगा इत्मिनान वहीं उग जाएंगे दूब घास की तरह च्ुापचाप बिना किसी को बताये लेाग लाख हमें सिरफिरा कहें हम चिलचिलाती धूप में तब भी चढ़ेंगे खड़ी READ MORE

आधी रही मुराद

March 20, 2011 // 0 Comments

आंखों के किसी बेहतरीन खाब सा थावो जो लमहा था लाजवाब सा था जबसे देखा उसी में डूब गयेउसका चेहरा किसी सुर्खाब सा था कैसे ना झुकते शान में उसकीउसका रुतबा जो था नवाब सा था उसने यूं तो कभी कुछ भी न कहावो न कहना भी आदाब सा था उनको लेकर हमारा इश्क जो थाकिसी आधी रही मुराद सा READ MORE

मेरी चाहत, तेरी रज़ा

March 20, 2011 // 0 Comments

वो तो जीने का एक नशा सा हैवरना जीना भी खामखा सा है मर मर के जी रहे हैं तेरी याद में परऐसे जीने में भी मज़ा सा है। तुझको देखा तो एक गुमां सा हुआमेरी सांसों में कुछ रुका सा है। मुझको मालूम है कि इश्क गलतफहमी हैएक मुगालता है यूं ही बेवजा सा है। कोई बारीक सा समन्दर हैये जो यादों का सिलसिला सा है लगता है शब औ रोज़ का रिश्तामेरी चाहत, तेरी रज़ा सा READ MORE

वो दिन तुझसे मिलने का

March 14, 2011 // 0 Comments

याद है मुझको वो दिन तुझसे मिलने का। सूरज ने उस दिन ठंडी सी बारिश की थी  गर्मी की। बर्फ भी उस दिन गर्म हवा सी छोड़ रही थी। और तुम्हारे गोल गुलाबी छाते के सीकों से  बारिश की गुलाबी बूंदें  टपक टपक कर आती थी मेरे हाथों में। मुझे याद है वह छोटी सी बूंद जिसमें देखा था पहली बार तेरी परछाई को। फिर देखा था  नजर उठा तेरे चेहरे की ओर। काली अलकें काली पलकों से टकराती भूरी आंखों के उपर लहराती थी। और READ MORE

मौत पर लिखी पहली कविता

March 13, 2011 // 0 Comments

मौत पर लिखनाज़िन्दगी की चाह का खत्म हो जाना नहीं हैऐसा होतातो अब तक अमर न होते पाब्लो नेरुदा। ज़िन्दगी अपने मूल रुप मेंमरने का इन्तज़ार ही हैपर मरना अपने मूल रुप मेंज़िन्दगी से हारना नहीं है। मौत गर्द सी जमी होती है हवाओं मेंमिटटी में, पानी में, सूरज की किरणों मेंऔर हर उस चीज़ में जिसका सम्बंध जीने से हैऔर गर्द को साफ किया जाना हर लिहाज से लाजमी होता है।इस तरह से मौत कोई अवांछित READ MORE

नजदीकियों की चाह

March 12, 2011 // 1 Comment

एक रतजगे बाददिन में नीद न आने की आदत साआंखों को जलाता वो अहसासअब तक एक तिलिस्म लगता रहा है।और उसी क्रम में होता रहा है महसूसकि नजदीकियां जितनी सुखदाई होती हैंउतनी ही व्याकुलता भरी होती हैंनजदीकियों की चाह। दूरियां धूल भरी सूखी हवा सीचली आती हैं संासो मेंऔर उनसे भागना लगता हैजैसे जिन्दगी से भागना,पर जब नजदीकियां दूर चली जाती हैंतो दूरियों के पास नहीं होतापास आने के सिवाय और कोई READ MORE

एक गीत, एक म्यूजिक वीडियो और एक बात

March 6, 2011 // 0 Comments

ARVE Error: id and provider shortcodes attributes are mandatory for old shortcodes. It is recommended to switch to new shortcodes that need only url उन लोगों के हाथ में एक वोटर लिस्ट थी। जिससे वो पता कर रहे थे कि कौन सा सिख किस घर में रहता है। जैसे ही वो एक परिवार को मौत के घाट उतारते वो लिस्ट से उसका नाम काट लेते। उनमें से ज्यादातर पढ़े लिखे नहीं थे। और जो कुछ एक पढ़े लिखे थे उनके हाथ में लिस्ट थी। बाकि लोगों के पास तलवारें थी। इस तरह एक एक करके दिल्ली के अलग अलग कोनों से READ MORE

गुलज़ार के लिये

March 5, 2011 // 1 Comment

कभी कभी जब पढ़ता हूं गुलज़ार तुम्हें ग़ुल जैसे महकते लफ़ज़ों के मानी हो जाते हैं और लफ़ज़ ज़हन के पोरों को गुलज़ार किये देते हैं लगता है कि एक सजा सा गुलदस्ता लाकरके किसी ने ताज़ा ताज़ा रख्खा हो और विचारों की टहनी में भावों की कोमल पंखुड़ियां नाच रही हों अक्ष्रर अक्षर मेरे ज़हन में रंग से भर जाते हैं  फिर मैं भी तो गुलज़ार हुआ जाता READ MORE

मासूम दुपट्टा

March 5, 2011 // 1 Comment

हवा का वो मासूम दुपट्टाउड़ता हुआ चुपचाप चला आता है उस दिन छत पर तुम थी मैं थाऔर तभी उड़कर आया था एक दुपट्टाओढ़ा था उसे हम दोनों नेऔर ठंडी सी वो लहर देह से लिपट गई थी।बहुत देर तक दूर दूर चुपचाप खड़े थे हम दोनोंऔर दुपट्टा बहुत देर तक बोल रहा था। उस दिन पेड़ की शाखों और पत्तियों नेशायद उससे एक बात कही थीमैं उस दिन भी रोज़ की तरहा तुम्हें देखताअपने दिल के कोनों से कुछ बोल रहा थासुन न सका वो READ MORE

सवेरा

March 3, 2011 // 0 Comments

सवेरासूर्य की विजय नहीं होता।  अधिकार की लड़ाई में तारों की पराजयया चन्द्रमा का दमन भी नहीं।  सवेरा एक यात्रा है अंधेरे में नहाकर लौट जाना रोज की तरह निर्धारित सफर के लिये।  सवेरा किसी मानी का मद नही          होता  अहंकार के रंग में रंगी सुनहरी सुर्ख तलवार भी नहीं। सवेरा कलाकार का चित्र है नीले आधार पे उभरता लाल रंग और सोने की छोटी छोटी पंक्तियां। सवेराअंधेरे का अंत नहीं होता। READ MORE

पहाड़ और पहाड़ के जीवन-संदर्भों से उपजी महेश चंद्र पुनेठा की कविता – शिव कुमार मिश्र

February 26, 2011 // 0 Comments

युवा कवि महंश चंद्र पुनेठा का कविता संग्रह भय अतल में  इन दिनों चर्चा में है। पुनेठा जी की कविताएं पर्वतीय अंचल का ऐसा चित्रण हमारे सामने पेश करती हैं कि पहाड़ से दूर रहने के बावजूद आपको वहां के सुख दुख संघर्ष और जनजीवन की झलक मिल जाती है। पुनेठा जी की कविताओं को आप इससे पहले भी नई सोच पर पढ़ चुके हैं। वरिश्ठ माक्सवादी आलोचक एवं जनवादी लेखक संघ के राष्टीय अध्यक्ष शिव कुमार मिश्र  ने READ MORE

ऐसी मेरी सौ कविताएं

February 24, 2011 // 0 Comments

भावों का शतक शब्दों ने कहाकुछ उगल दिया कुछ दबा रहा कुछ में था दर्द चुभन थोड़ीकुछ ने अपनी सीमा तोड़ी कुछ में था खुशी का अफसानाकुछ अपना था कुछ बेगाना कुछ में बस दिन की बातें थीकुछ में था तमस और रातें थी कुछ यूं ही भी लिख डाला थाकुछ में चिन्तन का हाला था कुछ को लिखने में रोया थाकुछ में भावों को संजोया था कुछ थी शोषित मजदूरों परकुछ आज़ादी के नूरों पर कुछ में नेताओं का छल थाकुछ में मन थोड़ा READ MORE

शब्द

February 23, 2011 // 2 Comments

शब्द गिरगिट की तरह होते हैंऔर बदल जाते हैं पल मेंमायनों की तरह। रोशनी से मिलते हैं शब्दऔर बिखर जाते हैंजैसे दूधिया चमक मेंनहा जाती हैं पानी की बूंदऔर पल भर रुककरबिखर जाती है खुशी सी। शब्द मिलते हैं अंधेरे सेऔर सिकुड़ जाते हैं सन्नाटे मेंतब शब्दों से बड़ा डर लगता हैतब वो रुलाने लगते हैं। शब्द जब चढ़ते हैंकिसी शिकारी की बन्दूक मेंभेद जाते हैं नसों को ।ताज़ा खूनफूट पड़ता है फव्वारे READ MORE

पागलों की तरह

February 23, 2011 // 0 Comments

खिड़कियों से बंद हैंजो ये दरवाजेमुझे शक हैकि इस मकान में कोई रहता है। कोई आवाज कसमाती नहींहवा चलती नहींएक धूप हैजो जलाती जाती हैन जाने किन सीखचों के रास्तेवो पा लेती है जगहभीतर घुस आने की। मेरे सवालकिसी लू में जल रहे हैंजवाबों की राखकिसी जर्द सीचिपकी पड़ी हैअलमारियों में। जाने वो कौन सी दरारें हैंजो अहसासों के इर्द गिर्दऔंधी लेटी हुई हैंजिनसे कुछ छनता हुआ सानसों में भर रहा READ MORE

जन्नत की हकीकत

February 20, 2011 // 1 Comment

ऊंची सियासत ने कीबड़ी गलतियांऔर कश्मीर कश्मीर हो गया। दिखाये गयेधरती पर स्वर्ग के सपनेपर स्वर्ग बन पाने की सभी शर्तेंदमन की कब्र में दफना दी गई। पीने लगे कश्मीरीआजादी के घूुटफूंक फूंक कर।देखने लगे आजादी केतीन थके हुए रंग।ढ़ोते हुए आजादी कोकिसी बोझ की तरह। फीका लगने लगा गुलमर्गस्ंागीनों के साये में।लगने लगा सुर्खडल झील का पानी। बर्फ की सफेदी के बीचपसरता रहा स्याह डर।दबती रही READ MORE

ये साली…. अच्छी थी

February 9, 2011 // 1 Comment

इन्टयूशन था कि साली अच्छी होगी। कई इन्टयूशन सच निकलते हैं। इस बार यही हुआ। ये साली जिन्दगी कुलमिलाकर एक अच्छी भली फिल्म थी। इसे देखते हुए ऐसा नहीं लगा कि कुछ रेगुलर देख रहे हैं। गन थी। धांय धांय थी। गेंग्स्टर्स थे। पर अभी रामू मार्का किसी डाईरेक्टर की जगह सुधीर मिश्रा थे। इसीलिये फिल्म थोड़ी अलग बन पड़ी। थोड़ी स्टाईलाईज्ड सी। अच्छी एडिटिंग निहायत रफ और रा कहे जा सकने वाले कैची READ MORE

हमें मालूम इस दुनियां की सब बारीकियां भी थी

February 7, 2011 // 7 Comments

भूख की तड़पन भी थी और रोटियां भी थी पतन की खाईयां भी थी, विजय की चोटियां भी थी। जिसे था हौसला, चुनने का साहस था, चुनी उसने घने जंगल में संकरे रासते पगडंडियां भी थी। इतिहास कहता है यहां कितने उगे और कितने ही डूबे वक्त के आकाश में दिन रात की पाबंदियां भी थी। मुझे लगता रहा दुनिया में मैं सबसे अकेला हूं कि ऐसी ही शिकायत उनके दिल के दरमियां भी थी कि मैने जब भी भीतर झांक के खुद की तलाशी ली वहां READ MORE

तनहा कोने खाली से

February 5, 2011 // 1 Comment

टूटे टूटे बिखरे बिखरे तनहा कोने खाली सेदेखो कैसे डरे हुए हैं लमहों की बिकवाली से बिक जाती हैं बंटने वाली चीजें भी बाजारों मेंतभी तो धन्ना सेठ बने हैं जो थे लोग सवाली से। हमको खबर जो बेच रहा है भूख से होती मौतों कीवही है जिसने रोटी छीनी मरे हुए की थाली से। यह बाजार का गणित है भैया हंसना रोना क्या जानेप्यार के मीठे बोल यहां पर लगते गाली गाली से। कुरियर से घर में गुलदस्ता भिजवाने का फैशन READ MORE

पाबंदी

January 31, 2011 // 1 Comment

थोड़ी थोड़ी धूप संभाले रिमझिम सी बरसात भी होचुप्पी भी हो खामोशी भी थोड़ी थोड़ी बात भी हो टप टप की शहनाई गूंजे इन्द्रधनुश के रंगों मेंधूप की गलबहियां भी हों और ठिठुरन की सौगात भी हो कुछ ना हो और कुछ ना होना कुछ होने सा लगने लगेफुरसत वाली सुबह साथ हो खाली खाली रात भी हो। बाजारों का शोर शराबा लहरों में खो जाये कहींपैसे धूं धूं जलने लगें फिर कोई झंझावात न हो। वो शैतान सी जल्दीबाजी खाले READ MORE

कल

January 31, 2011 // 0 Comments

मैं भी था और तुम भी थी और वो निर्जन सी चुप्पी भीअच्छा होता गर वो खामोशी हमसे कुछ कहती तो यह सन्नाटा भी चुप होने की हद तक गहरा होताअगर तेरी आवाज हवा सी आस पास ना बहती तो तेरा कुछ ना कहना भी शायद मुझको अच्छा लगतातेरी आंखों में कुछ कहने की मंषा गर रहती तो।                                                       प्यार अनूठे पागलपन की एक निशानी बन जाताहम दोनों के बीच भरोसे की दीवार न ढहती तो। ना जाने READ MORE

कोशिश

January 31, 2011 // 0 Comments

ऐसी क्या मजबूरी थी इतना न हुआ कल आ जातेकल से फिर ना आओगे बस इतना ही बतला जाते। हमने समय को ऐसे तांका जैसे तुम्हारी आंखें होंपलों को पलकें मान रहे थे इस भ्रम को झुठला जाते। तुमको ही तुम माना होता ऐसा होता बेहतर थाहमको तोे तुम सा हि दिखा जिसको देखा आते जाते। सोये तो तुम आंखों में थी जगते भी कुछ ना बदलापरिवर्तन है नियम प्रकृति का खुद को कैसे समझाते। सुनो कि मैं जो कुछ कहता हूं कहो कि तुमने READ MORE

सवेरा

January 27, 2011 // 0 Comments

सवेरा सूर्य की विजय नहीं होता।  अधिकार की लड़ाई में तारों की पराजय या चन्दमा का दमन भी नहीं।  सवेरा एक यात्रा है अंधेरे में नहाकर लौट जाना रोज की तरह निर्धारित स र के लिये।  सवेरा  किसी मानी का मद नहीे            होतां अहं के रंग में रंगी सोने की  सुर्ख तलवार भी नहीं। सवेरा  कळाकार का चित्र है नीले आधार पे उभरता लाल रंग और सोने की छोटी छोटी पंक्तियां। सवेराकाजल की कोठरी मेंसयाने का READ MORE

इफरात

January 27, 2011 // 0 Comments

काश मैं जीता कुछ दिनकुछ न होने के लिए।कुछ बनने की शर्त को प्याज के छिलके के साथफेंक आता कूड़ेदान में।और निश्चिंत होकरलगाता, सूरज में रोशनी का अनुमान।रोश नी को भरकर बाल्टी मेंउड़ेल आतादीवार पर बनीअपनी ही परछाई परऔर देखता उसेसुनहला होते।हवा के बीच कहीं ढ़ूंढ़ता फिरताबेफिक्र अपने गुनगुनाये गीतऔर सहेज लेता कुछ चुने हुए षब्दअपनी कविता के लिए।मैं आइने में खुद को देखताकुछ न होते हुएऔर READ MORE

भोपाल का मृतलेख

January 24, 2011 // 0 Comments

आज फिर इन्साफ को मिट,टी में दफनाया गयाजमहूरियत की शक्ल का कंकाल फिर पाया गया। उनकी सियासत की जदों में कत्ल मानवता हुईकहके यही इन्साफ है फिर हमको भरमाया गया। जिस शख्स की गलती के कारण मिट गई जानें कईउसको बड़े आदर से उसके देश भिजवाया गया। आता  है अब भी ज़हन में बच्चा वो मिटटी में दबाअरसों से हर अखबार की सुर्खी में जो पाया गया। सालों से जो आंखें लगाये आस बैठी थी उन्हेंनृशंसता की हद का READ MORE

एक बियाबान-सा जंगल है

January 21, 2011 // 0 Comments

अहसासों की वो पगडंडीमुझे तुम तक ले आईपर मैं जब तुम्हारे पास पहुँचातो जाने क्यों लगामैं रास्ता भूल आया हूँ। तुम्हारी आंखों में मैंने खुद को पाया अपरिचित साऔर मुझे खुद से आने लगी परायेपन की बू। तुम चुराती रही नजरेंऔर भावनाओं के जखीरे सेखाली होती रही खुशियां।तुम किसी जौहरी सीतौलने लगी मुझेअपनेपन की कसौटी मेंचेहरे पर एक रुखा सा भाव लिएकि मैं लुटा-पिटा सा यहाँ क्यों चला आया हूँ। READ MORE

तुम्हारा ख़्याल

January 21, 2011 // 0 Comments

गर्मियों में सूखते गले कोतर करते ठंडे पानी-साउतर आया ज़हन में।और लगाजैसे गर्म रेत के बीचबर्फ की सीली की परतज़मीन पर उग आई हो। सपने,गीली माटी जैसेधूप में चटक जाती हैवैसे टूट रहे थे ज़र्रा-ज़र्रातुम्हारा खयालजब गूंथने चला आया मिट्टी कोसपने महल बनकर छूने लगे आसमान। तुम उगीकनेर से सूखे मेरे खयालों के बीचऔर एक सूरजमुखीहवा को सूंघने लायक बनाताखिलने लगा खयालों में। पर खयाल-खयाल होते READ MORE

इस वक्त मे उस वक्त को याद करते हुए

January 20, 2011 // 0 Comments

कुछ अनमना सा होकरजब इस वक्त मैं उस वक्त के बारे में सोचता हूंतो सोचना हवा हो जाता है और फैल जाता है बेतरतीबमैं सोचने की चाह को एक दिशा देना चाहता हूंपर दिशा होना पानी होने जैसा लगता हैजिसकी थाह लेने का इरादा समंदर की असीमता मेंअसम्भव की बिनाह पर इतराने लगता है।मुझे उस वक्त गुमान नहीं थाकि मैं कभी जियूँगा इस वक्त को भीऔर इसे जीना ऐसा होगाजैसे मरने के बीच मंडराना और न मरनाजैसे खून में READ MORE

रेत और रोमान पोलान्सकी

January 13, 2011 // 5 Comments

बीते साल की आंखिरी सांसों के इर्द गिर्द महज महीना पुरानी बेरोजगारी की एक हल्की सी बू थी। रिज्यूमे को ईमेल के जरिये किसी किसी के इनबौक्स में धकेलने की प्रक्रिया थी। खालीपन का एक सतही अहसास था। फिर दिल्ली से मुम्बई पहुंच जाने का फैसला था। नई उम्मीदों और सचमुच का समंदर था। लहरें थी। वर्सोवा था। रोज शाम लाल सूरज का क्षितिज से नीचे उतरता एक असल दृश्य था। और समुद्र में पहले सुनहरा और फिर READ MORE

मुम्बई के बीच से

December 14, 2010 // 0 Comments

इन दिनों मुम्बई में हूं। वहां वर्सोवा के समुद्री किनारे से मुम्बई पर कुछ लिखने का मन हुआ। गीली रेत पर अकेले कुछ घंटे चलते चलते बिताने के बीच से ये पंक्तियां आपके लिये कैसी वर्सोवा वर्सोवा वाली चुप्पी सा शहरकैसा जुहू चौपाटी सा ये शोर हैकैसी नरिमन नरिमन इसमें छाई है चकाचौंधकैसी बांद्रा किनारे वाली भोर है कैसे लहर लहर खुद तक खींच लेता हैकैसे बूंद बूंद खुद में समा लाता हैकैसे READ MORE

मानव व्यापार की राष्ट्रीय शर्म

November 23, 2010 // 0 Comments

आज विकीपीडिया पूरी दुनिया को ये बता रहा है कि भारत पूरी दुनिया में इन्सानों की खरीद फरोक्त का मूल केन्द्र है और यहीं से इस व्यापार के संक्रमण की शुरुआत होती है। ये उस देश के लिये बेहद शर्मनाक बात है जो हालिया सुरक्षा परिषद में अपनी स्थाई सदस्यता के दावे कर रहा है, जिसको विश्व में सबसे तेजी से उभरते देश के रुप में देखा जाता है। एक ऐसा देश जो कौमनवैल्थ जैसे बड़े आयोजन करवाके पूरी READ MORE

बरसात

November 16, 2010 // 0 Comments

तुम अजीब हो।… उसने कहा। अजीब….. वह मुस्कुराई …अजीब क्यों? क्योंकि तुम मुझे अजीब लगती हो। वह उसे देखते हुए बोला। और फिर देखता रहा बोलने के बाद भी। तुम चुप रहो…वह मजाक में डांटती हुई सी बोली। चुप…वो क्यों…उसका सवाल उसे जायज लगा। क्योंकि…वह कुछ बोलती इससे पहले ही उसने न बोलने का फैसला कर लिया। वह और करती भी क्या। इस बात का जवाब था ही कहां जो वो देती। अंधेरे कमरे में दोनों सोफे READ MORE

इन्तजार

November 12, 2010 // 1 Comment

 रात बारह बजे…… सुनो। प्लीज इरिटेट मत करो और जल्दी कहो। त्ुम मुझे अब उतना प्यार नहीं करती? क्रती हूं बाबा। जल्द ही मेरे पास अपनी गाड़ी होगी। फिर हम रोज बरिस्ता में काफी पी सकेंगे। तुम्हारी फेवरेट। कैपेचीनो। देखो दो महीने पहले वैलेन्टाईनडे के दिन भी तुमने यही कहा था। पर अब मैं इतना इन्तजार नहीं कर सकती.. हनी। बस तीन महीने और फिर मेरा प्रमोशन ओ माई गौड तीन महीने…..??? सुबह दस READ MORE

सिनेमाथैक पर ईदियां…..

November 11, 2010 // 1 Comment

कश्मीर को इस पूरे दौर में एक ऐसे प्रान्त के रुप में देखा, समझा और महसूस किया गया है जो किसी देश से जुड़ने और अलग हो जाने के बीच ऐसे पिस रहा है जैसे दो पाटों के बीच कोई परम्परा पिस रही हो। जैसे अलग होने और अपना साबित करने के बीच की ये लड़ाई अपने राजनैतिक, धार्मिक और भौगोलिक कारणों के वजहकर कभी खत्म ही नहीं होगी। चलती रहेगी। इस लड़ाई पर हर तरह के लोग अपनी प्रतिक्रिया देने से नहीं चूकते। READ MORE

सिनेमाथैक पर ईदियां…..

November 11, 2010 // 0 Comments

कश्मीर को इस पूरे दौर में एक ऐसे प्रान्त के रुप में देखा, समझा और महसूस किया गया है जो किसी देश से जुड़ने और अलग हो जाने के बीच ऐसे पिस रहा है जैसे दो पाटों के बीच कोई परम्परा पिस रही हो। जैसे अलग होने और अपना साबित करने के बीच की ये लड़ाई अपने राजनैतिक, धार्मिक और भौगोलिक कारणों के वजहकर कभी खत्म ही नहीं होगी। चलती रहेगी। इस लड़ाई पर हर तरह के लोग अपनी प्रतिक्रिया देने से नहीं चूकते। READ MORE

नैनीताल से लौटने के नशे के बीच से कुछ…

October 22, 2010 // 1 Comment

हाल ही में नैनीताल जाना हुआ। वहां ताल में बोटिंग करते हुए कुछ पंक्तियां लिखने का मन हुआ। कुछ तस्वीरें उतारने का जी किया। नैनीताल को अपने शब्दों में बयां करती शब्दों और तस्वीरों की ये जुगलबंदी आपके लिये….. वो नशीली सी झील मस्तानी गुनगुनी  धूप गुनगुना पानी। आज सूरज चांद बनके बिखरने सा लगा बनके तारा पानी में उभरने सा लगा।  बूंदों में पसरने लगी दूधिया पिघलन जैसे पानी में ही बस आया READ MORE

मीडिया प्रशिक्षण का कौमनवेल्थ पाठयक्रम

October 1, 2010 // 1 Comment

 रोहित ने दो दिन पहले फोन करके बताया कि उनका एक लेख दैनिक भास्कर में छपा है। घर आकर उस लेख को पढ़ा और उस लेख में उसी पुराने रोहित की छवि नजर आ गई। स्कूल के दिनों में भी इसी तरह रोहित वहां की अनियमितताओं को मंच से बयान करते थे। और आज आईआईएमसी में रहते हुई उसकी अनियमितताओं का खुलकर विरोध कर रहे हैं। यहां उनका वो लेख पोस्ट कर रहा हूं इसी आशा के साथ कि उनकी यह बेबाक पत्रकारिता आगे भी जारी READ MORE

आओ आओ फिल्में देखो….

September 28, 2010 // 1 Comment

यहां हर रविवार को कुछ नई फिल्में स्क्रीन हो रही हैं। कुछ नये चेहरे उन फिल्मों पर अपनी प्रतिक्रिया दे रहे हैं। कुछ नये घर वैन्यू में शामिल हो रहे हैं। कुछ नई यादें आगे के लिये जुड़ रही हैं। नई बातें और एक नई सोच। हर बार एक तरह का नयापन। सिनेमाथैक ने अपनी स्क्रीनिंग की तीसरी पारी पूरी की। इशिता हर स्क्रीनिंग के बाद उसपर अपनी एक ताजा रिपोर्ट फेसबुक के सिनेमाथैक ग्रुप पे पोस्ट कर देती READ MORE

आओ आओ फिल्में देखो….

September 27, 2010 // 2 Comments

यहां हर रविवार को कुछ नई फिल्में स्क्रीन हो रही हैं। कुछ नये चेहरे उन फिल्मों पर अपनी प्रतिक्रिया दे रहे हैं। कुछ नये घर वैन्यू में शामिल हो रहे हैं। कुछ नई यादें आगे के लिये जुड़ रही हैं। नई बातें और एक नई सोच। हर बार एक तरह का नयापन। सिनेमाथैक ने अपनी स्क्रीनिंग की तीसरी पारी पूरी की। इशिता हर स्क्रीनिंग के बाद उसपर अपनी एक ताजा रिपोर्ट फेसबुक के सिनेमाथैक ग्रुप पे पोस्ट कर देती READ MORE

सिने सफर मुख्तसर -भाग 2

September 25, 2010 // 0 Comments

बहसतलब का आज दूसरा दिन था। आज बात होनी थी हिन्दी सिनेमा और बाजार पर। कार्यक्रम के संचालन की बागडोर अविनाश ने खुद कुछ कहने के बाद वरुण ग्रोवर को दे दी। वरुण ग्रोवर  ने शुरुआत की और कहा कि हिन्दी सिनेमा का व्यापार बड़ा एब्सटेक्ट किस्म का है। यहां लोग फिल्में बेच तो रहे हैं पर रिस्क नहीं ले रहे। ये लोग जाहिर तौर पे निर्माता हैं। उनके कंटेंट में प्रयोग दिखे न दिखे लेकिन पीआर में जबरदस्त READ MORE

सिने सफर मुख्तसर -भाग 2

September 25, 2010 // 1 Comment

बहसतलब का आज दूसरा दिन था। आज बात होनी थी हिन्दी सिनेमा और बाजार पर। कार्यक्रम के संचालन की बागडोर अविनाश ने खुद कुछ कहने के बाद वरुण ग्रोवर को दे दी। वरुण ग्रोवर  ने शुरुआत की और कहा कि हिन्दी सिनेमा का व्यापार बड़ा एब्सटेक्ट किस्म का है। यहां लोग फिल्में बेच तो रहे हैं पर रिस्क नहीं ले रहे। ये लोग जाहिर तौर पे निर्माता हैं। उनके कंटेंट में प्रयोग दिखे न दिखे लेकिन पीआर में जबरदस्त READ MORE

सिने सफर मुख्तसर- भाग 1

September 25, 2010 // 0 Comments

मोहल्ला लाईव, जनतंत्र और यात्रा बुक्स द्वारा आयोजित बहसतलब का पहला दिन कुछ सार्थक बहसों के नाम रहा । अविनाश दास ने कार्यक्रम की रुपरेखा रखी और फिर मिहिर पान्डया के संचालन में कार्यक्रम ने रफतार पकड़नी शुरु की। अभी गाड़ी स्लो पेस में थी। सफर शुरु हुआ ही था। सिनेजगत की उपरी सतहों से शुरु होकर उसकी गहराईयों में उतरता एक बातचीत का सफर जिसमें एक साथ परदे के पीछे अपनी भूमिका अदा करने READ MORE

सिने सफर मुख्तसर- भाग 1

September 24, 2010 // 4 Comments

मोहल्ला लाईव, जनतंत्र और यात्रा बुक्स द्वारा आयोजित बहसतलब का पहला दिन कुछ सार्थक बहसों के नाम रहा । अविनाश दास ने कार्यक्रम की रुपरेखा रखी और फिर मिहिर पान्डया के संचालन में कार्यक्रम ने रफतार पकड़नी शुरु की। अभी गाड़ी स्लो पेस में थी। सफर शुरु हुआ ही था। सिनेजगत की उपरी सतहों से शुरु होकर उसकी गहराईयों में उतरता एक बातचीत का सफर जिसमें एक साथ परदे के पीछे अपनी भूमिका अदा करने READ MORE

पावन पत्नियों का कलुषित सच

September 18, 2010 // 1 Comment

हाल ही में रितेश शर्मा की एक डाक्यूमेंट्री फिल्म दिल्ली में प्रदर्शित की गई जिसमें देवदासी प्रथा जैसी ऐसी कुरीति पर सवाल उठाये गये जिसपर मेनस्ट्रीम मीडिया में आजकल मुश्किल से कोई बहस हो रही है। द होली वाईव्स नाम से बनी यह फिल्म बताती है किस तरह इस दौर में महिला अधिकारों को लेकर हल्ला मचाया गया, घरेलूं हिंसा विरोध्ाी कानून बने और महिला अधिकारों पर कई बहसें हुई लेकिन इसके बावजूद READ MORE

एक शुरुआत थोड़ी फिल्मी सी…..

September 12, 2010 // 1 Comment

एक बंद संकरी गली और बत्ती गुल बंद संकरी गली के भीतर जहां शाम के चार बजे एक खास किस्म का अंधेरा रैंग रहा था। पहुंचते ही कुछ पसीने से नहाई हुई शक्लें किसी चीज का इन्तजार करती दिखाई दी। मैं पहुचा और तय था कि इन्तजार किसी और चीज का था। यार पिछले दो घंटे से लाईट नहीं है। वहां पहुंचने तक तय हो चुका था कि वैन्यू अब चेंज करना होगा। बिना लाईट के स्क्रीनिंग सम्भव नही थी। सिनेमाथैक। इसी नाम से READ MORE

बोल कबीरा तब क्या हैगा

September 7, 2010 // 2 Comments

कभी गुलामी मातम थीपर आज गुलामी उत्सव हैगाकौमनवेल्थ के जरिये बिकनाआज देश का गौरव हैगा। लूट खसोट की मैराथन मेंभ्रष्टाचार का शासन हैगाअब तो वो भी बिक जाना हैघर में जितना राशन हैगा। कितना कौमन वैल्थ हमाराइसको उसको बंटता हैगाआम आदमी चुपकर प्यारेतुझको काहे खटता हैगा। बंदरबांट का मेला देखोहर चेला मदारी हैगाकब्ज न होती पच जायेगापैसा पाचनकारी हैगा। कल्माड़ी की दाड़ी भीतरकाले धन का READ MORE

जीविका से जुड़ी आम आदमी की फिल्में

September 6, 2010 // 2 Comments

वृत्त्चित्रों को लेकर भारत में अपेक्षाकृत ठीक ठाक काम होता है लेकिन उनके प्रदर्शन को लेकर उतने प्रयास नहीं दिखाई देते। शहरी इलाकों में कभी कभार कुछ फिल्म फेस्टिवल्स को छोड़ दें तो इनके प्रदर्शन के लिये कोई सुचारु व्यवस्था हमारे देश में देखने को नहीं मिलती। शायद यही वजह है कि कई गम्भीर मुद्दे इन फिल्मों की शक्ल में उठते तो हैं पर दर्शकों के अभाव में अपनी मौत मर जाते हैं। और ये READ MORE

गिर्दा के इर्द गिर्द

September 5, 2010 // 1 Comment

दिल लगाने में वक्त लगता है, डूब जाने में वक्त लगता है, वक्त जाने में कुछ नहीं लगता, वक्त आने में वक्त लगता है। गिरीश तिवारी गिर्दा वक्त जा चुका है। गिरदा नहीं रहे। अब ऐसा वक्त आने में समय लगेगा जब गिरदा जैसा कोई जनकवि, जनसेवक फिर पैदा होगा और हमसे झूमते हुए कह उठेगा ततुक नी लगा उदेख, घुनन मुनई न टेक। दिल्ली के राजेन्द्र भवन में गिरदा की दिवंगत आत्मा को सृद्धान्जली देने के लिये आज उमड़ी READ MORE

गिर्दा की याद में

September 2, 2010 // 0 Comments

दिल लगाने में वक्त लगता है, डूब जाने में वक्त लगता है,वक्त जाने में कुछ नही लगता, वक्त आने में वक्त लगता है- गिरीश तिवारी दोस्‍तो, पिछले दिनों हमारे प्रिय जन कवि गिर्दा नहीं रहे। गिरीश तिवाड़ी ‘गिर्दा’ के जाने से जो जगह सांस्‍कृतिक-राजनीतिक जगत में खाली हुई है, उसे भरना अब मुमकिन नहीं। हम में से सभी के पास गिर्दा की अलग-अलग यादें और संस्‍मरण हैं। इनके बारे में बात करना ही गिर्दा को READ MORE

जनस्वास्थ्य पर भारी पड़ता कौमनवैल्थ

August 27, 2010 // 1 Comment

हैल्थ इज वैल्थ। इस जुमले का भरपूर प्रयोग आप हम अपने जीवन में भले ही कई बार करते हैं किन्तु स्वास्थ्य सम्बन्धी नीतियों के मामले में सरकार को शायद यह बात समझ नहीं आती। इस बात का अन्दाजा कौमनवैल्थ में किये जा रहे खर्च और कौमन यानी आम आदमी की हैल्थ पर हो रहे मौजूदा खर्च की तुलना करके लगाया जा सकता है। यह बात अब किसी से छिपी नही है कि कौमनवैल्थ खेलों के नाम पर इन कुछ में महीनों में किस तरह READ MORE

उत्तराखंड के युवा कवि महेश सूत्र सम्मान 2010 के लिए चयनित

July 31, 2010 // 0 Comments

पुनेठा जी को सूत्र सम्मान दिये जाने पर हार्दक बधाईयो सहित ये खबर आप तक पहुंचा रहा हू। पर्वतीय सराकारों से जुड़ी उनकी कविताओं को आपने इस ब्लाग पर पहले पढ़ा भी होगा। आशा है कि उनकी कविताओं का सफर आगे भी जारी रहेगा। इस मौके पर उन्हें हार्दिक शुभकामनाएं। पिथौरागढ़। देश के प्रतिष्ठित साहित्यिक पुरस्कारों में शामिल साहित्य सूत्र सम्मान इस वर्ष उत्तराखण्ड के युवा कवि महेश चन्द्र READ MORE

सिनेमा पर एक जरुरी लेख

July 17, 2010 // 0 Comments

अभी अभी इस लेख पर नजर पड़ी। प्रमोद जी के इस लेख को पढ़ लेने के बाद भारतीय सिनेमा के भीतर जो खालीपन है उसकी परतें खुलकर सामने आ जाती हैं। यहां एक खालीपन है ये पता चलता है, क्यों है ये समझ आने लगता है। वो अपने इस लेख में भारत से बाहर की फिल्मों का ब्यौरा देते हैं, बल्कि यूं कहें कि उनको देखते हुए उपजे अपने भावों वो शाब्दिक अभिव्यक्ति देते हैं। हमारी फिल्में और उनकी फिल्में, क्यों अलग हैं READ MORE

फुटबाल फीवर और फैशन स्टेटमेंट बनता फेसबुक स्टेटस

July 4, 2010 // 0 Comments

अर्जेटीना हार गई। ब्राजील भी नहीं रहीं। कुछ दुखी हैं। कुछ बस इसलिये खुश कि अभी तो सेमीफाईनल चल रहा है। माने पिक्चर अभी बांकी है। रगों में वाका वाका बनकर सकीरा दौड़ रही है और कानों में भिनभिनाती मधुमक्खियों सी वो पता नहीं कैसी सी धुन, कैसा तो नाम वैवुजेला या इससे मिलता जुलता। एक विश्वव्यापी रोमान्च सा फैला हुआ है दुनिया में फीफा के नाम का। खिलाड़ी भगवान हो गये है, टीम धर्म और खेल READ MORE

‘सृजनोत्सव 2010’: कुछ झलकियां

July 2, 2010 // 0 Comments

रोहित जोशी उत्तराण्ड के सुदूर जनपद पिथौरागढ़ में बाबा नागार्जुन और केदारनाथ अग्रवाल की जन्मशती के अवसर पर विगत् 18 और 19 जून को ‘रचनात्मक शिक्षक मंडल’ और लघु कविता पत्रिका ‘विहान’ की ओर से ‘सृजनोत्सव 2010’ मनाया गया। इस दो दिवसीय कार्यक्रम में साहित्यिक व्याख्यान, चर्चाऐं, काव्य पाठ, गजल संध्या, पोस्टर प्रदर्शनी और नाटक की प्रस्तुति की गई। पहले दिन के प्रथम सत्र में अल्वर राजस्थान READ MORE

भोपाल का मृतलेख

June 13, 2010 // 2 Comments

भोपाल की त्रासदी के 26 वर्षों बाद उसपर जो हालिया फैसला आया है वह चौंकाने वाला है। उसी फैसले का विरोध दर्ज करती ये कुछ पंक्तियां उन लोगों को को समर्पित जो बेवजह इस त्रासदी के शिकार हो गये और उन कई पीड़ितों के साथ खड़े होने की एक कोशिश जो इस अन्यायी फैसले के खिलाफ अपनी आवाज बुलंद कर रहे हैं….. आज फिर इन्साफ को मिट,टी में दफनाया गयाजमहूरियत की शक्ल का कंकाल फिर पाया गया। उनकी सियासत की READ MORE

जंगलों में जीवन तलाशता वो

June 5, 2010 // 2 Comments

Into the wild …..और एक दिन वो सब कुछ छोड़ कर चला जाता है। कहीं दूर अलास्का के जंगलों की तरफ। अपने मां बाप और बहन को छोड़कर। बिना कुछ बताये। क्यों? इसके लिये उसके पास कई कारण हैं। वो अपने मां बाप को बचपन से देख रहा है छोटी छोटी बातों पर लड़ते हुए। वो देखता आया है उनकी बहसों के कारण कितने भौतिक हैं। कितने मटीरियलिस्टिक। उसके ग्रेजुएशन डे के दिन उसके पापा उसे सबसे बेहतर तोहफा क्या दे सकते हैं? एक READ MORE

सिनेमा पर कार्यशाला

May 30, 2010 // 2 Comments

जामिया एमसीअसारसी के कुछ पूर्वछात्र फिल्मों से जुड़ी हुई एक कार्यशाला आयोजित कर रहे हैं। सिनेमा तकनीक में यदि आपकी रुचि हो और और आप कम समय में इसके मूलभूत सिद्धान्तों को समझना चाहते हों तो यह आपके लिये एक अच्छा मौका है। सिनेमाथैक नाम से शुरु हो रही इस कार्यशाला में आपको फोटोग्राफी और फिल्मों के बारे में काफी कुछ सीखने को मिलेगा साथ ही कुछ महत्वपूर्ण फिल्मों पर परिचर्चाएं भी READ MORE

इनक्रोचमेंट, डिमोल्यूशन एंड डिस्प्लेसमेंट

May 21, 2010 // 0 Comments

सुबह सुबह नौएडा मोड़ से गुजरते हुए सड़क के किनारे देखा तो वहां मां दुर्गा की वो मूर्ति नहीं थी, ना ही नटराज की। वहां कुछ लोग थे जो बुल्डोजर लेकर कच्ची ईंटों से बने उन कच्चे घरों को तोड़ रहे थे जहां अब तक वो कुछ लोग रहते थे, जिनका रहना वहां गैवाजिब था, उन लोगों के लिये जिनके लिये लोकतंत्र सबसे उपर है और कानून उससे भी उपर। इसीलिये इन लोगों का वहां रहना गैरकानूनी समझा गया और आज उनको वहां न READ MORE

बांधों का विरोध करते फिल्मकार और फिल्में

May 1, 2010 // 1 Comment

बड़े बांधों को बनाये जाने को लेकर दुनिया भर में चर्चाएं हो रही हैं। विश्वभर में कुलमिलाकर 47665 छोटे बड़े बांध हैं जिनमें से सबसे ज्यादा 22 हजार बांध चीन मे, 6600 से ज्यादा बांध संयुक्त राज्य अमेरिका और उसके बाद 4291 बांध भारत में हैं। लेकिन अब इन बांधों को लेकर बड़े बड़े आन्दोलन ही खड़े नहीं हो रहे बल्कि इस विशय पर वृत्तचित्र और फिल्में भी बन रही हैं। इससे साफ जाहिर होता है कि अंधाधुृध READ MORE

बांधों की टूटन से उपजते आन्दोलन

May 1, 2010 // 1 Comment

बड़े बांधों को बनाये जाने को लेकर दुनिया भर में चर्चाएं हो रही हैं। विश्वभर में कुलमिलाकर 47665 छोटे बड़े बांध हैं जिनमें से सबसे ज्यादा 22 हजार बांध चीन मे, 6600 से ज्यादा बांध संयुक्त राज्य अमेरिका और उसके बाद 4291 बांध भारत में हैं। लेकिन अब इन बांधों को लेकर बड़े बड़े आन्दोलन ही खड़े नहीं हो रहे बल्कि इस विशय पर वृत्तचित्र और फिल्में भी बन रही हैं। इससे साफ जाहिर होता है कि अंधाधुृध READ MORE

एक दोस्त का प्रोफेश्नल हो जाना

April 22, 2010 // 4 Comments

कई बार अपने आसपास लोगों को निहायत प्रोफेश्नल होता देख डर लगता है। समझ नहीं आता कि क्या ज्यादा जरुरी है। इन्सानी भावनाओं को जिन्दा रखते हुए जीना या प्रोफेश्नल होना। जल्दबाजी, बेचेनी फलतह तुनकमिजाजी, गुस्सा। समझ नहीं आता कि क्यों कोई काम शुकून से नहीं किया जा सकता। पर सबके काम करने करवाने के अपने अपने तरीके हैं यहां। क्या सही क्या गलत। लेकिन कई बार इस प्रोफेश्नलिजम की हद यहां अपने READ MORE

फिल्म में काम करने के इच्छुक सम्पर्क करें

April 9, 2010 // 0 Comments

ब्लाग जगत से सम्पर्क रखने वालों के लिये जो खास तौर पर फिल्मों के शौकीन हैं एक खबर अनुरोध की शक्ल में यहां दे रहा हूं। जामिया के एमसीआरसी में शूट हो रही स्टूडेन्ट फिल्म के लिये एक लीड एक्टेस की आवश्यकता है। अदाकारा की उम्र 20 से 25 साल के बीच हो। थियेटर या फिल्मों का थोड़ा ही सही अनुभव या समझ हो। 14 से 22 अप्रैल के बीच सात दिन पूरी तरह दे सके। और उससे पहले जितनी जल्दी हो सके रिहर्सल के लिये READ MORE

कुरुसावा के सपने

April 6, 2010 // 1 Comment

कई बार हम सपने देखते हैं और जब जागते हैं तो सोचते हैं जो हमने देखा उसका अर्थ आंखिर था क्या। पर अक्सर ज्यादातर सपनों को हम भुला ही देते हैं ऐसे जैसे उन्हें हमने कभी देखा ही न हो। पर क्या आपको नहीं लगता कि किसी दूसरे के सपने अपनी आंखों से देखना कितना रोमांचक अनुभव हो सकता है। और वो भी तब जब सपने किसी सुन्दर फिल्म में फिल्मा लिये गये हो और वो भी अकिरा कुरुसावा जैसे निर्देशक के द्वारा। READ MORE

पंचेश्वर बांध के सवाल पर

April 2, 2010 // 1 Comment

पंचेश्वर बांध पर इस ब्लौग में पहले भी लिखा जा चुका और इसी क्रम में रोहित का ये लेख यहां छापा जा रहा है। इस लेख के अंश दैनिक भास्कर और जनपक्ष् आजकल में छप चुके हैं। आशा है कि पंचेश्वर से जुड़े जनपक्षीय सवालों को समझने में यह लेख कारगर साबित होगा। रोहित जोशी, पिछले दिनों नैनीताल समाचार ने उत्तराखण्ड की नदियों पर प्रस्तावित छोटे-बड़े बाधों को काले धब्बे से दर्शा कर एक नक्शा प्रकाशित READ MORE

लव.. सेक्स.. धोखा. और सच

March 24, 2010 // 1 Comment

  लव, सेक्स और धोखा। इन तीनों में से कोई भी शब्द हाईपोथैटिकल और नया नहीं है। तीनों इन्सानी फितरत के हिस्से हैं। और इसी तरह हिन्दुस्तानी फिल्मों के भी। लेकिन दिबाकर बनर्जी जिस तरीके से इन तीनों को स्क्रीन पे दिखाते हैं उससे फिल्म की ग्रामर को ही एक नई धारा सी मिल जाती है। मेरी समझ से इस तरह की फिल्म हिन्दुस्तान में पहले कभी नहीं बनी। जिसमें सब कुछ आन कैमरा चल रहा है। फिल्म कैमरे के READ MORE

लव.. सेक्स.. धोखा. और सच

March 24, 2010 // 4 Comments

लव, सेक्स और धोखा। इन तीनों में से कोई भी शब्द हाईपोथैटिकल और नया नहीं है। तीनों इन्सानी फितरत के हिस्से हैं। और इसी तरह हिन्दुस्तानी फिल्मों के भी। लेकिन दिबाकर बनर्जी जिस तरीके से इन तीनों को स्क्रीन पे दिखाते हैं उससे फिल्म की ग्रामर को ही एक नई धारा सी मिल जाती है। मेरी समझ से इस तरह की फिल्म हिन्दुस्तान में पहले कभी नहीं बनी। जिसमें सब कुछ आन कैमरा चल रहा है। फिल्म कैमरे के READ MORE

सम्भावना डाट काम से तीन कविताएं

March 15, 2010 // 4 Comments

यहां बांईओर कमेन्ट बौक्स में एक मैसेज मुस्कुरा रहा है जिसमें हिन्दयुग्म के हालिया प्रकाशित काव्यसंग्रह सम्भावना डाट काम में प्रकाशित मेरी कुछ कविताओं को छापने का जिक्र है। रोहित की इस दोस्ताना गुजारिश पर उनकी कुछ कलाकृतियों के साथ उनके कुछ चित्रों और मेरी कविताओं की जुगलबंदी पेश है आपके लिये….. शब्द शब्द गिरगिट की तरह होते हैं और बदल जाते हैं पल में मायनों की तरह। रोशनी से READ MORE

उन्हें आपकी कोई केयर नहीं है जी

March 12, 2010 // 1 Comment

उफ एक बुरी खबर उनके लिये जो फेसबुक पर अपने दिल की बात कहकर जी हल्का कर लेने में भरोसा करते हैं। जो ये सोचते हैं कि दिल में उठे भावनाओं के तूफान को शब्दों के लबादे में लिपटाकर दुनिया को बता ही दिया जाय ताकि कुछ लोग जो इस हाले दिल से इत्तेफाक रखते हैं अपनी राय इसपर चस्पा कर दें। कहीं आप भी ऐसी ही कोई गलतफहमी तो नहीं पाले बैठे हैं कि फेसबुक पर आपके जजबातों की कद्र करने के लिये दुनिया पलक READ MORE

रंग तो बहुत सारे पर अपना रंग हल्का

February 27, 2010 // 2 Comments

कुमाउनी होली के अपने अलग रंग हैं। इसमें में भी इतनी विभिन्नता है कि हर क्षेत में होली का कुढ नया जायका देखने को मिल जाता है। पिथैरागढ़ के छोटे से कस्बे गंगोलीहाट की होली के रंग में हमें होली से पहले ही डुबो रहे हैं युवा साहित्यकार महेश चन्द्र पुनेठा -महेश चंद्र पुनेठा गंगोलीहाट की होली देखने का मौका पहले-पहल मुझे वर्ष 1993 में मिला जब मेरी पहली नियुक्ति इस क्षेत्र में हुई।उस वर्ष READ MORE

भूत के प्रकोप से मुक्ति की सच्ची कहानी

February 21, 2010 // 3 Comments

निलिता वचानी एक जानी मानी डाक्यूमेंट्री फिल्म मेकर हैं ये बात कल उनकी फिल्मों के अंश देखते और उन पर उन्हीं की टिप्पणियों को सुनते मालूम हुई। आईज आफ स्टोन उनकी उल्लेखनीय वृत्तचित्रों में शुमार है। साथ ही सब्जी मंडी के हीरे भी चर्चा में रही है। ऐसा कल ही मालूम हुआ। वृत्तचित्रों के लिए एक खास किस्म की समझ होना बड़ा लाजमी है क्योंकि ये समझ उसे एक सादा डाक्यूमेंटेशन बनने से रोकती है। READ MORE

1411- बाघों के नाम

February 18, 2010 // 1 Comment

आज के दौर में जंगल उदास हैं और वो लड़की जो बाघ की खाल से बना फर पहनकर शीशे में देख मुस्कुरा रही है हमें जंगली सी दिखती है। पर ये उस दौर की बात है जब जंगल उतने जंगली नहीं थे न ही आदमी उतना शहरी। जब एक दहाड़ सुनाई देने पर अक्सर कहते थे गांव के लोग कि बाघ आ गया। हम सुनते थे अपने पापा से बाघ के किस्से कि कैसे उस रोज आया था बाघ हमारे शेरा को ले जाने और पापा ने किया था टौर्च लेकर पीछा हम आज तक पापा READ MORE

डाट काम में सम्भावनाओं को तलाशती कविताएं और हिन्दयुग्म

February 6, 2010 // 3 Comments

प्रगति मैदान के गेट नम्बर सात के पास हाल नम्बर 2 में आज हिन्दयुग्म अपना वार्षिकोत्सव मना रहा था। साथ में होना था 38 उभरते हुए सम्भावनाषील कवियों की कविताओं के संकलन सम्भावना डाट का विमोचन। कुछ जाने पहचाने चेहरों के अतिरिक्त वहां जो लोग लोग मौजूद थे उनका परिचय यही था कि वो हिन्दयुग्म से किसी न किसी तरह जुड़े थे। हिन्दयुग्म के निखिल आनन्द गिरि ने नियत समय पर मंच संचालन का कार्यभार READ MORE

ताकि बाघ जीते रहें…

February 1, 2010 // 1 Comment

कल मेरे एक क्लासमेट और आत्मीय दोस्त शशांक वालिया का अचानक फोन आया। “यार तुम बडे ब्लौग शौग लिखते हो। एक ब्लाग मेरी रिक्वेस्ट पे भी लिखो यार। मैं चाहता हूं कि बाघों पर तुम कुछ लिखो। सेव टाईगर्स का टीवी पर एड देखा तो सोचा कि तुम्हें फोन कर लूं।” बडा अच्छा सा लगा कि लोगों कि अपेक्षाएं नई सोच से जुड रही हैं। ऐसी आशाओं पर खरा उतरने की कोशिश नई सोच के जरिये इसी तरह आगे भी जारी रहेगी फिलहाल READ MORE

लाशों से कफन बीनने वालों पर बनी फिल्म को नेश्नल अवार्ड

January 26, 2010 // 2 Comments

  जामिया के मासकम्यूनिकेशन रिसर्च सेन्टर में साउन्ड के लेक्चरार मतीन अहमद को फिल्म चिल्ड्रन आफ पायर की साउन्ड डिजाईनिंग के लिये इस बार का नेश्नल अवार्ड दिया जा रहा है। ये फिल्म वाराणसी के उन 6 बच्चों की कहानी है जो मरघटों पर जलती हुई लाशों पर लिपटे हुए कफन बीनते हैं। कफन बीनकर या कभी कभी चुरा और छीनकर अपनी जिन्दगी जीने वाले इन बच्चों का जीवन कैसे बसर होता है चिल्ड्रन आफ पायर इसे READ MORE

लाशों से कफन बीनने वालों पर बनी फिल्म को नेश्नल अवार्ड

January 26, 2010 // 3 Comments

जामिया के मासकम्यूनिकेशन रिसर्च सेन्टर में साउन्ड के लेक्चरार मतीन अहमद को फिल्म चिल्ड्रन आफ पायर की साउन्ड डिजाईनिंग के लिये इस बार का नेश्नल अवार्ड दिया जा रहा है। ये फिल्म वाराणसी के उन 6 बच्चों की कहानी है जो मरघटों पर जलती हुई लाशों पर लिपटे हुए कफन बीनते हैं। कफन बीनकर या कभी कभी चुरा और छीनकर अपनी जिन्दगी जीने वाले इन बच्चों का जीवन कैसे बसर होता है चिल्ड्रन आफ पायर इसे READ MORE

एक बेजुबान आक्रोश

January 23, 2010 // 0 Comments

सारे आक्रोष महज एक दुर्घटना बनकर समाप्त हो जाते हैं। ये आक्रोश भी कुछ ऐसा ही था। गोविन्द निहिलानी की इस फिल्म को देखकर ताजा ताजा बस यही समझ में आता है कि आक्रोश की अपनी असल आवाज उसके सन्नाटे में दबी होती है। मगर अक्सर इस चुप्पी के पीछे जो आक्रोश दबा होता है वो इतना खामोश रहता है कि उसका होना न होना बनकर समाप्त हो जाता है। आदिवासियों पर होने वाले अत्याचार पर बनी इस पूरी फिल्म में READ MORE

What a ‘Dam’ shit

January 21, 2010 // 0 Comments

What a dam meant for? Is it for the benefit of a common man or to displace them from there homeland? In Uttarakhand Pancheswar dam issue is day by day rasing protests from the far villages.  Fact file is really astonishing and says the story of exploitation of not only a big range of mountain area but also a common PAHADI man. Pancheswar dam was proposed in 1994 under Mahakali treaty between India and Nepal.  Although Nepali Political parties including opposition party were not happy with this treaty. But now this project is going to come into action. Almost 19500 people are going to loose there homelands after the construction of this dam. 120 Indian and about 50 Nepali villages will be displaced. This multipurpose project is supposed to produce 6500 megawatt power. But these villagers are not happy with the project at least news of protests coming from far mountains makes it clear. It is a matter to think that how justifiable it is to displace peoples in this large amount. READ MORE

Is Film Noir more about style than content: A discussion

January 18, 2010 // 0 Comments

Paul Schrader in his essay titled notes on film noir tells about the neglect of film noir in America that noir films are more based on choreography then sociology. And Americans are more fascinated about sociology so these films did not work there for long. The noir film period which started from 1942 was more interested about the stylistic aspect of cinematography rather than the content of film. These films are called best creative films ever in the film history. When we say that film noir is more about style then content, it is essential to discuss about what is ‘Style’ meant for. Raymond Durgnat says that “film noir is not genre; it is not defined as are the western genre, by conventions of setting the conflict, rather by the more subtle qualities of tone and mood.” This ‘tone and mood’ comes from different stylistic aspects of noir time period. Criminal gangster movies were more associated with noir films.  These films used darkness and shadows to create effects of READ MORE

पंचेश्वर- टूटती उम्मीदों का बांध

January 15, 2010 // 3 Comments

पंचेश्वर बांध इन दिनों उत्तराखंड में चर्चा का केंद्र बना हुआ है और संभावित डूब क्षेत्र के इलाकों में ये बांध प्रतिरोध को भी जन्म दे चुका है। ये प्रतिरोध जाहिर तौर पर उन लोगों का है, जो इस बांध के बन जाने के बाद सीधे तौर पर प्रभावित होंगे। इस बांध के कारण कितने लोगों का विस्थापन होगा, इसका अनुमान कई विश्लेषक लगा चुके हैं। ये बांध भारत और नेपाल के बीच 1994 में हुई संधि के अंतर्गत READ MORE

Hello world!

January 15, 2010 // 1 Comment

Welcome to WordPress.com. This is your first post. Edit or delete it and start READ MORE

पहाड़ी जायके के बहाने

January 10, 2010 // 3 Comments

मम्मी ने रात को भट के दाने भिगा दिये । सुबह सुबह मैं जब इन दानों को देखता हूं तो इनमें एक अजीब सी विशालता आ जाती है। रात को ये दाने इतने बड़े कहां थे। मुझे हैरानी होती है। कहीं संबह सुबह की धूप के घुलने से तो ये दाने फूल नहीं गये होंगे। मैं इस समय विज्ञान भूल जाना चाहता हूं। मम्मी ने जब इन्हें भिगाया होगा तो क्या उसे भी विज्ञान याद रहा होगा। नहीं ना। फिर क्यों मैं इन दानों के फूल जाने में READ MORE

एक बवंडर से उठी फिल्म

January 5, 2010 // 0 Comments

राजस्थान की भंवरी देवी को शायद आप अब तक न भूले हों। 1992 में राजस्थान की भतेरी गांव की इस महिला का गांव के ही कुछ उच्च जाति के लोगों ने बलात्कार किया। वजह यह थी कि एक छोटी जाति की महिला होने के बावजूद उसने गांव में हो रहे बाल विवाह को रोकने के लिए सरकार की मदद करनी चाही। केन्द्र सरकार के महिला विकास कार्यक्रम के तहत साथिन नाम की संस्था के साथ उसने सक्रिय रुप से गांव की सामाजिक बुराईयों के READ MORE

बदतर होते ये सरकारी स्कूल

December 19, 2009 // 1 Comment

जामिया के एमसीआरसी में उस दिन एक अजीब वाकया सुनने को मिला। सुनकर सभी चैंके। और एक अजीब वितृष्णा से मन भर उठा। फस्र्ट ईयर के कुछ छात्रों ने बताया कि उनकी क्लास की एक लड़की को भरतनगर के सरकारी स्कूल के लड़कों ने स्कूल कैंपस में मोलेस्ट किया है। दिल्ली के सरकारी स्कूल। सुनकर जो छवि अब तक बनती रही थी वो यही थी कि सफेद कमीज और नीली पैंट पहने जो लड़के बसों में बुरी तरह लटकते हुए कन्डक्टरों READ MORE

कोपेनहेगन के बहाने

December 13, 2009 // 3 Comments

जलवायु परिवर्तन के मुददे पर बहुत कुछ लिखा जा रहा है आजकल। बहुत सी बहसें। बहुत से जुलूस। बहुत से कोंन्फ्रेस, सेमीनार, किताबें और न जाने क्या क्या। पर असल में किया क्या जा रहा है कम से कम ऐसे बड़े श्हरों में जहां बहसें अपने इन्टलैक्चुअल रिदम के साथ उफान पर हैं, यह जरा देखने वाली बात है। दिखे तो कोई बता दे। इस ब्लाग को लिखने की एक खास वजह है। जो इस वैश्विक मुददे को स्थानीय होकर देखने से READ MORE

डेज़ आफ हैवन यानि खूबसूरती के पल

December 10, 2009 // 1 Comment

डेज़ ऑफ़ हैवन उन कमाल की फिल्मों से एक है जिन्हें आप चाहें तो बस उनकी सिनेमेटोग्रेफी के लिए देख सकते हैं। इस फिल्म को कम्प्यूटर पर देखते हुए आपकी स्पेस की परेषान हो सकती है। क्योंकि हर दूसरा फ्रेम आपको मजबूर कर देता है कि फिल्म को रोककर बस उस फ्रेम में डूब जाया जाये। उसी तरह जैसे पहाड़ों में सर्दियों के मौसम में घूमने निकले हों। और कंपाती ठंड के बीच जहां जहां धूप दिखे वहां वहां रुक READ MORE

एक वीडियो ब्लाग के बारे में

December 8, 2009 // 4 Comments

हिन्दी में ब्लाग कैसे बनायें कई लोग ये सवाल करते मिल जाते हैं। शुरुआती दिनों में ब्लाग कैसे बनायें यह भी लोगों की समस्या का विषय था। कई लोगों के लिये अभी भी ये समस्या का विषय है। ब्लाग बनाते हुए और बनाने के बाद कुछ छोटी छोटी दिक्कतें आती हैं। मसलन शुरुआत कैसे करें। फिर ब्लाग बन जाने के बाद उसमें हिन्दी में कैसे लिखें। अगर र्वउ में कोई बढ़ा टैक्स्ट जेसे लेख या कहानी पहले सो लिखी हुई READ MORE

क्या आपका फोन चोरी नही हुआ

November 24, 2009 // 4 Comments

सिट यार फोन चोरी हो गया। घर आकर बताया तो भाई लोगों के चेहरे पर मुस्कुराहट तैर आई। पहली बार जब घर आकर बताया था तो ऐसा नहीं हुआ था। तब सबको लगा था कि हां कुछ चोरी हो गया। ऐसा होना नहीं चाहिये था। कैसे कोई फोन चोरी कर सकता है। जेब से निकाल कैसे लिया फोन। ब्ला ब्ला…तब घर वालों ने बड़ी जिज्ञासा दिखाई थी फोन चोरी होने की घटना के बारे में। घर में पहला फोन जो चोरी हुआ था। मुझे भी सदमा सा लगा था। READ MORE

लगत जोबनवा मा चोट को खोजती एक फिल्म

November 22, 2009 // 2 Comments

लगत जोबनुवा में चोट, फूल गेंदवा न मार। ये शब्द फिर गाये नहीं गये। ठुमरी के ये बोल कहीं खो गये होते।शब्द ही थे। खो जाते। अगर सबा उन्हें ढ़ूढ़ने की कोशिश नहीं करती। लेकिन सबा दीवान को न जाने क्या सूझी कि वो इन शब्दों को ढ़ूढ़ते ढूंढ़ते एक सिनेमाई सफर तय कर आई। उनकी डोक्यूमेंटी फिल्म द अदर सौंग दरअसल लगत जोबनुआ में चोट के लगत करेजवा में चोट बन जाने की यात्रा है। आंखिर क्यों जोबनुआ READ MORE

युद्व का उन्माद और सोल्जर ब्लू

November 14, 2009 // 0 Comments

युद्व का उन्माद कितना विभत्स, कितना भयावह और अमानवीय हो सकता है सोल्जर ब्लू में देखा जा सकता है। ये एक अमेरिकन फिल्म है। इतिहास में झांकती, जंग के मैदान में ले जाती और उस मनहस्थिति से रुबरु कराती जो एक आदमी को निहायत जंगली बना देने पर उतारु कर देती है। जो एक सभ्यता के असभ्य हो जाने की अन्तिम सीमा तक पहुंचने की यात्रा दिखाती है। फलतह आदमी के अमानवीय हो जाने की दर्दनाक सच्चाई को खुलकर READ MORE

और तीन की टिकट नहीं रही…….

November 5, 2009 // 0 Comments

दिल्ली की बसों में एक और बड़ा दर्दनाक वाकया हुआ। बड़े अफसोस के साथ कहना पड़ रहा है कि इस हादसे में 3 रुपये की टिकट नहीं रही । दिल्ली में बसों के किराये बढ़ गये। पांच का टिकट दस का हो गया और दस का पन्द्रह में बदल गया। सात की बिसात भी अब नहीं रही। इस घटना का सीधा असर यहां ब्लाग पढ़ रहे आप हम लोगों में से बहुत कम पर होगा। हमें शायद ये घटना बहुत दर्दनाक ना लगे। पर बस में चढ़ने वाला एक बड़ा तबका READ MORE

खरगोश ओसियान में अव्वल

November 1, 2009 // 0 Comments

सोने जा ही रहा था कि एक सूचना मिली। सूचना बड़ी अच्दी लगी तो सोचा आपको बता ही डालूं। खरगोश को ओसियान के दर्शकों ने सबसे ज्यादा पसंद किया। ये तो पता ही था। लेकिन बात और साफ हो गई जब ओसियान के पुरस्कारों की घोषणा की गई। औडियन्स पोल कैटेगरी में खरगोश ने बाजी मार ली। लौंग नाइट को बेस्ट फिल्म का ज्यूरी अवार्ड दिया गया। हातेम अली निर्देशित यह सीरियन फिल्म जेल में डाल दिये गये राजनैतिक READ MORE

अब स्लोवाक फिल्म फेस्टिवल

October 31, 2009 // 0 Comments

सिरीफोर्ट औडिटोरियम में ओसियान की रंगत खत्म। ओसियान के पिटारे से निकली सौ से ज्यादा देशी विदेशी फिल्मों का लुत्फ लोगों ने खूब लिया। पर कई लोगों की ये शिकायत भी रही कि इस बार ओसियान की टिकट महंगी हो गई। 300 रु की रजिस्टेशन फीस कई लोगों को रास नहीं आई। वैसे इस बार ओसियान में लोगों की आवाजाही पिछले सालों की अपेक्षा कम रही। हो सकता है फीस का बढ़ना इसके कारणों में से एक हो। खैर इस फिल्म READ MORE

सुपरमैन आफ मालेगांव

October 29, 2009 // 2 Comments

वे फैज नहीं हैं फैजा हैं इसलिए उनका अंदाजे बयां अलहदा है। फैज शब्दों से अपनी बात कहते थे फैजा ने वृत्तचित्र के जरिये कही। और जो कही कमाल कही। किसी कविता सी दिल में उतर गई चित्रों के कई वृत्त सी बनाती जैसे नदी के शान्त प्रवाह में कंकड़ को हल्के धकेल दिया हो। फैजा अहमद खान आरै कुहू तनवीर की फिल्म सुपरमैन आफ मालेगांव एक डाक्यूमेंटी फोर्म की फिल्म है। पूरी फिल्म एक फिल्म बनने की READ MORE

ओसियान उड़कर आया सुपरमैन आफ मालेगांव

October 29, 2009 // 2 Comments

वे फैज नहीं हैं फैजा हैं इसलिए उनका अंदाजे बयां अलहदा है। फैज शब्दों से अपनी बात कहते थे फैजा ने वृत्तचित्र के जरिये कही। और जो कही कमाल कही। किसी कविता सी दिल में उतर गई चित्रों के कई वृत्त सी बनाती जैसे नदी के शान्त प्रवाह में कंकड़ को हल्के धकेल दिया हो। फैजा अहमद खान आरै कुहू तनवीर की फिल्म सुपरमैन आफ मालेगांव एक डाक्यूमेंटी फोर्म की फिल्म है। पूरी फिल्म एक फिल्म बनने की READ MORE

ओसियान् में खरगोश

October 28, 2009 // 1 Comment

ओसियान्स में दिखा वो खरगोश रगों में अब तक एक अजनबी सी रुमानियत पैदा कर रहा है। एक मासूम सी, बच्ची सी पर पर फिर भी प्रौढ़, परिपक्व सी है ये रुमानियत। बड़ा रुहानी सा होकर भी रुहानी भाव न होने सा कुछ, पर फील पूरा रुहानी, पूरा नशा लिए हुए। सात बजकर पैंतालीस मिनट पर उस खरगोश ने फिल्मी परदे पर दौड़ना शुरु किया फिर दौड़ा क्या रुक ही गया दिमाग के कोने कोने में जैसे हमेशा के लिए। परेश कामदार ने READ MORE

ओसियान का दूसरा दिन

October 27, 2009 // 1 Comment

ओसियान फिल्म फेस्टिवल के दूसरे दिन आज तीन फिल्में देखी। तेजा, मैन वूमेन एंड अदर स्टोरीज और ब्लाईंड पिग हू वान्टस टू फलाई। पहली फिल्म तेजा हेला जर्मिया के निर्देशन में बनी है। फिल्म अफ्रिका के इन्टलेक्चुअल युवाओं के पलायन पर केन्द्रित है। फिल्म मुख्य रुप से अपने अतीत पर अधिकार के हक के समर्थन में खड़ी होती है। अफ्रिकी समाज की एक बहुत कड़वी सच्चाई को दिखाती इस फिल्म के कुछ अंशों READ MORE

ब्लागिंग से जुड़े कुछ डर कुछ शिकायतें

October 25, 2009 // 3 Comments

एक फिल्म आई थी, तारे जमी पर। फिल्म की सफलता के बाद फिल्म के मुख्य कलाकार दर्शील ने एक सवाल उठाया था कि जब उनकी अदाकारी बेहतर है तो उन्हें बेस्ट ‘बाल कलाकार’ की जगह बेस्ट ‘कलाकार’ का पुरस्कार क्यों नहीं दिया जा सकता। मायने यही थे कि किसी चीज को रिकोर्गनाईज किये जाने के लिए क्या ज्यादा जरुरी है? उसकी गुणवत्ता या फिर उससे जुड़ी हुई उम्र और अनुभव की सीमाएं। मेरे खयाल से गुणवत्ता। READ MORE

अब आयेगा इन्टरनेट पर दुकानदारी का दौर

October 20, 2009 // 3 Comments

इन्टरनेट इन दिनों दुकानों का काम भी कर रहा है। यहां पर कई ऐसी साईटस मौजूद है जो आपको विभिन्न प्रोडक्टस की जानकारी दे देती हैं वो भी घर बैठे। आपके मनपसन्द कपड़े हों या फिर अन्य कोई एसेसरी इन्टरनेट पर उनके मूल्यों के साथ उनकी गुणवत्ता की भी जानकारी ली जा सकती है। ये वैबसाईट कुछ इसी तरह काम करती हैं जैसे गूगल या कोई अन्य सर्च इन्जन। बस आपको टाईप करना होता है प्रोडक्ट का नाम और आपको उस READ MORE

एक ज्यादती है कपिल साहब का बयान

October 20, 2009 // 1 Comment

15 जुलाई 2009 को कपिल सिब्बल ने लोकसभा में अपने भाषण में कहा था कि शिक्षा व्यवस्था में सभी तरह के नये प्रयोगों को शामिल किया जायेगा। और हाल ही में उन्होंने बयान जारी किया आआईटी में प्रवेश के लिए 80-85 प्रतिशत अंक लाना अनिवार्य होना चाहिये। 15 जुलाई को दिये हुए वक्तव्य में उनका मन्तव्य शायद इसी तरह के प्रयोगों से था। उनका मानना है कि जो बारहवीं में इतने अंक नहीं ला सकता उसे इतने प्रतिश्ठित READ MORE

आस्था के लिए जीता एक नगर: त्रयम्बकेश्वर

October 19, 2009 // 2 Comments

इस बार त्रयम्बकेष्वर जाना हुआ। लगा कि भक्ति और आस्था ये ऐसे शब्द हैं जिनका कटटरवाद से कोई लेना देना नहीं है। महाराष्ट में नासिक के पास एक छोटा सा कस्बा है त्रयम्बकेश्वर जिसका अस्तित्व अगर है तो उसके पीछे बस यही भक्ति और आस्था है। लगता कि है कि ये कस्बा इसी आस्था से है और इसके लिए जीता है। आस्था न होती तो ये कस्बा न होता। एक पिछड़ा सा नजर आने वाला इलाका, पिछड़े से नजर आने वाले लोग लेकिन READ MORE

पहाड़ और उतरन

October 2, 2009 // 0 Comments

महेश चंद्र पुनेठा जी की कविताएं इस ब्लाग पर मैं लगातार प्रकाशित करता रहा हूं। इसी कड़ी में आज पेश हैं उनकी ये दो उम्दा कविताएं….. अपनी जमीनपहाड़इसलिए पहाड़ हैक्योंकिजितना फैला है वह आसमान मेंउससे अधिकधॅसा है कहीं अपनी जमीन में उतरनप्रवाह है जब तकनदी नदी है ।गति है जब तकहवा हवा है ।मुक्त है जब तकप्रेम प्रेम है ।बॅधते हीनदी नदी नहींहवा हवा नहींऔर प्रेम प्रेम नहींउतरन मात्र रह READ MORE

ईद मुबारक…..

September 21, 2009 // 4 Comments

हम ईदगाह पढ़ते बड़े हुए। और जब जब हामिद के चिमटे ने उसकी दादी की आंखें को खुशी से सराबोर कर दिया हमें लगा कि ईद आ गई। और आज फिर जब ईद आई है हमें हामिद की दादी याद हो आई है। उसी चिमटे उन्हीं खुशी भरे आंसुवों के साथ। जामिया में पढ़ते उसे समझते मुझे पांच साल हो आये हैं। पर जामिया को मैने कभी उस रुप नहीं समझा जिस रुप में मीडिया अक्सर हमें समझाता रहा है। मुझे जब जब मोहन चंद्र शर्मा से हमदर्दी READ MORE

फिल्मी गीतों के नाम

September 21, 2009 // 2 Comments

उन सभी फिल्मी गीतों के नाम जिनको गुनगगुनाते हुए हम बड़े हुए और जो हमारी उम्र के साथ बढ़ते रहेंगे हमारे साथ…. हम उम्रदराज होते रहेंगे और ये गीत और जवान सदियां जिन्हें गुनगुनाकर चली गईपर जो जिन्दा रहेंगे सदियों तकगुनगुनाने के लिए।जो बांटते रहे हैं अकेलापनबिखेरते रहे हैं खुशियांबनते रहे हैं दर्द की दवा भी।गीत जो घुल गये हैं परम्पराओं मेंमिसरी के घोल की तरहजिनमें घुल गई हैं READ MORE

मैन विद मूवी कैमरा : कैमरा जब आंख बन जाता है

September 17, 2009 // 0 Comments

फिल्मों में रुचि रखने वाले लोगों के लिए मैन विद मूवी कैमरा एक कमाल की फिल्म है। जिस दौर में सिनेमा की शुरुआत होती है उस दौर में कैसे एक डाइरैक्ट हर सम्भव तकनीक अपनी फिल्म में प्रयोग कर लेता है और पूरी सफलता से, ये बात फिल्म देख लेने के बाद ही पता चलती है। 1929 में बनी ये डौक्यूमेंट्री फिल्म रसियन निर्देशक वर्तोव ने निर्देशित की। न फिल्म में कोई कहानी है, ना ही कोई निर्धारित पात्र साथ ही READ MORE

मैन विद मूवी कैमरा, कैमरा जब आंख बन जाता है

September 17, 2009 // 3 Comments

फिल्मों में रुचि रखने वाले लोगों के लिए मैन विद मूवी कैमरा एक कमाल की फिल्म है। जिस दौर में सिनेमा की षुरुआत होती है उस दौर में कैसे एक डाईरैक्ट हर सम्भव तकनीक अपनी फिल्म में प्रयोग कर लेता है और पूरी सफलता से, ये बात फिल्म देख लेने के बाद ही पता चलती है। 1929 में बनी ये डौक्यूमेंटी फिल्म रसियन निर्देषक वर्तोव ने निर्देषित की। न फिल्म में कोई कहानी है, ना ही कोई निर्धारित पात्र साथ ही यह READ MORE

भोजपुरी गीतों का संसार

September 16, 2009 // 6 Comments

यह लेख इससे पहले मेरे ब्लाग नई सोच में छप चुका है। फिल्मों से सरोकार होने के कारण इसे यहां भी छाप रहा हूं। ये लेख मूलतह एक रेडियो फीचर की पटकथा है जिसे एक प्रोजेक्ट के तहत लिखा गया था। इसे लिखने में मुख्य भूमिका मेरे सहपाठी रोहित वत्स की रही। भोजपुरी संगीत में उपज रही अश्लीलता के कारणों पर यह लेख एक अच्छी समझ पैदा करता है।समय बदला और उसी के साथ बदली हमारी रुचियां। शहरी क्षेत्रों में READ MORE

एक पिक्चर हौल आपके लिए

September 16, 2009 // 1 Comment

http://picturehaal.blogspot.com/हिन्दी में फिल्मों पर अभी बहुत कम ब्लौग हैं। और जो हैं भी उनमें भी फिल्मों के बारे में सीखने सिखाने की परिपाटी अभी शुरु नहीं हो पाई है। पिक्चर हौल एक प्रयास है फिल्मों के बारे में सीखते हुए उन्हें समझने का। एक फिल्म स्टूडेंट होने के नाते फिल्मों में रुचि है और सीखने की चाह भी है। पिक्चर हौल ऐसे ही लोगों के लिए है जिनकी फिल्मों में रुचि है औ वो मेरी ही तरह सीखना चाहते हैं READ MORE

भीड़ भरी बस और वो

September 11, 2009 // 6 Comments

दिल्ली की भीड़ भरी बसों में रोज कई वाकये होते हैं। मसलन मोबाईल या पर्स चोरी हो जाना। पर इन वाकयों को अंजाम देने वाले लोग ये काम चोरी छिपे करते हैं। उन्हें किसी का डर होता है। यह किसी शायद प्रशासन होता है, माने पुलिसिया डंडा और मार। पर जो वाकया आज हुआ उसे उदेखकर लगता है इस किसी का डर अब किसी को नहीं रह गया है। खासकर उनको जिन्होंने शायद हर किसी को अपनी मुट्ठी में कर लिया है। किसी को ताकत READ MORE

एक कहानी सा कुछ

September 9, 2009 // 3 Comments

सड़क पर बसें रफ्तार से आ जा रही हैं। बस स्टॉप पर भीड़ तिलचट्टों के झुंड सी बिखरी है। एक बस आती है। रुकती है और उस पर लोग टूट पड़ते हैं। जैसे जल्दबाजी एक जरुरत हो जिसके पूरा न होने पर सम्भवतह जिन्दगी थम सी जाएगी। लोग इस भीड़ में खुद को सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण और हर किसी को निहायत तुच्छ मानते हुए किसी तरह बस में अपने लिए जगह बना लेना चाहते हैं। खींचातानी-धक्कामुक्की जगह बना लेने की इस READ MORE

यारसा गुम्बा के साईड इफैक्ट

August 21, 2009 // 0 Comments

कुछ समय पहले जब उत्तराखंड जाना हुआ तो वहां यूं ही चलते चलते यारसा गम्बू पर विनोद भाई से बात हो रही थी। बात करते करते महसूस हुआ कि कुछ रोचक जानकारियां सामने आ रही हैं। मैने बिना उन्हें बताये अपना फोन निकाला और उनकी सारी बातें रिकोर्ड कर ली। विनोद उप्रेती दरअसल उच्च हिमालयी क्षेत्रों की वनस्पतियों पर विभिन्न सरकारी योजनाओं के तहत शोध कार्य कर रहे हैं। यहां पेश है उनसे हुई बातचीत के READ MORE

एक पार्टी ऐसी भी

August 21, 2009 // 2 Comments

पार्टी कल्चर से बहुत ज्यादा ताल्लुक ना होने के बावजूद इस पार्टी ने लुभा लिया। 1984 में आई  गोविन्द निहिलानी की फिल्म पार्टी गर्मियों की पहाड़ी ठंडक का अहसास करते हुए देखी। फिल्म वर्तमान साहित्य जगत के पूरे गड़बड़झाले को उस दौर में भले ही कह गई हो पर आज भी सीन बाई सीन सच्चाई वही है। तल्ख ही सही। पार्टी की कहानी एक पार्टी की तैयारियों से शुरु होती है। ये पार्टी प्रतिष्ठित साहित्यकारों READ MORE

एक और सफर जारी है

August 10, 2009 // 0 Comments

एक और सफर की अगली कड़ी में रोहित के सफर को और आगे बढ़ाते हैं। अब उनके इस सफर में पहाड़ के सुन्दर विवरणों के अलावा भी और कुछ जुड़ने जा रहा है। वो इस सफर में कई चित्रकारों से मिले और चित्रकला पर उनके लम्बे साक्षात्कार लिए। यहां पेश हैं उनके साक्षात्कारों के अंश। रोहित जोशी पन्तनगर से वापस लौटते समय लालकुॅआ के पास मेरे फौन की घण्टी ने मुझे रूकने को कहा। फोन पर मेरे पत्रकार मित्र भाष्कर READ MORE

एक और सफर

July 27, 2009 // 0 Comments

एक और सफर की अगली कड़ी में रोहित के सफर को और आगे बढ़ाते हैं। अब उनके इस सफर में पहाड़ के सुन्दर विवरणों के अलावा भी और कुछ जुड़ने जा रहा है। वो इस सफर में कई चित्रकारों से मिले और चित्रकला पर उनके लम्बे साक्षात्कार लिए। यहां पेश हैं उनके साक्षात्कारों के अंश। रोहित जोशी भीमताल से निरन्तर नीचे की ओर उतरना है और रानीबाग से टपकते हुए हम काठगोदाम के साथ ही हल्द्वानी की सरहदों को छूते हैं। READ MORE

पहाड़ का जीवन

July 23, 2009 // 5 Comments

आप कभी पहाड़ी इलाकों में जरुर गये होंगे। क्या महसूस किया आपने…….?यही ना कि इससे खूबसूरत कोई चीज दुनिया में शायद बनी ही ना हो। कितना खुशनुमा है यहां का जीवन। कितना साफ सुथरा, ताजगी भरा बेहद सहज और सरल। आपाधापा से दूर। मन किया होगा कि बस यहीं जीवन बिताने को मिल जाये तो जन्नत और क्या होगी। आपकी एक सैलानी की नजर जो नहीं देख पाई आइये आपको दिखाते हैं पहाड़ों के भीतर की दूसरी दुनिया का सच। READ MORE

एक और सफर…

July 19, 2009 // 2 Comments

इस बार घर जाना हुआ दा मेरे दोस्त रोहित ने अपनी एक यात्रा के बारे में तफसील से बताया। रोहित वैसे घुमक्कड़ी में खास रुचि रखते हैं और इस बार वो और मैं चार दिनों की एक बाईक यात्रा पर गंगोलीहाट से बेरीनाग, चैकोड़ी, थल, डीडीहाट, नारायण नगर, अस्कोट, धारचूला होते हुए मुन्स्यारी तक का सफर तय कर आये। बेहद रोमांचक और दिल खुश कर देने वाली यादगार यात्रा रही यह। यात्रा का मकसद था केवल और केवल घूमना READ MORE

दाखिले की प्रक्रिया में दखल की जरुरत

July 3, 2009 // 0 Comments

दिल्ली विश्वविद्यालय में दाखिले की दौड़ अन्तिम पड़ाव पर पहुंचने वाली है और कई लाख छात्रों में से कुछ हजार ही ऐसे हैं जिन्हें विश्वविद्यालय में पढ़ने का मौका हासिल होने वाला है। दाखिलों की इस पूरी प्रक्रिया को बेहद आसान कर देने का श्रेय विश्वविद्यालय प्रशासन को अवश्य दिया जाना चाहिये क्योंकि इसने छात्रों और उनके अभिभावकों के कई लीटर पसीने को बहने से बचाया है लेकिन मौजूदा वर्ष READ MORE

हिन्दुस्तान में नई सोच

July 1, 2009 // 2 Comments

अच्छा लगा कि रवीश जी हिन्दी के ब्लौगर्स को मीडिया में जगह दे रहे हैं और इस बार उनकी खोज के दायरे में मेरा ब्लाग भी शामिल हुआ है। दरअसल यह ब्लाग संस्कृति को पहचान देने और प्रोत्साहन देने का एक अच्छा प्रयास है कि उनकी चर्चा की जाय और और इसी बहाने ब्लाग जगत के बीच से आ रही नयी बातों और चर्चाओं को अन्य संचार माध्यमों के बीच लाया जाये। दैनिक समाचार पत्र हिन्दुस्तान में रवीश जी ने यह प्रयास READ MORE

भोजपुरी गीतों का संसार

June 15, 2009 // 5 Comments

ये लेख मूलतह एक रेडियो फीचर की पटकथा है जिसे एक प्रोजेक्ट के तहत लिखा गया था। इसे लिखने में मुख्य भूमिका मेरे सहपाठी रोहित वत्स की रही। भोजपुरी संगीत में उपज रही अश्लीलता के कारणों पर यह लेख एक अच्छी समझ पैदा करता है।समय बदला और उसी के साथ बदली हमारी रुचियां। शहरी क्षेत्रों में तेजी से हुए औद्योगीकरण और उससे उपजे पैसे ने जनता की पसंद नापसंद में कई बदलाव किये जिसका असर खान पान, रहन READ MORE

भावनाओं का संसार रचती दो उम्दा फिल्में

June 13, 2009 // 2 Comments

इस बीच माजिद माजिदी की दो फिल्में देखने को मिली। चिल्ड्रन आफ हैवन और कलर्स आफ पैराडाईस। माजिद माजिदी की फिल्में एक अलग संसार रचती हैं। गांवों का संसार, भावनाओं का संसार और अदभुत प्राकृतिक और मनोवैज्ञानिक सुन्दरता का संसार। इन दो ही फिल्मों ने इस ईरानी निर्देशक के प्रति एक अजीब सा आकर्षण जेहन में पैदा किया है। कोई निर्देशक कितनी गहराई से अभावों के बीच से उपजते मनोवैज्ञानिक READ MORE

हिंदी साहित्य का वर्तमान परिदृश्य

May 30, 2009 // 4 Comments

हिन्दी साहित्य पर विष्लेषण और चिन्ता किये जाने की स्थिति कमतर होती जा रही है खासकर हिन्दी से जुड़े छात्रों के बीच भी यह परम्परा अब जाती रही है। ऐसे में युवा संजीव का यह लेख आशादायक प्रतीत होता है। संजीव हिन्दी साहित्य के छात्र होने के साथ साथ एक उम्दा गीतकार, कवि और कहानीकार भी हैं। वो कुछ फिल्मों में भी एक निर्देशक के तौर पर हाथ आजमा चुके हैं। हांलाकि उनके ये प्रयास अभी छोटे हैं READ MORE

साठ साल की नाइंसाफी और शर्म

May 27, 2009 // 3 Comments

ये लेख अभिशेक भैया की अनुमति पर वैबसाईट रविवार डाट काम से साभार यहां पर प्रकाशित कर रहा हूं। अभिशेक भैया एक युवा पत्रकार हैं और अपने पत्रकारिता के अनुभवों को कई संस्थानों के साथ बांट फिलवक्त स्वतंत्र पत्रकारिता की राह पकड़ चुके हैं। क्यों, इसपर फिर कभी उन्हीं के अनुभवें को यहां छापा जायेगा। उनके कुछ अनुभवों को उनके ही ब्लाग http://janpath.blogspot.com पर देखा जा सकता है। लेकिन इस बार उनका यह लेख READ MORE

दलित विमर्श की महत्वपूर्ण कविता है केशव अनुरागी

May 6, 2009 // 1 Comment

अब तक इस ब्लौग पर आपने पुनेठा जी की कविताओं का लुत्फ उठाया है लेकिन इस बार उन्होंने इस ब्लौग के लिए समीक्षा भेजी है। इसी बहाने यह बताता चलूं कि महेश चंद्र पुनेठा जी हंस कृतिओर ज्ञानोदय अंकुर सहित लगभग सभी साहित्यिक पत्रिकाओं के लिए कविता और समीक्षा लेखन करते रहे हैं। आशा है आने वाले समय में भी उनकी समीक्षाएं इस ब्लाग में पढ़ने को मिलती रहेंगी। – महेश चंद्र पुनेठा म्ंगलेश डबराल READ MORE

जेब खाली है तो ना कर बात नैनीताल की

May 4, 2009 // 4 Comments

गर्मियों के इस मौसम में नैनीताल की खूबसूरत वादियों में घूम फिरकर आना किसे अच्छा नहीं लगता। लेकिन जब रोहित वहां गये तो उन्हें कुछ और ही महसूस हुआ। जिसे उन्होंने अपने इस ब्लौग लेख में लिख भेजा है। बिना किसी प्रस्तावना के सीधे उनकी ही बात सुनते हैं। रोहित जोशी,नैनीताल एक खूबसूरत शहर है। यहां एक खूबसूरत झील है। झील में तैरती खूबसूरत नावें हैं। खूबसूरत जंगल हैं। खूबसूरत से घर हैं। READ MORE

नैनो पर सवार कवितामय बहस

April 28, 2009 // 0 Comments

अब नैनो पर बहस कविता में सवार है। लंबे समय बाद पुनेठा जी ने अपनी इस कविता के रुप में फिर दस्तक दी है। इससे पहले इस ब्लाग को पहाड़ी बनाने में उनकी कवितामय मदद मिलती रही है। अब उनकी कविता बहस का हिस्सा बन आई है तो आप भी इसे महसूसें इसे । उमेश भाई ,ब्लाग निरंतर निखर रहा है। इसलिए काफी लोग इसे पढ़ और पसंद कर रहे हैं । अपनी प्रतिक्रिया भी दे रहे हैं । ‘ नैनो’ को लेकर काफी अच्छी बहस चल रही है। आगे READ MORE

नैनो पर क्रिया -प्रतिक्रिया

April 27, 2009 // 2 Comments

इस ब्लौग पर नैनो को लेकर एक लेख रोहित ने मुझे भेजा था। और साभार मैने उसे यहां छापा था। जिस पर मुनीश जी ने अपनी प्रतिक्रिया जाहिर की थी और रोहित की जगह मुझे कुछ सुझाव दे दिये थे। रोहित ने उन सुझावों को पढ़ने के बाद आज काफी समय बाद अपनी प्रतिक्रिया एक कमेन्ट के रुप में भेजी जिसे यहां पोस्ट करना मुझे जरुरी लग रहा है। मुनीश जी इसे पढ़ें तो उनकी प्रतिक्रिया भी यहां आमंत्रित है। क्योंकि सहज READ MORE

नुक्कड़ नाटक के बाद एक और नाटक

April 25, 2009 // 5 Comments

समलैंगिकता को कितना सही कहा-ठहराया जाय ये मुददा अलग बहस का हो सकता है लेकिन हमारे समाज में समलैंगिकों के साथ होने वाला व्यवहार कतई सही नहीं ठहराया जा सकता। हाल ही में जामिया के एमसीआरसी के मासकाम्यूनिकेषन कर रहे छात्रों ने समलैंगिकता पर एक नुक्कड़ नाटक किया। पूरा नाटक इन छात्रों द्वारा लिखा और कोरियोग्राफ किया गया। बाकायदा ये पूरा नाटक टीचिंग स्टाफ के संरक्षण और दिशा निर्देशन READ MORE

मैं वोट करुंगा

April 2, 2009 // 5 Comments

कई बार ये सवाल मेरे जहन मैं आता हैकि आंखिर मैं वोट क्यूं करुंवोटिंग मशीन के मतों में मैं एक और अंक क्यों भरुंमैं आंखिर वोट क्यूं करुं।लेकिन इस बार मैं अपनी इस सोच पर चोट करुंगा।मैं वोट करुंगा। मैं वोट करुंगा।मैं वोट करुंगाक्योंकि संसद के गलियारों में मेरी हिस्सेदारी होगी।मैं वोट करुंगाक्योंकि एक युवा होने के नाते ये मेरी जिम्मेदारी होगी।मैं वोट करुंगाक्योंकि याद है मुझे कि READ MORE

किनके नयनों को प्यारी है नैनो

March 26, 2009 // 4 Comments

नैनो अब सड़कों पर होगी और कई बे कार लोगों के दिमाग में चुहल पैदा करेगी कि काश अब बहुत हो गया। इस कार के आने के बाद कई पहलुओं पर चर्च ए आम है। इस ब्लौग के लिए रोहित ने ये आलेख आ भेजा हैं साभार छाप रहा हूंरोहित जोशी एक लम्बे इन्तजार के बाद टाटा ‘नैनो’ बाजार में उतर आई है। जुलाई माह से ‘नैनो’ सड़कों में भागती-दौड़ती दिखाई देने लगेंगी। सम्पूर्ण मीडिया जगत् ने भी ‘नैनों’ पर बिठाकर इसका स्वागत READ MORE

एक और भड़ास जैसा कुछ

March 20, 2009 // 3 Comments

हम एक ऐसी लोकतांत्रिक व्यवस्था में जी रहे हैं जहां पे आपको बोलने सुनने और यहां तक कि सोचने के लिए भी एक दायरा तय कर लेना होता है। क्या सोचें क्या कहें और क्या करें इस सब के इर्द गिर्द एक बड़ी लोहे की कांटेदार जंजीर लिपटी हुई है। एक छोटी सी भूल उस जंजीर को आपके मांसल शारीर के खून का प्यासा बना सकती है। और फिर एक दर्द आपके इर्द गिर्द किसी साये की तरह मडराने को बेताब खड़ा हो जायेगा। फिर आप READ MORE

ये शहर इस मौत का जिम्मेदार है

March 16, 2009 // 5 Comments

तस्वीरें यहां से हटा दी गई हैं। एक नजदीकी दोस्त की इस सलाह पर कि तस्वीरें यहां पोस्ट करना भी अपने में एक संवेदनहीनता है। हांलाकि मैं अभी उहापोह की स्तिथि में हूं कि क्या वाकई इस मुत लड़के की तस्वीरों को यहां छापना एक असंवेदनशील व्यवहार है कि नहीं। या फिर एक कड़वी सच्चाई को उसके भौंडे ही सही लेकिन वास्तविक रुप में दिखाना यदि कुछ लोंगों काी सेवेदनाओं को जगा सके तो क्या इस सोच से छापी गई READ MORE

होली है तो पर यहां कहां

March 9, 2009 // 2 Comments

कल होली है तो पर होने जैसा कुछ नजर नहीं आया अब तक। हर त्यौहार की तरह इस होली में फिर घर की याद हो आयी है। घर जाने का मन तो था पर जाना हो नही पाया। कारण वही एकैडमिक प्रेशर। खैर घर यानी गंगोलीहाट में होली के अपने अलग रंग हैं। वहां आज भी होली पारम्परिक तरीके से मनायी जा रही है। वहां की होली की खास बात है कि उसमें रंग भी है ता साफ सुथरे। वहां कोई हुडदंग जैसी चीजें नही हैं। औरतों की अपनी अलग READ MORE

जय हो जय हो जय जय हो

February 24, 2009 // 0 Comments

border=”0″ alt=””id=”BLOGGER_PHOTO_ID_5305846119517931362″ /> आजा आजा जिन्द सामियाने के तले। और इसके बाद जय हो। आस्कर सेरेमनी में अभी जब इस संगीत के सामियाने में ए आर रहमान पुरस्कार ले रहें हैं तो दिल गर्व से गदगद हो रहा है। हांलाकि ए आर रहमान की धुनें पहले गोल्डन ग्लोब और उसके बाद बाफटा में कमाल दिखा चुकी थी। लेकिन आस्कर आंखिर आस्कर है। ये हर भारतीय के लिए गर्व की बात है कि भारत के संगीत को इस बार विश्व में READ MORE

मीडिया पर एक और तालिबानी हमला

February 19, 2009 // 1 Comment

पाकिस्तान की स्वात घाटी में एक बार फिर पाकिस्तान की तालिबानी ब्रिगेड ने अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की हत्या की है। दरअसल यह हत्या उस पाकिस्तानी पत्रकार मूसा खान की हत्या ही नहीं है बल्कि यह मामला हमारी मौलिक स्वतंत्रता के अधिकार के हनन का मामला है। यह हत्या भले ही पाकिस्तान में हुई हो लेकिन ऐसा नहीं है कि किसी और देश के लिए इसकी कोई अहमियत नहीं रह जाती। यहां सवाल आतंकवाद के बुलन्द READ MORE

यमुना किनारे विचरने के बहाने

February 2, 2009 // 1 Comment

नदियां हमेशा उस जगह को एक संस्कृति देती हैं जहां वो बह रही होती हैं। नदियों के साथ एक पूरा जीवन और उस जीवन के बरक्स लोगों की दैनिक जीवनचर्या भी नदियों से जुड़ जाती है। चाहे वो बनारस या हरिद्वार के घाट हों या किसी छोटे से गांव के किनारे बह रही अनजान से नाम वाली नदी के किनारे, नदी होने से उनका होना कुछ अलग ही अहमियत से सराबोर हो जाता है। उन घाटों, उन किनारों में होने वाली चहल पहल की वजह वो READ MORE

परिंदों का इन्तजार सा कुछ

January 28, 2009 // 5 Comments

इन दिनों कभी कभी तस्वीरें खीचने का जी होता है। हांलाकि मेरे पास अब तक कोई प्रोफेश्नल कैमरा तो नहीं है लकिन कालेज से जब कैमरा ईश्यू किया तो कुछ तसवीरें खींची। कभी कभी लगता है कि परिंदों के पास अपनी दुनिया को और ज्यादा विस्तार से जीने की आजादी है। उनके पास आकाश है, उसकी उंचाई है और एक स्वच्छन्दता किसी भी हद तक जा सकने की। लेकिन दरियागंज के पास ये परिंदे अपनी छोटी सी दुनिया में कितने खुश READ MORE

इसे कहते हैं जीवटता

January 24, 2009 // 5 Comments

उसकी उम्र 76 वर्ष से ज्यादा हो गई है। चेहरे पर उगी बेतरतीब दाड़ी के बीच बुढ़ापे की कमजारी को साफ देखा जा सकता है। लेकिन उसके अन्दर ऐसा क्या है जो उसे इस तरह के कदम उठाने पर मजबूर कर रहा है। ऐसी कौन सी पीड़ा है कि वो सख्स इन दिनों दिल्ली में बिड़ला मन्दिर के पास हिन्दु महासभा भवन परिसर में धरने पर बैठा हुआ है। आज दसवां दिन है। जीडी अग्रवाल नाम के यह वयोवृद्ध व्यक्ति गंगा को बचाये जाने की मांग READ MORE

फिरकापरस्ती के खिलाफ सहमत जामिया में

January 23, 2009 // 3 Comments

इन दिनों जामिया में सफदर हाशमी की याद में एक चित्र प्रदर्शनी लगी हुई है। यह प्रदर्शनी सांस्कृतिक संस्था सहमत के द्वारा आयोजित की गई है। जामिया के एक सोफिस्टिकेटेड फूड कोर्ट यूथ कैफे के पास बने एक नवनिर्मित प्रदर्शनी हाल में एक महीने के लिए लगी यह प्रदर्शनी कई मायनों में देखने लायक है। जब यह हाल बन रहा था तो लगा था कि यहां पर एक और फूड कोर्ट बनेगा लेकिन ऐसा नहीं हुआ। यह सचमुच बड़ी READ MORE

पर्यावरण के लिए समर्पण की मिशाल हैं वो

January 21, 2009 // 1 Comment

रोहित जोशी का यह लेख एक ऐसे शख्स के बारे में है जिसे पेड़ लगााने का एक नशा सा था। पर्यावरण के लिए उस सख्स के लगाव की खबर लगते ही रोहित उस तक पहुंचे और विस्तार से बातचीत की। ऐसे लोगों को बढ़ावा दिया जाना जरुरी है क्योंकि ग्लोबल वार्मिंग के जिस खतरे में हम जी रहे हैं उसमें ऐसे प्रयास ही हमें बचा सकते हैं। इसीलिए इस ब्लाग के जरिये ऐसे प्रयास हमेशा सराहे जाते रहेंगे। कम से कम इतना तो मैं कर READ MORE

पढ़ने की संस्कृति विकसित करती हैं बाल पत्रिकाएं

January 17, 2009 // 4 Comments

हमारे समय के बच्चे तकनीकों के इर्द गिर्द जी रहे हैं। मोबाईल, टीवी और इन्टरनेट उनकी दुनिया में बहुत गहरे समाये हुए हैं। उन्हें हाई डेफिनिशन वीडियो गेम्स की दुनिया के सुपरहीरोज के साथ कम्पीटिशन करने में मजा आता है। हांलाकि ये बातें शहरी और कस्बाई बच्चों के पर ही ज्यादा लागू होती है। ऐसे में बच्चों के किताबों के जरिये मनोरंजन की सम्भावना कमती जा रही है। उन्हें कहानी, कविताएं पढ़ने से READ MORE

बच्चों के मन को भाने वाला एक लोक त्यौहार-घुघत्या

January 14, 2009 // 4 Comments

आज काले कौआ है। छुटपन में काले कौआ का इन्तजार हम बड़ी शिददत से किया करते थे। एक हफते पहले ही दिलों की धड़कनें तेज हो जाया करती थी। और बच्चों में आपस में प्रतियोगिता होती थी कि इस बार कौन सबसे ज्यादा बड़ी माला पहनेगा। इस माला में एक खास बात थी। यह फूलों की नहीं बल्कि सूजी, आटे मास आदि पदार्थों से बने तरह तरह के पकवानों की होती थी। घुघुतिया, खजूरे, बड़ा, पूरी नारंगी, गुजिया और न जाने क्या क्या READ MORE

पहाड़

January 11, 2009 // 1 Comment

महेश चंद्र पुनेठा जी ने इस ब्लौग के लिए कई सारी कविताएं उपलब्ध कराई हैं। समय समय पर उनकी कविताओं के जरिये इस ब्लाग के पाठकों को पहाड़ की खुशबू और जायके का अहसास होता रहेगा। फिलहाल पेश है उनकी ये कविता। पहाड़ !कितने प्यारे लगते होजब रोज सुबह-सवेरेधर लाते हो सूरज कोअपने भारी-भरकम कंधों परतुम्हारे इस करतब परखिलखिला उठती हैं दिशाएं भीहिमाच्छादित शिखररंग जाते हैं भट्टी में गर्म हो READ MORE

जब सोर वैली में बिखरे रंग

January 10, 2009 // 2 Comments

पिछले दिनों सोर वैली के नाम से मशहूर उत्तराखंड के सीमान्त जिले पिथौरागढ़ में एक चित्रकला और हस्तशिल्प प्रदर्शनी का आयोजन हुआ। मेरे मित्र रोहित जोशी ने वहां सिरकत की। इस ब्लौग के लिए भेजी गयी उनकी ये रिपोर्ट यहां प्रस्तुत है। रोहित जोशी,सोर कलाकार कल्याण समिति के तत्वावधान में साल के आखिरी दिनों में राज्यभर व राज्य के बाहर से भी आए 13 चित्रकारों ने अपनी कला प्रदर्शनी व कार्यशाला READ MORE

मीडिया के छात्रों के बारें में

January 9, 2009 // 0 Comments

मीडिया से जुड़े विषयों की पढ़ाई कर रहे छात्रों के बीच हमेशा कुछ कहने की, अपने समाज के मुददों पर बात रखने की एक ललक अन्दर से होती है। नहीं होती तो होनी ही चाहिये, ऐसा मेरा मानना है। दिल्ली आने के बाद पत्रकारिता या जनसंचार से जुड़े कुछ महत्वाकांक्षी छात्रों से मुलाकात हुई। उनमें कुछ कहने और छपने छपाने की गजब की ललक थी। हांलाकि तीन सालों में उनकी छपने छपाने और कुछ कर गुजरने की ललक तो बनी READ MORE

घर में सर्दी के बीच हिमालय को देखते हुए

January 6, 2009 // 1 Comment

दूर हिमालय शान्त खड़ा हैदरकती हुई परतों का शोरअपनी षान्त नियति में छुपाया हुआ सा। एक लहर जो बिना चीखे समा रही है असंख्य छातियों के भीतररुह में अभेद्य सिहरन दियेजिसका नाम डर नहीं है। जलती हुई अंगीठियों के भीतरपक रहं, लाल नारंगी रंगऔर उनपर कांपती सी नीली हवाजो ठिठुरते हाथों में समा जायेगीऔर शीत लहरकुछ देर गाायब होने का स्वांग भर लौट आयेगी थोड़ी देर में। गर्म लपटें जिन्दगी की तरहठंडी READ MORE

जनसरोकारों से जुड़ी पत्रकारिता के खतरे से जूझता उत्तराखंड

January 2, 2009 // 2 Comments

उत्तराखंड में फिलवक्त पत्रकारिता के दो स्वरुप दिखाई दे रहे हैं। पहला जिसमें बड़े पूंजीपति समूह एक बड़े मार्केट प्लेयर के रुप में वहां अपनी जड़ें जमाने पर आमादा हैं। इस बीच इसी क्रम में हिन्दुस्तान और राष्ट्रीय सहारा जैसे बड़े ामूहों ने वहां अपना प्रसार किया है। इससे पहले उत्तर भारत के प्रमुख समाचार पत्रों दैनिक जागरण और अमर उजाला का बाजाार पर कब्जा था और सम्भवतह राष्टीय सहारा और READ MORE

शराब से पीड़ित पहाड़ का दर्द

December 28, 2008 // 3 Comments

मौजूदा समय में पूरे उत्तराखंड में जिस तरह से आन्दोलनों ने जोर पकड़ा है उसे देख यही लगता है कि खंडूरी सरकार से आम आदमी पूरी तरह संतुष्ट नहीं है। ऐसा प्रतीत होता है कि प्रषासन और आम जनता के बीच तालमेल जैसी स्थिति उत्तराखंड से गायब होती जा रही है। यही कारण है कि लोग पानी, अस्पताल, रोजगार, षिक्षा जैसी बुनियादी सुविधाओं की मांग करते हुए लामबन्द होकर सड़कों पर उतर रहे हैं। ज्यादातर इलाकों READ MORE

रचने वालों का बयान

December 25, 2008 // 2 Comments

इस बीच कौसानी में देश के जाने माने साहित्यकारों का जमावड़ा लगा और साहित्य खासकर कविता पर ढ़ेर सारी चर्चाएं हुई। मेरे साथी रोहित जोशी आपको उस चर्चा से रुबरु करा रहें हैं। लाभ उठाइयेगा। रोहित जोशी,अपने प्राकृतिक सौंदर्य के लिए सुपरिचित कौसानी इस बीच महादेवी वर्मा सृजन पीठ कुमायूॅ विश्वविद्यालय द्वारा आयोजित ‘पन्त-शॅैलेश स्मृति’ कार्यक्रम से भी चर्चा में रहा। उत्तराखण्ड शासन के READ MORE

रंग तो बहुत सारे पर अपना रंग हल्का

December 25, 2008 // 2 Comments

कुमाउनी होली के अपने अलग रंग हैं। इसमें में भी इतनी विभिन्नता है कि हर क्षेत में होली का कुढ नया जायका देखने को मिल जाता है। पिथैरागढ़ के छोटे से कस्बे गंगोलीहाट की होली के रंग में हमें होली से पहले ही डुबो रहे हैं युवा साहित्यकार महेश चन्द्र पुनेठा -महेश चंद्र पुनेठा गंगोलीहाट की होली देखने का मौका पहले-पहल मुझे वर्ष 1993 में मिला जब मेरी पहली नियुक्ति इस क्षेत्र में हुई।उस वर्ष READ MORE

समय का कैक्टस और कमल का फूल

December 10, 2008 // 2 Comments

कई बार ना जाने क्यों लगता है कि इस शहर में एक बंजर सी उदासी भरी पडी है। और जब जब ये लगता है तो महसूस होता है कि मैं कहीं का नहीं रह गया हूं। इस शोर मचाती दिल्ली में कहीं भीतर एक अजीब सी खामोशी पसरती चली जाती है। सब कुछ एक मशीनी अन्दाज में चला जा रहा है। जैसे किसी खांचे में फिट कर दिया गया हो। एक अजीब सा परायापन किसी अदृश्य गुबार की शक्ल में दिमाग के पुर्जों के बीच गर्द सा चस्पा हो गया है। READ MORE

सावधान ये सब जाली है

December 8, 2008 // 3 Comments

कुछ महीनों पहले दिल्ली के एक संस्थान से एमबीए कर रहे छात्र ने आत्हत्या करने का प्रयास किया। कारण था कि छात्र जिस संस्थान पर अपने लाखों रुपये फीस के रुप में लुटा चुका था वह संस्थान ही जाली निकला। इतनी बुरी तरह ठगे जाने के दर्द ने छात्र को अपनी जीवनलीला समाप्त करने पर मजबूर कर दिया। संयोगवश उसकी जान बच गई। इस तरह के कई ठगी के मामले अक्सर देखने में आते हैं। यदि आप भी नये सत्र में किसी READ MORE

मीडिया को दोष क्यों?

December 6, 2008 // 2 Comments

कंचन पंतरात के कोई दस, सवा दस बजे का समय था जब मुंबई के कोलाबा में फायरिंग की ख़बर आई। करीब डेढ़ करोड़ लोगों का शहर है मुंबई, दिन भर में मर्डर, लूट-पाट और गोलीबारी की न जाने कितनी घटनाएं इस शहर में होती हैं। इस ख़बर को ज़्यादा फुटेज नहीं देना चाहिए। यही कहा था मेरे एक सीनियर साथी ने मुझसे। वैसे मेरी राय भी यही थी। लेकिन मुंबई का मामला था इसलिए मैंने ताज़ा ख़बर चलाकर अपनी ड्यूटी पूरी हुई READ MORE

मुम्बई मेरी जान

December 2, 2008 // 0 Comments

उन लमहों में जब हम मायानगरी को देख रहे थे छलनी होते। हम लाचार हिरन थेजिसे शिकारियों ने घेर लिया थाऔर फुर्ती से भरा होने पर भीदुबके रहना एक कोने मेंजिसकी नियति बन गई थी। उन लमहों में हम एक ऐसे लोकतंत्र के साक्षी थेजो उदार होने के नाम परअपनी सुरक्षा ताक पे रख देता है।जिसे मैत्री सम्बन्ध अपनी जान से प्यारे हैं। उन लमहों में हम राजनीति के उस रुप के दर्शक थेजो महज वोट के लिए कर रही थी READ MORE

नौला- विलुप्त होना एक पुरानी परम्परा का

December 1, 2008 // 2 Comments

नौला। पहाड़ी इलाकों में पेयजल के पारम्परिक स्रोतों का जिक्र करते ही सबसे पहले जहन में यही श्ब्द आता है। दरअसल नौले पहाड़ों में पानी के संचयन की एक पुरानी प्रणाली है। इन नौलों का पानी साफ और स्वादिष्ट होता है। नौले अक्सर ऐसी जगह पर बनाये जाते हैं जहां पानी प्राकृतिक रुप से उपजता हो। हर गांव में सामान्य रुप से चार या पांच नौले जरुर होते हैं। गांवों में नौले केवल पानी का स्रोत भर नहीं READ MORE

ब्लैक होल (Black Hole) – अंतरिक्ष के गर्भ में छिपा रहस्य

November 29, 2008 // 2 Comments

Black hole, Kanchan Pant कंचन पंत कंचन एनडीटीवी इन्डिया में पत्रकार है। बह्मांड के अनंत विस्तार में ढेरों रहस्य और अदभुत करिश्मे छिपे हुए हैं। ब्लैक होल भी अंतरिक्ष का ऐसा ही एक रहस्य है। इस अदभुत आकाशीय रचना को समझाने के लिए साइंटिस्टों ने कई सिद्यांत दिए, कई तर्क पेश किए। लेकिन क्या ब्लैक होल को समझना इतना आसान है? सैद्यांतिक तौर पर देखें तो हां लेकिन जब बात प्रायोगिक तौर पर इसे सिद्ध करने की READ MORE

आर्तनादः पांच दिन पिचहत्तर किलोमीटर

November 29, 2008 // 1 Comment

गंगोलीहाट में अभिलाषा एक प्रयास नाम से छात्रों का एक अनौपचारिक संगठन है जिसे रोहित भाई के साथ कुछ सालों पहले हम लोगों ने क्षेत्र के कुछ युवा साथियों की मदद से प्रारम्भ किया। हमें सूझी कि क्यों न‌ क्षेत्र के सबसे बीहड़ बेल और भैरंग पट्टी के इलाके की खाक छानी जाय। इस तरह तय हुआ पांच दिनों के गांव चलो अभियान का कार्यक्रम। सात आठ लोगों का हमारा दल गाते बजाते गांव गांव घूमा। पांच दिनों READ MORE

धारावाहिकों में लौटता सामाजिक सन्देश

November 25, 2008 // 3 Comments

भारत में टेलीविजन पर मनोरंजन परक कार्यक्रमों की शुरुआत सोप ओपरा से हुई। 1985 में मनोहर श्याम जोशी द्वारा लिखा गया धारावाहिक हम लोग पहला धारावाहिक था। कक्का जी कहिन या नीम का पेड़ जैसे धारावाहिकों में सामाजिक सन्देश की महक साफ महसूस की जा सकती थी। गांव की मिट्टी की गंध लिए रोज रात बुधई दर्शकों के परिवारों के साथ अपने सुख दुख बांटता। धीरे धीरे यह फिजा बदली, धारावाहिक मध्य और उच्च वर्ग READ MORE

देखने की चीज बनते विज्ञापन

November 25, 2008 // 2 Comments

वे दौर अब नहीं रहा जब टीवी पर विज्ञापन आते ही आपकी नजर रिमोट पर दौड़ती थी और आप फट से चैनल बदल देते थे। मौजूदा दौर में एकता कपूर के के सीरियल भले ही उबाउ हो चले हों पर विज्ञापन समय दर समय रोचक होते जा रहें हैं। अब किसी खास विज्ञापन की वजह से आप चैनल बदलते बदलते उंगलियों को रोक दें ऐसा सम्भव है। विज्ञापन अब एक बड़ा उद्योग बन चला और इस उद्योग में रचनात्मकता की उड़ान अपने उफान पर है। विज्ञापन READ MORE

सावधान इन्टरनेट का भविष्य खतरे में है

November 25, 2008 // 2 Comments

इन्टरनेट इन दिनों दैनिक उपयोग की जरुरी चीजों में शुमार हो गया है। लेकिन जरुरी कामों के साथ कई बार गैरजरुरी कामों के लिए भी हम घंटों इन्टरनेट सर्फ करते हैं। क्योंकि अब तक हम यही समझते आये हैं इन्टरनेट का चाहे कितना ही प्रयोग कर लें सिवाय बिल के इसका कहीं और फर्क नहीं पड़ता। लेकिन वास्तव में ऐसा नहीं है। अगर हम इतनी ही बेतकल्लुफी और लापरवाही से इन्टरनेट का प्रयोग करते रहे तो कुछ अरसे READ MORE

रहस्यों से परदा उठाती गुफा: पाताल भुवनेश्वर

November 25, 2008 // 2 Comments

उत्तराखण्ड की पहाड़ी वादियों  के बीच बसे सीमान्त कस्बे गंगोलीहाट की पाताल भुवनेश्वर गुफा किसी आश्चर्य से कम नही है। यहां पत्थरों से बना एक. एक शिल्प तमाम रहस्यों को खुद में समेटे हुए है। मुख्य द्वार  से संकरी फिसलन भरी 80 सीड़ियां उतरने के बाद एक ऐसी दुनिया नुमाया होती है जहां युगों युगों का इतिहास एक साथ प्रकट हो जाता है। गुफा में बने पम्थरों के ढांचे देश के आध्यात्मिक वैभव की READ MORE

आज का समाज और जनआन्दोलन

November 25, 2008 // 3 Comments

रंजना कुमारी ,निदेशक, सेन्टर फार सोशल रिसर्चलोकतंत्र में जनआन्दोलनों की भूमिका काफी अहम रही है। यह भूमिका आज के दौर में बढ़ गई है। आज समाज का गरीब तबका कमजोर है। जन आन्दोलन ही सरकार और बाजार के बीच उलझे आम जन के मुददों को उठा सकते हैं। आज मानवाधिकार, महिलाओं से जुड़े मुददे समाज में सबसे ज्यादा जरुरी दिखई दे रहे हैं। राजनीति का स्वरुप जनमुखी नहीं रह गया है जिस वजह से ये मुददे कहीं दब से READ MORE

स्वामीनारायण अक्षरधाम अतीत में झांकने की अनूठी कोशिश

November 25, 2008 // 2 Comments

‘अक्षर’ यानी कभी नष्ट न होने वाला। अपने नाम के अनुकुल ही अक्षरधाम के चप्पे-चप्पे पर भारतीय संस्कृति, ज्ञान और कला की ऐसी दुनिया बसी है जो न अब तक नष्ट हुई, न आगे होगी। दिल्ली का स्वामी नारायण मंदिर आज भारत की सबसे आकर्षक विरासतों में शुमार हो चुका है। नवम्बर 2005 में यमुना किनारे स्थित यह नवनिर्मित मंदिर भारतीय स्थापत्य और षिाल्पकला का जीता-जागता सबूत तो यह है ही, पारम्पिरिक षिल्प में READ MORE

मीडिया बनाम जनस्वास्थ्य

November 24, 2008 // 2 Comments

जनस्वास्थ्य एक ऐसा मुद्दा है जो भारतीय मीडिया में अछूत सी हैसियत रखता है इसीलिये एनडीटीवी इन्डिया पर स्वास्थ्य पर फीचर देखकर एकबारगी हैरानी हुई कि यह कैसे हो गया? विशेषकर हिन्दी मीडिया में यह विषय बेहद उपेक्षित है। देश में एक ओर पंचसितारा अस्पतालों के चलन ने जोर पकड़ा है। हेल्थ टूरिजम के बहाने विदेशी पर्यटक बेहतर स्वास्थ्य की उम्मीद में यहां आते हैं और हमारा देश उनकी उम्मीदों पर READ MORE