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‘दुनाली में लगी जंग’ दिखाती ‘अनारकली आरा’

Review : Anarkali Arrah

हमारे समाज की अनारकलियों के जीवन को एक बाहरी की तरह देखने के बजाय ये फ़िल्म उनके अंतर्मन तक पहुंचाती है. ये फ़िल्म हमारे समाज के दुनाली-धारियों की दुनाली में लगी उस जंग को दिखाती है जिसे गोली खाने के डर से हमारा डरा हुआ समाज देखकर भी अनदेखा कर देता है. लेकिन हमारे ही बीच की कोई अनारकली उसे ज़रा घिसती है, तनिक रगड़ती भी है और ज़रुरत पड़ने पर उस दुनाली को पकड़कर उसी पर तान देती है जो उसकी धौंस में उसके इंसानी आत्मसम्मान के हक़ की हत्या कर रहा होता है.

अनारकली आरा एक द्विअर्थी गानों और भड़काऊ मनोरंजन वाली सतही फिल्म हो सकती है लेकिन ऐसा नहीं होता. अनारकली आरा द्विअर्थी गाने गाने वाली गायिका के अंतर्मन को दिखाती एक ज़बरदस्त कवितामय और गहरी फिल्म हो सकती थी लेकिन ऐसा भी नहीं होता. सतह और गहराई के बीच कहीं ठहरने का ये संतुलन ही है शायद जिससे फिल्म चर्चा में बनी हुई है. और पहली बार सिनेमा के परदे पर अपने निर्देशन और लेखन का गुर आजमा रहे निर्देशक अविनाश दास के लिए ये एक बहुत अहम उपलब्धि है कि फिल्म बिना किसी कन्फ्यूजन के अपना सन्देश दर्शकों तक पहुचा देती है. उसी तरह जिस तरह वो पहुचाना चाहती है. इन योर फेस.

आरा की पृष्ठभूमि पर बनी इस फ़िल्म का सबसे बड़ा और अहम क़िरदार है उसका संगीत जिसे रोहित शर्मा ने तैयार किया है. फिल्म की नायिका अनारकली यानी स्वरा भास्कर की बेहद उम्दा अदायगी शायद इस संगीत के बिना अधूरी रह जाती. या फिर यूं कहें कि दोनों की जुगलबंदी ने फिल्म की एक साधारण कहानी में जान डाल दी है. इससे पहले इसी सन्देश को लेकर बनी फ़िल्म पिंक जिस पृष्ठभूमि तक नहीं पहुंच पाती ये फिल्म उसी पृष्ठभूमि के बीच जाकर उसी की भाषा में ये सन्देश देती है कि ‘नहीं का मतलब नहीं’. जबकि पिंक ने यही सन्देश एक अलग वर्ग को दिया था और वही उसकी सीमा थी. अनारकली आरा इस सीमा से आगे जाकर वही बात कहती है. लेकिन यहां नहीं का मतलब नहीं का क्लेम एक अभिजात्य समाज की मध्यवर्गीय लड़की का नहीं है, ये एक ऐसी निम्वर्गीय नाचने-गाने वाली का क्लेम है जिसके लिए समाज की धारणाएं तय हैं. जिसके लिए कोई सॉफ्ट कॉर्नर समाज के किसी तबके में नहीं है. जिसके साथ कोई ‘ज़्यादती’ भी हो सकती है ये अवधारणा समाज में है ही नहीं. क्यूंकि ज़्यादती का सम्बन्ध इज्ज़त से मान लिया जाता है. जिसकी कोई इज्ज़त नहीं होती उसकी ‘मर्ज़ी’ की कोई कीमत नहीं होती फिल्म इस धारणा को रेखांकित करती हुई उसे तोड़ती है. किसी की इज्ज़त करना या न करना ये हमारी एक मानवीय सीमा है जो हमारे  परवरिश से निर्धारित होती है. हमारे परवरिश की इस कमी को हम उसपर नहीं थोप सकते जिसकी इज्ज़त करना समाज ने हमें सिखाया ही नहीं. अनारकली आरा ये बात कहती नहीं फिर भी समझाती ज़रूर है. एक मंचीय लोक कलाकार (भले ही वो अश्लील गाने क्यों ना गाती हो) एक वैश्या नहीं कही जा सकती और अगर वो वैश्या है भी तो इससे किसी को ये हक़ नहीं मिल जाता कि वो उसकी मर्ज़ी का सम्मान ना करे. ये एक ज़रूरी सन्देश है जो बिना उपदेशात्मक हुए दर्शकों तक एकदम मसालेदार तरीके से पहुंचता है.

फिल्म देखते हुए दर्शकदीर्घा से महिलाओं की फुसफुसाहट सुनाई देती है – “गज़ब का स्ट्रोंग केरेक्टर है इस लेडी का”. और वाकई में अनारकली के रूप में स्वरा भास्कर का किरदार एक बेहद सशक्त और मजबूत किरदार के रूप में निकलकर आता है. एक ऐसा क़िरदार जो ‘अपनी औकात’ जानता है लेकिन सामने वाले को उसकी औकात दिखाने का माद्दा भी रखता है. अनारकली ‘इज्ज़त’ के दायरे को लांघकर अपना प्रतिरोध दर्ज करती है. अपने अस्तित्व को बचाए रखने के लिए धारणाओं की एक ऐसी नदी को पार करने की कोशिश करती है जिसका प्रवाह उसके पूरी तरह खिलाफ है.

एक वाइस चांसलर जिसका सम्बन्ध सीधे सीएम से है एक दरोगा के साथ मिलकर उसे सिर्फ इसलिए वैश्या साबित करने पर अमादा है क्यूंकि उसने उसके सामने झुकने ( अपनी देह को समर्पित करने) से साफ़-साफ़ मना कर दिया. गाने-बजाने के मंच में नशे और सत्ता के मद में वो उससे ज़बरदस्ती करता है और अनारकली के पास दो विकल्प हैं या तो वो इस ज़बरदस्ती को अपनी किस्मत मान ले या फिर इसका बदला ले. वो दूसरा रास्ता चुनती है. वो एकदम शेरनी की तरह शिकार के घर जाकर उसपे ऐसा हमला करती है जिसके ज़ख्म दिखाई तो नहीं देते पर आदमी को जीतेजी मार देते हैं.

वीसी के रूप में संजय मिश्र की अदाकारी कमाल है, वो हर बार की तरह प्रभावित करते हैं. लेकिन उनका जो किरदार गढ़ दिया गया है उसमें कई तकनीकी झोल हैं. एक वीसी इतने स्पष्ठ तौर पर गुंडा नहीं हो सकता कि वो एक पब्लिक गेदरिंग में जहां संभवतः उसकी यूनीवर्सिटी के भी छात्र हो सकते हैं, बेहूदगी की इन्तहां कर दे. सारा शहर इस बात को जानता हो बल्कि एमएमएस के रूप में इस घटना के साक्ष्य मौजूद हों फिर भी अनारकली के सिवा उसका कोई विरोधी न हो . अनारकली जैसी साधारण गाने वाली लड़की के खिलाफ जो दल झंडा लेकर जुलूस निकाल रहा है वो वीसी जैसी पोस्ट पर बैठे व्यक्ति के खिलाफ क्यों नहीं दिखाई देता ये समझ से परे है. वीसी का किरदार पूरी फिल्म में थोड़ा कम कन्विंसिंग लगता है लेकिन संजय मिश्रा ने उसे इतने बेहतरीन तरीके से निभाया है कि ये कमी काफी हद तक छुप जाती है.  

पंकज  त्रिपाठी (रंगीला) के क़िरदार में कई आयाम हैं. और हर आयाम पर वो क़िरदार एकदम सच्चा मालूम होता है. मंच पर नाचती गाती गायिका के आगे पीछे रंग-बिरंगी पोशाक पहने ठुमकने वाला वो क़िरदार दरअसल एक ऐसे ‘प्रोफेशनल’ का प्रतिनिधित्व करता है जो अपने पेशे के सामने हर चीज़ से समझौता कर सकता है. अपनी महिला सहकर्मी की आबरू से भी. उसके साथ जब कुछ ग़लत होता है तो वो कुछ बोलता नहीं. उस क़िरदार को देखकर अहसास होता है कि जब आप आत्मसम्मान को ताक पर रख देते हैं तो झुक जाना कितना आसान हो जाता है. और कई बार व्यावहारिकता के नाम पर हम उसे कितनी आसानी से जस्टिफाई कर जाते हैं. अनारकली के पास भी झुक जाने और महलों की ज़िंदगी जीने का मौका है लेकिन उसने अपनी मां को इसी तरह झुक जाते और एक दिन बेवजह मर जाते देखा है. जब झुक कर भी मरना ही है तो क्यों ना आत्मसम्मान के साथ जीतेजी मरने से खुद को बचा लिया जाय. कई बार केवल गाल पर तमाचा मारना नाकाफ़ी रह जाता है. कई बार तमाचा वजूद पर भी मारना पड़ता है.  ‘पइसा भी रखेंगे और ‘देंगे’ भी नहीं, झाड़ी में दम है तो लेके दिखा दीजिये’ , अनारकली का यही खांटी जज्बा फिल्म को यादगार बना देता है. 

इश्तियाक खान का हीरामन का किरदार भी फिल्म में उसकी मानवीय ऊष्मा के लिए याद रह जाता है. एक कलाकार का मुरीद जो उसके बुरे समय में काम आता है. एक ‘मार्केटिंग मैनेजर’ जिसके अन्दर इतना भावनात्मक लगाव है कि वो एक कलाकार की मजबूरियों से दुखी होकर उसके आंसू तक साझा कर सकता है. दिल्ली जैसे बाज़ार केन्द्रित शहर में इस भावना का ज़िंदा रहना (फिल्म में ही सही) एक सुखद एहसास देता है.

फिल्म में जो डीटेलिंग है वो उसमें एकदम मौलिक ह्यूमर का तड़का भी लगाती है. मसलन पुलिस चौकी में विजयदशमी के दिन कृष्ण की तस्वीर लगाने पर सिपाहियों की आपसी खींचातानी या फिर वीसी को गुलदस्ता भेंट करते हुए साथ में पानमसाला भी पकड़ाना, या फिर चमकीले धागों से लपेटकर ढंकी गयी शराब की बोतल. ऐसी छोटी-छोटी बातें उस लोक की अच्छी झलक देती हैं जिसपर पूरी फिल्म की आधारशिला रखी गई है.     

कुलमिलाकर ‘देसी तंदूर-बिदेसी ओवन’ अनारकली आरा हमारे समाज की अनारकलियों के जीवन को एक बाहरी की तरह देखने के बजाय उनके अंतर्मन तक पहुंचाती है. ये फ़िल्म हमारे समाज के दुनाली-धारियों की दुनाली में लगी उस जंग को दिखाती है जिसे गोली खाने के डर से हमारा डरा हुआ समाज देखकर भी अनदेखा कर देता है. लेकिन हमारे ही बीच की कोई अनारकली उसे ज़रा घिसती है, तनिक रगड़ती भी है और ज़रुरत पड़ने पर उस दुनाली को पकड़कर उसी पर तान देती है जो उसकी धौंस में उसके इंसानी आत्मसम्मान के हक़ की हत्या कर रहा होता है.

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