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1411- बाघों के नाम

आज के दौर में जंगल उदास हैं

और वो लड़की जो बाघ की खाल से बना फर पहनकर

शीशे में देख मुस्कुरा रही है

हमें जंगली सी दिखती है।

पर ये उस दौर की बात है

जब जंगल उतने जंगली नहीं थे

न ही आदमी उतना शहरी।

जब एक दहाड़ सुनाई देने पर

अक्सर कहते थे गांव के लोग

कि बाघ आ गया।

हम सुनते थे अपने पापा से बाघ के किस्से

कि कैसे उस रोज आया था बाघ

हमारे शेरा को ले जाने

और पापा ने किया था टौर्च लेकर पीछा

हम आज तक पापा के किस्से से उपजे

उस रोमांन्च को नहीं भूले हैं

जिसे याद कर सिहर जाती है रुह आज भी।

उस रोज गांव जाने पर ताउजी ने बताया था

कि शेरा को बाघ ले गया

तो बहुत गुस्सा आया था बाघ पर।

कल्पनाओं में तैरती सी बही जाती थी

बाघ की छंलांगे

और तब तब सुनाई देती थी

जंगलों को कंपा देती उसकी गर्जनाएं।

कैसे तो बाघ हो जाता था उस लमहे में

किस्सागोई का रोमांचकारी अनुभव।

कि कैसे उस दिन

हमारे छोटे से कस्बे में

हुई थी बाघ पर विजय की वो यात्रा

आगे आगे ट्रक पर लदा बाघ का पिंजरा

और पीछे पीछे सैकड़ों की तादात में जुटे हुए लोग

अब तलक जिन्दा है हमारी आंख में

बाघ की निर्भय आंखों का वो अक्स।

पर एक दिन हमने देखा

कि बाघ मरा हुआ रखा है

मवेशियों के अस्पताल में

उस दिन उसकी आंखों में बहुत पास से देखा था

कि हम सभी की मौत के जैसे ही

कुछ खाली सा कर देती है उसकी मौत भी

और उस खालीपन में भरने लगती है

एक खास किस्म की उदासी।

उस रोज किसी ने नहीं कहा था

कि घट रही है उनकी तादात

पर आज जबकि बाघ की जीवन यात्रा

छूं रही है अपना अन्तिम पड़ाव

तेा आ रहा है समझ

घट जाने की उस घटना का दर्द भरा मतलब।

हजार की तादात जैसे जैसे कमती जा रही है

खत्म होते लग रहे हैं

बाघ ही नहीं

कई किस्से, कई रोमांन्चक अनुभव

जंगली उदासी को पाटते

निर्भय आंखों के कई अक्स

पापा गांव छोड़कर कस्बे में रहने लगे हैं

और हम कस्बे से आ गये हैं शहर में

और इस बीच

बाघ जो जिन्दा था हमारे आस पास

पापा के सच और हमारी कल्पनाओं में,

ले रहा है इतिहास के गर्भ में अपनी अन्तिम संास

हमें रोकना ही होगा इस गर्भपात को

ताकि न कह सके आने वाली पीढ़ी

कि शहरी होना जंगली होना भी नहीं होता।

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1 Comment on "1411- बाघों के नाम"

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thefemaleme
Guest

very thoughtful and profound!