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हत्याओं के प्रतिशोध से गुजरता हाइवे

एन एच 10 के एक दृश्य में मीरा (अनुष्का शर्मा) हाइवे के किसी ढाबे के गंदे से टॉयलेट के दरवाज़े पर लिखे उस एक शब्द को मिटाती हैं- रंडी. हमारे समाज के एक बड़े हिस्से की मानसिकता उसी गंदे टॉयलेट के सड़े-गले टीन के दरवाज़े की तरह ही है. एनएच 10 उस एक गीले कपड़े की तरह उस मानसिक गंदलेपन को पोंछने की एक अच्छी कोशिश करती है. फिल्म हाइवे पे तो निकलती है लेकिन ऐसी पगडंडियों को नमूदार करते हुए जिनके इर्द-गिर्द आज भी एक कट्टर मर्दवादी सामंती समाज रहता है. एक ऐसा समाज जहां बहन से प्यार करने वाले लड़के के सीने में गोली दाग देने से भाई की इज्ज़त छोटी हो जाती है. उसे नग्न क्रूरता के साथ सरिये से छेद देना ही मर्दों वाली बात है. आप ये बात समझते हैं तो आप मर्द हैं और नहीं समझते तो आपके पीछे कोई मामा खड़ा होगा जो ये बात आपको अच्छे से समझा देगा.

मुझे एक दृश्य याद आता है. किसी फिल्म से नहीं, निजी ज़िंदगी से. हम राष्ट्रीय नाट्य अकादमी के थियेटर फेस्टिवल से कार से लौट रहे हैं. सामने की सीट पर दो महिलाएं बैठी हुई हैं. पीछे बैठा मैं उनसे बात कर रहा हूं. हम सीपी के आसपास गुडगाँव की तरफ जाने वाला रास्ता ढूंढ़ते हुए कुछ देर भटके हैं. कार ने एक ही गोलचक्कर पर दो चक्कर काट लिए हैं. कि तभी ठीक दाहिनी ओर ड्राइविंग करती महिला की बगल की खिड़की की तरफ सड़क पर दो बाइक-सवार नमूदार होते हैं. काला चश्मा पहनी हुई लड़की को गाड़ी चलाता देख बाइक सवारों की रफ़्तार डगमगा जाती है. बाइक खिड़की के बगल में मंडराने लगती है. दोनों में से पीछे बैठा लड़का एक कमेन्ट मारता है. कमेन्ट की साफ़ साफ़ आवाज़, बंद खिड़की को भेद नहीं पाती लेकिन उस हावभाव से सब बयां हो जाता है. वो कुछ देर गाड़ी के आगे पीछे मडराता है फिर उसकी नज़र पीछे जाती है. पीछे एक मर्द को देखकर उसका उत्साह शायद कुछ कम होता है. और फिर सीपी के गोलचक्करों के बीच वो मर्दद्वय कहीं गुम हो जाता है. ये दिल्ली के सीपी में होता है, ‘गुडगाँव के उस आंखरी मॉल के ख़त्म होने के बाद’ नहीं जहां से ‘डेमोक्रेसी ख़त्म हो जाती है’.

फिल्म ‘एनएच 10’ में रोहतक से गुजरते हाइवे पर अपनी पत्नी मीरा के सामने दुसरे मर्द से  तमाचा खाने से सदमे में आया अर्जुन जब पिस्टल निकालकर गाँव वाले कसाइयों को तमीज़ सिखाने की बात करता है तो मेरी नज़रों के सामने देश के महानगर का सबसे व्यस्त और पॉश इलाका सीपी घूमने लगता है. और समझ आता है कि टॉयलेट चाहे हरियाणा के गावों से गुजरते हाइवे के किनारे ढाबे का हो या फिर दिल्ली के किसी सीपी का, उसके दरवाज़े पर लिखे को पोंछने के लिए एक गीला कपड़ा हर जगह चाहिए.

फिल्म के तकरीबन आख़री दृश्य पर गौर करें. जब अपने सामने अपनी बहन और उसके पति की हत्या कर चुकने के बाद मीरा के पति को भी मार देने वाला सतबीर (दर्शन कुमार) मीरा के हमले के बाद बाइक से गिरता है. उसके सामने उसके मामा की लाश है. उसका एक पैर बुरी तरह ज़ख़्मी है. वो रेंगते हुए सहारे के लिए दीवार की तरफ जाता है. और इधर मीरा सिगरेट निकालती है, उसे माचिस से सुलगाती है और वहीं एक घर की दहलीज़ पर बैठकर अपने सामने लाचार रेंगते सतबीर को एक ख़ास भाव से देखती है. यही ख़ास भाव पूरी फिल्म का तत्व है. यही ख़ास भाव जो बहुत विरला है. हमारी फिल्मों से, हमारे समाज से और हमारी सोच से तकरीबन गायब. और फिर उस सतबीर की नज़र को देखिये जो दर्द के आगोश में होने के बावजूद धुआं उड़ाती उस ‘औरत जात’ की आत्मविश्वास से सराबोर निगाहों की तरफ देखती है.. उनमें एक हारता हुआ सा मर्दवादी दंभ है.. धीरे धीरे जलती राख में तब्दील होती सिगरेट सा दंभ जो मीरा के होंठों में दबी है, पैरों से कुचले जाने को तैयार..

इस फिल्म में अपने सामाजिक व्यक्तित्व के अलग-अलग स्तरों पर खड़ी चार महिलाएं हैं. पहली मीरा, जो पढी लिखी है, बड़ी कंपनी में नौकरी करती है.. आत्मनिर्भर है इसलिए आत्मविश्वास से लवरेज है.. उसके पास अर्जुन जैसा पति है जिसका मर्दवादी दंभ कहीं है तो पर दबा कुचला.. जो एक थप्पड़ खाने पर इस हद तक जाग जाता है कि अपनी और अपनी पत्नी की सुरक्षा को दांव पर लगा देता है. मीरा जो अपनी सुरक्षा के लिए उस पर निर्भर तो है पर उसकी ज़िंदगी से अलग अपने लिए स्पेस निकाल पाने में समर्थ है और इतनी काबिल भी कि कठिन परिस्थिति आने पर वो सबकुछ अपने हाथ में ले सकती है..सबकुछ अकेले संभाल सकती है.. और तमाम मर्दों को परास्त कर अपने मरे हुए पति की ह्त्या का बदला ले लेना भी वो जानती है… वो महिला जो किसी भी परिस्थिति में टूटती नहीं.. गाली का जवाब गाली से देना जानती है..

एक पिंकी है जो एक अपराध करती पकड़ी गई है.. प्यार करके शादी कर लेने का अपराध.. वो अपने हिस्से का साहस कर चुकी है और साहस को दिखाने की सजा भुगतते हुए अपने ही भाई के हाथों वो एक त्रासद मौत मर जाती है. उन हज़ारों साहसों की लाशों की एक प्रतिनिधि जिनकी अर्थी भी पुरुषप्रधान समाज के कन्धों पर नहीं चढ़ती… सलाखों से क्षत-विक्षत वो किसी हाईवे के किनारे गड्ढों में, नालियों में, कुओं में कहीं दफन हो जाती हैं, जिन्हें शमशान भी नसीब नहीं होता और उन्हीं लाशों के इर्द-गिर्द अपने धर्म और संस्कृति पर गर्व करता एक राष्ट्र विकास की बातें करता डेमोक्रेसी की ऐसी की तैसी कर रहा होता है.

एक सरपंच (दीप्ति नवल) भी है वहां.. जो महिला तो है वर पुरुषवादी समाज में रची-बसी, उसी सोच में पली. उसकी लड़की ने उसे कहीं का नहीं छोड़ा इसलिए उसके बेटे ने उसे इस दुनिया में नहीं छोड़ा. ‘चार गए थे और दो कम लौटे’ इसपर अपने बेटे को एक छोटी सी झिड़की भर देकर वो एक लड़के की मां का उत्तरदायित्व पूरा कर लेती है. उसका लड़की की मां होने बोध तभी मर जाता है जब वो अपनी मर्ज़ी से शादी कर लेती है. और एक औरत होने का उसका बोध वही है जो एक पुरुषवादी समाज में रह रही एक परम्परावादी औरत का होता है. माने ‘लड़की’ थी, (उसका, बेटे ने) जो करना था, सो करना था.

पिंकी की बहन एक अलग स्तर पर है. वो आज़ाद होना तो चाहती है, पर उसकी अपनी सीमाएं हैं. वो भाग जाने की तैयारी में है पर भाग नहीं पाती. पिछले बीस साल से वो उस चाहरदीवारी को फांद नहीं पाई जहां उसका जीवन तो है पर उसकी मर्जी नहीं. यही कारण है कि वो मीरा को गाड़ी की चाभी देने से पहले कहती है- “अब देर मत कर, जल्दी भाग जा यहां से”. हमारे अगल-बगल ऐसी कई चाहरदीवारियां हैं जिनमें सतबीर जैसों ने कई पिन्कियों को क़त्ल कर दिया है और कई पिंकी की बहनें दासता में जीती पल-पल मर रही हैं. और पूरा समाज उस गाँव  की तरह मंच पर औरतों के नाच का लुत्फ़ उठाने में मशगूल है.

एनएच 10 में औरत और मर्द के द्वंद्व के इर्द-गिर्द गाँव-शहर का द्वंद्व है, आधुनिकता और परम्पराओं का द्वंद्व है. सामंती समाज और उससे जूझते व्यक्तिवाद का द्वंद्व है. और इस द्वंद्व के अगल-बगल एक अच्छी कहानी है, अच्छी पटकथा है, अच्छा निर्देशन है और शानदार अभिनय है. साथ ही स्थानीय लोगों की मिलीभगत और प्रावासियों के डर को भी फिल्म प्रभावी तरीके से छूकर निकल जाती है. फिल्म रूपकों में बात करते हुए भी एकदम सपाट संवाद करती है. अपने मूल विषय पर एकदम गहरे जाकर बात करती है. इसलिए किसी भी जगह पर न उबाऊ लगती है और ना ही भाषण देती हुई.

इससे पहले आई हाइवे और क्वीन सरीखी फ़िल्में भी औरत की अस्मिता के सवाल से गुजरती हैं. एक हद तक दम लगाके हाईसा भी इसी सवाल पर बात करती है पर एनएच 10 एकदम डंके की चोट पर इस सवाल को उठाती है. ख़ास बात ये है कि इस फिल्म की नायिका एक हारी हुई औरत नहीं है, न ही उसे जीतने के लिए एक पुरुष के सहयोग की ज़रुरत पड़ती है. वो मजबूरी पड़ने पर ही सही, सब कुछ संभाल लेने की कुव्वत रखती है. भारतीय सिनेमा में ऐसी नायिकाएं गढ़ने का चलन धीरे-धीरे आ रहा है. ऐसी फिल्में कम बन रही हैं, पर बन रही हैं, जो नायक के प्रभुत्व वाले सिनेमा को दरकिनार करते हुए नायिकाओं को अपने केंद्र में ला रही हैं. और ऐसा करते हुए औरतों की अस्मिता के सवालों पर बहस खड़ी कर रही हैं. जहां नायिकाएं बस आई-कैंडी भर नहीं हैं. ये फिल्में हमारे सिनेमा के लिए अच्छी खबर की तरह हैं. सिनेमा का ये बदलाव समाज को बदलने में कितनी भूमिका निभाएगा ये कहा नहीं जा सकता.

इस हाइवे से गुजरना कई तरह की मनोदशाओं से गुजरते हुए आखिर में उम्मीद की पगडंडी पा लेने सा अनुभव है. हाइवे से लगी पगडंडी के इस छोर पर भोगे हुए को भूलकर दूसरे छोर की तरफ बढ़ने की एक बहुत बारीक सी उम्मीद

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