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सिने सफर मुख्तसर- भाग 1

मोहल्ला लाईव, जनतंत्र और यात्रा बुक्स द्वारा आयोजित बहसतलब का पहला दिन कुछ सार्थक बहसों के नाम रहा । अविनाश दास ने कार्यक्रम की रुपरेखा रखी और फिर मिहिर पान्डया के संचालन में कार्यक्रम ने रफतार पकड़नी शुरु की। अभी गाड़ी स्लो पेस में थी। सफर शुरु हुआ ही था। सिनेजगत की उपरी सतहों से शुरु होकर उसकी गहराईयों में उतरता एक बातचीत का सफर जिसमें एक साथ परदे के पीछे अपनी भूमिका अदा करने वाले निर्देशक भी थे, परदे के दूसरी ओर उनकी फिल्मों में अपनी जिन्दगी का अक्स तलाशते दर्शक भी थे और परदे पर उस पूरे सिने संसार की परिभाषाओं को अपने विश्लेषण से गढ़ते मीडियाकर्मी भी।

बात अजय ब्रहमात्मज ने शुरु की। उन्होंने कहा कि भारतीय सिनेमा के साथ एक बड़ी दिक्कत ये है कि हिन्दी की फिल्मों का विमर्श अंग्रेजी में होता है जिससे एक बड़ा पाठक और दर्शक वर्ग इस विमर्श के अहाते से स्वतह बहिस्कृत हो जाता है। ये सिनेमा में एक तरह से भाषाई शेंध मारने जैसी बात है। हमारे देश में संस्कारों की बात अन्य क्षेत्रों में भले होती हो पर सिने संस्कार का यहां एक भारी अभाव है। सिनेमा जगत में और उससे जुड़े मीडिया में स्टार एक महत्वपूर्ण फिनोमिना की तरह है जिसकी चर्चा और पब्लिसिटी करने का दबाव सिने और मीडियाकर्मियों पर लगातार बना रहता है। यह एक गम्भीर समस्या है कि जो बात मुम्बई में कुछ गिनेचुने और खास लोगों के बीच तय की जाती है उसका प्रचार प्रसार करना एक तरह की मजबूरी हो जाता है। उन्होंने कहा कि बेहसतलब का ये प्रयास सलीके से पड़ा एक ठोस कदम है। और खास बात ये है कि यहां हिन्दी में सवालों को सुनकर अंग्रेजी में जवाब देने वाले लोग नही हैं।

कार्यक्रम के इस सैशन का असल मुददा ये था कि बालिवुड की कंटेंट फक्टी की लगाम किसके हाथ में होनी चाहिये। इस विषय पर सबसे पहले अनुराग कश्यप ने अपनी बात रखी। अनुराग ने कहा कि वो खुद यही मानते हैं कि अन्ततह चाहे कुछ भी हो लेकिन मूलतह कंटेट का निर्धारण खुद निर्देशक के हाथ में ही होता है। फिर उस कंटेंट की मूल आत्मा कितनी जिन्दा रह पायेगी ये इस बात पे निर्भर करता है कि प्रोडयूसर का पेट कितना कमजोर या मजबूत है माने ये कि अगर प्रोडयूसर के पास ठीक ठाक पैसा है तो आपका मूल तत्व ज्यादा सफर नहीं करेगा और यदि वो कम पैसे वाला है तो तय मानिये कंटेट क्या से क्या हो जायेगा और आप देखते रह जायेंगे। ये बात मान लेनी चाहिये कि सिनेमा एक खर्चीला आर्ट फौर्म है जो किसी दूसरे के पैसे से बनता है। यहां निर्देशक के फिल्मनिर्माण के बीते हुए कल से निर्धारित होता है कि उसे आगे काम मिलेगा भी कि नहीं। अगर वो फिल्म में लगे पैसे की रिकवरी का माददा रखता है तो ही उसे अगले प्रोजेक्ट के लिये पैसा मिलेगा वरना नहीं। इन साफ सुथरे आर्थिक समीकरणों से राम गोपाल वर्मा जैसे निर्देशकों को फायदा मिलते हमने देखा है। एक और बात जो ये निर्धारित करती है कि आपका मूल कंटेट कितना बदलेगा वो ये कि आपकी फिल्म का बचट क्या है। अगर बजट कम है तो सम्भव है आपको अपने मन का काम करने दिया जाये लेकिन अगर फिल्म बड़े बजट की है तो कंटेट की कमान आपके हाथ से फिसलना तय है। फिल्मों में कंटेट का स्तर गिरने की एक अन्दरुनी वजह और है। वो है इन्टरमिसन। जैसे ही फिल्म मध्यान्तर तक पहुंचती है दर्शक को एक हाई पाईट चाहिये होता है। वरना वो मध्यान्तर के बाद फिल्म क्यों देखना चाहेगा। ऐसे में फिल्म में जरुरी हो जाता है कि दो हाई पाईंट रखे जांयें। और इस चक्कर में कंटेंट से समझौता करना पड़ता है। दिक्कत यही है कि सिनेमा एक व्यापार है कोई आर्ट फौर्म नहीं। ऐसा नही है कि केवल भारत में फिल्मों के लिये पैसे की दिक्कत हो। विदेशों में भी ये दिक्कत है लेकिन वहां लोग सब्सिडी, ग्रांट आदि जुटाकर फिल्में बना लेते हैं। हमें यथार्थ को स्वीकारना होगा। अब 5 साल की गारंटी वाला कल्चर नहीं रहा बल्कि 1 साल की वारंटी का दौर है। आज फिल्म देखना इवेंट नहीं है। अगर अपने मन की फिल्में बनानी हैं तो हमें तरीके तलाशने होंगे। मैने कई फिल्मों की स्क्रिप्ट झूठ बोलकर पास करवाई हैं। ऐसा नहीं है कि निर्माता बिल्कुल पैसा लगाने को तैयार ही नहीं हैं लेकिन उन्हें कन्विन्स करने की जरुरत है। मुझे बिहार बिहार के रुरल अन्डरवर्ड पर फिल्म बनाने के लिये 16 करोड़ रुपये मिल रहे हैं। उड़ान फिल्म से मैने बिल्कुल पैसा नहीं कमाया। लेकिन एक निर्देशक के रुप में मुझे तय करना होगा कि या तो मुझे पैसा कमाना है या मुझे अच्छी फिल्म बनानी है। आज फिल्म को सस्टेन रहने के लिये समय नहीं मिल रहा। अगर हमें चीजों से लड़ना है तो बदलाव को समझना होगा। नई तकनीक को समझना होगा। मोबाईल फिल्मिंग के दौर में महज 3 3 मिनट की फिल्मों के लिये मुझे इतना पैसा मिल रहा है जितना मैने अपनी फुल लेंथ फिल्मों से नहीं कमाया। ऐसे में मैं ये नहीं कह सकता कि सम्भवनाएं कम हो गई हैं या खत्म हो रही हैं। बस अवसर को समझना जरुरी है।

बात आगे बढ़ी। जयदीप वर्मा को माईक मिला। जयदीप वर्मा यानी 2008 में आई फिल्म हल्ला के निर्देशक। हाल ही में बिग सिनेमा द्वारा देश के महानगरों में पहली बार रिलीज की गई  डौक्यूमेंटी लिविंग होम के निर्देशक। डौक्यूमेंटी इंडियन आशन बैंड पर बनी थी। जयदीप ने बड़ी नकारात्मक शुरुआत करते हुए कहा कि यह दौर भारतीय सिनेमा का सबसे खराब दौर है। भारत जैसे विविधताओं वाले देश में फिल्मों की कहानियों में कोई विविधता नही दिखाई देती ये हैरान करने वाली बात है। हमारी फिल्मों की कमान तो विर्माताओं के हाथ में है लेकिन फिल्म के कंटेट के प्रति उनकी कोई जिम्मेदारियां तय नहीं है। अच्छा होता कि निर्माताओं को भी अच्छी बुरी फिल्मों पर पुरस्कार या आलोचना के दायरे में रखा जाता ताकि उनकी नीयत कुछ तो बदलती। कभी एनएफडीसी जैसे संस्थान जो कभी फिल्में बनाने में रुचि दिखाते थे उनकी अब न फिल्मों में रुचि ही है न ही उस विभाग में इतनी काबिलियत। ये दौर एक तरह का इन्टलैक्चुअल कोलोनाईजेशन का दौर है हम इस साम्राज्यवादी किस्म की सभ्यता में अपने प्रोडक्ट को इन्फीरियर समझते हैं इसलिये हम बाहरी फिल्मों की नकल करते है और हमारी कहानियां फिल्मों में नहीं आ पाती। हालत ये है कि जिनके पास फिल्में फंड करने के लिये पैसा है वो अच्छे कंटेंट पर हंसते हैं। हमारी फिल्में स्टाईल के बूते बनने और चलने लगी हैं कंटेंट कहीं गुम सा है और इसी वजह से स्टोरी टैलिंग की बात परिदृश्य से गायब हो गई सी लगती है। ये एक ऐसी पढ़ी है जो कि अपनी पिछली सभी पीढ़ियों से ज्यादा मूर्ख है। उपभोक्ता उत्पाद की प्रवृत्ति फिल्मों में घुस गई है। ऐसी फिल्मों को प्रोत्साहन देने की प्रवृत्ति घटी है जो अच्छी हैं पर छिपी हुई हैं। विष्लेशकों और लेखक पत्रकारों का सहयोग इसके लिये बहुत जरुरी है। अक्सर फिल्मों की समीक्षाओं में देखा जाता है कि समीक्षक फिल्म को नीचा दिखाने में पूरी मेहनत झोंक देते हैं। जो लोग मेहनत करके फिल्में बनाते हैं उन्हें इज्जत दी जानी चाहिये।

बहस के सिलसिले में अब बारी थी पीपली लाईव की निर्देशक अनूशा रिजवी की। अनूशा ने शुरु में ही सवाल किया कि अगर कोई निर्माता फिल्म बनाने में रिस्क नहीं लेना चाहता तो फिल्म का स्वामित्व उसके हाथ में क्यों हो। फिल्मों की लोकप्रियता को लेकर किये जाने वाले शोध की असलियत ये हैगिनी चुनी दस बारह कम्पनियां चार पांच बड़े शहरों में अपने सर्वे कराती हैं और उससे ही ये निर्धारित कर लिया जाता है कि कौन सी फिल्म चलेगी कौन सी नहीं। दूसरी बात ये की निर्देशकों के पीआर से फिल्मों का कंटेंट निर्धारित किया जाने लगा है।

अनूशा के बाद महमूद फारुकी ने अपनी बात रखते हुए कहा कि हम इस मायने में भाग्यशाली हैं कि हमें अन्य फिल्मकारों की तरह अपनी फिल्म बनाने के लिये निर्माताओं के चक्कर नही काटने पड़े। इस मायने में पीपली लाईव की यात्रा अन्य फिल्मकारों की यात्रा से अलक और कम कष्टप्रद है। कला की समस्याएं पिछले तीस सालों से वहीं की वहीं हैं। दरअसल सिनेमा विजुअल मीडिया का एक छोटा सा हिस्सा है। ऐसे में फिल्म की सफलता केवल इस बात से निर्भर नहीं होनी चाहिये कि वो थियेटर में कितने दिनों तक चलती है।

बहस की अगली कड़ी बने सुधीर मिस्र जिन्होंने हजारों ख्वाहिसें ऐसी और खोया खाया चांद जैसी फिल्मों का निर्देशन किया है। उन्होंने कहा कि ऐसे लोगों के लिये फिल्म इन्डस्टी में ज्यादा समस्याएं हैं जिनका कन्टेंट कम लोगों को प्रभावित करता है। मुझे एक निर्माता ने सलाह दी थी कि मैं अपने चाहने वालों से निजात पा लूं। अगर फिल्मों के लिये लोगों में इज्जत खत्म हो रही है तो केवल इस वजह से कि हमने ऐसी फिल्में बनाई ही नहीं जिनकी इज्जत की जा सके। फिल्म के कंटेंट की लगाम अपने हाथ में लेना एक निर्देशक की जिम्मेदारी होनी चाहिये। इसके लिये उसे लड़ना पड़ेगा। वरना फिल्म ना बनाने के बहाने बहुत हो सकते हैं।

निर्देशकों के अपने अनुभवों के बाद अब बारी थी हस्तक्षेप की। हस्तक्षेप के सिलसिले की शुरुआत करते हुए अतुल तिवारी ने कहा कि भारतीय सिनेमा कोई मोनोलिथ नही है इसके कई रुप हैं। जिसदिन कन्टेन्ट की लगाम दर्शकों के हाथ में चली जायेगी उस दिन मुन्नी सचमुच बदनाम हो जायेगी। कोर्पोरेट का संसार जिसके हाथ में कंटेंट की लगाम चले जाने की बात उठती रही है वो एक ऐसी दुनिया है जिसका अपना कोई चेहरा ही नहीं है। ऐसे में उसकी जिम्मेदारी कैसे तय की जा सकती है। सिनेमा अन्य आर्ट फोर्म की तरह नही है जिसकी लगाम किसी एक व्यक्ति के हाथ में हो सकती हो। कभी सिनेमा एक परिवार हुआ करता था। अब वो घर नही रहा बल्कि बाजार हो गया है। माल मल्टीप्लेक्स के इस समय की मूल परेशानी यही है कि भूखे नंगों की फिल्में दिखाई गई तो उन्हें देखकर कोई समोसा नही खा सकेगा।

हस्तक्षेप की दूसरी कड़ी में भूपेन ने अपना हस्तक्षेप दर्ज करते हुए कहा कि फिल्मों में पूंजी लगाने वालों के विकल्प की जरुरत है। सरकार के उपर फिल्मों पर पैसा लगाने का दबाव होना चाहिये। सरकार से इसके लिये मांग की जानी चाहिये। मैने सईद मिर्जा का एक इन्टरव्यू किया था जिसमें उन्होंने कहा था कि शहरों में फिल्में दिखाने की कोई सरकारी व्यवस्था भी होनी चाहिये। ये बात तय की जानी चाहिये कि फिल्म किस स्तर की संवेदनशीलता की फिल्म है। फिल्में बनाने वालों में उच्च जातियां, हिन्दू और उंचे वर्ग के लोग हावी हैं इसलिये हर तबके की कहानियां वहां नही आ पाती।

बहस के क्रम में अपनी बात रखते हुए एनडीटीवी के रवीश कुमार ने कहा कि ऐसा नहीं है कि स्थानीय सिनेमा पर पैसा नहीं लग रहा। बात इतनी सी है कि वहां हमारी नजर नहीं पहुंच रही। लेकिन मेनस्टीम सिनेमा में ऐसी फिल्में नहीं बन रही जिसमें हमारा जीवन हो। एक दर्शक के व्यक्तित्व में कई तरह के दर्शक छिपे होते हैं। वह एक साथ बहुत तरह की चीजें देखना चाहता है। ऐसे में सफलता की गारंटी तभी मिल सकती है जब कोई फिल्म उस एक दर्शक की बहुत किस्म की चाहतों में से अधिकतम को संतुष्ट कर सके। कौर्पोरेट का दबाव इसलिये फिल्मों में बढ़़ा है क्योंकि फिल्मों की पकड़ दर्शकों के बीच कमजोर हुई है।

पत्रकार और स्तम्भकार शेष नारायण सिंह के सवाल कि पिंजर जैसी फिल्म क्यों तूफान नहीं मचा पाई पर अनुराग ने कहा कि क्योंकि दर्शकों ने इसे देखा ही नही। मेरी कोई फिल्म आजतक सुपरहिट नहीं गई फिर भी मैं अपना अस्तित्व बर्करार रख पाया हूं तो केवल इसलिये कि हमें जिन्दा रखने के लिये टेलीवीजन जैसे माध्यम हैं जो समय समय पर हमारी फिल्मों को दिखाते हैं। सुधीर ने इसके जवाब में कहा कुछ फिल्में दर्शकों के साथ धीरे धीरे रिस्ता बनाती हैं। पिंजर पर इतने समय बाद आज भी सवाल किये जाते हैं तो केवल इसलिये क्योंकि उसका दर्शकों के साथ एक गहरा रिस्ता है। ऐसी फिल्में ही कालजयी होती हैं। जरुरी नहीं है कि उनको तात्कालिक रुझान मिले। पर वो समय के साथ दर्शकों में अपनी पैठ बना लेती हैं।

बहसतलब के दूसरे सत्र में फिल्मों में स्त्री पुरुष सम्बन्धों पर चर्चा हुई। इसी सत्र में बात यह भी आई कि फिल्मों में प्यार की अभिव्यक्ति के लिये क्यों हमें अंग्रेजी की मदद लेनी पड़ती है। हिन्दी की गालियों क्यों में अश्लील मालूम होती हैं जबकि अंग्रेजी की गालियों में वो अश्लीलता नजर नहीं आती। इस सत्र में सुधीर मिस्र ने अपनी बात रखते हुए कहा कि आदमी और औरत के रिश्ते के बारे में मैं यही कह सकता हूं कि वो होना चाहिये। हिन्दुस्तानी सिनेमा में इस रिश्ते के लिये अच्छा स्कोप दिखता है। क्योंकि यहां वो रिश्ता मुमकिन है। उसकी अहमियत है। इस रिश्ते को गुरुदत्त, गुलजार, राजखोसला आदि फिल्मकारों ने बड़ी खूबसूरती के साथ दिखाया है। हिन्दुस्तानी सिनेमा के स्वरुप में इसके लिये काफी जगह है। फिल्मी गाने इस जगह को बखूबी भरते मालूम होते हैं। वहां इस रिश्ते में एक ठहराव है।




विनोद अनुपम
ने कहा कि आज फिल्मों में मुख्य बात यही सामने आती है कि स्त्री कितनी स्वतंत्र और पुरुष कितना अराजक है। उन दोनों के बीच बस एक ही तरह के रिश्ते की बात फिल्मों में आती है। फिल्मों से देवर भाभी, मां बेटा, भाई बहन जैसे रिश्ते गायब हो गये हैं। कोई भी रिश्ता अराजक तब होता है जब हम अकेले हो जाते हैं। अब हमें इन रिश्तों के बारे में ये तय करना है कि इस तरह के रिश्तों पर नियंत्रण की जरुरत है या हम इस अराजकता का सम्मान करने के लिये तैयार हैं। जादू है नशा है जैसे मशहूर गीत के रचयिता 


नीलेश मिस्र ने कहा कि टीवी पर स्त्री पुरुष सम्बंध और फिल्मों में दिखाये जाने वाले स्त्री पुरुष सम्बंध दोनों में किन्हीं दो ब्रहमांडों का सा अन्तर है। और इनमें टीवी पर दिखाये जाने वाले सम्बंध वास्तविकता के ज्यादा नजदीक हैं। फिल्मों में असली लोग हमारा रिफ्रेंस नहीं रहे हैं। हम अपने रिश्तों में कहीं अकेले और फलतह बहुत डेस्पिरेट हुए जा रहे हैं। इस क्रम में मराठी फिल्मकार दिनेश  ने बात आगे बढ़ाते हुए कहा कि मेरे आसपास की दुनिया अकेले पड़ते लोगों की दुनिया है। हमारे पास प्यार को व्यक्त करने के लिये अपनी भाषा नहीं है। हम क्यों इतने सुसंस्कारित हैं कि प्यार जैसी भावना तक को सही से व्यक्त नहीं कर पाते। हम अपने कपड़ों के भीतर छिपी सच्चाई के लिये क्यों इने छिपे हुए हैं। मुझे लगता है कि प्यार की अभिव्यक्ति के प्रति पनपे इस पलायनवाद से बाहर आने की जरुरत है।

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4 Comments on "सिने सफर मुख्तसर- भाग 1"

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anjule shyam
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lajwab riporting…
ab mujhe sochna padega main kis andaz mein riporting karun……behtrin…

आशीष कुमार 'अंशु'
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सुन्दर रिपोर्टिंग

मुन्ना के पांडेय(कुणाल)
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acchi rapat ..umesh …badhai.:-))

addictionofcinema
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badhiya reporting aur usase bhi achha hai apke blog ka layout. waise sudhir mishra jane bhi do yaro ke nirdeshak nahi the, uske nirdeshak kundan shah the.
Vimal C Pande