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सिनेमाथैक पर ईदियां…..

कश्मीर को इस पूरे दौर में एक ऐसे प्रान्त के रुप में देखा, समझा और महसूस किया गया है जो किसी देश से जुड़ने और अलग हो जाने के बीच ऐसे पिस रहा है जैसे दो पाटों के बीच कोई परम्परा पिस रही हो। जैसे अलग होने और अपना साबित करने के बीच की ये लड़ाई अपने राजनैतिक, धार्मिक और भौगोलिक कारणों के वजहकर कभी खत्म ही नहीं होगी। चलती रहेगी। इस लड़ाई पर हर तरह के लोग अपनी प्रतिक्रिया देने से नहीं चूकते। लेकिन इन हर तरह के लोगों में ऐसे लागों की तादात ज्यादा है जो उस जददोजहद को बाहर से देख रहे हैं। उसे जी नहीं रहे। इस जददोजहद के बीच सब अपनी अपनी रोटियां सेंक रहे हैं। लेकिन कुछ ऐसे लोग जो वहां की जिन्दगी जी रहे हैं उनके अपने भीतर कोने हैं।


 इस बार के सिनेमाथैक के सैशन में प्रदर्शित इरफान, अमन और अफरोज की एक फिल्म ईदियां इन भीतर कोनों की एक बेहद अंतरंग झलक हमारे सामने पेश करती है। इरफान कश्मीरी हैं और उनके बांकी दो साथी उनके साथ कश्मीर जाकर उन भीतर कोनों की झलक लेकर आये और उन्होंनो मिलकर ईदियां बनाई। तीनों की डिप्लोमा फिल्म ईदियां 19 मिनटों में एक ऐसी मां की कहानी कहने की कोशिश करती है जिसका बेटा अचानक एक दिन गायब हो गया।

और कभी लौटा नहीं। वो जिन्दा भी है कि नहीं मां ये नहीं जानती। उसकी एक बहन है जो अपने भाई को बहुत याद करती है, उसे पत्र लिखकर अपनी परेशानियां कहती है। कि मां ने आज उसे डांटा। कि वो कब वापस आ रहे हैं। वो बहन नहीं जानती कि भाई के साथ क्या हुआ है पर उसे उम्मीद है कि वो लौटेगा जरुर। फिल्मकार कहते हैं कि कश्मीर में हजारों ऐसी मांएं और बहने हैं। जो शायद कश्मीर को उतने विस्तृत संदर्भ में नहीं देखती जितने अरुन्धती राय सरीखे इन्टलेक्चुअल्स या फिर राजनेता। फिल्म कश्मीर के हालातों पर अपनी कोई  बड़ी राय नहीं रखती या कोई समाधान ही परोसती है। लेकिन कोशिश करती है कि कम से कम ये बता पाये कि कश्मीर की समस्या का कोई हल निकल जाना क्यों जरुरी है। ईदियां कई फिल्म फेस्टिवल्स में दिखाई जा रही है।
फिल्म की खास बात ये है कि आप उसे देखकर ये नहीं बता सकते कि वो दिल्ली के किसी जामिया नाम की यूनिवर्सिटी के कमरों में फिल्माई गई है। फिल्म के सेट से कश्मीर में होने का भ्रम बर्करार रहता है जो कि एक स्टूडेंट फिल्म के लिये काबिले तारीफ है। फिल्म के मुख्य कलाकार बच्चे कश्मीर से दिल्ली अभिनय करने के लिये बुलाये गये। एम के रैना ने अच्छी कहानी होने की वजह से फिल्म में काम करने के लिए हामी भरी। कश्मीर के कई पारम्परिक बरतन फिल्म की प्रासांगिकता में इजाफा किये देते हैं। और इस तरह ईदियां अपनी जटिल विडम्बनाओं से जूझते कश्मीर के बीच जी रहे एक छोटे से परिवार की छोटी सी कहानी लगभग जस्टिफाईड तरीके से कह जाती है। हांलाकि फिल्म की अपनी तकनीकी कमियां भी हैं। जिनकी चर्चा सिनेमाथैक के सैशन में भी की गई। पर इन कमियों के बावजूद फिल्म एक विचार के स्तर पर अपनी बात कह जाती है।

 सिनेमाथैक के इस सैशन में कविता पाठ भी किया गया जिसमें सैलेन्द्र साहू, उमेश पंत ने अपनी कविताएं पढ़ी और उसके बाद महेश, जुबैर और सैयद मेहदी ने अपनी अपनी फोटोग्राफी का प्रदर्शन भी किया। सिनेमाथैक के आयोजकों को अगले सैशन्स में लोगों की उपस्थिति बढ़ने की उम्मीद है। आयोजकों में से एक राजू बिस्वास का कहना है कि वो लोग जो दिल्ली से जुड़ी अपनी तस्वीरों का प्रदर्शन करना चाहते हैं सिनेमाथैक से सम्पर्क करें। आगामी सैशन्स में इन तस्वीरों की प्रदर्शनी लगाये जाने की योजना है।

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