ताज़ा रेजगारी

सम्भावना डाट काम से तीन कविताएं

यहां बांईओर कमेन्ट बौक्स में एक मैसेज मुस्कुरा रहा है
जिसमें हिन्दयुग्म के हालिया प्रकाशित काव्यसंग्रह सम्भावना डाट काम में प्रकाशित मेरी कुछ कविताओं को छापने का जिक्र है। रोहित की इस दोस्ताना गुजारिश पर उनकी कुछ कलाकृतियों के साथ उनके कुछ चित्रों और मेरी कविताओं की जुगलबंदी पेश है आपके लिये…..
शब्द

शब्द गिरगिट की तरह होते हैं
और बदल जाते हैं पल में
मायनों की तरह।

रोशनी से मिलते हैं शब्द
और बिखर जाते हैं
जैसे दूधिया चमक में
नहा जाती हैं पानी की बूंद
और पल भर रुककर
बिखर जाती है खुशी सी।

शब्द मिलते हैं अंधेरे से
और सिकुड़ जाते हैं सन्नाटे में
तब शब्दों से बड़ा डर लगता है
तब वो रुलाने लगते हैं।

शब्द जब चढ़ते हैं
किसी शिकारी की बन्दूक में
भेद जाते हैं नसों को ।
ताज़ा खून
फूट पड़ता है फव्वारे सा।
और क्षत विक्षत हिरन के घाव पर
शब्द चिपक जाते हैं मौत से।

शब्द बदल जाते हैं क्रान्ति में
जब कोई मजदूर
जान लेता है कि वह मजदूर है
पर मजदूर होना ही
भाग्य नहीं है उसका।
तब
शब्द किसी जुलूस की शक्ल में
सड़कों में गूंज रहे होते हैं
शब्द बन जाते हैं तब
परिवर्तन की उम्मीद।


सवेरा


सवेरा

सूर्य की विजय नहीं होता।


अधिकार की लड़ाई में
तारों की पराजय या
चन्दमा का दमन भी नहीं।

सवेरा
एक यात्रा है
अंधेरे में नहाकर
लौट जाना
रोज की तरह
निर्धारित स र के लिये।

सवेरा
किसी मानी का मद नहीे
होतां

अहं के रंग में रंगी
सोने की
सुर्ख तलवार भी नहीं।


सवेरा
कळाकार का चित्र है
नीले आधार पे उभरता
लाल रंग
और सोने की
छोटी छोटी पंक्तियां।


सवेरा
काजल की कोठरी में
सयाने का जाना है
और बिना कालिक लगे
सुरक्षित साफ साफ
वापिस लौट आना।

सवेरा
अंतहीन उजाला नहीं होता।

निराषा की गर्त में
किसी अंधेरे की
गंभीर पतीक्षा भी नहीं।

सवेरा
एक सच है
रात के सपनों को
साकार करने का
सुनहरा मौका, और
नये सपने की
जमीनी हकीकत देखने का भी।

इफरात

काश मैं जीता कुछ दिन
कुछ न होने के लिए।
कुछ बनने की शर्त को
प्याज के छिलके के साथ
फेंक आता कूड़ेदान में।
और निश्चिंत होकर
लगाता,
सूरज में रोशनी का अनुमान।

रोशनी को भरकर बाल्टी में
उड़ेल आता
दीवार पर बनी
अपनी ही परछाईं पर
और देखता उसे
सुनहला होते।

हवा के बीच कहीं ढूढ़ता-फिर

ता
बेफिक्र अपने गुनगुनाये गीत
और सहेज लेता कुछ चुने हुए शब्द
अपनी कविता के लिए।
मैं आइने में खुद को देखता
कुछ न होते हुए
और बिखर जाता
जैसे हवा बिखर जाती है
मन माफिक।

आइने में सिमट जाता
ओस की बूंदों सा
और बदल जाता आईना
दूब के खेत में।
मेरी आंख बंद होती
मुट्ठी की तरह
और जब हथेली खुलती
वो समय होती
बिखर जाती खेतों में
इफरात से।


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4 Comments on "सम्भावना डाट काम से तीन कविताएं"

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दीपक 'मशाल'
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Behad khoobsoorat kavita ukereen dost..

Udan Tashtari
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बहुत उम्दा कविताएँ तीनों ही…

शरद कोकास
Guest

अच्छी कवितायें हैं ।

रोहित
Guest

yaar sabse khubsoorat kavita to tumne chod di.