ताज़ा रेजगारी

सपनों की नौकरी, नौकरी के सपने

दोस्त
जब भी समुद्र देखता हूं
तुम याद आते हो
मन कहता है
कि समुद्र के बीच
उगने लगेंगे पहाड़
और पहाड़ों पर मालाएं बनाती सड़क पर
दौड़ने लगेंगे बाईक के पहिये
जैसे सूरज का रथ।
हम भूल जाएंगे मील के पत्थर
जहां पानी होगा, हवा होगी, मन होगा
ठहर जाएंगे
जहां होगा इत्मिनान
वहीं उग जाएंगे दूब घास की तरह
च्ुापचाप बिना किसी को बताये
लेाग लाख हमें सिरफिरा कहें
हम चिलचिलाती धूप में
तब भी चढ़ेंगे खड़ी चढ़ाई
रात को किसी गांव में करेेंगे नुक्कड़ नाटक
देखेंगे छितरी टौर्च की रोशनियों को
दूर पहाड़ से अपनी ओर आते
और बन जाएंगे कुछ देर के हीरो
फिर ढ़ूंढ़ेंगे रहने का ठिकाना
खाएंगे दाल भात लाई की सब्जी
गटक जाएंगे मठठे का गिलास अमृत समझकर
करेंगे जीभर कर अपने गांवों को प्यार
काश कि औरतें फिर दरांतियां उठाती
बच्चे तालियां बजाते
लड़के गाते हमारे साथ
लड़ना है भाई ये तो लम्बी लड़ाई है
उस शराबी की फट जाती
एसडीएम का नाम सुनके
हम ढ़पली बजाते
फिर निकलते एक काफिले के साथ
ये क्यों है
कि सौंपनी पड़ती है जिन्दगी
नौकरी सरीखी जेलों को
बसर करना जीना हो जाता है और जीना मुश्किल
क्यों नहीं सब छोड़के जा सकते
हम अपनी मरजी से
किसी सीमा से परे असीमित संसार में
जहां हम हों हमारी मरजी हो
जहां रुपयों को पत्तों की तरह बिखरा
हम उनसे जलाएं आग
और एक मीठी नदी के किनारे
उसकी आंच से
हम महसूस करें जीवन की सरगर्मी।

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