ताज़ा रेजगारी

सीख रहे हैं हम इस तरह शहर होना

धूप सेकना, बरसातों में तर होना
बर्फ पड़े तो गरम-गरम बिस्तर होना

मां का गरम पकौड़ी तलकर ले आना
‘गप्प’ मारकर दिन की गुजर-बसर होना

अंगीठी में तपे कोयले सी एक शाम
रात का खाना साथ में मिलजुल कर होना

बंद कमरों ने सारे मौसम छीन लिए
ऐसे ‘शिफ्टों’ में घर का दफ्तर होना

अपने आज को टांक के वक्त की सूली पर                            
चाहें जाने किस कल का बेहतर होना

फुर्सत भी चिड़ियों जैसी लापता हुई
सीख रहे हैं हम इस तरह शहर होना

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