ताज़ा रेजगारी

शहर इतने खराब नहीं होते

अगर थोड़ा सा समय निकालकर गौर करें
तो ये कोई पत्थर पर लिखी लकीर नहीं है
कि शहर हमेशा खराब होता है।
शहर में एक क्यारी हो सकती है
जहां जल्दबाजी की टहनियों में फुरसत के फूल हों
औटो के भागते मीटर में
ठहरी हुई उम्मीद हो सकती है
किसी बाम्बे टाईम्स के चौथे पन्ने पर
खबर हो सकती है खुशी की
आठवें माले से नीचे झांक सकती है प्यार भरी नजर
जो कूद सकती है आपकी आखों में
और कर सकती है रोमांटिक गाने सुनने को मजबूर
ट्रेन की भीड़ में हो सकती है एक कतरा खाली जगह
जहां पर इत्मिनान बैठा हो सकता है आपसे मिलने को बेकरार
राह चलती किसी अधेड़ औरत में
आपको अपनी मां नज़र आ सकती है
शहर के आसमान में हो सकती है धूप और बारिश एक साथ
और नाच सकते हैं रंग इन्द्रधनुश बनकर।
शहर के किसी घर में हो सकता है एक गांव
लड़की की शादी में शुकुनाखर गाता
बुला सकती है आपके फ्लैट में सामने रहने वाली आंटी
कि आओ बेटा एक कप चाय पीलो
पूछ सकता है भेलपुरी वाला कि कैसे हैं घरवाले
पड़ौसी का गोलू मोलू सा बच्चा मुस्कुरा सकता है आपको देखकर।
शहर में रास्ता काट सकती है बिल्ली और आप मान सकते हैं अपशकुन
शहर में भी छतों पर बैठकर आप सेंक सकते हैं धूप
और खा सकते हैं मूंगफली।
शहर में आपको आ सकती है अपनों की याद
बस फर्क इतना सा है कि शहर में फैले हैं बड़े बड़े बाजार
जो आपको हर चीज ‘खरीदने’ और ‘बेचने’ पर मजबूर करते हैं
वरना शहर में भी इन्सान रहते हैं
और थोड़ी थोड़ी इन्सानियत भी।

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3 Comments on "शहर इतने खराब नहीं होते"

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Shivani Gupta
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outstanding… aankh bahr aayi.. saamne hote to ek shehri hug aur desi jhappi deti..

उमेश पंत
Guest

Chalo due raha ye…Ya mere delhi ane par..ya tumhare mumbai…ha ha..Thanks anyways…

रोहित
Guest

badhiya kavita hai dost…

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