ताज़ा रेजगारी

वो घर मेरा ही था जहां रहता नहीं था मैं

जिसपे निगाह ठहरे वो शफहा नहीं था मैं
एक हर्फ़ था, खुद भी जिसे पढ़ता नहीं था मैं

होती किसे आखिर मेरे होने की ज़रुरत
अपनी ही ज़रुरत का सामां नहीं था मैं

खुदको कभी तफसील से जाना नहीं मैंने
जाने कि क्या-क्या था और क्या नहीं था मैं

मुझको मेरी सांसों की सदा शोर सी लगी
बेइंतहा तनहाई थी, तनहा नहीं था मैं

लोगों के साथ रास्ते भी भाग रहे थे
कबसे खड़ा था फिर भी ठहरा नहीं था मैं

दहलीज़ उसकी छूंके कई बार मैं लौटा
वो घर मेरा ही था जहां रहता नहीं था मैं

 लेकर कहां पे आ गई इलहाम-ए-ज़िंदगी
पहुंचा वहां जहां कभी गुजरा नहीं था मैं

मेरा ही क़त्ल और गुनाहगार भी मैं ही ?
मैं बदहवास था मगर इतना नहीं था मैं

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