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वक्त होता है कतरनों की तरह

मैने कड़ियों को जोड़ना चाहा
वो जो टूटी थी
शायद समय की माला थी
वो जो बिखरी तो
जुड़ न पाई कभी।

वक्त होता है कतरनों की तरह
वो भी डरता है आंधियों से कहीं
कोई आंधी उसे उड़ा ही न दे
कोई पानी उसे गला ही न दे

एक स्याही थी बड़ी गाढ़ी सी
तूने मेरे समय पे पोती थी
तबसे समय की वो कतरन
दिल की अलमारियों में रक्खी है
उसपे दो शब्द लिख नहीं पाया
उसका कुछ और हो नहीं पाया

मुझे हर बार यही लगता है
अब वो किसी भी काम न आये शायद
उसकी अब और जरुरत ही न हो
बस इसी डर से संभाला है उसे
कोई आंधी उसे उड़ा ही न दे
कोई पानी उसे गला ही न दे।

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2 Comments on "वक्त होता है कतरनों की तरह"

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Udan Tashtari
Guest

वाह!! बहुत गहन रचना..आनन्द आया.

रोहित
Guest

खूबसूरत है…..गुलजार के करीब.