ताज़ा रेजगारी

रेत और रोमान पोलान्सकी

बीते साल की आंखिरी सांसों के इर्द गिर्द महज महीना पुरानी बेरोजगारी की एक हल्की सी बू थी। रिज्यूमे को ईमेल के जरिये किसी किसी के इनबौक्स में धकेलने की प्रक्रिया थी। खालीपन का एक सतही अहसास था। फिर दिल्ली से मुम्बई पहुंच जाने का फैसला था। नई उम्मीदों और सचमुच का समंदर था। लहरें थी। वर्सोवा था। रोज शाम लाल सूरज का क्षितिज से नीचे उतरता एक असल दृश्य था। और समुद्र में पहले सुनहरा और फिर समुद्र के रंग का होता लहरों में कहीं डूब जाता आभासी सूरज था। दिन बीत रहे थे। नौकरी मिल जायेगी इसका विश्वास था और थी रोमान पोलान्सकी की कुछ आठ दस फिल्में। दिन में ये फिल्में देखना और ढ़लती शाम के शामियाने में वर्सोवा को बिल्कुल फिल्मी सा निहायत सिनेमैटिक सा होते देखना। लाल सूरज के सुनहरे आभामंडल का सुनहरा प्रतिबिम्ब लहरों से गीली होती रेत पर पड़़ता। एक सूरज आकाश में वलय बनाता नीचे उतरता और दूसरा सागर में पीछे और पीछे चलता चला जाता। इस सब के बीच कभी कोई घुड़सवार उस सुनहरे रंग की रेत पर निशान छोड़ता गुजर जाता तो कभी कोई अपनी साईकिल के पहियों की एक लकीर सा बनाता उस रेत पर से गुजर जाता। दूसरे छोर पर कहीं मछुआरे अपनी नावों को खेने की तैयारी कर रहे होते और उनकी पत्नी उनसे कुछ बतिया रही होती] बच्चे पास ही में फुटबाल खेल रहे होते। दूर एक जहाज सूरज से बातें करता आकाश की विशालता के बीच अदना होता चला जाता। लोग अपने परिवार के साथ घोड़ा गाड़ी की सवारी करते। लहरों के बीच तस्वीरें खिंचाते। सूरज डूबने लगता। भीड़ छंटने लगती। अंधेरा आकाश के नीले रंग पर  अपनी धौंस जमाता उसे खदेड़ देता और खुद शहंसाह की तरह पसर जाता। समुद्र का पानी रेत के सूखेपन को बहाता आगे बह जाता। लहरें जोर लगाती और कुछ देर में किनारों पर छोटी छोटी चटटानों की शक्ल में रखे पत्थरों के पैर छूने की कोशिश करती। पत्थरों पर युगल एकान्त के पल बिता रहे होते। अपनी अपनी प्यार की हदों और रजामंदी की सीमा के मुताबिक बातों, स्पर्श और लहरों से उठती ठंडी हवा का सेवन कर रहे होते।

हर एक पत्थर के पीछे एक युगल इस प्रक्रिया में लीन होता और जो पत्थर खाली होते वहां नये युगल या मेरी तरह के कुछ एकांकी लोग अपने अपने लिये जगह बनाते पत्थरों पर छपी रेत को साफ करते बैठ जाते। और लहरों को आते जाते देखते। मुझे हमेशा यही लगा कि लहरों में एक खास तरह का आकर्शण है। अगर डूबने का डर न होता तो मैं दूर तक इन लहरों का पीछा करते चला जाता। और यदि हो सकता तो पता कर आता कि वो कहां कैसे उपजती हैं। क्यों इतनी रहस्यमयी होती हैं।

लेकिन क्योंकि तभी सामने दूसरे छोर पर पानी के उपर अपने शारीरिक अपशिष्ठ की धार का तर्पण करते लोग दिखाई देते। या फिर मोर की शक्ल में बैठ रेत पर पीली गंद मिलाते लोग दिखाई देते और लहरों के साथ जाने का खयाल इस गंद की दुर्गन्ध में कहीं दम तोड़ देता। यह देख पहला विचार उन लोगों के प्रति क्रोध का होता कि कितने बदतमीज किस्म के लोग हैं ये, टटटी पिशाब जैसे काम भी अपने घरों में नहीं कर सकते। लेकिन तभी समझ आता कि इनके घरों में अगर टोयलेट होता तो यहां गंद फैलाने की जरुरत शायद इन्हें नहीं पड़ती। मन एक आर्थिक विमर्श करने लगता। कि कैसे गरीबी का बदतमीजी से गहरा सम्बन्ध है। और किस तरह गरीब होना कितनी सहजता से क्रोध और घृणा का पात्र बना देता है। गरीबी के लिये एक नफरत होने लगती। और एक एक दिन की बेरोजगारी भी बुरी तरह खलने लगती।

 

   जिस दिन मैं पहली बार वर्सोवा गया उस दिन से रोज मैं वर्सोवा जाने लगा हूं। वर्सोवा के प्रति मेरा चुम्बकीय आकर्षण खुद मेरी समझ की सीमा के परे जा रहा है। मुझे हर शाम अपने दिमाग में चुम्बकीय रेखाएं घूमती मालूम होती हैं। मेरे सेरेब्रम, मेरे वर्टिकल कोर्टेक्स, मेरे नयूरोन्स में एक रासायनिक प्रक्रिया होने लगती है जिसका भौतिक प्रभाव मुझे वर्सोवा की तरफ खींच लाता है। वहां रोज मैं लहरों को आता जाता देखता हूं। रोज नये तरह के लोगों को खेलते, बात करते, प्यार करते, शराब पीते मुस्कुराते दौड़ते और रुक जाते देखता हूं। मुझे लगता है लोग मुझे नहीं देख रहे। उनके लिये मैं शून्य हंू। अदृश्य। मुझे लगने लगता है कि मैं हूं ही नहीं। समुद्र के विशाल किनारे पर मुझे अपना अस्तित्व नदारद होता महसूस होता है। शरीर से खून रेत बनकर बिखरने लगता है और लहरों से गीला होता वहां पहले से बिखरी रेत में मिल जाता है। मुझे लगता है कि रोज मैं अपने अस्तितव को रेत में बदलता यहां बिखर जाता हूं। मुझे बिखरी हुई रेत में अपने अंश नजर आने लगते हैं। शायद इसलिये उस रेत के लिये रोज मेरे अन्दर एक खास किस्म का लगाव पैदा होता चला जाता है।  और मेरे भीतर वो लगाव रोज जमा होता हुआ रेत के कण भर देता है। रेत के वही कण जो लगाव हैं जो मेरे अंश हैं रोज समुद्र के किनारे पानी की सतह पर बिखरते हैं और फिर कुछ ज्यादा मात्रा में दिन ब दिन मेरे अन्दर समाने लगते हैं। ऐसे जैसे मेरा शरीर मुटठी हो और मैं उस मुटठी में जमा रेत। हर बार वो मुटठी इस आशा में खुल रही हो कि रेत की कुछ ज्यादा मात्रा उस में समा जाय। इस तरह से मैं उस रेत से खुद को और ज्यादा मात्रा में अपने अन्दर भरता हूं। और खुद को अपने और करीब पाने लगता हूं। मुटठी खुलती है, मैं कुछ देर के लिये आजाद हो जाता हूं। मुटठी बंद होती है और आजादी के इस अहसास के साथ मैं मुटठी में बंद हो जाता हूं। अपने बासीपन को आजादी के ताजेपन से बदलकर मैं और ताजा हो जाता हूं। या पता नहीं क्या।

 


   दिन के खाली समय में मुझे हर दिन नये चरित्र मेरे सामने मौजूद फ्रेम में जीते नजर आते हैं। उन चरित्रों के उपर खुद रोमान पोलान्स्की किसी आदमकद शक्ल में मडराते दिखते हैं। सारे चरित्रों को पोलान्स्की अपनी उंगलियों में एक डोर के जरिये बांधे दिखाई देते हैं। अपने भव्य रुप में। एक फिल्मकार के सृश्टिकर्ता हो जाने की यह घटना अभूतपूर्व लगने लगती है। पोलान्स्की अपने चरित्रों को, अपनी रचनाओं को अपनी उंगली पर नचा रहे हैं। वो नाच रहे हैं। उन चरित्रों की जिन्दगी जो गढ़ी हुई जिन्दगी है एक नाच बन जाती है। मैं  अपलक उस नाच को देखता हूं। वह नाच जो कई भावनाओं से सराबोर है। जिसमें पात्र हैं, उनके दुख हैं, सुख हैं, हंसी है, पीड़ा है, को्रध है, ईर्श्या है, वासना है, प्यार है, जिद है, जीवन है और मृत्यु भी। भावनाओं की परतें हैं, सतहें हैं। हर नयी कहानी में नये पात्र, नयी परतों में नयी भावनाओं की अलग अलग मात्रा लिये आते हैं और चले जाते हैं, अपनी अपनी बात करते हैं, गुस्सा व्यक्त करते हैं, परेशानियां बताते हैं, प्यार जताते हैं। सारे पात्रों की अपनी दुनिया है, अपने साथी हैं, अपना जीवन है। और मैं उनके जीवन का एकाकी दर्शक। 

   सीडी दर सीडी फिल्में बदल जाती हैं, जीवन बदल जाते हैं, समय, काल, स्थान, भाषा, रंग, रुप सब कुछ। हर प्लेबैक की शुरुआत नये लोगों से परिचय कराती है। मैं खुद को इन पात्रों में खोजने लगता हूं। मुझे कोई पात्र अपनी तरह नहीं लगता । इन पात्रों के आपसी संवाद में अपनी उपस्थिति मुझे नजर नहीं आती। लेकिन मैं एक मूक दर्शक भी नहीं रह पाता। धीरे धीरे ये पात्र बड़े अदृश्य तरीके से मेरे लहू का हिस्सा बनने लगते हैं। मेरे न्यूरोन्स में ये पात्र कब्जा करने लगते हैं। मेरे सामने नये चरित्र फिल्म के रुप में आते हैं और मेरे दिमाग में पुरानी फिल्मों और कुछ वास्तविक घटनाओं के चरित्र एक दूसरी फिल्म की तरह एक साथ जीने लगते हैं। शोर करने लगते हैं। मेरे दिमाग में चल रहीं उस समानान्तर फिल्म में कुछ भी स्पष्ठ और तय नहीं होता। मैं एक साथ कई तरह की जिन्दगियों का शरणदाता बन जाता हंू। मेरे दिमाग में गर्भवती रोजमेरी अपने पति से लड़ रही होती है। कि वो क्यों अब उससे पहले जैसा प्यार नहीं करता। मैं पति हो जाता हू। मुझे अपराधबोध होने लगता है कि एक सुन्दर लड़की जो मेरे साथ कई अन्तरंग और मधुर क्षणों की सहभागिनी रही है आज जब मेरी जिन्दगी में इतना बड़ा परिवर्तन लाने जा रही है तो मैं उसके प्रति लापरवाह हो गया हूं। मैं स्वार्थी हो गया हूं।

मैं खुद को कोस ही रहा होता हूं और रोजमैरी अपना गुस्सा व्यक्त कर ही रही होती है कि द्वितीय विश्वयुद्ध की विभीषिका के बीच एक पियानिस्ट कहीं धमाके के धुंए के बीच से उभरता है। पियानो बजाने लगता है। ऐसे जैसे पियानो बजाना सांस लेना हो। और सांस लेने की लय एक गीत। पियानो की आवाज एक गीत बन जाती है और मैं उस गीत को अपने अंदर जीने लगता हूं। मेरी उंगलिया थिरकने लगती हैं। मैं आंखें बंद कर लेता हूं। पियानिस्ट हो जाता हूं। मैं इस लयबद्धता को जी ही रहा होता हूं कि एक लेखक मुझे अपनी कहानी सुनाने लगता है। कि किस तरह एक खूबसूरत लड़की से उसने पहले बेइन्तहां प्यार किया। फिर एक प्यार और वासना से भरी लम्बी जिन्दगी जी। कैसे उसकी देह के स्पर्श को जीते, महसूस करते और उसका आनन्द लेते हुए वो औरत उसके लिये आनन्दप्राप्ति का जरिया भर रह गई। उसे उपेक्षित समझते समझते एक दिन जब उसने उसे घर से निकाल दिया तो वो रोई, बिलखी लेकिन वो आदमी बेअसर पत्थर बना रहा। और एक दिन धोखा देकर उसे एक हवाई जहाज में अकेले छोड़ आया। कि कैसे एक दिन जब वह विकलांग हो गया तो वो वापस आई। और लम्बे समय तक हुए अपने उत्पीड़न का बदला लिया। उस आदमी की पीड़ा उस औरत कोे असीम सुख देने लगी। परपीड़ा से पैदा होता यह और्गेजम उसके लिये दैहिक सुख हो गया। मैं लहरों के इर्द गिर्द गोते खाते उस आदमी की कहानी को किसी जादुई असर से बंधा सुनता जाता हूं कि दो गोलियां चलती हैं।

मैं देखता हूं कि पहले वो लड़की और फिर वो लेखक वहीं ढ़ेर हो जाते हैं। उनका खून उनके छलनी हुए दिमाग से निकलकर मेरे दिमाग की सतहों पर बहता मेरे खून से मिलने लगता है। मुझे अपने खून से उनकी गंध आने लगती है। अपने अंदर उनकी मौत बहती महसूस होती है। और लेखक अब भी मुझे उस लड़की के अभूतपूर्व सौन्दर्य की कहानी सुना रहा होता है।

ये कहानी मेरे लहू में बहने लगती है, बह रही होती है कि इस बहाव को दिमाग के किसी मोड़ में एक अमेरिकन लड़की आकर रोक देती है, उस सुन्दर लड़की की टीशर्ट फटी हुई है और कुछ लड़के एक कार से दूर जाते नजर आते हैं। लड़की एक बियाबान में है। वहां एक हवेलीनुमा घर है। विचित्र किस्म की रहस्यमयता लिये घर। लड़की उत्सुकता से हवेली में घुसती है। उसे एक बूढा आदमी दिखाई देता है जिसकी भाषा लड़की के लिए एक अनसुनी भाषा है। लड़की उससे कुछ पूछना चाहती है वो ध्यान नहीं देता। कुछ ढ़ूंढ़ता सा कहीं गायब हो जाता है। पूरा घर सुनसान है, वहां दूर दूर तक किसी की आवाज़ नहीं है। लड़की एक कमरे में पहुंचती है। उसके हाथ में एक डायरी और एक पैंसिल है। जिसे घर में घुसते हुए एक कुत्ते ने झपटने की कोशिश की थी। वो पहले अपनी फटी टीशर्ट को उतारती है, फिर पूरी तरह निर्वस्त्र हो जाती है। थकी है। सामने बिस्तर है। सानेे लगती है। देखती है कि कमरे में एक छोटा सा छेद है वो उस छेद में अपनी पैंसिल घुसा देती है। और कम्बल ढ़ककर निश्चिंत होकर सो जाती है। कुछ देर में उस पैंसिल को दूसरे कमरे से खींच लिया जाता है। फिर कुछ नहीं होता। सुबह होती है। लड़की अपनी जींस पहनती है। देखती है कि उसकी टीशर्ट गायब है। आस पास ढूंढ़ती है। टीशर्ट कहीं नहीं मिलती। डरते डरते बिना कुछ पहने ही कमरे से बाहर निकलती है। बाहर गैलरी है, खाली सी। पास में उसे एक सफेद झीना सा कपड़ा मिलता है। उससे अपना उपरी हिस्सा ढ़क लेती है। बाहर आती है। वहां एक डायनिंग टेबल है। उसपर खाने के बरतन और किस्म किस्म की खाद्य सामग्री है। चाय है। पर कोई नहीं है। उसे भूख लगी है। एक कप में चाय उड़ेल ही रही होती है कि उसे पीछे एक हलचल सुनाई देती है। वहां कुर्सी पर एक अधेड़ उम्र का आदमी बैठा है। वो घबराती है। आदमी कुछ कहता है। उसे समझ नहीं आता। वो उसे चाय का कप ले जाकर देती है। वो ले लेता है। कुछ देर बाद वहां एक गेंद आकर गिरती है। उपर से कुछ लड़के गेंद का पीछा करते आते हैं और बारामदे में झांकते हैं।  अधेड़ आदमी तिलमिला उठता है। लड़के उसे चिढ़ाने लगते हैं। अब तक बिल्कुल खूसट और प्रभावशाली सा दिखने वाला वह इन्सान दयनीय लगने लगता है। लड़के इशारा करके लड़की को उपर बुलाते हैं और वापस चले जाते हैं। आगे कुछ विचित्र घटनाएं होती हैं। मसलन एक दृश्य में वह आदमी चीते की खाल पहनकर लड़की से कहता है कि वो उसे कोड़े से मारे। लड़की पहले हंसती है। उसे ये मजाक लगता है। लेकिन वो आदमी बाघ की ही तरह हिंसक हो जाता है। डरके मारे लड़की उसे कोड़े मारने लगती है। आदमी इस पीड़ा का आनन्द लेने लगता है। दूसरे दृश्य में लड़की को घर के पास समुद्री किनारे में एक बूढ़ा मिलता है और उससे कहता है कि जितनी जल्दी हो सके इस जगह को छोड़ दे। ये जगह वैश्याओं के लिये है। फिल्म को कहीं किसी ने एलिस इन वन्डरलैन्ड का ओवरसेक्सड वर्जन भी कहा है। मुझे लगता है कि मैं एक अजीब सी सेक्सुअल दुनिया का हिस्सा हो गया हूं। जहां एक अजीब तरह की स्वच्छन्दता है। और सेक्स के प्रति एक अजीब तरह की मानसिक बिमारी से ग्रसित लोग। अन्त में लड़की भागती हुई हवेली से निकलती है और अदृश्य हो जाती है।

सामने जैसे कुछ उभरता है। एक आदमी झोला लटकाये मेरी ओर आता है, दरअसल वो मेरी ओर नहीं आ रहा बल्कि किसी किताब की खोज में जा रहा है। वो द नाईन्थ गेट के अंकों को खोजता, उनकी प्रामाणिकता को तलाशता अलग अलग लेखकों के पास पहुंचता है। इस प्रक्रिया में उसका सामना मौत से होता है। उसके कई दुश्मन हो जाते हैं। और एक दैवीय शक्ति एक लड़की की शक्ल में उसे बचा लेती है। मैं डिटैक्टिव हो जाता हूं। मुझे समझ नहीं आता कि वो लड़की क्यों मेरी मदद कर रही है। ये मेरे लिये एक रहस्य हो जाता है। रहस्य बढ़ता चला जाता है। एक आदमी जो नाईन्थ गेट के किसी एक अंक का लेखक है, जल रहा है। उसे भरोसा था कि वो जल नहीं सकता क्योंकि उसके पास एक खास किस्म की ताकत है। उसके साथ उसका ये विश्वास भी जलने लगता है। वो चीख रहा है। मुझे लगता है कि मेरा विश्वास भी उसी आग में जलने लगा है। मुझे समझ नहीं आता कि मेरा विश्वास आंखिर था किस पर। अपने अमरत्व पर, अपनी शक्ति पर या इस बात पर कि मेरे दिमाग के अन्दर चल रहे इस चारित्रिक और एक किस्म के फिल्मी महाभारत के बीच मैं खुद को बचा भी पाउंगा कि नहीं। कि पोलान्सकी अपने चरित्रों के साथ कहीं मुझे भी तो अपनी उंगली पर नहीं नचाने लगेंगे।

 

    मैं फिर किसी बाहरी शक्ति के प्रभाव से वर्सोवा की तरफ चल पड़ता हूं। वहां फिर एक शाम है। एक सूरज है। रेत पर सूरज की मध्धम होती आंच का चांदीपन है। रेत की सतह पर समुद्र की लहरों की सबसे कम शक्ति वाली महीन परत पारे की तरह चमकती लौट रही है। घोड़े दौड़ रहे हैं। एक छोटी मासूम सी बच्ची अपने लिए रेत का घर बना रही है। उसका नन्हा सा भाई उस घर को तोड़ रहा है। लड़की उससे झगड़ रही है। वो लड़की को चिढ़ा रहा है। एक बड़ा आदमी जो शायद उनका पिता है उन्हें डांट रहा है और अलग कर रहा है। उन्हें कुछ समझा रहा है। फिर तीनों मिलकर घर बनाने लगते हैं। बच्चे कितनी आसानी से मान जाते हैं। एक लहर आती है। तेज लहर। वो घर को तोड़ देती है। तीनों भीग जाते हैं। खिलखिलाते हैं हंसते हैं। उनकी हंसी रेत में बिखर जाती है। रेत और सुनहली हो जाती है। सुनहली रेत मेरे अन्दर समा जाती है। लहू बनकर मुझमें तैरने लगती है। वो दो बच्चे और उनका सम्भावित पिता मेरे दिमाग में समा जाते हैं। रोमान पोलान्सकी के पात्रों के साथ घुल मिल जाते हैं।

 

  मुझे लगता है कि हर नई घटना रेत है। इस तरह मैं जिस भी घटना को अपने भीतर जमा करता हूं वो घटना रेत हो जाती है। और मेरे उन्हें याद करने का समय समुद्र है। इस समुद्र में लहरें रेत को बहाती ले आती हैं। मैं बहाव में बहता चला जाता हंू। समय हो जाता हूं। मेरे अन्दर रेत जमा होने की असीम सम्भावनाएं और अपार गुंजाईश है। इस तरह मैं समय हूं और समुद्र भी। 

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5 Comments on "रेत और रोमान पोलान्सकी"

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सागर
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उमेश… मज़ा आ गया पढ़कर, काश तुम दिल्ली में होते अभी यार, मैं तुमसे वो फ़िल्में ले कर देख पाता और सिनेमा का नज़रिए से जरुरी चीजें समझता … बहरहाल तुम्हें तुम्हारे मन मुताबिक वहां काम मिले और तुम फिर भी समय निकल पर रेत पर बैठा करो.

राजेश चड्ढ़ा
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…………..मुझे लगता है कि हर नई घटना रेत है। इस तरह मैं जिस भी घटना को अपने भीतर जमा करता हूं वो घटना रेत हो जाती है। और मेरे उन्हें याद करने का समय समुद्र है। इस समुद्र में लहरें रेत को बहाती ले आती हैं। मैं बहाव में बहता चला जाता हंू। समय हो जाता हूं। मेरे अन्दर रेत जमा होने की असीम सम्भावनाएं और अपार गुंजाईश है। इस तरह मैं समय हूं और समुद्र भी।…. ….. यही तो प्रत्येक के साथ है…..अध्भुत…

pallavi trivedi
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आज पहली बार पढ़ा आपको…. बर्सोवा से शुरुआत होते हुए रोमन पोलंस्की के पात्रो का वर्णन…न्युरौंस …खुद की कशमकश…और समय , घटनाओं में खुद को खूबसूरती से शामिल किया जाना…बेहद प्रभावशाली है!

शरद कोकास
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बहुत बढ़िया लिखा है आपने , अगर सम्भव हो तो कहीं से मनोज रूपड़ा की कहानियाँ लेकर पढ़ें ।

K K Mishra
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बेहतरीन लेखन व चित्र