ताज़ा रेजगारी

ये हो न सका

मैं मिलना चाहता था तुमसे
ठीक उस वक्त
जिसके लिये कोई गिनती न हो
न घंटा, न मिनट न सेकंड
न सुबह, न शाम,
न बारिश, न धूप, न वजह……

उजाले और अंधेरे के बीच
तलाशना चाहता था वो वक्त
जिसमें हम दोनो धुंधले से दिखते
 न पूरी तरह उजले… न पूरी तरह स्याह

सुनना चाहता था वो आवाज़
जो सुनाई देने और न देने के बीच की होती
न पूरी तरह सच… न पूरी तरह झूठ

खोजना चाहता था एक जगह
जहां समुद्र के उपर एक जंगल होता
पहाड़ों के उपर एक मैदान
आकाश के उपर एक धरती होती
दोनों के बीच हम….
एक जगह जो न असल होती…न वहम…

करना चाहता था तुमसे कुछ बातें
जो न अच्छी होती …न बुरी

लाख कोशिशों के बाद भी
ये हो न सका
तुम न पूरी तरह आई मेरे पास
न पूरी तरह मुझसे दूर ही गई……..
मैं न पूरी तरह मिल सका तुमसे
न बिछड़ पाया पूरी तरह…..

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1 Comment on "ये हो न सका"

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Gee
Guest

acchi kavita… shabdo ke beech thehri khamoshi dil ko choo gayi .

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