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युद्व का उन्माद और सोल्जर ब्लू

soldier blue

युद्व का उन्माद कितना विभत्स, कितना भयावह और अमानवीय हो सकता है सोल्जर ब्लू में देखा जा सकता है। ये एक अमेरिकन फिल्म है। इतिहास में झांकती, जंग के मैदान में ले जाती और उस मनहस्थिति से रुबरु कराती जो एक आदमी को निहायत जंगली बना देने पर उतारु कर देती है। जो एक सभ्यता के असभ्य हो जाने की अन्तिम सीमा तक पहुंचने की यात्रा दिखाती है। फलतह आदमी के अमानवीय हो जाने की दर्दनाक सच्चाई को खुलकर अपने नग्न रुप में हम तक पहुंचाती है। और कुछ सवाल छोड़ जाती है कि क्या यह सब सच भी हो सकता है। इन्सान क्या इतना निर्मम हो सकता है। इतना निरीह। राहुल सांस्कृत्यायन ने जब वोल्गा से गंगा लिखी तो क्या तो उसकी पूरी शाब्दिक यात्रा महज काल्पनिक ही रही होगी। लेकिन इतिहास ही नहीं वर्तमान भी इस पूरी निर्मम कहानी का साक्षी रहा है। वोल्गा से गंगा मेेें एक औरत अपने नवजात बच्चे को पटक कर फेंक देती है उसके खून से सने लोथड़ों को देख उसे कतई दुख नहीं होता। उसे लड़ना है। खुद के अस्तित्व को बचाने के लिए। खुद के कबीले को जिंदा रखने के लिए। उसे पढ़ते हुए लगता है कि यह सब एक कल्पना है जिसकी निरीहता से सच्चाई का कोई लेना देना हो ही नहीं सकता। लेकिन फिर सोल्जर्स ब्लू जैसी फिल्में हमें देखने को मिलती हैं। जिनका नरसंहार पूरी तरह ऐतिहासिक सच्चाईयों पर आधारित है। फिल्म 1864 में अमेरिकी फ्रंटियर के कालेरेडो में कर्नल जान एम सिविंगटन के नेतृत्व में हुए भयावह नरसंहार की पृष्ठभूमि पर आधारित है जहां शेन और अर्फाहो नाम के दो सुदूरवर्ती गांवों को नेस्तनाबूत कर दिया गया।

क्रेस्टा (केन्डिक बर्गन) और हानस (पीटर स्टास) शेन(cheyenne) गांव की ओर जा रहे हैं। मात्र ये दोनों ही कावर्ली में भारतीयों के द्वारा किये गये हमले में बच पाये हैं। इस हमले में 22 लोगों को मार दिया गया। बचने के बाद दोनो शेन गांव में बने बेसकैंप की तरफ जा रहे हैं। हानस एक अमेरिकी सिपाही है जो युद्व की इस संस्कृति को पसंद नहीं करता। क्रेस्टा दो साल शेन गांव में रही है। वो अमेरिकी सेना के खिलाफ है। उसे शेन गांव से एक लगाव है। लेकिन हानस को उसका ये लगाव पसंद नहीं है। खैर क्योंकि मात्र ये दोनों ही भारतीयों के द्वारा हुए उस हमले में जिंदा बचे हैं तो दोनों साथ साथ शेन की तरफ जा रहे हैं। हानस एक कायर सा लगने वाला आदमी है लेकिन कई बार लगता है कि उसकी ये कायरता असल में उसकी मानवीयता से उपतजी है। ऐसा असल जिंदगी में भी होता है कि कई बार मानवीय गुणों से भरा इन्सान कायर समझ लिया जाता है। क्योंकि वो हिंसा में भरोसा नहीं रखता। खैर क्रेस्टा और होनस की इस यात्रा के दौरान दोनों में प्यार की भावना पनपने लगती है। क्रेस्टा को शेन जाकर अपने फिओन्से लेफिटनेंट मेक्नायर से मिलना है। क्रेस्टा एक घुमन्तू सी फितरत की महिला है। वो प्रकुति से जुड़ाव रखती है। प्रकृति से सामन्जस्य बैठाने की क्षमता रखती है पर अकेले इस यात्रा को पूरा कर लेने का माददा उसमें नहीं है। इसीलिये वो हानस पर कुछ निर्भर भी है। हांलाकि पूरी फिल्म में वो ज्यादा हानस के काम आती है न कि हानस उसके। रास्ते में हानस को एक हथियारों से लेस गाड़ी मिलती है। ये हथियार अमेरिकी सेना के विरोधी समूह के हैं। हानस इन हथियारों को नष्ट कर देता है। और इस कोशिश में वो जख्मी हो जाता है। क्रेस्टा उसे जैसे तैसे बचाने में कामयाब हो जाती है। क्रेस्टा हानस को बताती है कि शेन एक शान्तिपूर्ण गांव है लेकिन हानस उसकी बात पर भरोसा नही करता। वो अमेरिकी सेना के प्रति परी निष्ठा रखता है। उसे भरोसा है कि वो गलत नहीं कर सकती। लेकिन शेन पहुंचकर उसका भरोसा बुरी तरह टूटता है। वो देखता है कि शेन जो कि वाकई एक शांतिपूर्ण इलाका है उसे कैसे अमेरिकी सेना नेस्नाबूत कर देती है। कैसे 500 से ज्यादा मासूम लोगों को मार दिया जाता है। कैसे इस मारकाट की विभीशिका में मासूम बच्चे और औरतें मौत के घाट उतार दिये जाते हैं। औरतों का निर्मम बलात्कार करके उन्हें काटकर फेंक दिया जाता है।

ये फिल्म वियतनाम युद्व के दौरान रिलीज की गई और इसका खूब विरोध हुआ। बहस उठी कि क्या फिल्मों में इतनी हिंसा दिखाना जायज है। फिल्म के कुछ दृश्यों में बंदूक की गोली को मांस को बिल्कुल छलनी करता सा दिखाया गया है। औरतों को नग्न करके उनके साथ जबरदस्ती करके उन्हें काटते हुए सेनिकों को दिखाया गया है। सर से अलग होते धड़ और उन्हें हाथ में लेकर अमेरिकी सेनिकों को नाचते हुए दिखाया गया है। क्या इतनी हिंसा का फिल्मों में दिखाया जाना सही है। लेकिन यहां सवाल यही है कि क्या ऐसा असल में हो नहीं रहा। इतना ना सही पर इसके आसपास निर्ममता की सीमांएं क्या नहीं छुृई जा रही। क्या असलियत में युद्व का उन्माद आज की मानवीय सभ्यता से अछूता है। ईराक, गाजा, गुजरात, वियतनाम ऐसे कई उदाहरण तो हैं ही हमारे सामने। जब असल में ये सब हुआ है तो अपनी सच्चाई को देखने से परहेज कैसा। अपना आईना देखने में घृणा कैसी। जिस चीज को अपनी स्क्रीन पर देखने में हमारे रौंगटे खड़े हो जाते हैं उस चीज को असल में होता देख क्या गुजरती होगी उन मासूम लोगों पर जो उस हिंसा के शिकार बनते हैं। ऐसे उन्मादी हादसों के साक्षी बनने के बाद जो बच जाते हांगे उनके लिये वो यादें किसी बार बार आती भयावह मौत से कम न होती होंगी। अमेरिका जैसे युद्व प्रेमी देशों को यह समझने में न जाने कितना समय लगेगा। राल्फ नील्सन की सोल्जर ब्लू या स्पिलबर्ग की सिंडलर्स लिस्ट जैसी फिल्मों को देख युद्व की संस्कृति के लिए एक घृणा पनपती है। इस घृणा का पनपना और उसका व्यापक हो जाना बड़ा जरुरी है इसलिये कि युद्व न हों, इसलिये कि इन्सान जंगली होने से बचा रह पाये।

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