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यारसा गुम्बा के साईड इफैक्ट

कुछ समय पहले जब उत्तराखंड जाना हुआ तो वहां यूं ही चलते चलते यारसा गम्बू पर विनोद भाई से बात हो रही थी। बात करते करते महसूस हुआ कि कुछ रोचक जानकारियां सामने आ रही हैं। मैने बिना उन्हें बताये अपना फोन निकाला और उनकी सारी बातें रिकोर्ड कर ली। विनोद उप्रेती दरअसल उच्च हिमालयी क्षेत्रों की वनस्पतियों पर विभिन्न सरकारी योजनाओं के तहत शोध कार्य कर रहे हैं। यहां पेश है उनसे हुई बातचीत के कुछ अंश ……

उमेश पंत

यारसा गुम्बा या कीड़ाजड़ी हिमशिखरों की तलहटी में पाया जाने वाला एक ऐसा पौधा है जिसने इन कुछ वर्षों में कई पहाड़ी घरों को पैसे के लिहाज से सिफर से शिखर तक पहुंचा दिया। यारसा गुम्बा एक तिब्बती भाशा का षब्द है। यारसा मतलब गर्मियों का कीड़ा और गुम्बा माने गर्मियों का पौधा । इस छोटी सी जड़ी के सम्बन्ध में जब ये जानकारी मिली कि यह एक यौन शक्तिवर्धक दवा भी है, इसकी कीमतें अचानक आसमान छूने लगी। चीन और अमेरिका जैसे देषों में इस जड़ी बूटी के विषय में सबसे पहले पता चला। दरअसल यह जड़ी एक फंगस है जो मौस के लारवा में पैदा होती है। यही फंगस दवा का काम करता है। वनस्पति वैज्ञानिकों की मानें तो यह इसे कीड़े और पौधे के बीच की अवस्था है। यह फंगस मिट्टी में नहीं उग सकता। कीड़ाजड़ी बर्फ के पिघलने के मौसम में उगती पनपती है। 3200 से 3800 मीटर की उंचाई पर स्थित हिमषिखरों पर पायी जाने वाली इस दवा का पता भारत में सबसे पहले इन्द्र सिंह राईपा नाम के एक व्यक्ति को चला। जो कुछ नेपाली युवकों को लेकर दवा को लेकर आया और इसे बेचना शुरु किया। बीजिंग ओलम्पिक तो जैसे इस जड़ी को बेचने वालों के लिए पैसे बनाने की मषीन बन गया। इस दौरान यारसा गुम्बा की खूब खपत हुई। इसकी कीमतें बीस हजार रुपये किलो से लेकर 5 लाख रुपये किलो तक पहुंच गई। जानकार बताते हैं कि मन्डियों में इसकी कीमत 12 से 15 लाख रु प्रति किलो तक लगाई गई। खास बात सह थी कि इस दवा की शरीर में मौजूदगी का पता डोपिंग के दौरान नहीं चल पाता। ऐसे में ओलम्पिक में इसका जमकर प्रयोग हुआ। लेकिन ओलम्पिक के बाद इसकी कीमतें अचानक गिर गई।

इन चार पांच सालों में यारसा गुम्बा ने हिमालयी ग्रामीणों की अर्थव्यवस्था में चमत्कारी बदलाव किये। भुखमरी की कगार पर खड़े इन ग्रामीणों ने गांवों में लाखों के बंग्ले खड़े कर दिये। इन ग्रामीणों के बच्चे जिनके पास पहनने को कपड़े नहीं होते थे हजार बारह सौ की जींस पहनने लगे। यारसा गुम्बा के प्रति ग्राामीणों के आकर्शण की वजह यह थी कि यह लोगों के नकद व्यापार का जरिया था। अन्य औशधीय वनस्पतियों की बिक्री भेशज संघों के माध्यम से होती है जिसके चलते ग्रामीणों को एक तो पैसा देर से मिलता है दूसरा इनकी कीमत भी बहुत कम मिलती है। ऐसे में यारसा गुम्बा पैसे बनाने की जादुई मषीन से कम नहीं था। जुआ खेलने के शौकीन ये लोग जंुए में पैसे की जगह इस जड़ी को दांव पर लगाने लगे क्योंकि वे जानते थे कि पैसे की कीमत तो स्थाई रहेगी लेकिन इस जड़ी की कीमत 60 रु पीस से 120 रु पीस तक जा सकती है या इससे ज्यादा भी।

लेकिन यारसा गुम्बा के इर्द गिर्द कई नकारात्मक प्रभाव भी पैदा हुए। पहला यह कि इसके जबर्दस्त दोहन के कारण हिमालयी क्षेत्रों में इसकी मात्रा कम होने लगी। इस जड़ी के उत्पादन के हाट स्पाट माने जाने वाले क्षेत्र जैसे पुचाचूली के बेस से लगे जनथली, नागनी झूला, छिपला और नेपाल स्थित अपी और छड़े के बुग्यालों तक में इस दवा का मिलना मुष्किल हो गया। धीरे धीरे इस अभाव ने वर्चस्व की लड़ाई को भी जन्म दिया। मसलन दवा का हाट स्पाट छिपला, मदकोट, कनार और धारचूला से लगा है। धारचूला की भोटिया जनजाति प्रभावशाली मानी जाती है। इस जनजाति के कई लोग उंचे प्रशासनिक ओहदों में हैं। ऐसे में अपनी शक्ति का प्रयोग कर इन लोगों ने दवा का दोहन शुरु किया। मदकोट और कनार के ग्रामीणों को अपने प्रभाव के दम पर इन्होंने दवा का व्यापारिक प्रयोग करने से रोका। यहां तक कि इनकी अपनी वन पंचायतों से भी दवा लेने को लेकर भोटिया जनजाति के लोगों ने डंडा किया। इस वर्चस्व की लड़ाई का एक और विभत्स रुप देखने को मिला। धारचूला से जुड़े इलाकों में इन लोगों ने वैश्यालय तक खोल दिये। यहां तक कि ग्रामीण महिलाओं के बलात्कार तक की घटनाएं होने लगी। लेकिन मेनस्टीम मीडिया में इनके प्रभाव के बूते ये खबरें नहीं पहुंच पाई। यह और बात है कि खबरों का स्वरुप दवा लेने गई महिला की चटटान से गिरकर मौत सरीखा होने लगा। और ऐसी खबरें इन दिनों मीडिया में बहुतायत में आई।

यारसा गुम्बा के बड़ी मात्रा में दोहन ने वहां की पारस्थितिकी पर भी गहरे असर छोड़े। उत्तराखंड के राजकीय पक्षी मोनाल के जीवन पर इस दोहन का सीधा प्रभाव पड़ा। इसके अतिरिक्त कस्तूरी और भरल जैसे दुर्लभ वन्य जीवों का जीवन भी खतरे में पड़ गया। चूंकि इस दौर में भारी मात्रा में लोग इन हिमालयाी क्षेत्रों में पहुंचे तो स्वाभाविक तौर पर उनकी नजर यारसा गुम्बा के अलावा यहां के जीवों पर भी पड़ी। अपने पेट भरने के अतिरिक्त इसलिए भी इन लोगों ने इन जीवों का शिकार किया क्योंकि इनके खाल और नाखूनों की गैरकानूनी बाजारों में भारी कीमतें हैं। चूंकि इन क्षेत्रों में इस तरह की तस्करी रोकने के लिए सरकारी संस्थानों की खास दखल नहीं होती इसीलिए बेराकटोक वन्य जीवों को नुकसान पहुंचाया जाता रहा।

दरअसल यारसा गुम्बा के बहाने इन हिमालयाी क्षेत्रों में जो मानवीय दखल दी गई उसने यहां की पारस्थितिकी पर नकारात्मक असर डाले हैं। यारसा गुम्बा ही नहीं कई अन्य वजहों से भी प्रकृति को नुकसान पहुचाने का असर हम देख ही चुके हैं। इस वर्श उत्तराखंड में सामान्य से लगभग 66 प्रतिशत कम बारिष हुई। और यहां रह रहे लोग यह बेहतर जानते हैं कि अन्य वर्शों के मुकाबले यहां अचानक गर्मी कितनी बढ़ गई है। ऐसे में सवाल यह खड़ा होता है कि अपने तात्कालिक आर्थिक फायदों के लिए प्रकृति को नुकसान पहुंचाने के दीर्घकालिक परिणामों को हम कितनी देर से समझेंगे। कहीं देर ना हो जाये कहना भी अब मुफीद नही लगता क्योंकि लगता यही है कि देर तो हो चुकी है।
( हिमालयी वनस्पतियों पर शोध कर रहे विनोद उप्रेती से बातचीत पर आधारित )

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