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मैन विद मूवी कैमरा, कैमरा जब आंख बन जाता है

Man with movie camera

फिल्मों में रुचि रखने वाले लोगों के लिए मैन विद मूवी कैमरा एक कमाल की फिल्म है। जिस दौर में सिनेमा की षुरुआत होती है उस दौर में कैसे एक डाईरैक्ट हर सम्भव तकनीक अपनी फिल्म में प्रयोग कर लेता है और पूरी सफलता से, ये बात फिल्म देख लेने के बाद ही पता चलती है। 1929 में बनी ये डौक्यूमेंटी फिल्म रसियन निर्देषक वर्तोव ने निर्देषित की। न फिल्म में कोई कहानी है, ना ही कोई निर्धारित पात्र साथ ही यह एक मूक फिल्म है। लेकिन एक घंटे से कुछ ज्यादा समय में आपको एक फिल्म को तकनीक के तौर पर देखने, समझने का हर मौका फिल्म दे देती है।

कथानक के नाम पर फिल्म में एक कैमरामैन अपने ट्राईपौड और कैमरे के साथ यहां वहां घूमता है और उसे जो दिखाई देता है वो अपने कैमरे में कैद कर लेता है। लेकिन ये वो जो बस ऐसे ही कैद कर लिया जाता है उसके पीछे कई विचारधाराएं और एक गहन राजनैतिक सोच भी काम करती है। पूरी फिल्म एक माक्सवादी विचार को लेकर आगे बढ़ती है। मसलन समाज में विभिन्न वर्गों के बीच के सामाजिक विभेद को फिल्म दिखाती है। फिल्म औघोगीकरण का मानवीकरण सा करती महसूस होती है। समय समय पर मशीनों के क्लोजअप और उन मशीनों के साथ जूझते इन्सानों के परिश्रम को फिल्म एक सूत्र में बांधती सी महसूस होती है। मशीनों की यह अभिव्यक्ति कई बार इतनी प्रभावशाली सी हो जाती है कि वो खुद में एक चरित्र बन जाती हैं। फिल्म के किसी पात्र सी जीवन्त।

फिल्म तकनीक के तौर पर फास्ट मोशन, स्लो मोशन, स्प्लििट स्क्रीन, फ्रीज फ्रेम, जम्प कट और डबल एक्सपोजर जैसी तमाम सिनेमाई तकनीकें फिल्म में प्रयोग की गई हैं। ये तकनीकें वर्तोव ने सम्भवतह पहले खुद ईजाद की और फिर उन्हें प्रयोग कर लिया। एक निर्देशक कितना प्रयोगवादी हो सकता है उसकी हद इस फिल्म में देखने को मिल जाती है। फिल्म के एक दृश्य में एक नवजात को गर्भनाल से अलग होते हुए दिखाया गया है। एक और दृश्य में महिलाओं को नग्न दिखाया गया है। एक दृश्य में कैमरामैन शीशे के गिलासों के बीच से सुपरइम्पोज हो जाता है। एक और दृश्य में पहाड़ से बड़े कैमरे के उपर कैमरामैन अपना ट्राईपौड सेट करता हुआ सा दिखाई देता है। कहीं रेलगाड़ी रफ्तार से भागती नजर आती है तो कहीं भारी भीड़ और फिर कहीं विशाल पानी की धाराएं। माने यह कि फिल्म का धरातल इतना बड़ा है कि उसमें महज एक घंटे में क्या कुछ नहीं समा गया है। एक प्रयोग के तौर पर इस फिल्म में देखने के लिए कितना कुछ है ये एक बार देखने के बाद आप जान जाएंगे।

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3 Comments on "मैन विद मूवी कैमरा, कैमरा जब आंख बन जाता है"

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Amit K Sagar
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ब्लोगिंग जगत में आपका स्वागत है. आपको पढ़कर बहुत अच्छा लगा. सार्थक लेखन हेतु शुभकामनाएं. जारी रहें.

Till 25-09-09 लेखक / लेखिका के रूप में ज्वाइन [उल्टा तीर] – होने वाली एक क्रान्ति!

A desk of An Artisan
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शुभकामनाएं

सागर
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इस शीर्षक की खबर मोहल्ला डॉट कॉम पर भी आई है… बधाई हो… आपका प्रयास वाकई सराहनीय है…