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मैने दिल से कहा, ढूंढ़ लाना खुशी…

मैने दिल से कहा ढ़ूंढ़ लाना खुशी……कल मशहूर गीतकार और पटकथा लेखक नीलेश मिस्रा के लिखे गीत की इन पंकितयों को सुनते हुए अचानक खयाल आया कि वाह क्या सच्ची बात कही है। अक्सर हम नासमझों की तरह खुशी के छोटे छोटे पलों को बहुत छोटा और गमों के छोटे छोटे लमहों को भी बहुत बड़ा करके आंकते हैं। खुशी की तलाश में निकलते तो हैं पर रासते से बेवजा ही ग़मों के तिनके समेटकर ले आते हैं। और फिर उन्हीं तिनको को समेटकर अपनी नाकामयाबियों को जमा करने के लिये एक दिमागी घरोंदा तैययार कर लेते हैं, जो धीरे धीरे हमारी खुशियों को बेघर करने लगता है।

बीते दिनों देखी एक शौर्ट फिल्म वैलिडेशन ने जैसे खुश रहने का एक राज़ बता दिया। फिल्म में एक आदमी है जो दूसरों की मुस्कुराहटों में अपनी खुशी खोजता है, अपनी इसी  खासियत के चलते वो मशहूर हो जाता है। फिल्म को देखकर लगा कि खुश रहना और खुश करना ये दो ऐसी खूबियां हैं जो आपमें हों तो लोग आपको बिना नागा किये अपना लेते हैं।

हम अक्सर लोगों से उम्मीद करते हैं कि वो हमें कौमिप्लमेंट दें, पर उन्हें कौमिप्लमेंट देना तो हम भूल ही जाते हैं। हर इन्सान अपने बारे में कुछ ऐसा सुनना चाहता है जिससे उसे महसूस हो कि खुद के बारे में वो जो सोचता है, वो उससे बेहतर है। या फिर कम से कम इतना कि उससे जुड़ी कोर्इ पौजिटिव बात सामने वाला कहे। दूसरे लफज़ों में कहें तो हमें अपनी जिन्दगी में एक ऐसे गवाह की ज़रुरत होती है, जो समय समय पर हमारे बारे में अपनी राय जताता रहे। एक ऐसा विटनेस जो कहे कि आज आप अच्छे लग रहे हो, ये कपड़े आप पर जंच रहे हैं, मुस्कुराते हुए आप खूबसूरत लगते हो, आपने आज औफिस में बहुत अच्छा काम किया, आपकी समझदारी की दाद देनी होगी। माने बहुत छोटी छोटी बातें जो आपको सुकून देती हैं। जो बताती हैं कि मैं जो कह रहा हूं, कर रहा हंू, पहन रहा हूं उससे लोगों को फर्क पड़ता है। अपनेपन की सौंधी सौंधी महक से भरी होती हैं ये छोटी छोटी बातें। ये महक हमारे अन्दर मौजूद तो होती हैं पर न जाने क्यों हम अक्सर इसे बिखेरने में कंजूसी कर देते हैं।

खुशी एक ऐसी आदत है जो हमें लग जाये तो जि़न्दगी ज्यादा खूबसूरत नज़र आने लगती है। भागते दौड़ते शहरों में खुशी की ये आदत अक्सर उस औफिस बैग की किसी जेब में बंद हो जाती है जिसकी चेन बहुत कम खुलती है। हमारी मशरुफियत बस उन्हीं कामों तक सीमित हो जाती है जो ज़रुरी होते हैं। उठना, जागना, काम पर जाना, काम निपटाना, लौटना और खाना खाकर सो जाना। रोटी कपड़ा और मकान की सीमित इच्छाओं के बीच हम भूल ही जाते हैं कि हम आंखिर काम करने के लिये जी रहे हैं या फिर, जीने के लिए काम कर रहे हैं? अपनी कार में बैठे हुए टै्र्रफिक के बीच हौर्न बजाते या फिर बसों, ट्रेनों, की रफतार में जिन्दगी का सफर काट लेते हम खुशी को एक भूली बिसरी हुर्इ चीज़ बना लेते हैं। संडे की शौपिंग के बीच थोड़ी सी खुशी उधार लेने की नाकामयाब कोशिश तो करते हैं पर काश कि खुशी के लिये कोर्इ बाज़ार बन पाया होता।

आने वाला कल कैसा होगा, इस बात की चिन्ताओं से जब थोड़ा सा वक्त मिलता है तो बीते कल में रही कसर हमें मसोसने लगती है। हम भूल ही जाते हैं कि जो ये मासूम सा आज हमारे पास मडरा रहा है वो भी चाहता है कि आप उसके बारे में सोचें। लेकिन हम इससे बेफिकर हो उसे ऐसे नज़रअंदाज़ कर देते हैं जैसे वो सबसे गैरज़रुरी चीज हो। जबकि सच्चार्इ इसके बिल्कुल उलट है।

खुशी कीमती तो होती है पर अच्छी बात ये है कि कीमती चीजों की तरह उसे पाना इतना मुशिकल नहीं होता। अपने गेटकीपर से पूछा एक छोटा सा सवाल कि आप कैसे हो, काम से थोड़ा जल्दी लौटकर अपने बच्चों को कहना कि चलो कहीं घूमने चलते हैं, आफिस के बीच से अपने जीवनसाथी को एक छोटा मैसेज कि आर्इ मिस यू, बस इतने में खुशी मुस्कुराती हुर्इ हाजि़र हो जाती है। आपकी वजह से सामने वाला खुश हो तो खुशी आपके पास लौटकर ना आये ऐसा हो ही नहीं सकता।

कुछ देर के लिये ही सही ज़्ारुरी के फेर से बाहर आकर कभी ऐसी गैरज़रुरी चीजें कर के देखिये जो आपको अच्छी लगती हैं, या फिर आपसे जुड़े लोगों को अच्छी लगती हैं, आपको समझ आ जाएगा कि सचमुच आपका दिल नासमझ था, खुशी तो आपके दरवाजे पर आने को बेताब खड़ी है, बस आप ही हैं जो दिल की खिड़कियाेंं पर मशरुफियत के परदे लगाके बैठे हैं।

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