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मेरी चाहत, तेरी रज़ा

वो तो जीने का एक नशा सा है
वरना जीना भी खामखा सा है

मर मर के जी रहे हैं तेरी याद में पर
ऐसे जीने में भी मज़ा सा है।

तुझको देखा तो एक गुमां सा हुआ
मेरी सांसों में कुछ रुका सा है।

मुझको मालूम है कि इश्क गलतफहमी है
एक मुगालता है यूं ही बेवजा सा है।

कोई बारीक सा समन्दर है
ये जो यादों का सिलसिला सा है

लगता है शब औ रोज़ का रिश्ता
मेरी चाहत, तेरी रज़ा सा है

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