ताज़ा रेजगारी

मीडिया के छात्रों के बारें में


मीडिया से जुड़े विषयों की पढ़ाई कर रहे छात्रों के बीच हमेशा कुछ कहने की, अपने समाज के मुददों पर बात रखने की एक ललक अन्दर से होती है। नहीं होती तो होनी ही चाहिये, ऐसा मेरा मानना है। दिल्ली आने के बाद पत्रकारिता या जनसंचार से जुड़े कुछ महत्वाकांक्षी छात्रों से मुलाकात हुई। उनमें कुछ कहने और छपने छपाने की गजब की ललक थी। हांलाकि तीन सालों में उनकी छपने छपाने और कुछ कर गुजरने की ललक तो बनी हुई दिखी लेकिन वो सरोकार जो वो इन पाठयक्रमों में प्रवेश लेने से पहले अपने साथ लाये थे वो कहीं खतम होते रहे। उसकी कई वजहें तो स्पष्ठ थी। मसलन पढ़ाने वालों ने हमेषा यही सिखाया कि प्रोफेष्नल बनो, मिषन जैसी चीज के चक्कर में फंसोगे तो कहीं के रह नहीं जाओगे। तुम्हें तैयार होना है कमर्सियल मीडिया के लिये। वहां ये मिशन विसन नहीं चलता। और फिर छात्र खुद भी यह देखते समझते रहे कि मीडिया में जो कुछ हो रहा है वो उनकी समाज के लिये कुछ करने की ललक से तो कतई मेल नहीं खाता। वो ये समझते न समझते, उन्हें समझाया और एक हद तक यही घोट घेाट कर पिलाया गया। ऐसे में उन छात्रों के दिल को धक्का जरुर लगा जो छोटे शहरों या कस्बों, जहां वो अब तक रहते आये थे, की बदहाल स्थिति के लिये कुछ करने की उम्मीद से मीडिया में आने के इच्छुक थे। यहां में उन लोगों की बात कतई नहीं कर रहा जो मीडिया को विशय के रुप में महज इसीलिए पढ़ रहे थे कि उनकी एडमिशन इस विशय में हो गया। ऐसे में ज्यादातर छात्रों में समाज के लिए कुछ करने जैसी भावना का तो अन्त हो गया। खैर जो बचे उनकी अपनी कहानी भी कम रोचक नहीं है।
उदाहरण मेरे अपने कोर्स का है। हमारी 30 बच्चों की मास मीडिया की क्लास में से मुश्किल से ऐसे 6 या 7 सात बच्चे हैं जो अब भी मीडिया के क्षेत्र में जाने के इच्छुक हैं। ये संख्या 10 तक भी हो जाती अगर बांकी 3 या चार छात्र जो चाहते थे कि वो इस क्षेत्र में जांये, का एडमिषन किसी मीडिया से जुड़े पीजी कोर्स में हो गया होता। हममे से कुछ आआईएमसी, कुछ एमसीआरसी और कुछ एफटीआईआई में प्रवेश ले सके। कुछ अन्य निजी संस्थानों में चले गये। बांकियों ने मीडिया के क्षेत्र में कैरियर बनाने का सपना ही छोड़ दिया। खैर जो अब भी मीडिया के क्षेत्र में जाने का मन बनाये हुए हैं वो ऐसे लोग हैं जिनमें इस क्षेत्र में जाने की लगन थी। लेकिन इनमें अब भी दो वर्ग हैं। पहला वर्ग जो मीडिया को पैसा कमाने और अपनी रचनात्मकता को दिखाने का जरिया भर मानते हैं। और दूसरा जिन्हें लगता है कि मीडिया की समाज के लिए कोई ना कोई भूमिका जरुर है। हांलाकि ऐसे लोगों की संख्या कम है।
ऐसे छात्र मीडिया में अब किसी न किसी रुप में सक्रिय हो गये है। हांलाकि उनकी सक्रियता कई कारणों से बाधित भी होती है। मसलन उनके कोर्स के एसाइन्मेन्टस का दबाव और दूसरा मीडिया से मिलने वाले नकारात्मक रिस्पोंस। हांलाकि पहला कारण उनके भविष्य के लिहाज से सकारात्मक ही कहा जा सकता है, क्योंकि यह तकनीकें सीखने का दौर है। लिहाजा असाइन्मेंटस तो करने ही होंगे अगर कुछ सीखना है। लेकिन दूसरा कारण कुछ खतरनाक है। हमारे एक सीनियर अंकुर चैधरी ने यूथ पाब्साला नाम से एक पत्रिका को बढ़ जोश आ खरोस के साथ निकाला। इस पत्रिका को निकालने की प्रेरणा उन्हें उस दौर में आई फिल्म रंग दे बसंती से मिली। उन्होंने अपने ग्रुप के साथ मिलकर पत्रिका के लिऐ खूब मेहनत की। सभी ने मिलकर इतने पैसे जुटा लिये कि पत्रिका छापी जा सके। दूसरे अंक के लिये और ज्यादा मेहनत की गई। यह अंक मीडिया पर ही निकलना था। लगभग एक हजार लोगों के बीच में मीडिया से जुड़ा एक सर्वें किया गया। साथ ही दस पन्द्रह मीडिया प्रोफेष्नल के साक्षात्कार भी लिये गये। खुद मैंने एनडीटीवी के दिबांग का साक्षात्कार लिया था। रेडियो, प्रिंट और टीवी से जुड़े लोगों से बातचीत में कई रोचक तथ्य सामने आये, जिनपर मैं कभी बाद में विस्तार से लिखूंगा। खैर अब बात पैसे पर आ टिकी थी। ऐसे में सोचा गया कि क्यों ना मीडिया संस्थानों से ही पैसे का इन्तजाम किया जाये। लेकिन हर संस्थान ने निराश किया। और कुछ संस्थानों ने तो इस शर्त पर फंड देने की बात कि कि हमें अपने सर्वें को उनके नाम से छापना होगा। खैर अन्ततह पैसे के अभाव के चलते अंक नहीं निकल पाया। और सारी मेहनत बरबाद हो गयी। ऐसे छात्रों को प्रोत्साहित करने के लिये कोई व्यवस्था हमारे यहां नहीं है जो समानान्तर मीडिया की भूमिका निभाने का माददा रखते हैं। क्योंकि उनमें जोश भी होता है और उनपर किसी संस्थान का दबाव भी नहीं होता। हांलाकि मेरे कुछ मित्र अपने सीमित संसाधनों में अब भी ऐसे प्रयास कर रहे हैं। आईआईएमसी से हिन्दी पत्रकारिता कर रहे हिमांशु शेखर के सम्पादन में निकल रहा पत्र मीडिया स्कैन इसका अच्छा उदाहरण है। हांलाकि चार पन्नों के इस मासिक टैब्लौयड को अब अच्छी प्रतिक्रियांएं भी मिल रही हैं। मीडिया में लोग इसे जानने लगे हैं। लेकिन सवाल ऐसे प्रयासों का अस्तित्व बचाये रखने का है। क्योंकि ये प्रयास कमर्सियल मीडिया का एक विकल्प देने की बड़ी सम्भावना जगाते हैं। साथ ही मीडिया की पढ़ाई कर रहे छात्रों को उनके जनसरोकारों से जोड़े रखने में भी मदद करते हैं।

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