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मासूम दुपट्टा

हवा का वो मासूम दुपट्टा
उड़ता हुआ चुपचाप चला आता है

उस दिन छत पर तुम थी मैं था
और तभी उड़कर आया था एक दुपट्टा
ओढ़ा था उसे हम दोनों ने
और ठंडी सी वो लहर देह से लिपट गई थी।
बहुत देर तक दूर दूर चुपचाप खड़े थे हम दोनों
और दुपट्टा बहुत देर तक बोल रहा था।

उस दिन पेड़ की शाखों और पत्तियों ने
शायद उससे एक बात कही थी
मैं उस दिन भी रोज़ की तरहा तुम्हें देखता
अपने दिल के कोनों से कुछ बोल रहा था
सुन न सका वो बात
तुम्हें अगर कुछ याद आये
एक गांठ में उसको बांध के इक दिन रख देना

मुझे यकीं है  मेरे सिवा
उस गांठ को कोई नहीं खोलेगा
शायद फिर से वही दुपट्टा लौट के मुझ तक आ जाये
शायद उस दिन हम दोनों के बीच की गिरहें खुल जायें
हवा का वो मासूम दुपट्टा
उड़ता हुआ चुपचाप चला आता है।

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1 Comment on "मासूम दुपट्टा"

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samrat chakraborty
Guest

great thought.
the imagery works..to a grt extent..
umesh..i feel 16th line mein yakee, ko yakeen ya bharosa hona chahiye..
do u get my point..only an opinion.
otherwise..the visual element inherent to the lines is amazing.