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मानव व्यापार की राष्ट्रीय शर्म

आज विकीपीडिया पूरी दुनिया को ये बता रहा है कि भारत पूरी दुनिया में इन्सानों की खरीद फरोक्त का मूल केन्द्र है और यहीं से इस व्यापार के संक्रमण की शुरुआत होती है। ये उस देश के लिये बेहद शर्मनाक बात है जो हालिया सुरक्षा परिषद में अपनी स्थाई सदस्यता के दावे कर रहा है, जिसको विश्व में सबसे तेजी से उभरते देश के रुप में देखा जाता है। एक ऐसा देश जो कौमनवैल्थ जैसे बड़े आयोजन करवाके पूरी दुनिया की नजर अपनी ओर खींचने की कोशिश करता है उस देश की नजर अगर अपने ही देश में हजारों की तादात में खरीदे और बेचे जा रहे औरतों और बच्चों की सुरक्षा पर नहीं है तो ये सचमुच शर्म से डूबकर मरने वाली बात है। बावजूद इसके कि तथ्य और आंकड़े सार्वजनिक हैं और बाजार इतना संगठित कि भारत के गांवों से  औरतें और बच्चे दिल्ली ही नहीं बल्कि योरोप के देशों में बेरोकटोक बेची जा रही हैं और इस पर सरकार अपनी लगाम नहीं कस पा रही।

दुनिया भर में मानव व्यापार का ये कारोबार हथियारों और दवाओं के कारोबार के बाद सबसे तेजी से बढ़ता कारोबार है। मानवाधिकारों पर काम कर रहे एक संगठन शक्तिवाहिनी द्वारा 2004 में किये गये सर्वें के मुताबिक  इस व्यापार में जबरन शामिल किये जा रहे  लोगों का 10 प्रतिशत उद्योग धंधों में झोंक दिया जाता है और 90 प्रतिशत घरेलू कामों में।  महिला एवं बाल विकास मंत्रालय द्वारा जारी आंकड़े बताते हैं कि अकेले भारत में 25 लाख वैश्याएं हैं जो देश भर में फैले 3 लाख वैश्यालयों और 1100 रेड लाईट एरियाओं में अपनी देह का व्यापार कर रही हैं। और इनमें से ज्यादातर ग्रामीण क्षेत्रोें से लाई गई महिलाएं और लड़कियां हैं जिनसे जबरन ये काम करवाया जा रहा है। इस तथ्य का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि वैश्यालयों में काम कर रही 20 प्रतिशत लड़कियों की उम्र 18 साल से कम है। मानवव्यापार के इस पूरे कारोबार में शामिल लोगों का 50 प्रतिशत महिलाओं का है। पूरी दुनिया में 13 लाख बच्चे ऐसे हैं जिनका बचपन जबरन ही मजदूरी में झोंक दिया जाता है।

    भारतीय परिप्रेक्ष में देखें तो इस पूरे बाजार के अपने सामाजिक समीकरण हैं जिन्हें जातीय और आर्थिक आधार पर वर्गीक्रित करके समझा जा सकता है।  इस पूरे कारोबार में भारत अपनी अहम जगह रखता है और इस अहमियत को बनाने में ज्यादातर भारत के गरीब गावों की महिलाओं और बच्चों को शिकार बनाया जाता है। वैश्वीकरण से पहले 1989 से 1991 के बीच भारतीय गावों के 35.37 प्रतिशत लोग गरीबी रेखा से नीचे थे और वैश्वीकरण के दौर में 1995 से 1997 के बीच यह प्रतिशत 36.47 हो गया। माने ये कि भूमंडलीकरण ने ग्रामीण भारत में गरीबी को बढ़ाया और इसकी क्षतिपूर्ति करने के लिये भारत के इस अदृश्य और कम महत्वपूर्ण आंके जाने वाले भाग में मानव व्यापार सरीखे संक्रमण पनपने लगे। भारतीय गरीबों को देश विदेश में दैहिक और शारीरिक श्रम के बाबत बेचे जाने की कहानी यहीं से शुरु हो जाती है। इस खरीदफरोख्त के अपने जातीय समीकरण भी हैं। वैश्यावृत्ति में शामिल 60 प्रतिशत महिलाएं या तो अनुसूचित जाति से हैं या फिर जनजातीय इलाकों से। इनमें भी जो महिलाएं अशिक्षित और निचली जातियों से हैं उन्हें न्यूनतम 400 रुपये में खरीद लिया जाता है और कुछ पढ़ी लिखी और उंची जातियों की महिलाओं की कीमत 70 हजार रुपये तक भी लगाई जाती है। इससे बड़ी शर्म और क्या हो सकती है कि हरियाणा में आपको एक गाय खरीदने के लिये 15 से 25 हजार रुपये तक खर्चने होते हैं और दूसरी ओर एक औरत  महज 3000 रुपये में उपलब्ध है।

     भारत मानव व्यापार का वैश्विक गढ़ माना जाने लगा है। नैपाल और बांग्लादेश से औरतों, आदमियों और बच्चों को यहां लाकर पश्चिमी देशों में जबरन मजदूरी या देह व्यापार के लिये भेजा जाता है और यूरोपीय देशों से भारत आने वाले पर्यटकों की सेवा में भी इन्हें परोसा जाता है। इन लोगों को नौकरी, शादी या ऐसा ही कोई और झांसा देकर इस व्यापार का अंग बना दिया जाता है। समझा जा सकता है कि इस पूरे कारोबार के पीछे कितना बड़ा गिरोह काम कर रहा है। दुनिया के सबसे बड़े लोकतांत्रिक देश होने का दावा करने वाले देश को मानवाधिकारों के हनन की इस कहानी का नायक बनने में यदि कोई शर्मिंदगी नहीं होती तो ये सोचने वाली बात है। और यदि शर्मिंदगी है तो न केवल सरकार को बल्कि मीडिया को भी इस बाबत खुद जागरुक होना होगा और अपने आसपास के लोगो को जागरुक करना होगा। क्योंकि मानव व्यापार के ये व्यापारी हमारे और आपके बीच ही के कोई लोग हैं जो महज इसी वजह से खुलेआम अपना धंधा कर रहे हैं क्योंकि हमें इस बात से कोई फर्क ही नही पड़ता कि हमारे घर की चाहरदीवारी के ठीक बाहर आंखिर हो क्या रहा है। वो हमारी इस लापरवाही और उन लोगों की मजबूरी का खुलकर फायदा उठा रहे हैं जो इतने गरीब और बेबस हैं कि खुद पर हो रहे इस अन्याय के खिलाफ एक शब्द भी बोलने की हिम्मत नहीं कर पाते।

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