ताज़ा रेजगारी

महत्वाकांक्षाओं का ‘आप’निवेशिक काल

ये राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं का ‘आप’निवेशिक काल था. वो धारा जो न दक्षिणपंथी लगती थी, न वामपंथी अब वो ‘कमीनपंथी’ पर उतर आई थी. पार्टी बनाने वाले, पार्टी चलाने वाले के लिए ‘कमीने-साले’ हो गए थे. इस ‘आप’निवेशिक काल का अविर्भाव आदर्शों के अतिरेक की ज़मीन पर हुआ, वो ज़मीन जो दरअसल अपनी नहीं थी. देश के अन्नाओं, गांधियों, अम्बेडकरों की ज़मीन का अतिक्रमण करके वो ज़मीन कब्जाई गई थी. ठीक उसी दौर में जब देश के किसान ज़मीन के अधिग्रहण के कानूनों का विरोध कर रहे थे उसी दौर में राजनीतिक ज़मीन के अतिक्रमण की चेतना ‘आपनिवेशिक’ दौर के पुरोधाओं के मन में गुदगुदी करने लगी. ये राजनीति का वो ‘आप’निवेशिक काल था, जहां जिन नेताओं के जीवन में नेतृत्व का अकाल था, उन सबों ने अपने जीवन का इसमें निवेश किया. देशभर की क्रांतिकारी कंदराओं में छुपे हुए कामपन्थी, वामपंथी, धरना-चक्काजाम पंथी सबको यह निवेश विशेष रूप से आकर्षक लगा. कई ऐसे भी थे जिन्हें उम्मीदों के अकाल में भरोसे की एक सूखी रोटी (कच्ची ही सही) नज़र आई और वो दौड़े-दौड़े चले आए. उस निवेश के मूल में महत्वकांक्षाओं की भुरभुरी ज़मीन थी जिसे एक ऐसी हवा की खबर भी नहीं थी जिसके आने पर बिना किसी बहाने के वो ज़मीन ढहाई जा सकती थी.

‘इन्सान का इन्सान से भाईचारा’ की विचारधारा दरअसल एक चारा भर थी जिसे मतदाताओं के लिए डालकर उन्हें दुधारू गाय की तरह दुह दिया गया. (पर बाद में उसी दूध ने उनके दिमाग का दही कर दिया). बिजली, पानी स्वराज सब आपसी कलह की दराज़ में बंद कर दिया गया. लड़ते-भिड़ते, अपनी बात पर अड़ते रहना उनकी नियति बन गया. कर्ता-धर्ता की मशहूर खांसी ऐसी ठीक हुई कि ज़ुबान को विकार दे गई. पार्टी ‘आप’त्तिजनक बयानों की दूकान हो गई. इस बीच भीतर ही भीतर कई ‘टेपक’ जन्म ले चुके थे जिन्होंने समय-समय पर अपनी अद्भुत ‘टेपक’ प्रतिभा का प्रदर्शन किया और समाचारों में छा गए. ये ‘टेपक’ किनके दूत थे इस बात पर हमेशा उहापोह बना रहा. और इस उहापोह के चटाकेदार फल मीडिया की मंडी में महंगे दामों पर बिकते चले गए. झाड़ू चली तो पर वो भीतर के उस कूड़े को साफ़ नहीं कर पाई जो आखिरकार ज़ुबान से निकलने लगा.

शायरी चलती रही और विश्वाश गुंजाइशों में भी सिमटा न रह सका. जो अपने थे वो ‘आप’राधिक हो गए. वो ‘आप’ थे, फिर तुम हुए, फिर तू का उन्वां हो गए’… रफ्ता रफ्ता यूं होता चला गया जिसकी उम्मीद किसी को नहीं थी. जिसको इसकी उम्मीद थी वो आज खुश तो बहुत होंगे.

इस ‘आप’निवेशिक काल में जनता उस फ्री वाई-फाई की तरह हो गई जिसकी उम्मीदों के डेटा को जिसने चाहा जी भर का यूज़ किया. उस जनता की आत्मा का आतंरिक लोकपाल ये भी तय नहीं कर पाया कि उसकी गलती आखिर थी क्या. उनके वादों में जो बिजली थी, जो पानी था वो सिर्फ और सिर्फ ज़ुबानी था जनता ये सोच-सोचकर अवाक थी. और इस ‘अवाकत्व’ की आड़ में दूर बैठा कोई जोर जोर से कह रहा था- ‘सब्सिडी मत लो’, ‘सब्सिडी मत लो’… ‘आप’ एक राजनीतिक सब्सिडी ही थी जिसे लेना जनता को उसी तरह भारी पड़ गया जिस तरह किसानों को सब्सिडी का नाइट्रोजन लेना भारी पड़ गया था. दूर बैठा कोई इसलिए भी खुश था कि उसके वोरोधियों में से एक अज्ञातवास का लिबास ओढ़कर गायब फिल्म का तुषारकपूर हो गया था. और दूसरा ? जो इस ‘आप’निवेशिक काल का पुरोधा था वो छा-छा कर खुदको इतना छलनी कर चुका था कि अब छीछालेदार का शिकार हुआ जा रहा था.

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