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भोपाल का मृतलेख

आज फिर इन्साफ को मिट,टी में दफनाया गया
जमहूरियत की शक्ल का कंकाल फिर पाया गया।

उनकी सियासत की जदों में कत्ल मानवता हुई
कहके यही इन्साफ है फिर हमको भरमाया गया।

जिस शख्स की गलती के कारण मिट गई जानें कई
उसको बड़े आदर से उसके देश भिजवाया गया।

आता  है अब भी ज़हन में बच्चा वो मिटटी में दबा
अरसों से हर अखबार की सुर्खी में जो पाया गया।

सालों से जो आंखें लगाये आस बैठी थी उन्हें
नृशंसता की हद का यूं अहसास करवाया गया।

कैसे हैं जालिम लोग ये सत्ता पे जो बैठे हुए
न्याय को जो इस कदर फांसी पे लटकाया गया।

शहर में उस दिन बही जो गंध भ्रष्टाचार थी
यूनियन कार्बाईड जिसका नाम बतलाया गया।

बैठेंगे वो कुछ लोग बस कुछ वर्ष कारावास में
त्रासदी की भूमिका रचते जिन्हें पाया गया।

जी रहे थे हम के जिसमें वहम था जनतंत्र का
लोक को यूं तंत्र के पैरों से रुंदवाया गया।

तंत्र ही सबकुछ यहां है लोक की औकात क्या
इस पुराने सत्य को संज्ञान में लाया गया।

मंहंगे हैं उनके शौक और सस्ता है कितना आदमी
कल हमें इस आर्थिक पहलू को समझााया गया।

अन्याय की स्याही से ये लिक्खा हुआ मृतलेख है
कानून का जामा ओढ़ाकर हमको सुनवाया गया।

तब मरे थे लोग अब टूटा भरोसे का भी दम
इस तरह भोपाल पर भोपाल दोहराया गया।

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