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ब्लू वेल्वेट- माने मखमल के उस पार

परसों रात दो बजे जब फाईनली डिसाईड हो गया कि आज नीद नहीं ही आयेगी तो अपने फिल्मों के कलेक्शन पे गौर किया। रात काटने का ये एक बेहतरीन विकल्प मालूम हुआ। ब्लू वेल्वेट। डेविड लिंच की ये फिल्म किसी तरह छूट गई थी। सोचा देखी जाये। देखने के बाद लगा कि इसे देखने का इससे बेहतर वक्त शायद कोई और नहीं हो सकता था।

अगर आपने अल्फ्रेड हिचकौक की फिल्म साईको देखी हो और आपको उस जौनर की फिल्में पसंद हों तो तो ब्लू वेल्वेट आपके लिये ही बनी है। एक अजीब सा साईकोटिक संसार जहां जी रहे कैरेक्टर्स को उनकी विचित्र मेंटल स्टेट बेहद वियर्ड तरीके से बिहेव करने के लिये मजबूर कर देती है। वो आपके या हमारे जैसे लोगों की तरह मामूली बर्ताव नहीं करते। वो एक्स्ट्रीम वाली स्थिति है जहां कोई इसलिये इतना विचित्र हो जाता कि या तो वो निहायत मजबूर हो गया है या इसलिये कि वो निहायत कू्रर हो गया है। वर्ड सिनेमा में फिल्म नोआर एक पूरा दौर रहा है। उस दौर में ऐसी कई फिल्में बनी जिसके किरदार या गैंगस्टर थे या फिर साईकोटिक। या फिर दोनों ही। ये चरित्रों के भीतर के काले गहरे ग्रे शेडस उभारने वाली फिल्में थी। नेगेटिव करेक्टर्स इन फिल्मों में बड़ी अहमियत रखते थे। टैक्सी ड्राईवर, डबल इन्डेम्निटी, टच औफ इविल, सिटीजन केन, वर्टिगो, साईको जैसी कई फिल्में इस दौर में बनी। इन सारी फिल्मों के चरित्र कहीं न कहीं साईकोटिक थे। इन फिल्मों में सिम्बोलिजम बड़ी अहम भूमिका निभाता था। फेम फेटाल यानि नकारात्मक महिला किरदार इन फिल्मों में अहम भूमिका में रहती थी। डेविड लिंच की इस फिल्म को भी उसी स्रेणी में रखा जाता है।


एक कौलेज स्टूडेंट जेफरी को ल्यूम्बर्टन नाम के एक छोटे से कस्बे के अपने घर के पास के खेतों में एक आदमी का कान गिरा हुआ मिलता है। इसी खेत में कुछ समय पहले उसके पिता को एक अटेक आया था और वो बीमार हो गये थे। इस कान को लेकर वो एक डिटेक्टिव के पास जाता है ताकि इसके बारे में जांच पड़ताल की जा सके। दूसरे दिन डिटेक्टिव की बेटी सेंडी से उसकी मुलाकात होती है और वो उसको अपने पिता से मिलने वाली कुछ ख्ूाफिया जानकारियां देने का वादा करती है। वो उसे उसके पड़ौस में मौजूद एक घर के बारे में बताती है जहां एक विचित्र औरत रहती है। जैफरी सैंडी की मदद से उस औरत के बारे में पता लगाने का फैसला करता है। वो पेस्ट कंट्रोल वाला आदमी बनकर उसके घर में घुसता है लेकिन पहले दिन वो कुछ खास जानकारी हासिल नहीं कर पाता पर वहां से एक चाबी चुरा लेता है। दूसरे दिन वो चुपचाप उस कमरे में घुसता है। कुछ खोज ही रहा होता है कि उस घर में अकेले रहने वाली एक सिंगर डौर्थी अपने घर लौटती है। वो एक कबर्ड में छुप जाता है और उसे कपड़े बदलते हुए बिल्कुल नग्न अवस्था में देखता है। डौर्थी सोने को होती है कि उसे कबर्ड में हलचल सुनाई देती है। वो चाकू लेकर कबर्ड का दरवाजा खोलती है और जेफरी पकड़ा जाता है। वो जेफरी से पूछती है कि उसने क्या देखा। जेफरी बताता है। वो जेफरी से पूरे कपड़े उतारने के लिये कहती है और चाकू की नोक पर उसके साथ शारीरिक सम्बंध बनाती है। पर जेफरी को खुद का स्पर्श भी नहीं करने देती। तभी दरवाजे पर दस्तक होती है। वो जेफरी से कबर्ड में छुप जाने के लिए कहती है। वो दरवाजे के पीछे से एक आदमी को कमरे में आते देखता है। और वहां उसके सामने खुलती है एक बेहद विचित्र और डरावनी दुनिया। वो देखता है कि  डौर्थी नामकी ये खूबसूरत गायिका जो अब तक उसके साथ जबरदस्ती कर रही थी   निर्ममता की किस हद तक इस कमरे के अन्दर फ्रेंक नामके उस अन्डरवर्ड डौन से प्रताड़ित हो रही है।

 फ्रेंक एक साईकोटिक करेक्टर है जिसे डौर्थी को एक खास तरह से प्रताड़ित करने में मज़ा आता है। अपने चेहरे पे मास्क लगाकर और डौर्थी के मुंह में कपड़ा ठूंसकर वो उसके साथ जबरदस्ती करता है। डौर्थी असहाय है। बिल्कुल लाचार। एकदम कमजोर। जेफरी ये सब देखके डौर्थी के लिये सहानुभूति से भर जाता है। जैसे ही फ्रेंक वापस जाता है जेफरी कबर्ड से बाहर निकलता है। वो बिल्कुल टूट चुकी सी डौर्थी को हमदर्दी देता है। डौर्थी को इस हमदर्दी की बहुत जरुरत है क्योंकि फ्रेंक उसके साथ एक जानवर सा व्यवहार करता है। जेफरी फिर इस घर में रोज आना शुरु करता है। वो रोज फ्रेंक को उसके साथ जानवरों सा व्यवहार करते देखता है। एक दिन फ्रेंक उसे देख लेता है और उसे पकड़कर अपने गुंडों के साथ अपने अड्डों पे ले जाता है। यहां जेफरी को पता चलता है कि फ्रेंक एक अन्डरवर्ड से जुड़ा शातिर अपराधी है। वो उसके बेहद असामान्य दोस्तों से रुबरु होता है। फ्रेंक अपने दोस्तों के सामने ही कार के अन्दर फिर अपने वहशियाना अंदाज़ में डौर्थी को प्रताड़ित करने लगता है। इस बार जेफरी उसका विरोध करता है। फ्रेंक अपने गुडों की मदद से उसको बुरी तरह पीटता है। वो बदहवाश हो जाता है। यहां सेंडी को पता लगता है कि जेफरी और डौर्थी के बीच किसी तरह का रिश्ता पनप रहा है। इस रिश्ते की गंध उसे अच्छी नहीं लगती। एक दिन सेंडी और जेफरी अपनी कार में कहीं जा रहे हैं। एक दूसरी कार उनका पीछा करती है। उससे कुछ लड़के बाहर निकलते हैं और एक महिला को जेफरी के सुपुर्द करते हैं। ये महिला डौर्थी है। जो बिल्कुल नग्न अवस्था में है। बिल्कुल बदहवास सी। उसके साथ फिर बुरी तरह से मारपीट की गई और उसे रास्ते में कहीं फेंक दिया गया। जेफरी को अपने पास पाते ही वो उससे लिपट जाती है। जैसे उसकी समीपता उसकी जिन्दगी की केवल और केवल उम्मीद हो। वो उसे लेकर सेंडी के घर में जाते हैं। और फिर उसी कान के एक क्लोजअप के साथ फिल्म समाप्त हो जाती है जो कान जैफरी को फिल्म की शुरुआत में मिलता है।

डेविड लिंच की इस फिल्म में न्यूडिटी तो है लेकिन उसे देखके एक अजीब सा सेंसेशन होता है। ऐसा सेंसेशन जो लस्ट के बिल्कुल करीब नहीं है। मानव स्वभाव के बेहद अंधेरे कोनों से ये फिल्म रुबरु कराती है। विकृत सी मनोवैज्ञानिक दुनिया में ले जाती है। एक खास किस्म का थ्रिल आपके अन्दर बहने लगता है। डेविड लिंच की ये फिल्म एब्सट्रेक्ट होने के बेहद करीब है। ऐसी फिल्मों को देखने के तुरंत बाद एक बेहद नकारात्मक किस्म का अहसास होने लगता है। उस खास किस्म की विकृत दुनिया के लिये घृणा पैदा होने लगती है। ऐसी फिल्में बेचैन करने लगती हैं। विश्व सिनेमा के एक पूरे दौर में ऐसी फिल्में बनी हैं। जिससे एक बात बेहद साफ हो जाती है कि हमारे आम जनजीवन के इर्द गिर्द या उसके बीच ही कहीं एक ऐसी विकृत दुनिया रहती है जहां पीड़ित करने और पीड़ा सहने की हदें पार होती हैं। फिल्म नोआर के दौर की ये फिल्में उसी दुनिया की उपज हैं।

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1 Comment on "ब्लू वेल्वेट- माने मखमल के उस पार"

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rohit
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यार संयोग है कि कल ही मैंने भी यह फिल्म देखी है। उसके बाद तुम्हारे ब्लॉग पर समीक्षा पढ़ रहा हूं। अच्छा लिखा है। अपने बलॅग पर भी लगा रहा हूं में ये समीक्षा।

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