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बोल कबीरा तब क्या हैगा

कभी गुलामी मातम थी
पर आज गुलामी उत्सव हैगा
कौमनवेल्थ के जरिये बिकना
आज देश का गौरव हैगा।

लूट खसोट की मैराथन में
भ्रष्टाचार का शासन हैगा
अब तो वो भी बिक जाना है
घर में जितना राशन हैगा।

कितना कौमन वैल्थ हमारा
इसको उसको बंटता हैगा
आम आदमी चुपकर प्यारे
तुझको काहे खटता हैगा।

बंदरबांट का मेला देखो
हर चेला मदारी हैगा
कब्ज न होती पच जायेगा
पैसा पाचनकारी हैगा।

कल्माड़ी की दाड़ी भीतर
काले धन का मंतर हैगा
हाथ फिराकर नीलामी में
बेचता परजातंतर हैगा।

मंहंगे मंहंगे होटल हैंगे
मंहंगा मंहंगा खाना हैगा
झुग्गी झोपड़ तोड़ के मेरा
स्वीमिंग पूल बनाना हैगा।

फ्लाई ओवर की उंचाई के
नीचे जो चारपाई हैगी
उसपर डैंगू डंक के मारे
लेटी कोई माई हैगी।

देशी देह से मन न भरेगा
बाहर से मगवाई हैंगी
औरत की बिकवाली खातिर
एजेंसियां बनवाई हैंगी।

पैसों की बरसात हो गई
अब बारिस का पानी हैगा
कौन करे अब कारज पूरा
जो होगा वरदानी हैगा।

शीला जी तोहरी अंखियन में
चिन्ताओं का सुनामी हैगा
एक एक कर सारी मर गई
अब डैडलाईन आगामी हैगा।

बाहर वाला मना कर गया
भीतर वाला जारा हैगा
डोपिंग की गरमी में चढ़ता
संख्याओं का पारा हैगा।

सत्र गुना पैसा हाई रामा
इन खेलों में बहाया हैगा
शुकर करो इन मंत्री जी को
ओलम्पिक ना भाया हैगा।

थोडे़ दिन हैं थोड़े दिन में
देखो कैसा ड्रामा हैगा
अरबों खरबों का सौदागर
मंत्री जी का मामा हैगा।

दिन की घटती धक धक बढ़ती
कोई न जाने अब क्या हैगा
जिस दिन देश की भद्द पिटेगी
बोल कबीरा तब क्या हैगा।

उमेश पंत

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2 Comments on "बोल कबीरा तब क्या हैगा"

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शैलेन्द्र नेगी
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जो कॉमनवेल्थ दिल्ली में विकास के सपने लेकर आया था. वो आज लूट का महोत्सव बन कर रह गया है. ये हाल तब हैं जब ये खेल देश की राजधानी में हो रहे हैं जहां पूरी की पूरी सरकारी मशीनरी रात दिन लगी हुई है और राष्ट्रीय मीडिया भी मौजूद है. लेकिन एक सवाल जो मुझे लगातार परेशान किए जा रहा है वो है की आखिर ये कैसा खेल है जिसके लिए हमारे रधानमंत्री को तक मैदान में उतरना पड़ा? और ये सब हो रहा है देश की झूठी शान की खातिर. जैसे ही कोई इस लूट के खेल के… Read more »
निखिल आनन्द गिरि
Guest

वाह भाई…बस एक डफली की कमी है और सड़क पर उतरना बाक़ी है…मैं तो तैयार हूं….लगे रहो…